— परिचय दास —
विश्वविद्यालय की कल्पना करते ही हमारे सामने अक्सर एक भवन आता है। कुछ कक्षाएँ, कुछ विभाग, एक पुस्तकालय, परीक्षा-कक्ष, प्रशासनिक कार्यालय, सूचना-पट्ट और गलियारों में आते-जाते विद्यार्थी। कहीं घंटी बजती है, कहीं अध्यापक पढ़ा रहे होते हैं, कहीं कोई परीक्षा चल रही होती है और कहीं कोई विद्यार्थी अपने परिणाम की प्रतीक्षा कर रहा होता है।
लेकिन विश्वविद्यालय केवल इतना नहीं है।
यदि विश्वविद्यालय केवल परीक्षा की जगह होता, तो उसके सबसे महत्त्वपूर्ण हिस्से शायद प्रश्नपत्र और उत्तरपुस्तिकाएँ होते। विद्यार्थी आता, पाठ्यक्रम पढ़ता, परीक्षा देता, अंक प्राप्त करता और चला जाता। फिर विश्वविद्यालय भी किसी बड़े कार्यालय की तरह होता, जहाँ मनुष्य कुछ वर्षों के लिए प्रवेश करता है और प्रमाणपत्र लेकर बाहर निकल आता है।
लेकिन विश्वविद्यालय प्रमाणपत्र से बड़ा होता है।
बहुत बड़ा।
विश्वविद्यालय वह जगह है जहाँ एक युवा पहली बार अपने घर से बाहर निकलकर दुनिया को अपने ढंग से देखना सीखता है। वह पहली बार किसी ऐसे व्यक्ति के सामने बैठता है जिसकी भाषा, विचार, प्रदेश, संस्कृति और अनुभव उससे बिल्कुल अलग हो सकते हैं। वह पहली बार यह अनुभव करता है कि जो बात उसे अपने घर में बिल्कुल स्वाभाविक लगती थी, किसी दूसरे के लिए वैसी नहीं भी हो सकती।
यहीं से विचार की शुरुआत होती है।
विचार अक्सर उत्तर से नहीं, दूसरे मनुष्य से मिलने से पैदा होता है।
विश्वविद्यालय की असली कक्षा कभी-कभी कक्षा के बाहर होती है।
कैंपस का कोई बरामदा, पुस्तकालय की सीढ़ियाँ, पेड़ के नीचे पड़ी बेंच, छात्रावास का कमरा, चाय की छोटी-सी दुकान, गलियारे में खड़े दो विद्यार्थी–ये सब अपने-अपने ढंग से विश्वविद्यालय की कक्षाएँ हैं। वहाँ पाठ्यक्रम की कोई निर्धारित इकाई नहीं होती, लेकिन जीवन का पाठ चलता रहता है।
किसी दिन साहित्य पर चर्चा होती है।
किसी दिन राजनीति पर।
किसी दिन प्रेम पर।
किसी दिन किसी अध्यापक के कथन पर असहमति होती है।
किसी दिन कोई विद्यार्थी अपनी कविता सुनाता है और उसके मित्र उस पर हँसते भी हैं, बहस भी करते हैं और अंततः उसे फिर लिखने की सलाह भी देते हैं।
यही विश्वविद्यालय है।
जहाँ पढ़ाई केवल किताब से नहीं होती।
मनुष्य मनुष्य से भी पढ़ता है।
असहमति विश्वविद्यालय की आत्मा का एक आवश्यक स्वर है। जिस परिसर में हर व्यक्ति एक ही बात कहे, एक ही तरह सोचे और एक ही निष्कर्ष तक पहुँचे, वहाँ शिक्षा तो हो सकती है, लेकिन विश्वविद्यालय की आत्मा धीरे-धीरे सूखने लगती है।
असहमति का अर्थ शत्रुता नहीं है।
असहमति का अर्थ है–मैं तुम्हारी बात सुन रहा हूँ, लेकिन मुझे उसके बारे में सोचने का अपना अधिकार भी है।
यह अधिकार लोकतांत्रिक जीवन की पहली सीढ़ियों में से एक है।
विश्वविद्यालय विद्यार्थी को केवल यह नहीं सिखाता कि उत्तर क्या है। वह यह भी सिखाता है कि प्रश्न कैसे पूछा जाए।
और प्रश्न पूछना आसान काम नहीं है।
कभी प्रश्न शिक्षक से पूछना पड़ता है। कभी पुस्तक से। कभी परंपरा से। कभी अपने ही विचार से।
सबसे कठिन प्रश्न अक्सर वही होता है जो मनुष्य स्वयं से पूछता है।
विश्वविद्यालय उस आत्म-संवाद की भी जगह है।
इसीलिए विश्वविद्यालय में राजनीति का प्रवेश कोई अस्वाभाविक घटना नहीं है। विद्यार्थी समाज से आते हैं। उनके परिवार हैं, गाँव हैं, शहर हैं, देश है, दुनिया है। वे अपने समय के प्रश्न लेकर आते हैं। बेरोजगारी, असमानता, भाषा, संस्कृति, शिक्षा, भविष्य, लोकतंत्र–इन सबके बारे में वे सोचेंगे ही।
प्रश्न यह नहीं कि विद्यार्थी राजनीति पर विचार क्यों करते हैं।
प्रश्न यह है कि वे विचार करना कैसे सीखते हैं।
राजनीति यदि केवल नारे में बदल जाए तो विश्वविद्यालय का नुकसान है। लेकिन राजनीति यदि प्रश्न पूछने, तर्क करने, असहमति रखने और सार्वजनिक जीवन को समझने की प्रक्रिया बने, तो वह शिक्षा का ही एक रूप है।
विश्वविद्यालय को राजनीति से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है।
उसे विचारहीनता से भयभीत होना चाहिए।
क्योंकि विचारहीन विद्यार्थी केवल परीक्षा में सफल हो सकता है; जीवन में नहीं।
विश्वविद्यालय में साहित्य की भूमिका भी इसी कारण महत्त्वपूर्ण है। साहित्य विद्यार्थी को यह सिखाता है कि मनुष्य को केवल आँकड़ों से नहीं समझा जा सकता। किसी व्यक्ति की गरीबी एक आँकड़ा हो सकती है, लेकिन उसकी भूख एक अनुभव है। किसी विस्थापन की संख्या बताई जा सकती है, लेकिन अपना घर छूटने की पीड़ा केवल संख्या में नहीं आती।
साहित्य मनुष्य को मनुष्य की तरह देखने की दृष्टि देता है।
कविता हमें शब्दों के बीच का मौन सुनाती है।
कहानी हमें दूसरे जीवन में प्रवेश करने देती है।
उपन्यास हमें लंबे समय तक किसी दूसरे मनुष्य के साथ रहने का अभ्यास कराता है।
निबंध हमें किसी विचार के साथ धीरे-धीरे चलना सिखाता है।
और विश्वविद्यालय में धीरे चलना भी एक शिक्षा है।
आज की दुनिया बहुत जल्दी में है। संदेश तुरंत चाहिए, परिणाम तुरंत चाहिए, सूचना तुरंत चाहिए। विद्यार्थी भी कभी-कभी ज्ञान को उसी गति से प्राप्त करना चाहता है जिस गति से मोबाइल की स्क्रीन पर कोई सूचना खुलती है।
लेकिन ज्ञान डाउनलोड नहीं होता।
वह भीतर बनता है।
उसके लिए पढ़ना पड़ता है, भूलना पड़ता है, फिर पढ़ना पड़ता है, किसी से बहस करनी पड़ती है, कभी अपनी गलती स्वीकार करनी पड़ती है और कभी अपने प्रिय विचार पर भी संदेह करना पड़ता है।
विश्वविद्यालय का समय इसी अर्थ में जीवन का एक सुंदर अवकाश है।
यह वह समय है जब मनुष्य अभी पूरी तरह किसी निश्चित साँचे में नहीं ढला होता।
उसके सामने रास्ते खुले होते हैं।
वह साहित्य पढ़कर विज्ञान की ओर जा सकता है। विज्ञान पढ़ते हुए कविता लिख सकता है। इतिहास पढ़ते हुए संगीत में रुचि ले सकता है। भाषा पढ़ते हुए किसी दूसरी संस्कृति से दोस्ती कर सकता है।
विश्वविद्यालय विषयों को अलग-अलग कमरों में रखता है, लेकिन जीवन उन्हें बार-बार एक-दूसरे से मिलाता है।
एक विद्यार्थी हिंदी पढ़ता है और जापानी सीखने लगता है।
दूसरा राजनीति विज्ञान पढ़ता है और नाटक करता है।
तीसरा गणित पढ़ता है और कविता लिखता है।
चौथा इतिहास पढ़ता है और लोकगीतों में अपनी स्मृति खोजता है।
इन विचित्र लगने वाले रास्तों में ही विश्वविद्यालय की सुंदरता है।
मनुष्य को केवल विशेषज्ञ नहीं, मनुष्य भी बनना है।
मित्रता विश्वविद्यालय की एक ऐसी पाठशाला है जिसका कोई पाठ्यक्रम नहीं बन सकता। अलग-अलग प्रदेशों से आए विद्यार्थी साथ रहते हैं। उनकी बोलियाँ अलग होती हैं, भोजन अलग, त्योहार अलग, परिवारों की आदतें अलग। पहले वे एक-दूसरे को देखते हैं, फिर बात करते हैं, फिर हँसते हैं और धीरे-धीरे किसी दिन पता चलता है कि वे मित्र हो गए हैं।
मित्रता किसी अधिसूचना से नहीं बनती।
वह साझा समय से बनती है।
किसी परीक्षा की रात साथ जागने से।
किसी कठिन प्रश्न पर मिलकर सोचने से।
किसी उदास मित्र के पास बिना कुछ कहे बैठने से।
किसी छोटी-सी जीत पर साथ खुश होने से।
विश्वविद्यालय छोड़ने के वर्षों बाद भी अक्सर विद्यार्थी को उसके पाठ्यक्रम की सारी बातें याद नहीं रहतीं। उसे याद रहता है कोई मित्र। कोई अध्यापक। पुस्तकालय की कोई मेज। किसी बरसात की दोपहर। किसी कविता-पाठ की शाम। किसी बहस का क्षण। किसी गलियारे में हुई पाँच मिनट की बातचीत।
यही विश्वविद्यालय की अदृश्य स्मृति है।
अध्यापक भी इस स्मृति का एक बड़ा हिस्सा होते हैं। अच्छा अध्यापक केवल पाठ नहीं पढ़ाता। वह विद्यार्थी के भीतर एक संभावना पहचानता है। कभी-कभी वह एक वाक्य कह देता है और विद्यार्थी वर्षों बाद समझता है कि उस वाक्य ने उसके जीवन की दिशा बदल दी थी।
शिक्षक का प्रभाव हमेशा परीक्षा के परिणाम में दिखाई नहीं देता।
कई बार वह किसी विद्यार्थी की भाषा में दिखाई देता है।
उसके आत्मविश्वास में।
उसके प्रश्न पूछने के ढंग में।
उसकी असहमति की सभ्यता में।
उसकी संवेदना में।
विश्वविद्यालय की सफलता का सबसे बड़ा प्रमाण शायद यह नहीं कि उसके कितने विद्यार्थियों को कितनी नौकरियाँ मिलीं। वह भी महत्त्वपूर्ण है। लेकिन उससे आगे यह प्रश्न भी है कि वहाँ से निकला विद्यार्थी कैसा मनुष्य बना।
क्या वह दूसरे की बात सुन सकता है?
क्या वह अपने विचार पर पुनर्विचार कर सकता है?
क्या वह किसी भिन्न भाषा और संस्कृति के मनुष्य को सम्मान से देख सकता है?
क्या वह अपनी सुविधा से बाहर की दुनिया को समझने का प्रयास करता है?
क्या वह असहमति में भी संबंध बचाए रख सकता है?
यदि विश्वविद्यालय इन प्रश्नों का उत्तर देने में सफल होता है, तो उसकी शिक्षा परीक्षा से बहुत आगे निकल जाती है।
विश्वविद्यालय की इमारतें पुरानी होती हैं। विभाग बदलते हैं। पाठ्यक्रम बदलते हैं। अध्यापक आते हैं और चले जाते हैं। विद्यार्थी कुछ वर्षों के बाद अपने-अपने जीवन में लौट जाते हैं। लेकिन विश्वविद्यालय की स्मृति बनी रहती है।
किसी पुराने परिसर में चलते हुए कभी-कभी ऐसा लगता है कि यहाँ केवल वर्तमान नहीं है। पुराने विद्यार्थियों के कदम भी हैं। पुराने अध्यापकों की आवाजें हैं। पुराने समारोहों की ध्वनियाँ हैं। पुराने पोस्टरों के रंग हैं। किसी पेड़ की छाया में बैठी हुई कई पीढ़ियों की बातचीत है।
पेड़ विश्वविद्यालय के सबसे धैर्यवान इतिहासकार होते हैं।
वे किसी बैठक में नहीं बैठते, किसी फाइल पर हस्ताक्षर नहीं करते, कोई प्रमाणपत्र नहीं देते। बस देखते रहते हैं।
उनके नीचे प्रेम भी हुआ होगा, कविता भी पढ़ी गई होगी, राजनीति पर बहस भी हुई होगी, किसी ने नौकरी की चिंता भी की होगी और किसी ने दुनिया बदल देने की योजना भी बनाई होगी।
अगली पीढ़ी आती है।
उसी पेड़ के नीचे बैठती है।
उसे कुछ पता नहीं होता कि उससे पहले कितने सपने वहाँ बैठे थे।
यही विश्वविद्यालय की गत्यात्मकता है।
वह पीढ़ियों के बीच एक अदृश्य संवाद है।
इसलिए विश्वविद्यालय को केवल परीक्षा की जगह मानना उसके विशाल अर्थ को बहुत छोटा कर देना है।
परीक्षा उसका एक छोटा-सा हिस्सा है।
अंक उसका एक परिणाम हैं।
प्रमाणपत्र उसका एक दस्तावेज है।
लेकिन विश्वविद्यालय का असली काम मनुष्य के भीतर होता है।
वहाँ कोई प्रश्न जन्म लेता है।
कोई पुराना विश्वास टूटता है।
कोई नया विचार आकार लेता है।
कोई मित्र मिलता है।
कोई किताब जीवनभर साथ चलने लगती है।
कोई शिक्षक भीतर एक दीपक रख जाता है।
और कभी-कभी कोई विद्यार्थी पहली बार अपने आप से कहता है–मैं केवल वही नहीं हूँ जो अब तक मुझे बताया गया है। मैं अपने बारे में स्वयं भी सोच सकता हूँ।
शायद यही विश्वविद्यालय की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
वह मनुष्य को उत्तरों का संग्रह नहीं बनाता।
वह उसे प्रश्नों के साथ जीना सिखाता है।
और जब कोई विद्यार्थी विश्वविद्यालय से निकलता है, तो उसके हाथ में एक प्रमाणपत्र होता है, लेकिन उसके भीतर उससे कहीं अधिक कुछ होना चाहिए–एक खुला हुआ मन, विचार की स्वतंत्रता, असहमति की सभ्यता, साहित्य की संवेदना, मित्रता की स्मृति और संस्कृति के प्रति एक जीवित जिज्ञासा।
तभी विश्वविद्यालय समाप्त नहीं होता।
दीक्षांत समारोह के दिन भवन पीछे छूट जाता है।
लेकिन विश्वविद्यालय भीतर चलता रहता है।
किसी किताब के पन्ने में।
किसी मित्र की आवाज में।
किसी अध्यापक की कही हुई पंक्ति में।
किसी बहस की अधूरी स्मृति में।
और उस प्रश्न में, जो वर्षों बाद भी मनुष्य को चैन से बैठने नहीं देता।
शायद विश्वविद्यालय की असली परीक्षा वही है।
और उसका प्रश्नपत्र जीवन स्वयं बनाता है।इस रूप में “विश्वविद्यालय” भवन से निकलकर एक जीवित सांस्कृतिक अनुभव बनता है। विशेष रूप से अंतिम हिस्से में परीक्षा और जीवन की परीक्षा का समानांतर रखा गया है, जिससे शीर्षक का अर्थ अंत में जाकर पूरा खुलता है।
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