नामवर सिंह के आलोचना-संसार की नई संदर्भों में पड़ताल

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नामवर सिंह (28 जुलाई 1926 - 19 फरवरी 2019)

नव नालंदा महाविहार में जन्म-शताब्दी समारोह के दौरान नामवर सिंह के साहित्य, आलोचना और वैचारिकी पर विमर्श

हिंदी आलोचना के अप्रतिम व्यक्तित्व नामवर सिंह की जन्म-शताब्दी के अवसर पर नव नालंदा महाविहार में आयोजित संगोष्ठी में उनके साहित्यिक चिंतन और आलोचनात्मक अवदान को समकालीन संदर्भों में समझने का प्रयास किया गया। आचार्य नागार्जुन संकाय भवन के सप्तपर्णी सभागार में हुए आयोजन में वक्ताओं ने नामवर सिंह के विचार-संसार को साहित्य तक सीमित न मानते हुए इतिहास, दर्शन, मिथक, संस्कृति और आधुनिक बौद्धिक बहसों से जुड़े व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा।

अपनी प्रस्तावना में प्रो. रवींद्र नाथ श्रीवास्तव ‘परिचय दास’ ने कहा कि नामवर सिंह की आलोचना का आधार किसी रचना के संबंध में तत्काल फैसला सुनाना नहीं था। वे रचना के भीतर उतरकर उसके अंतर्निहित अर्थों, सामाजिक स्थितियों, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और मानवीय अनुभवों को समझने का प्रयास करते थे। उन्होंने कहा कि नामवर सिंह ने साहित्य को विचारधारात्मक जड़ता और पहले से तय निष्कर्षों से मुक्त रखते हुए उसे लगातार सवाल उठाने और बहस करने की जगह बनाए रखा।

उन्होंने कहा कि नामवर सिंह के लिए साहित्य केवल कलात्मक सौंदर्य का विषय नहीं था और न ही किसी राजनीतिक विचार का सीधा विस्तार। साहित्य मनुष्य, समाज और समय के बीच बनने वाला बहुस्तरीय संबंध था। इसी कारण उनकी आलोचना में रचना का सौंदर्य, उसका सामाजिक संदर्भ और उसका वैचारिक अर्थ एक-दूसरे से अलग नहीं होते।

उन्होंने कहा कि नामवर सिंह की आलोचना साहित्य को उसके व्यापक जीवन-संदर्भ में पढ़ने की मांग करती है। उनके यहां इतिहास और मिथक, परंपरा और आधुनिकता, साहित्य और दर्शन तथा रचनात्मक लेखन और आलोचना के बीच निरंतर आवाजाही दिखाई देती है। मिथक पर चर्चा करते हुए कहा गया कि उसे केवल प्राचीन कथा या धार्मिक आख्यान मानना उसके सांस्कृतिक विस्तार को कम करके देखना है। मिथक समाज की स्मृतियों, अनुभवों और ऐतिहासिक चेतना को जोड़ने वाली सक्रिय संरचना भी है।

मुख्य अतिथि वरिष्ठ आलोचक एवं रचनाकार डॉ. गया सिंह ने कहा कि नामवर सिंह की आलोचना की शक्ति उसकी गतिशीलता में थी। वे साहित्य को अतीत में स्थिर किसी वस्तु की तरह नहीं देखते थे। उनके लिए रचना अपने समय के साथ संवाद करती हुई जीवित उपस्थिति थी। डॉ. सिंह ने कहा कि नामवर सिंह के यहां संवेदना और तर्क, साहित्यिक आस्वाद और वैचारिक अनुशासन साथ-साथ चलते हैं।

उन्होंने कहा कि नामवर सिंह के आलोचनात्मक अवदान को समझने का अर्थ साहित्य और जीवन के बीच मौजूद गहरे संबंधों को समझना भी है। उन्होंने हिंदी साहित्य को भारतीय चिंतन-परंपरा तथा विश्व के व्यापक बौद्धिक विमर्श से जोड़ने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। डॉ. गया सिंह ने कहा कि साहित्य और दर्शन को अलग-अलग खानों में रखकर देखने की प्रवृत्ति से बचना होगा। भारतीय साहित्यिक चिंतन की अपनी समृद्ध वैचारिक परंपरा है, जिसका आधुनिक सिद्धांतों के साथ संवाद आवश्यक है, लेकिन यह संवाद अपनी सांस्कृतिक और दार्शनिक जमीन पर खड़े होकर होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि नामवर सिंह की आलोचना असहमति को रचनात्मक शक्ति में बदलती है और साहित्यिक विमर्श को लगातार गतिशील बनाए रखती है।

अध्यक्षीय वक्तव्य में कुलपति प्रो. सिद्धार्थ सिंह ने कहा कि नामवर सिंह के यहां परंपरा और आधुनिकता का संबंध टकराव का सरल समीकरण नहीं था। वे परंपरा में वर्तमान से संवाद की क्षमता देखते थे और आधुनिकता को प्रश्न करने तथा स्थापित धारणाओं की जांच करने की प्रक्रिया के रूप में समझते थे। उन्होंने कहा कि नामवर सिंह की आलोचना पाठक को निष्कर्ष थमाने के बजाय उसे स्वयं सोचने की चुनौती देती है।

उन्होंने कहा कि आलोचना अपने मूल स्वभाव में रचनात्मक प्रक्रिया है। आलोचक का काम केवल किसी रचना का मूल्यांकन करना नहीं, बल्कि उसके भीतर काम कर रहे इतिहास, सामाजिक शक्तियों, संवेदनात्मक अनुभवों और विचार-तत्वों को सामने लाना है। उन्होंने कहा कि नामवर सिंह की आलोचना ने हिंदी साहित्य में जीवंत बहस की परंपरा को मजबूत किया और आलोचना को एक गंभीर बौद्धिक कर्म के रूप में प्रतिष्ठित किया।

कार्यक्रम का संचालन हिंदी के अतिथि प्राध्यापक श्री विकास सिंह ने किया। धन्यवाद-ज्ञापन हिंदी की अतिथि प्राध्यापक सुश्री शिवानी जायसवाल ने किया। राष्ट्रगान के साथ समारोह संपन्न हुआ।

संगोष्ठी में यह विचार प्रमुखता से सामने आया कि नामवर सिंह की जन्म-शताब्दी महज श्रद्धांजलि या स्मरण का अवसर नहीं है। यह उनके विचारों को नए समय, नए प्रश्नों और बदलते साहित्यिक-सामाजिक संदर्भों में फिर से पढ़ने का अवसर है। उनकी आलोचनात्मक विरासत किसी अंतिम निष्कर्ष में नहीं, बल्कि प्रश्न करने, बहस को जीवित रखने और साहित्य को मनुष्य के व्यापक अनुभव से जोड़कर देखने की निरंतर प्रक्रिया में निहित है।


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