बिहार की शिक्षा~ व्यवस्था और राजनीति: सुधार या दिखावा?

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Parichay Das

— परिचय दास —

बिहार की शिक्षा व्यवस्था पर लिखना किसी शांत झील का वर्णन करना नहीं है; यह उस जल को पढ़ना है जिसमें सतह पर स्थिरता का भ्रम है, और भीतर निरंतर हलचल, अव्यवस्था और अदृश्य खिंचाव। “सुधार” शब्द यहाँ उतनी ही सहजता से प्रयोग में लाया जाता है जितनी सहजता से चुनावी मंचों पर वादे किए जाते हैं। लेकिन जब इस शब्द को जमीन पर कसकर देखा जाता है, तो वह या तो अपना अर्थ खो देता है या फिर एक ऐसे आवरण में बदल जाता है, जिसके भीतर वास्तविकता को छिपाना आसान हो जाता है। बिहार में स्कूलों की संख्या बढ़ी है, भवन खड़े हुए हैं, योजनाओं की सूची लंबी हुई है, लेकिन इस पूरे दृश्य के बीच सबसे असहज प्रश्न बना रहता है—क्या शिक्षा वास्तव में घटित हो रही है?

राजनीति और शिक्षा का संबंध स्वभावतः विरोधी नहीं होता; आदर्श स्थिति में राजनीति शिक्षा को दिशा देती है, संसाधन उपलब्ध कराती है और समान अवसर सुनिश्चित करती है। परन्तु बिहार का अनुभव इस आदर्श के ठीक उलट खड़ा दिखाई देता है। यहाँ शिक्षा एक स्वायत्त क्षेत्र नहीं, बल्कि राजनीतिक रणनीति का एक विस्तार बन गई है। सुधार की घोषणाएँ होती हैं, योजनाएँ बनती हैं, पर उनका क्रियान्वयन इस तरह से होता है कि वे अधिकतर प्रतीकात्मक रह जाती हैं। यह प्रतीकात्मकता ही वह स्थान है जहाँ “दिखावा” अपनी सबसे सशक्त उपस्थिति दर्ज कराता है।

सबसे पहले विद्यालयों की भौतिक उपस्थिति पर ध्यान दिया जाए। यह निर्विवाद है कि पिछले वर्षों में स्कूलों की संख्या और उनके भवनों में वृद्धि हुई है। गाँव-गाँव में प्राथमिक विद्यालय दिखाई देते हैं, कई स्थानों पर माध्यमिक विद्यालय भी स्थापित हुए हैं। परन्तु इन भवनों के भीतर जो शैक्षणिक जीवन होना चाहिए, वह अक्सर अनुपस्थित रहता है। शिक्षक समय पर नहीं आते, या आते हैं तो शिक्षण के बजाय औपचारिकताओं में अधिक समय व्यतीत होता है। बच्चों की उपस्थिति भी अनियमित रहती है, और जो उपस्थित होते हैं, वे भी सीखने की प्रक्रिया से अधिक मध्याह्न भोजन की प्रतीक्षा में दिखाई देते हैं। यह स्थिति किसी एक विद्यालय या क्षेत्र की नहीं, बल्कि एक व्यापक प्रवृत्ति का संकेत है।

यहाँ एक असुविधाजनक सत्य सामने आता है—राजनीति ने शिक्षा को एक सेवा के रूप में नहीं, बल्कि एक प्रबंधकीय परियोजना के रूप में देखना शुरू कर दिया है। विद्यालय खोल देना, भवन बना देना, नियुक्तियाँ कर देना—इन सबको ही सुधार का पर्याय मान लिया गया है। जबकि शिक्षा का वास्तविक अर्थ ज्ञान का संचार, बौद्धिक विकास और आलोचनात्मक सोच का निर्माण है। जब इन मूल तत्वों को नजरअंदाज कर दिया जाता है, तो शिक्षा केवल एक ढाँचा बनकर रह जाती है, जिसमें जीवन का अभाव होता है।

शिक्षकों की नियुक्ति और उनकी भूमिका इस पूरे परिदृश्य का एक महत्वपूर्ण पक्ष है। बिहार में बड़े पैमाने पर शिक्षक नियुक्त किए गए, जो एक ओर सकारात्मक कदम प्रतीत होता है, परन्तु दूसरी ओर इस प्रक्रिया में गुणवत्ता की उपेक्षा भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। राजनीतिक दबाव, स्थानीय समीकरण और तात्कालिक लाभ की प्रवृत्ति ने इस प्रक्रिया को प्रभावित किया। परिणामस्वरूप, कई ऐसे शिक्षक नियुक्त हुए जिनकी विषयगत दक्षता और शिक्षण क्षमता पर प्रश्नचिह्न लगते हैं। जब शिक्षक स्वयं अपने विषय में आश्वस्त नहीं होते, तो वे छात्रों में ज्ञान के प्रति जिज्ञासा कैसे उत्पन्न करेंगे?

इसके साथ ही, शिक्षकों पर गैर-शैक्षणिक कार्यों का बोझ भी एक बड़ी समस्या है। चुनाव ड्यूटी, सर्वेक्षण, सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन—इन सबके बीच शिक्षण कार्य पीछे छूट जाता है। यह विडंबना ही है कि जिस शिक्षक से कक्षा में ज्ञान देने की अपेक्षा की जाती है, उसे प्रशासनिक कार्यों में इतना उलझा दिया जाता है कि उसके पास पढ़ाने का समय और ऊर्जा दोनों कम पड़ जाते हैं। राजनीति यहाँ भी शिक्षा के मूल उद्देश्य को हाशिए पर धकेल देती है।

छात्रों की स्थिति भी कम जटिल नहीं है। प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर नामांकन बढ़ाने के लिए अनेक योजनाएँ चलाई गईं—मुफ्त किताबें, वर्दी, साइकिल योजना आदि। इन योजनाओं ने निश्चित रूप से विद्यालयों में छात्रों की संख्या बढ़ाई, विशेषकर लड़कियों की शिक्षा में सकारात्मक प्रभाव पड़ा परन्तु संख्या में वृद्धि को ही सफलता का अंतिम मापदंड मान लेना एक गंभीर भूल है। जब कक्षा में बैठे छात्र पढ़ना-लिखना नहीं सीख पा रहे, तो यह वृद्धि एक सांख्यिकीय उपलब्धि भर रह जाती है, जिसका शैक्षणिक अर्थ सीमित है।

यहाँ प्रश्न उठता है कि क्या राजनीति को इस विडंबना का ज्ञान नहीं है? या फिर यह एक जानबूझकर किया गया चयन है? संभवतः उत्तर दोनों के बीच कहीं स्थित है। राजनीति को यह ज्ञात है कि शिक्षा का वास्तविक सुधार एक दीर्घकालिक प्रक्रिया है, जिसका परिणाम तुरंत दिखाई नहीं देता। इसके विपरीत, भवन निर्माण, योजनाओं की घोषणा और नियुक्तियों जैसे कदम त्वरित राजनीतिक लाभ प्रदान करते हैं। इसलिए प्राथमिकता उन कार्यों को दी जाती है जो तुरंत दिखाई दें और जिनका प्रचार किया जा सके। शिक्षा की गुणवत्ता जो धीमे और गहरे परिवर्तन की मांग करती है, अक्सर इस प्राथमिकता सूची में पीछे छूट जाती है।

उच्च शिक्षा का क्षेत्र भी इस प्रवृत्ति से अछूता नहीं है। विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों की स्थिति पर दृष्टि डालने पर यह स्पष्ट होता है कि यहाँ भी संरचनात्मक समस्याएँ गहरी हैं। शिक्षकों के पद रिक्त रहते हैं, नियुक्तियाँ वर्षों तक लंबित रहती हैं और जो नियुक्तियाँ होती हैं, उनमें भी पारदर्शिता और गुणवत्ता को लेकर प्रश्न उठते हैं। विश्वविद्यालयों में शोध का स्तर गिरता जा रहा है, और छात्र डिग्री प्राप्त करने के बाद भी रोजगार के लिए आवश्यक कौशल से वंचित रहते हैं। यह स्थिति केवल संसाधनों की कमी का परिणाम नहीं बल्कि नीति और प्राथमिकताओं की विफलता का संकेत है।

राजनीति और शिक्षा के इस संबंध में एक और महत्वपूर्ण पहलू है—पाठ्यक्रम और वैचारिक हस्तक्षेप। जब शिक्षा को एक स्वतंत्र बौद्धिक क्षेत्र के रूप में नहीं देखा जाता, तो उसमें राजनीतिक विचारधाराओं का हस्तक्षेप बढ़ने लगता है। पाठ्यक्रम में बदलाव, इतिहास और साहित्य की व्याख्याओं में परिवर्तन और शैक्षणिक संस्थानों में वैचारिक दबाव—ये सब उस प्रक्रिया का हिस्सा हैं, जिसमें शिक्षा को एक निष्पक्ष ज्ञान क्षेत्र के बजाय एक राजनीतिक उपकरण के रूप में प्रयोग किया जाता है। बिहार में यह प्रवृत्ति भले ही उतनी तीव्र न हो जितनी कुछ अन्य स्थानों पर परन्तु इसके संकेत स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।

इस पूरे परिदृश्य में सबसे अधिक प्रभावित वह छात्र है, जो शिक्षा को अपने जीवन में परिवर्तन के साधन के रूप में देखता है। वह विद्यालय जाता है, विश्वविद्यालय में प्रवेश लेता है परन्तु उसे वह गुणवत्ता नहीं मिलती, जिसकी उसे आवश्यकता है। परिणामस्वरूप, वह या तो निराश होकर शिक्षा से दूरी बना लेता है या फिर बेहतर अवसरों की तलाश में राज्य से बाहर चला जाता है। यह पलायन केवल आर्थिक कारणों से नहीं बल्कि शैक्षणिक निराशा का भी परिणाम है।

अब यदि “सुधार” और “दिखावा” के बीच स्पष्ट रेखा खींचने का प्रयास किया जाए तो यह कहा जा सकता है कि सुधार वहाँ होता है जहाँ नीतियाँ दीर्घकालिक दृष्टि के साथ बनाई और लागू की जाती हैं, जहाँ गुणवत्ता को प्राथमिकता दी जाती है और जहाँ शिक्षा को एक मूलभूत अधिकार और सामाजिक निवेश के रूप में देखा जाता है। इसके विपरीत, दिखावा वहाँ होता है जहाँ तात्कालिक लाभ के लिए सतही परिवर्तन किए जाते हैं जहाँ संख्या और संरचना को ही सफलता का मापदंड बना दिया जाता है और जहाँ शिक्षा का उद्देश्य राजनीतिक लाभ तक सीमित हो जाता है।

बिहार की वर्तमान स्थिति इन दोनों के बीच झूलती हुई दिखाई देती है। कुछ प्रयास ऐसे हैं, जिन्हें वास्तविक सुधार की दिशा में कदम माना जा सकता है—जैसे छात्रवृत्तियाँ, लड़कियों की शिक्षा को प्रोत्साहन और कुछ क्षेत्रों में डिजिटल शिक्षा की पहल परन्तु इन प्रयासों की प्रभावशीलता तब तक सीमित रहेगी, जब तक उन्हें एक समग्र और दीर्घकालिक रणनीति के अंतर्गत नहीं रखा जाता।

यह स्वीकार करना होगा कि शिक्षा का संकट केवल प्रशासनिक या संसाधन संबंधी नहीं है; यह एक दृष्टिकोण का संकट है। जब तक राजनीति शिक्षा को एक प्राथमिकता के रूप में नहीं देखेगी और जब तक शिक्षा को केवल चुनावी मुद्दे के रूप में उपयोग किया जाता रहेगा, तब तक सुधार का दावा एक आभासी उपलब्धि ही बना रहेगा। बिहार के स्कूलों में बच्चे बैठते रहेंगे, उपस्थिति दर्ज होती रहेगी, योजनाएँ चलती रहेंगी और कागजों पर प्रगति के आंकड़े बढ़ते रहेंगे—परन्तु कक्षा में ज्ञान का वह मौन जो शिक्षा की आत्मा है, अनुपस्थित ही रहेगा।


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