
हालाँकि इस आंदोलन की शुरुआत नीट पेपर की गोपनीयता भंग होने के सवाल पर हुई थी, परंतु जाने-अनजाने इसमें जाति का विमर्श भी उभरकर सामने आया। कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके जब पहली बार मंच पर दिखाई दिए, तो उनके हाथ में बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर का विशाल चित्र था। मंच के नीचे कम्युनिस्ट पार्टी के युवा संगठन के कुछ छात्र “जय भीम” का उद्घोष कर रहे थे और मंच पर नीला झंडा भी लहरा रहा था.
डॉ. आंबेडकर को संविधान-निर्माता होने के साथ-साथ हिंदुस्तान की जाति-व्यवस्था के कोढ़ को नष्ट करने की मुहिम के अगुवा के रूप में भी जाना जाता है। आंदोलन के दौरान मंच से लेकर नीचे के जमावड़े में गांधी का चित्र या उनके नारे दिखाई नहीं दिए। बाद में एक साधारण स्केच में गांधी–अंबेडकर का संयुक्त चित्र अवश्य लगाया गया। सोनम वांगचुक, जो अक्सर अपने भाषणों में गांधी का नाम लेते थे, उन्होंने भी इस आंदोलन के दौरान गांधी का नाम लेने से परहेज किया। यह अलग बात है कि अनशन की समाप्ति पर वे सपत्नीक गांधी की समाधि पर जाकर नमन करने पहुँचे।
गांधी और अंबेडकर भारतीय इतिहास की वे दो महान हस्तियाँ हैं, जिन्हें राजनीतिक फायदे-नुकसान के मद्देनज़र ओझल नहीं किया जा सकता। बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने एक अछूत माँ के गर्भ से जन्म लेकर व्यक्तिगत रूप से जो यातनाएँ सहीं, उनके प्रतिकार को अपनी ज़िंदगी का मिशन बना लिया तथा अपना पूरा जीवन उसी उद्देश्य के लिए समर्पित कर दिया।
गांधी का जन्म एक रियासत के दीवान (प्रधानमंत्री) के वैष्णव परिवार में हुआ था। परंतु दक्षिण अफ्रीका में रहते हुए उन्होंने काले-गोरे के रंगभेद और नस्लीय भेदभाव पर आधारित अमानुषिकता को स्वयं देखा और झेला। यहाँ तक कि बैरिस्टर होने तथा प्रथम श्रेणी का टिकट होने के बावजूद, जब वे डरबन से प्रिटोरिया रेल द्वारा यात्रा कर रहे थे, तब एक गोरे गार्ड ने यह कहते हुए कि “क्या तुम्हें यह नहीं पता कि कुत्ते और काले आदमी फर्स्ट क्लास के डिब्बे में सफर नहीं कर सकते?”, उन्हें पीटरमैरिट्जबर्ग स्टेशन पर सामान सहित धक्का देकर नीचे उतार दिया।
गांधीजी ने भारत की जातिवादी मानसिकता के घिनौने रूप को अपने अनुभवों और संवेदना के आधार पर समझा और अपना संपूर्ण जीवन हरिजन-उत्थान के लिए समर्पित कर दिया। यह अलग बात है कि आज कुछ लोग ‘हरिजन’ शब्द को नापसंद करते हैं।
भारत में मानव मल साफ करने वाले समुदाय, जिन्हें समय-समय पर वाल्मीकि, मेहतर, जमादार, भंगी तथा अब सफाई कर्मचारी जैसे नामों से जाना गया, उन्हें भारतीय जाति-व्यवस्था में सबसे निचले पायदान पर रखा गया। गांधीजी अपनी संवेदना के कारण जातिवाद के विरुद्ध इतने प्रतिबद्ध हो गए कि उन्होंने अपनी पत्नी कस्तूरबा गांधी से कहा कि उनके घर आने वाले प्रत्येक अतिथि का शौचालय भी उन्हें साफ करना होगा। वैष्णव संस्कारों में पली-बढ़ी कस्तूरबा ने रोते हुए कहा, “मैं आपका मल तो साफ कर दूँगी, परंतु बाहर के मेहमानों का यह काम मुझसे नहीं हो पाएगा।” कस्तूरबा के मना करने पर गांधी ने उन्हें घर छोड़ने तक का आदेश दे दिया। अंततः कस्तूरबा ने इसे स्वीकार कर लिया।
जंग-ए-आज़ादी में अंग्रेज़ी हुकूमत की गुलामी के विरुद्ध संघर्ष कांग्रेस पार्टी के झंडे तले महात्मा गांधी के नेतृत्व में चल रहा था। इसके विपरीत बाबा साहब दूसरे पक्ष में थे। उनकी यह मान्यता थी कि आज़ादी के बाद हिंदुस्तानियों का शासन आने पर दलितों को और अधिक गुलामी का जीवन जीने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है, जबकि अंग्रेज कम-से-कम ‘रूल ऑफ लॉ’ (Rule of Law) में विश्वास रखते हैं और जो उनके शासन के अधीन है, उसके प्रति कुछ उत्तरदायित्व भी निभाते हैं।
अंग्रेज़ी हुकूमत ने अपनी राजनीतिक चालबाज़ी के तहत कांग्रेस के विरुद्ध भारत के विभिन्न जातीय और धार्मिक समुदायों का प्रतिनिधित्व करने वाले नेताओं को लंदन में आयोजित राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस में आमंत्रित कर बहस करवाई, ताकि यह दिखाया जा सके कि कांग्रेस पार्टी भारत का एकमात्र और वास्तविक प्रतिनिधित्व नहीं करती तथा अन्य संगठन भी उसके विरोध में हैं। सामने की कुर्सी पर गांधी बैठे हुए थे, जो कांग्रेस की नुमाइंदगी कर रहे थे। उनके सामने डॉ. अंबेडकर ने हिंदुस्तान में जाति के नाम पर होने वाले जुल्म, गैरबराबरी और अमानुषिक व्यवहार से क्षुब्ध होकर गांधी को हिंदुओं का प्रतिनिधि मानते हुए उन पर तीखे और अपमानजनक शब्दों में प्रहार किए। अंत में गांधी खड़े हुए और उन्होंने डॉ. अंबेडकर का धन्यवाद करते हुए कहा, “आपका शुक्रिया। आपने जो कुछ भी कहा, वह बहुत कम है। यदि आप मेरे मुँह पर थूक भी देते, तो वह भी कम ही होता।” इतना कहकर वे बैठ गए।
जातिवाद के खिलाफ गांधी के संघर्ष का लंबा इतिहास है। उन्होंने हरिजन, अर्थात ‘ईश्वर के जन’, मानकर हरिजन सेवक संघ की स्थापना की। अपने मुखपत्र का नाम भी ‘हरिजन’ रखा। अंततः उन्होंने यह निर्णय भी कर लिया कि वे केवल अंतरजातीय विवाहों में ही आशीर्वाद देने जाएंगे। गांधीजी के पुत्र समान उनके निजी सचिव महादेव देसाई के पुत्र नारायण देसाई के विवाह के अवसर पर भी उन्होंने इसी सिद्धांत का पालन किया। वे विवाह समारोह में सम्मिलित नहीं हुए और पत्र लिखकर कहा, “मेरा आशीर्वाद नवदंपति के साथ है, परंतु सजातीय विवाह होने के कारण मैं अपने नियम के अनुसार इस मांगलिक अवसर पर उपस्थित नहीं हो सकता।”
डॉ. अंबेडकर को संविधान सभा में लाने का श्रेय भी गांधी को जाता है। आजादी के बाद कांग्रेस पार्टी को विशाल बहुमत प्राप्त था। अनेक कांग्रेसी नेताओं के विरोध के बावजूद गांधीजी ने न केवल डॉ. अंबेडकर को संविधान सभा का सदस्य बनने में सहायता की, बल्कि संविधान निर्माण में उनकी केंद्रीय भूमिका सुनिश्चित करने में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।
आज देखने में आ रहा है कि अपनी राजनीतिक दुकान चलाने के लिए गांधीजी को दलित-विरोधी सिद्ध करने का प्रयास भी किया जा रहा है। कॉकरोच आंदोलन के मंच पर यदि अभिजीत दिपके डॉ. आंबेडकर का चित्र लेकर आते हैं और ‘जय भीम’ के नारे लगाते हैं, तो यह स्वाभाविक है। एक दलित युवक होने के नाते यदि वह अंबेडकर से प्रेरणा प्राप्त करता है, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है। किंतु दूसरी ओर, वोटों के हिसाब-किताब के आधार पर नारे और नेताओं को बदलने की प्रवृत्ति को क्या कहा जाए?
आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल पहले अपनी पार्टी के प्रतीक-चित्र में गांधी का फोटो लगाते थे, परंतु पंजाब चुनाव को ध्यान में रखते हुए उन्होंने गांधी का चित्र हटाकर डॉ. अंबेडकर का चित्र लगा दिया। हालांकि जब भी वे किसी संकट में पड़ते हैं, तो सीधे राजघाट जाकर गांधी की शरण में अपनी रक्षा की प्रार्थना करते हैं।
भारत की कम्युनिस्ट पार्टियाँ कार्ल मार्क्स, माओ और लेनिन के वर्ग-संघर्ष के सिद्धांत तथा ‘हैव्स एंड हैव-नॉट्स’ अर्थात शासक और शासित की अवधारणा में विश्वास रखते हुए अन्य राजनीतिक सिद्धांतों को अमान्य मानती रही हैं। समाजवादी चिंतक डॉ. राममनोहर लोहिया ने अपनी पुस्तक ‘Marx, Gandhi and Socialism’ में यह सिद्धांत प्रस्तुत किया कि भारत में वर्ग और वर्ण (Class and Caste) एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जब तक जातिवाद का अंत नहीं होगा, तब तक वर्ग-संघर्ष भी अपने वास्तविक अर्थों में स्थापित नहीं हो सकता। इसका कारण यह है कि वर्ग परिवर्तनशील है; आज का मजदूर भविष्य में मालिक बन सकता है, किंतु जाति अपरिवर्तनशील है। भारतीय जाति-व्यवस्था में व्यक्ति जिस जाति में जन्म लेता है, जीवनभर उसी की सामाजिक नियति से बँधा रहता है। धर्म-परिवर्तन भी जाति के इस विषैले दंश को पूरी तरह समाप्त नहीं कर पाया है।
उस समय कम्युनिस्ट पार्टियों ने डॉ. लोहिया के इस सिद्धांत को स्वीकार नहीं किया और इसे संशोधनवादी विचार कहकर खारिज कर दिया। डॉ. लोहिया ने प्रत्येक समाजवादी को ‘जाति तोड़ो आंदोलन’ चलाने तथा सहभोज आयोजित करने के लिए प्रेरित किया।
कॉकरोच आंदोलन में यह भी देखने को मिला कि कम्युनिस्ट पार्टी के नेता और उसके युवा संगठन कार्ल मार्क्स, माओ और लेनिन का नाम लेने के बजाय ‘जय भीम’ के नारे लगा रहे थे। हालांकि बाबा साहब कम्युनिस्ट विचारधारा और उसके नेतृत्व के कटु आलोचक थे। डॉ. अंबेडकर ने प्रथम लोकसभा चुनाव मुंबई से सोशलिस्ट पार्टी के साथ समझौते के तहत लड़ा था, जबकि उनके मुकाबले में कम्युनिस्ट पार्टी के श्रीपाद अमृत डांगे चुनाव मैदान में थे। उस चुनाव के दौरान अनेक आरोप-प्रत्यारोप भी लगे।
यदि यह वास्तव में कम्युनिस्टों की ऐतिहासिक वैचारिक भूल का परिमार्जन है, तो यह एक अत्यंत क्रांतिकारी कदम होगा। आज यह भी देखने में आ रहा है कि घोर जातिवादी समूह, नेता और कार्यकर्ता भी अपनी सभाओं, सम्मेलनों और जुलूसों में डॉ. अंबेडकर के चित्र और उनके नारे लगा रहे हैं। यदि वास्तव में उनका हृदय-परिवर्तन हुआ है, तो यह शोषण-विहीन और जाति-मुक्त भारत के निर्माण का शुभ संकेत है। परंतु यदि यह केवल दलित मतदाताओं को आकर्षित करने और उनका समर्थन प्राप्त करने का एक दिखावा मात्र है, तो इससे कोई सार्थक परिणाम नहीं निकलेगा। आज का दलित मतदाता अत्यंत जागरूक है। वह केवल नारों या चित्रों से प्रभावित होकर किसी का समर्थक नहीं बनता, बल्कि गहन और सूक्ष्म दृष्टि से यह परखता है कि क्या ये वास्तव में जातिवादी मानसिकता के विरुद्ध संघर्ष करने वाले बाबा साहब के सच्चे अनुयायी हैं।
गांधी और अंबेडकर अलग नहीं हैं; दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इन दो महान भारतीयों के बीच प्रतिद्वंद्विता, दुश्मनी या अलगाव दिखाने का प्रयास करने वाले कभी भी अपने मंसूबों में सफल नहीं हो पाएंगे।
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