वेंटिलेटर पर लोकतंत्र और युवाओं का भविष्य

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जिन लोगों ने 18 मार्च 1974 को पटना का छात्र आन्दोलन देखा था, वे अनायास 20 जुलाई 2026 को जंतर-मंतर पर हुए युवा आंदोलन से उसकी तुलना कर रहे हैं। जय प्रकाश नारायण ने भारत में लोकतंत्र के प्रति बढ़ती निराशा को देखकर ही दिसंबर 1973 में “यूथ फार डेमोक्रेसी” लोकतंत्र की चुनौतियों का सामना करने केलिए युवाओं का आह्वान किया था। उसके बाद ही गुजरात में नवनिर्माण आन्दोलन हुआ और वहां की सफलता के बाद बिहार के युवाओं ने आन्दोलन शुरू किया। इसका मूल उद्देश्य सरकार बदलना नहीं था। वे सत्ता के केंद्रीयकरण के चलते उपजे भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, मंहगाई और कुशिक्षा के खिलाफ थे।

लेकिन हम तब की स्थित से आज की तुलना करें तो परिस्थितियों को देखकर कर आश्चर्यचकित हो जाएंगे। जंतर-मंतर पर आंदोलन के दौरान युवाओं पर , महिलाओं पर जिस तरह पुलिस और गुंडों द्वारा अत्याचार किया गया वह पूरे देश ने देखा, और आन्दोलन तत्काल पूरे देश में फैल गया । युवाओं में से “साक्षी “पर इतने हमले किये गये कि उसके लिए सांस लेना दुर्लभ होगया। अस्पताल में उसका गला काट कर वेंटिलेटर बनाया गया, जिससे खाना पानी दिया जा सके। निहत्थे भरत को घेर कर जब चार पुलिस कर्मी लाठियां बरसाने लगे,तो उसने प्रतिवाद नहीं किया, बल्कि कहा कि मारो, और मारो, जांन से मार डालो !!! फिर भी लाठियां बरसती रहीं तो एक महिला पुलिसकर्मी को दया आ गयी और वह उसे बचा कर ले गयी। पुलिस और उनके गुंडों की एक एक अत्याचार की घटना सोशल मीडिया के माध्यम से पूरा देश देख रहा था। DCP स्तर का अधिकारी खुद महिलाओं को पीट रहा था और कुछ तो बच्चियों का यौन उत्पीडन कर रहे थे। उधर मुंबई अकेली लड़की रिया ने उस बस को रोक दिया जिसमें बेकसूर बच्चों को भरकर जेल ले जाया जा रहा था और सभी बच्चों को छुड़ा लिया। ऐसे पचासों उदाहरण देश ने देखे और सैकड़ों अनदेखे रह गए। बिहार के सिवान जिले में तो पुलिस ने युवाओं को AK 47 से भून डाला। इन घटनाओं ने पूरे देश के युवाओं को एकजुट कर दिया। खुद भाजपा के मंत्री और सांसद के बच्चों ने भी, अपने अभिभावकों की अवहेलना करते हुए,आन्दोलन का स्मरण करने की घोषणा की है।

हम ऐसे परिदृश्य की 1974 में कल्पना भी नहीं कर सकते थे। लेकिन असल समस्या उससे बहुत बड़ी है। आज पूरा देश में लोकतंत्र मरनासन्न है, लेकिन 20 जुलाई की घटना से उसके गले में एक वेंटिलेटर लग गया है। लोकतंत्र अब सांस ले पा रहा है। मोदी सरकार के प्रधानमंत्री और गृह मंत्री संसद में विपक्ष का सामना करने से डर रहे हैं। मुंह में राम, बगल में छूरी रखने वाले इन भाजपाइयों का नैतिक दिवालियापन तो उसी दिन उजागर हो गया था, जब चंदा चोरी का मामला जनता के सामने आया। यह भी उजागर हुआ कि चंपतराय ने मंदिर केलिए दो करोड़ की जमीन 18 करोड़ में खरीदी थी। यह उजागर होने के बाद भी भाजपा आरएसएस ने उन्हें नहीं हटाया था। साफ मतलब है कि मंदिर के चंदे के पैसे से भाजपा चुनाव लड़ती है और विधायकों सांसदों को खरीदती है। यदि सांसद और विधायक पैसे पर खरीद लिए जाते रहें तो जनता के वोट देने का क्या फायदा?

सोवियत संघ के समाप्त होने तथा वर्ल्ड ट्रेड आर्गनाइजेशन WTO के बाद से अनेक सरकारों पर पूंजीपतियों ने कब्जा कर लिया है। अमेरिका भी पूंजीपतियों के दबाव में ईरान पर हमले कर रहा है। भारत के पूंजीपतियों ने भी मिलकर तय किया कि आडवाणी के बदले नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाना जाये। पैसे के लालच में भाजपा ने इसे कबूल कर लिया। धीरे-धीरे सभी मुख्य मीडिया पर भारत के बड़े उद्योगपतियों ने कब्जा कर लिया। हर हर मोदी, घर घर मोदी, का प्रचार अभियान तभी से चल रहा है। इससे आम जनता के दिमाग पर भाजपा ने कब्जा कर लिया है। मीडिया जनता के सवालों को उठाने की जरूरत नहीं समझता, क्योंकि उसके घाटे को पूरा करने केलिए बड़े उद्योगपति मौजूद हैं। वह लगातार हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई आदि में नफ़रत फैला कर हमारी एकता को तोड़ने में लगा हुआ है। लेकिन सोशल मीडिया के विकास से आम लोगो तक सत्य पहुंचने लगा है। यह मोदीजी की चिंता का बहुत बड़ा कारण है।

सिर्फ मीडिया ही नहीं पूरे लोकतंत्र पर मोदीजी ने कब्जा कर लिया है। आज चुनाव में इतना खर्च होता है कि ईमानदार नेता का जीतना बहुत कठिन हो गया है, जो देश में भ्रष्टाचार समाप्त करने की पहल करें। मोदीजी को देशी ही नहीं विदेशी उद्योगपति भी भर पूर चंदा देते हैं। राफेल जहाज का घोटाला याद ही होगा। इलेक्टोरल बांड और प्रधानमंत्री केयर फंड आदि से भी हजारों करोड़ मिलता है। सरकारी कंपनियों को बेचने से अडाणी आदि पूंजीपतियों को जो लाभ मिलता है उसमें भाजपा भी बराबर की हिस्सेदार है। शेष सरकारी कंपनियों का मुनाफा भी भाजपा आरएसएस से जुड़ी संस्थाओं को जाता है। फिर कौशल प्रशिक्षण आदि योजनाओं में भ्रष्टाचार से अरबों की रकम भाजपा को जाती है। नीट और अन्य परीक्षाओं में घोटाले का लाभ भी भाजपा नेताओं को ही मिलता है। इतने विशाल फंड का मुकाबला करना अन्य राजनैतिक दलों के लिए असंभव है। फिर भी भारत की जनता कई बार पैसे पर बिकने से इंकार कर देती है।

मोदीजी का लक्ष्य भारत में लोकतंत्र को समाप्त कर के रूस या चीन की तरह स्थायी शासन लागू करने का है। आरएसएस की विचारधारा भी लोकतंत्र विरोधी है। इसीलिए आजादी के आंदोलन का विरोध किया गया और आजादी के बाद अनेक राजाओं को भारत में विलय से रोकने की कोशिश की गई। लेकिन गांधी जी की हत्या और सरदार पटेल जी की कोशिशों से यह षडयंत्र सफल नहीं हो सका। फिर भी अनेक वर्षों तक राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रीय गीत का अपमान किया गया और खुले आम कहा गया हम भारत के संविधान को नहीं मानते हैं। वे मनुस्मृति, जिसमें महिलाओं और दलितों का घोर उत्पीड़न के नियम हैं,भारत पर लागू करना चाहते हैं। विगत लोकसभा चुनाव में उन्होंने “अबकी बार,चार सो पार” का लक्ष्य घोषित किया था। लेकिन जनता ने उनकी योजना को नकार दिया और भाजपा बहुमत से भी नीचे चली गई। यह और बात है कि नीतीश और नायडू जैसे नेताओं ने भाजपा सरकार को बचा लिया। फिर भी भाजपा इसी कोशिश में लगी हुई है पुर्ण बहुमत पाकर देश पर मनुवादी संविधान लाद दिया जाए।

भाजपा ने सबसे पहले ईडी सीबीआई आदि के द्वारा नेताओं को ब्लैकमेल करके अपनी पार्टी में लाना शुरू किया। अनेक ऐसे नेता हैं जो भाजपा में जाने के साथ भ्रष्टाचार के आरोपों से मुक्त हो गये। दूसरा हथियार चुनाव आयोग बना। सरकार ने चुनाव आयोग की नियुक्ति करने वाली टीम से मुख्य न्यायाधीश को हटा कर अमित शाह को जोड़ दिया। आज के मुख्य चुनाव आयुक्त अमित शाह के सबसे करीबी अधिकारी रहे हैं। इसके अलावा एक कानून बनाया गया है कि यदि चुनाव आयुक्त कोई अपराध करते हैं तो उन्हें कोई सज़ा नहीं मिलेगी। ऐसा विचित्र कानून दुनिया में कहीं नहीं पाया जाता है। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ऐसे कानून को रद्द करना तो दूर विचार भी नहीं कर रहा है। वास्तव में आज न्यायपालिका मोदीजी का तीसरा और सबसे शक्तिशाली हथियार बन गया है। न्यायपालिका संविधान की रक्षा की जिम्मेदारी छोड़कर मोदीजी को बचाना सबसे बड़ा कर्तव्य मान बैठा है। न्यायपालिका में ज्यादातर मोदी और उद्योगपतियों के समर्थक भ्रष्ट न्यायाधीशों की ही नियुक्ति होती है। जिस न्यायाधीश पर शक हो सरकार उसकी घोषणा ही रोक देती है। ईमानदार न्यायाधीशों का आधी रात को ट्रांसफर कर दिया जाता है। फिर रिटायरमेंट के बाद चुने हुए न्यायाधीशों को सरकार नये पद सौंप देती है। इस लिए न्यायपालिका चुपचाप बैठी है। जिस तरह से चुनाव आयोग ने SIR एसआइआर के माध्यम से करीब चार करोड़ मतदाताओं को मतदान से वंचित कर दिया, उसके बाद चुनाव परिणाम का प्रभावित न होना असंभव है। यदि बिहार और बंगाल की तरह चुनाव होते रहे तो मतदाता वोट डालना ही छोड़ देंगे। एक हारी हुई पार्टी के इन खुले आम षड्यंत्रों को न्यायपालिका देख रही है, पर चुप है। देश भर में पर्यावरण, किसान, बेरोजगारी आदि के आंदोलनों को न्यायपालिका से कोई उम्मीद नहीं है।अपराध आदि के मामले में चालिस पचास साल बाद न्याय मिलने की उम्मीद रहती है। क्या यह न्याय देने से इंकार नहीं है?

लेकिन न्यायपालिका बेरोजगार प्रताड़ित युवाओं को ही क्रोक्रोच घोषित करती है।

आज सरकार जनहित के बदले देशी और विदेशी पूंजीपतियों के लाभ को ज्यादा महत्व देती है। गरीबों पर टैक्स बढ़ा रही है और अमीरों पर घटा रही है। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर खर्च आधा कर दिया गया है। पलवल नियमों की खुलेआम अवहेलना हो रही है। वर्ल्ड बैंक जैसे नचाता है हम नाच रहे हैं।अब यह आवश्यक है कि जंतर-मंतर से उठा आन्दोलन अगले चरण में लोकतंत्र की रक्षा केलिए उचित कदम उठाए। आन्दोलन की सफलता के लिए जरूरी है कि इसका स्वरूप शांतिमय और गैरदलीय बना रहे पर सभी दल अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर इस आंदोलन को मजबूत बनायें। गैर दलीय सामाजिक कार्यकर्ता 1974 की तरह सबको जोड़ने में सहयोग दें।पर असली भूमिका तो आमजनता की ही होगी। यदि यह सरकार बदल जाती है तो हमारी अनेक समस्याओं का समाधान संभव है। इसमें आपका सहयोग जरूरी है।


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