क्या इससे रुक जाएगा हिंदू राष्ट्र का रथ? – अरुण कुमार त्रिपाठी

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Will this halt the chariot of the Hindu Rashtra?

Arun Kumar Tripathi
शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा और शिक्षा में सुधार की मांग को लेकर दिल्ली के जंतर मंतर से पूरे देश में फैल चुका युवाओं का आंदोलन क्या हिंदू राष्ट्र के रथ को रोक देगा? यह सवाल एक दूर की कौड़ी हो सकता है लेकिन अप्रासंगिक नहीं। क्योंकि काकरोच जनता पार्टी के नाम से शुरू हुए एक विलोम प्रहसन ने युवाओं के संचित आक्रोश और उसके पीछे काम करने वाली समझ और तर्कशक्ति को जिस तरह से प्रकट किया है उससे इस सवाल का जवाब ‘हां’ में दिया जा सकता है। विपक्षी दलों ने इस सवाल को सड़क से उठाकर संसद तक पहुंचाया और फिर उसे सड़क तक ले जा रहे हैं, इससे भी एक आशा बनती है। लेकिन विपक्षी दलों के भीतर इस आंदोलन का श्रेय लेने की जो होड़ है और एक साथ न चलने की जो जिद है वह स्थिति निराश करती है। निराश करती है आंदोलन के बारे में चलने वाली साजिश की थ्योरी भी। इसी के साथ निराश करती है भारतीय राज्य की दमन शक्ति और इस समय उसे संचालित कर रही संघ परिवार की विचारधारा और उसका व्यापक धन बल। तभी लोग डर रहे हैं कि भाजपा सरकार कहीं ‘थियेनआन मन चौक’ न कर दे जैसा कि चीन ने 1989 में छात्रों पर टैंक चलाकर किया था।

प्रदर्शन में आए युवाओं की समझ और आक्रोश देखकर साफ तौर पर लगता है कि वे महज धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और पीड़ित परिवारों के मुआवजे से शांत होने वाले नहीं हैं। वे अपनी कक्षाएं छोड़ कर आए हैं, वे अपनी नौकरियों से छुट्टी लेकर आए हैं, वे अपने माता पिता से झगड़ा करके आए हैं और उनमें से कई तो घर से बिना बताए बिना टिकट महज चना चबेना लेकर आए हैं। उनकी टिप्पणियां माता पिता, शिक्षकों और अभिभावकों की उस राय को खंडित करती हैं कि यह पीढ़ी तो एआई(कृत्रिम बुद्धि) वाली है, यह तो हमेशा मोबाइल में लगी रहती है, यह तो कायर है, स्वार्थी है सिर्फ डाटा खर्च करती है, उसे देश और समाज से क्या लेना देना, उसे तो अपना करियर ही प्यारा है। इसलिए इस देश को हिंदू राष्ट्र तो बनना ही है और यहां फासीवाद कायम होना है। जंतर मंतर पर एक युवती का यह कहना कि मैं तो सिविल सेवा की तैयारी कर रही थी लेकिन जब देखा कि एक आईपीएस अधिकारी बेगुनाह बच्चों को पीट रहा है और महिलाओं को थप्पड़ ही नहीं मार रहा है बल्कि उनके स्त्रीत्व की तौहीन कर रहा है, तो मेरा मन भर गया और मैं साफ कहती हूं कि मुझे आईपीएस नहीं बनना है। एक युवा तो दरोगा के पद से इस्तीफा देकर आ गया। ऐसे बहुत से स्वर सुनाई पड़ रहे हैं जिनमें संविधान सभा की बहसों की गूंज है, भगत सिंह के अन्याय विहीन समाज का सपना है, डॉ आंबेडकर के लोकतंत्र का दर्शन है। उनमें हिम्मत है खून बहाने और सिर फुड़वाने और फिर भी पीछे न हटने की। सरकार को चाहिए था कि वह ऐसे समझदार और राष्ट्र के लिए समर्पित युवाओं की न सिर्फ मांगें मान लेती बल्कि संसद का द्वार खोलकर उनका स्वागत करती। उन्हें छोटी छोटी टुकड़ियों में बुलाकर संसद की कार्रवाई दिखाते हुए यह कहना था कि यह आप का ही है और हम आप के मालिक नहीं सेवक हैं। लेकिन संसद को लोकतंत्र का मंदिर बताकर उसके द्वार पर माथा टेकने वाले और अपने को प्रधान सेवक ने ऐसा कुछ नहीं किया।

दरअसल अहंकार, झूठ, पाखंड और अन्याय के सातवें आसमान पर बैठी सरकार और उसके कारिंदे अपने को दैवीय अवतार मानते हैं और वे बाकी मनुष्यों को क्षुद्र समझते हैं। इसलिए उन्होंने युवाओं को करंट और कीलों वाली लाठियों से मारा, आंसू गैस से आहत किया और पेलेट गन से उनका शरीर छेद दिया। इस तरह 20 जुलाई 2026 को जंतर मंतर से निकला युवाओं का संसद मार्च अगर देश के सरोकारी युवाओं और नागरिकों के जनउभार के लिए इतिहास में दर्ज हो गया तो उस दिन की दमनात्मक कार्रवाइयां एक हिंदुत्ववादी सरकार की नृशंसता के लिए भी लंबे समय तक याद की जाएंगी। अस्पतालों में जिंदगी और मौत से जूझ रहे युवाओं की पीड़ा और सरकार के विरुद्ध बने देशव्यापी आक्रोश ने अमेरिका में 25 मई 2020 को एक काले व्यक्ति जार्ज लायड की पुलिस दमन से हुई मौत के बाद उभरे ‘आई कॉन्ट ब्रीथ’ और ‘ब्लैक लाइफ मैटर्स’ जैसे आंदोलनों की याद दिला दी है। हम मौजूदा आंदोलन को ‘यंग लाइफ मैटर्स’ का आंदोलन भी कह सकते हैं।

जिस तरह अमेरिका में उस घटना के बाद गोरे काले समेत पूरे देश की एकता बनी थी उसी तरह शिक्षा में सुधार के लिए अभिजीत दीपके और सोनम वांचुक की पहल से शुरू हुए इस आंदोलन ने पूरे देश के युवाओं और फिर उनके पीछे माता पिता को भी एकजुट कर दिया है। वे माता पिता भी युवाओं के साथ खड़े हो गए हैं जो भाजपा सरकार और उसके नेता नरेंद्र मोदी के भक्त हुआ करते थे। क्योंकि उन्हें अपने बच्चों के भविष्य की चिंता है और अब बच्चों को चिंता है इस देश के भविष्य की। जबकि उनके माता पिता ने 2014, 2019 और 2024 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा को चुनाव में विजय दिलवाई और मनमानी करने के लिए ब्लैंक चेक दे दिया था। यह एक किस्म का पीढ़ीगत विद्रोह भी है।

इस आंदोलन की उपलब्धि यह है जो युवा वर्ग दरबारी चैनलों और विभाजनकारी नेताओं के माध्यम से प्रचारित मंदिर मस्जिद, नमाज पूजा और गाय-गोरू के हिंदू मुस्लिम आख्यान के आधार पर विभाजित हो रहा था वह अब चेत गया है। उसने देखा कि कनॉट प्लेस में लाठी की मार से भागते युवाओं के लिए मंदिर के पुजारियों ने दरवाजे बंद कर लिए लेकिन वहां की मस्जिद और बंगला साहिब गुरद्वारे ने उनकी रक्षा और भोजन पानी के लिए दरवाजे खोल दिए। तभी युवा वहां पर नारे लगा रहे हैं—जब जब मोदी डरता है, हिंदू मुस्लिम करता है। कुछ महीने पहले जब परिसरों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए यूजीसी नियमावली आई थी तब युवा वर्ग सवर्ण और अवर्ण में विभाजित हो गया था। कुछ समय के लिए लगा कि संघ परिवार की विभाजनकारी रणनीति सफल हो गई और इस देश का युवा कभी सेक्यूलर मुद्दों के लिए एक साथ खड़ा नहीं होगा। लेकिन इस आंदोलन ने हिंदू- मुस्लिम, सवर्ण- अवर्ण, पूरब- पश्चिम, उत्तर- दक्षिण, युवक- युवती सभी को एक जुट कर दिया है। वे एक लोकतांत्रिक और सेक्यूलर देश की मांग कर रहे हैं, जहां मानवीय गरिमा कायम रहे।

युवाओं को अहसास हो गया है कि भाजपा और संघ परिवार राष्ट्रीय शिक्षा नीति के बहाने न सिर्फ शिक्षा का भगवाकरण कर रहे हैं बल्कि उसका व्यावसायीकरण भी कर रहे हैं। इससे एक तो देश का ताना बाना टूट रहा है और दूसरी ओर तमाम लोग अच्छी शिक्षा से वंचित हो रहे हैं। बहुत सारे शोध परियोजनाओं को बंद किया जा रहा है। सीएसडीएस जैसे समाजशास्त्र के संस्थान बंद हो रहे हैं। विश्वविद्यालयों और दूसरे शैक्षणिक संस्थानों की स्वायत्तता छीनी जा रही है। वैज्ञानिक शोध नहीं हो पा रहे हैं। विश्वविद्यालय परिसर में छात्र संघ के चुनाव प्रतिबंधित हैं। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में हिंसा करके उसे बदनाम कर दिया गया। लगभग 90,000 सरकारी स्कूल बंद कर दिए गए। शायद संघ यह काम इसलिए कर रहा है ताकि वह भारत की साझी विरासत को मिटाकर लोगों के दिमाग का हिंदूकरण करके इस देश को आसानी से हिंदू राष्ट्र घोषित कर सके।

इस आंदोलन से शिक्षा में सुधार यानी भगवाकरण और व्यावसायीकरण रोकने की आवाज तो बुलंद हुई है, साथ में मानवाधिकार का सवाल भी उठ रहा है। उठ रहा है पुलिस व्यवस्था में सुधार का सवाल भी। इन सबसे ऊपर लोकतांत्रिक चेतना की नई लहर भी उठी है। देश के संवेदनशील कलाकार और रचनाकार युवाओं पर हुए दमन से बहुत गुस्से में हैं। नसीरुद्दीन शाह ने न सिर्फ मौजूदा निजाम को ‘जाहिल’ कहा है बल्कि यह भी कहा है कि किसी भी गुरु को सबसे अधिक शिक्षा अपने शिष्य से ही मिलती है।
ऐसे में युवाओं ने यह उम्मीद जता दी है कि वे हिंदू राष्ट्र के बढ़ते हुए रथ को रोक सकते हैं और वेंटिलेटर पर पड़े लोकतंत्र को फिर से जिंदा कर सकते हैं। क्या विपक्षी दल उनके इस संदेश को सुन रहे हैं? शबानी आजमी ने युवाओं को संबोधित करते हुए अपने पिता कैफी आजमी की नज्म का एक शेर पढ़ा है जो युवाओं के इस देश व्यापी आंदोलन के लिए मौजूं हैः—
कोई तो सूद चुकाए, कोई तो जिम्मा ले,
उस इंकलाब का जो आज तक उधार सा है


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