— Dr. Shubhneet kaushik —
आज प्रसिद्ध इतिहासकार और दार्शनिक मिशेल फूको का 100वाँ जन्मदिन है। बीसवीं सदी के उत्तरार्ध के सबसे प्रभावशाली विचारकों में से एक मिशेल फूको (1926-1984), जिन्होंने इतिहास, दर्शन, मनोविज्ञान जैसे तमाम विषयों को अपने प्रखर चिंतन से प्रभावित किया। समाज के हाशिये पर पड़े हुए उपेक्षित लोगों जैसे कैदियों, समलैंगिकों और पागल करार दिए गए लोगों को के प्रति गहरी सहानुभूति रखते हुए और राज्य व समाज द्वारा उनके प्रति की जाने वाली नाइंसाफ़ियों के इतिहास पर फूको ने अभूतपूर्व काम किया।
विज्ञान के इतिहास और दर्शन में उनके हस्तक्षेप, ज्ञान और सत्ता के अंतरसंबंधों का उनका विश्लेषण और राज्य व समाज की प्रकृति का उनका विवेचन आज भी प्रसांगिक बना हुआ है। फ्रेडरिक नीत्शे और जेरेमी बेंथम सरीखे पूर्ववर्ती विचारकों द्वारा दी गई अवधारणाओं जैसे जीनियालॉजी और पेनॉप्टिकन का जो अर्थ-विस्तार फूको ने किया, वह उनकी नवोन्मेषी मेधा का परिचय देती है।
आधुनिक राज्य और समाज द्वारा व्यक्ति पर नियंत्रण करने की रणनीति के अंतर्गत ज्ञान और उसकी प्रविधियों के इस्तेमाल का जो विश्लेषण फूको ने किया वह विचारोत्तेजक होने के साथ ही अभिलेखागारों में मौजूद दस्तावेजों और साहित्य के गहन विश्लेषण पर आधारित था।
खुद भी मनोवैज्ञानिक समस्याओं से जूझने वाले फूको ने आधुनिक काल में मानसिक चिकित्सालयों की स्थापना और मनोरोगियों के प्रति समाज और राज्य के रवैये में दिखने वाली तथाकथित उदारता, वैज्ञानिकता और तार्किकता के छद्म को उघाड़ कर रख दिया। यही नहीं ‘मैडनेस एंड सिविलाइजेशन’ जैसी पुस्तकों के जरिए फूको ने आधुनिक मनोचिकित्सा के नैतिक पाखंड को उद्घाटित किया। बुर्जुआ वर्ग की नैतिकता और प्रबोधन के दावे के खोखलेपन को भी अपनी इन कृतियों में उन्होंने उजागर किया।
जहाँ एक ओर उन्होंने आधुनिक चिकित्साशास्त्र के विश्लेषण पर आधारित ‘द बर्थ ऑफ़ द क्लिनिक’ जैसी पुस्तकें लिखीं। वहीं दूसरी ओर, अर्थशास्त्र, जीवविज्ञान, मनोविज्ञान जैसे अनुशासनों और उनकी पद्धतियों के गहन विश्लेषण पर आधारित ‘द ऑर्डर ऑफ़ थिंग्स’ जैसी पुस्तक की भी रचना की।
उन्होंने दिखाया कि ज्ञान से जुड़ा कोई अनुशासन या कोई विचार-प्रणाली कुछ विशिष्ट नियमों से संचालित होती है, जो व्यक्ति/विचारक की चेतना के कहीं भीतर सक्रिय होते हैं और यह एक ऐसा अवधारणात्मक साँचा निर्मित करते हैं जो उस अनुशासन या विचार-पद्धति और उसके समय की सीमा को भी निर्धारित करती है।
पुरातत्व जैसे विषयों से अंतर्दृष्टि ग्रहण करते हुए जहाँ फूको ने ज्ञान के उत्खनन की पद्धति विकसित की। वहीं ‘डिसिप्लिन एंड पनिश’ जैसी अपनी पुस्तकों में फूको ने दर्शाया कि जेल में कैदियों को नियंत्रित करने के लिए विकसित की गई तकनीकें कैसे आधुनिक राज्य द्वारा पूरे समाज पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए धड़ल्ले से इस्तेमाल किए जाने लगी। इसके लिए वे स्कूल, अस्पताल और कारखानों की कार्य-पद्धति का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।
मिशेल फूको ने अपने लेखन में यह भी दर्शाया कि समाज कैसे किसी व्यवहारविशेष को स्वीकृत या अस्वीकृत मानकर व्यक्तियों का सामान्यीकरण करता है, उन पर नियंत्रण स्थापित करता है और उन्हें सामान्य और स्वीकृत व्यवहार से किसी भी रूप में विचलन से लगातार रोकने की कोशिश करता है।
सत्तर के दशक के आखिरी वर्षों में उन्होंने सेक्सुअलिटी के इतिहास पर काम करना शुरू किया, जो अब तक चार खंडों में प्रकाशित हो चुका है। इसी क्रम में उन्होंने बायोपावर, बायोपॉलिटिक्स जैसी अवधारणाएं विकसित की जो आज राज्य द्वारा व्यक्ति पर नियंत्रण की असीम चाहत के दौर में और मौजूँ हो उठी हैं। समाज के हाशिये पर पड़े लोगों पर केंद्रित उनका काम हमें प्रेरणा देता रहेगा।
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