नई दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया में सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोसाइटी एंड सेक्युलरिज्म (CSSS) द्वारा आयोजित 28वें डॉ. असगर अली इंजीनियर स्मृति व्याख्यान में शामिल होने का अवसर मिला। विषय था, “Gandhi’s Faith, and Ours”। मुख्य वक्ता इतिहासकार और लेखक डॉ. रामचंद्र गुहा थे और अध्यक्षता लेखक तथा अध्येता डॉ. पुरुषोत्तम अग्रवाल ने की। हर्ष मंदर ने असगर अली इंजीनियर के जीवन, संघर्ष और सांप्रदायिकता विरोधी विरासत को याद किया।
यह आयोजन गांधी की धार्मिक आस्था पर केंद्रित एक ऐतिहासिक व्याख्यान नहीं था। यहाँ चर्चा बार-बार हमारे समय के एक बुनियादी प्रश्न पर लौटती रही: एक बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक गणराज्य में समान नागरिकता, धार्मिक विश्वास, विवेक और सह-अस्तित्व का रिश्ता कैसा होना चाहिए?
रामचंद्र गुहा ने असगर अली इंजीनियर को अपनी धार्मिक परंपरा के भीतर रहते हुए उसकी रूढ़ियों से संघर्ष करने वाले सार्वजनिक बुद्धिजीवी के रूप में याद किया। इसी सूत्र से उन्होंने गांधी की धार्मिक चेतना की यात्रा आरंभ की। उनके अनुसार गांधी की विशिष्टता इस बात में थी कि वे न धर्म को अस्वीकार करते थे और न किसी एक धर्म को अंतिम तथा एकमात्र सत्य मानते थे।
गुहा ने गांधी की धार्मिक चेतना के निर्माण में गोपाल कृष्ण गोखले और लियो टॉल्स्टॉय के प्रभावों की चर्चा की। गोखले ने सार्वजनिक जीवन में हिंदू-मुस्लिम सद्भाव के महत्त्व को गहरा किया और टॉल्स्टॉय ने उस विचार को पुष्ट किया कि मनुष्य और ईश्वर के बीच किसी धार्मिक पदानुक्रम की अनिवार्यता नहीं है। लेकिन गांधी का बहुलतावाद केवल पुस्तकों से नहीं आया। लंदन और दक्षिण अफ्रीका में मुसलमानों, ईसाइयों, यहूदियों और पारसियों के साथ उनके निजी संबंधों और साझा राजनीतिक संघर्ष ने इसे जीवन का अनुभव बनाया। दादा अब्दुल्ला, हेनरी पोलाक, पारसी रुस्तमजी और सी. एफ. एंड्रूज़ जैसे लोग गांधी की उस दुनिया का हिस्सा थे जिसमें धर्म अलग थे, लेकिन मित्रता, संघर्ष और मनुष्यता साझा थी।
यहीं से गुहा गांधी के धार्मिक दर्शन के केंद्रीय तत्व तक पहुँचे। गांधी के लिए किसी एक धर्म के पास सत्य का एकाधिकार नहीं था। प्रत्येक धार्मिक परंपरा में सत्य भी हो सकता है और त्रुटि भी। इसलिए धर्म की वास्तविक परीक्षा उसके ग्रंथ से अधिक उसके अनुयायी के आचरण में होती है।
गांधी और नेहरू: समाज और राज्य के दो स्तर व्याख्यान का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण हिस्सा गांधी से नेहरू तक की वैचारिक निरंतरता पर था। गुहा ने कहा कि आर्थिक नीति सहित अनेक विषयों पर जवाहरलाल नेहरू गांधी से अलग थे, लेकिन धार्मिक अल्पसंख्यकों की समान नागरिकता और भारत के बहुल चरित्र के प्रश्न पर वे गांधी की विरासत के सबसे दृढ़ राजनीतिक उत्तराधिकारियों में थे।
इसे उन्होंने बहुत उपयोगी ढंग से दो स्तरों पर रखा। गांधी का क्षेत्र नागरिक समाज था। हिंदू और मुसलमान एक-दूसरे से मिलें, मित्रता करें, एक-दूसरे के धर्म का सम्मान करें और किसी नागरिक को उसकी धार्मिक पहचान के कारण संदेह की दृष्टि से न देखें। नेहरू का क्षेत्र राज्य और उसकी संस्थाएँ थीं। कानून, प्रशासन और पुलिस नागरिकों के बीच धर्म के आधार पर भेद न करें। राज्य की दृष्टि में बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक समान अधिकारों वाले नागरिक हों। इस अर्थ में गांधी और नेहरू को एक-दूसरे के विकल्प के रूप में नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक के रूप में पढ़ने की आवश्यकता है। एक समाज के भीतर बहुलता की संस्कृति की बात करता है, दूसरा राज्य के भीतर समानता की संस्थागत गारंटी की।
अध्यक्षीय टिप्पणी में पुरुषोत्तम अग्रवाल ने गांधी की धार्मिकता के एक ऐसे पक्ष को सामने रखा जिसे अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। गांधी किसी भी धर्मग्रंथ, बाइबिल सहित, को अपने विवेक और नैतिक निर्णय से ऊपर रखने को तैयार नहीं थे। धर्मग्रंथ मनुष्यों के माध्यम से हम तक पहुँचते हैं और उनकी व्याख्या भी मनुष्य करते हैं। इसलिए आस्था विवेक को समाप्त नहीं कर सकती। यहीं गांधी के धार्मिक चिंतन का एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन दिखाई देता है: “ईश्वर सत्य है” से “सत्य ही ईश्वर है” तक की यात्रा।
अग्रवाल ने नास्तिक गांधीवादी गोरा के साथ गांधी के संवाद को याद करते हुए एक और महत्त्वपूर्ण बात रेखांकित की। कोई ईश्वर में विश्वास करता है या नहीं, इस प्रश्न पर असहमति बनी रह सकती है। लेकिन शांति, न्याय और मनुष्य की गरिमा के लिए आस्तिक और नास्तिक साथ काम कर सकते हैं। ईश्वर के अस्तित्व की बहस को स्थगित किया जा सकता है, नैतिक कर्म को नहीं।
लेखक हर्ष मंदर ने असगर अली इंजीनियर को भारतीय गणराज्य के उन महत्त्वपूर्ण नागरिकों में रखा जिन्हें आने वाला इतिहास सम्मान से याद करेगा। उनके वक्तव्य का मूल भाव दो सरल लेकिन आज अत्यंत महत्त्वपूर्ण विचारों में सिमटा था: भारत सबका है और सभी धर्म समान सम्मान के अधिकारी हैं। असगर अली इंजीनियर का जीवन इसी विश्वास को व्यवहार में उतारने की कोशिश था। मार्क्सवाद से आरंभ हुई उनकी बौद्धिक यात्रा सांप्रदायिक हिंसा के प्रत्यक्ष अनुभवों से गुजरते हुए धर्म की ऐसी व्याख्या तक पहुँची जिसमें न्याय, समानता और मनुष्य की मुक्ति केंद्रीय थे।
सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं के बाद वे लगातार तथ्य-अन्वेषण के लिए निकलते रहे। हर्ष मंदर ने सुझाव दिया कि उनकी इन fact-finding reports को एक साथ संकलित किया जाना चाहिए। ऐसा संकलन केवल असगर अली इंजीनियर के कार्य का दस्तावेज नहीं होगा, बल्कि स्वतंत्र भारत में सांप्रदायिक हिंसा और उसके बदलते स्वरूप का भी एक महत्त्वपूर्ण इतिहास बन सकता है।
आज की चर्चा से मेरे लिए सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह निकलकर आई कि बहुलतावाद अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यकों द्वारा दी जाने वाली कोई रियायत नहीं है। वह भारत जैसे समाज के अस्तित्व की बुनियादी शर्त है।
श्रीलंका सहित पड़ोसी देशों और दुनिया के दूसरे समाजों के अनुभवों की चर्चा करते हुए यह प्रश्न भी उठा कि धार्मिक बहुसंख्यकवाद अंततः किसे नुकसान पहुँचाता है। केवल अल्पसंख्यकों को? या धीरे-धीरे उस पूरे समाज को, जिसकी संस्थाएँ, अर्थव्यवस्था, शिक्षा, प्रतिभा और सामाजिक विश्वास धार्मिक ध्रुवीकरण की कीमत चुकाते हैं?
यहीं असगर अली इंजीनियर की स्मृति गांधी की आस्था से और गांधी की आस्था हमारे वर्तमान से जुड़ती है। गांधी, नेहरू, आंबेडकर और असगर अली इंजीनियर एक ही वैचारिक परंपरा के व्यक्ति नहीं थे। उनके बीच मतभेद थे और कुछ मतभेद बहुत गंभीर थे। लेकिन इतिहास का काम उन मतभेदों को मिटाना भी नहीं है। आवश्यकता यह देखने की है कि समान नागरिकता, विवेक, न्याय, धार्मिक सह-अस्तित्व और मनुष्य की गरिमा के प्रश्न पर उनकी अलग-अलग यात्राएँ कहाँ एक-दूसरे से संवाद करती हैं।
शायद इस व्याख्यान का सबसे बड़ा प्रश्न भी यही था कि क्या भारत सबका है? यदि उत्तर हाँ है, तो यह केवल संविधान की एक घोषणा नहीं रह सकती। उसे हमारे सामाजिक व्यवहार, हमारी राजनीति और राज्य की संस्थाओं, तीनों में दिखाई देना होगा। और शायद असगर अली इंजीनियर को याद करने का सबसे सार्थक तरीका भी यही है।
प्रश्नोत्तर सत्र में गांधी और आंबेडकर, धर्मांतरण, विभाजन, गांधी की सीमाएँ, हिंदुत्व का उभार, बहुसंख्यक असुरक्षा, पटेल की राजनीतिक विरासत और वर्तमान भारत में गांधी-नेहरू की प्रासंगिकता जैसे कई कठिन प्रश्न उठे।
गांधी से सवाल, यानी हमारे समय से सवाल:
असगर अली इंजीनियर स्मृति व्याख्यान! (भाग 2)
प्रमुख इतिहासकार, विचारक और लेखक रामचंद्र गुहा से पूछा गया कि क्या गांधी और आंबेडकर केवल विरोधी थे?
एक प्रश्न यह भी था कि गांधी के विरोधियों की चर्चा करते समय डॉ. बी. आर. आंबेडकर को क्यों नहीं रखा गया?
28वें डॉ. असगर अली इंजीनियर स्मृति व्याख्यान में रामचंद्र गुहा के “Gandhi’s Faith, and Ours” विषयक वक्तव्य और पुरुषोत्तम अग्रवाल की अध्यक्षीय टिप्पणियों के बाद हुआ प्रश्नोत्तर सत्र शायद कार्यक्रम का सबसे जीवंत हिस्सा था। सवाल केवल गांधी की आस्था तक सीमित नहीं रहे। गांधी-आंबेडकर संबंध, जाति और धर्मांतरण, गांधी की अपनी सीमाएँ, विभाजन, हिंदुत्व का उभार, बहुसंख्यक असुरक्षा, पटेल की विरासत और आज गांधी-नेहरू की प्रासंगिकता तक चर्चा फैलती गई।
इस संवाद की एक अच्छी बात यह थी कि गांधी को महिमामंडित करने के बजाय उनसे असुविधाजनक प्रश्न भी पूछे गए और गुहा ने कई जगह उनकी सीमाओं को स्पष्ट रूप से स्वीकार किया।
गुहा ने इसी संदर्भ में एक और महत्त्वपूर्ण बात कही। गांधी को प्रत्येक प्रश्न का अंतिम प्राधिकारी मानना इतिहाससम्मत नहीं है। जाति को आंबेडकर गांधी से बेहतर समझते थे और लैंगिक असमानता को कमलादेवी चट्टोपाध्याय जैसे व्यक्तित्व गांधी से अधिक गहराई से समझते थे।
गांधी की कमजोरियाँ क्या थीं? यह एक प्रश्न गांधी के कथन और कर्म के अंतर्विरोधों पर था। गुहा ने गांधी का बचाव करने के लिए उनकी कमजोरियों को छिपाया नहीं। उन्होंने कहा कि गांधी पारिवारिक जीवन में कठिन पिता थे, पति के रूप में उनमें पितृसत्तात्मक प्रवृत्तियाँ थीं और ब्रह्मचर्य को लेकर उनके कुछ आग्रह ऐसे थे जिनका वे स्वयं समर्थन नहीं करते।
महिलाओं और यौन हिंसा के संदर्भ में गांधी के कुछ अत्यंत विवादास्पद कथनों पर भी प्रश्न उठा। गुहा ने ऐसे एक कथन को बचाने की कोशिश नहीं की और उसे आवेगपूर्ण तथा असमर्थनीय माना। यह स्वीकारोक्ति महत्त्वपूर्ण थी। किसी ऐतिहासिक व्यक्तित्व की प्रासंगिकता सिद्ध करने के लिए उसे त्रुटिहीन बनाना आवश्यक नहीं है।
क्या गांधी बदलते भी थे? इसी से जुड़ा प्रश्न था कि गांधी के विचार समय के साथ कैसे विकसित हुए। गुहा ने एक उपयोगी अंतर किया। उनके अनुसार अहिंसा और हिंदू-मुस्लिम सद्भाव दो ऐसी प्रतिबद्धताएँ थीं जिन्हें गांधी ने अपेक्षाकृत कम उम्र में अपना लिया और जीवन भर उनसे जुड़े रहे। लेकिन जाति, नस्ल और लैंगिक समानता पर उनकी समझ क्रमशः विकसित हुई।
दक्षिण अफ्रीका के शुरुआती गांधी और जीवन के अंतिम दशकों के गांधी को एक ही वैचारिक स्थिति में रखकर नहीं पढ़ा जा सकता। नस्ल, जाति और स्त्री के प्रश्नों पर वे अपने अनुभवों, आलोचकों और सहयोगियों से सीखते रहे। वे पूर्ण नारीवादी नहीं बने और जाति की उनकी आलोचना आंबेडकर जितनी मूलगामी नहीं हुई, फिर भी उनमें अपने विचारों की पुनर्समीक्षा करने की क्षमता थी।
इतिहास में गांधी को समझने की शायद यही अधिक उपयोगी पद्धति है: किसी एक उद्धरण से नहीं, उनके विचारों की पूरी कालानुक्रमिक यात्रा से।
गांधी धर्मांतरण के विरोधी और आंबेडकर धर्मांतरित क्यों? एक युवा श्रोता ने बहुत महत्त्वपूर्ण प्रश्न किया। क्या गांधी का धर्मांतरण-विरोध इस तथ्य से जुड़ा था कि वे स्वयं जाति-व्यवस्था में अपेक्षाकृत विशेषाधिकार प्राप्त समुदाय से आते थे, जबकि आंबेडकर ने उसी व्यवस्था के उत्पीड़न को स्वयं झेला था?
गुहा ने इसे गांधी और आंबेडकर के बीच वास्तविक तथा गहरे मतभेद के रूप में स्वीकार किया, लेकिन गांधी की स्थिति को केवल उनकी जातिगत पृष्ठभूमि का परिणाम मानने से असहमति जताई। उनके अनुसार गांधी का विश्वास था कि व्यक्ति अपनी धार्मिक परंपरा के भीतर रहकर उसकी बुराइयों को दूर करे। उनका लक्ष्य हिंदू धर्म को छोड़ना नहीं, अस्पृश्यता को समाप्त करके उसे भीतर से सुधारना था।
आंबेडकर अपने जीवन-अनुभव से दूसरे निष्कर्ष पर पहुँचे। उन्हें अंततः विश्वास नहीं रहा कि दलितों को हिंदू सामाजिक व्यवस्था के भीतर वास्तविक मुक्ति मिल सकती है। 1935 में उन्होंने हिंदू के रूप में न मरने की घोषणा की और लंबी वैचारिक यात्रा के बाद 1956 में बौद्ध धर्म स्वीकार किया। इस मतभेद को इस तरह भी समझा जा सकता है: गांधी के लिए रास्ता था आत्मशुद्धि और भीतर से सुधार, आंबेडकर के लिए आत्मसम्मान, अधिकार और अंततः व्यवस्था से बाहर निकलना।
प्रश्नोत्तर का एक स्वाभाविक लेकिन कठिन प्रश्न था: देश के विभाजन के लिए कौन जिम्मेदार था? गुहा ने किसी एक व्यक्ति को दोषी ठहराने से स्पष्ट इनकार किया। उनके अनुसार न जिन्ना, न नेहरू, न गांधी और न कोई एक संगठन अकेले विभाजन के लिए जिम्मेदार था। विभाजन को 1906 से विकसित हो रही पृथक राजनीतिक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था, कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बदलते संबंधों, 1937 के बाद की प्रांतीय राजनीति, द्वितीय विश्वयुद्ध, 1940 के दशक के राजनीतिक ध्रुवीकरण और 1946 की निर्णायक परिस्थितियों की लंबी प्रक्रिया में समझना चाहिए।
उनका मूल आग्रह था कि इतिहास बहुकारकीय प्रक्रियाओं को किसी एक व्यक्ति की इच्छा में बदल देने से समझ में नहीं आता। लेकिन उन्होंने इसके बाद एक दूसरा प्रश्न उठाया: विभाजन हो जाने और हिंसा फैलने के बाद भारत में रह गए मुसलमानों की सुरक्षा के लिए सबसे दृढ़ता से कौन खड़ा हुआ? उनके उत्तर में गांधी और नेहरू की भूमिका निर्णायक थी।
क्या गांधी और नेहरू को हर समस्या का दोषी बना दिया गया? इसी चर्चा में गांधी और नेहरू की लगातार होने वाली अतिरंजित आलोचना का प्रश्न उठा। क्या आज की हिंदुत्व राजनीति के उभार में इसका भी योगदान है?
गुहा ने कहा कि जटिल राष्ट्रीय समस्याओं के लिए गांधी और नेहरू को जिम्मेदार ठहराना एक सुविधाजनक बलि का बकरा खोजने जैसा हो सकता है। भारत चीन जैसा क्यों नहीं बना, कोई राजनीतिक समस्या क्यों पैदा हुई, विभाजन क्यों हुआ, कश्मीर क्यों उलझा, इन सबके लिए दो व्यक्तियों को जिम्मेदार ठहरा देना इतिहास की जटिलता से बच निकलने का आसान रास्ता है।
पुरुषोत्तम अग्रवाल ने भी इसी प्रवृत्ति पर व्यंग्य करते हुए कहा कि भगत सिंह की फाँसी से लेकर विभाजन और कश्मीर तक हर प्रश्न को अंततः “गांधी और नेहरू ने इसे क्यों नहीं रोक दिया?” में बदल देना इतिहास समझने की पद्धति नहीं हो सकती।
एक और दिलचस्प प्रश्न था कि हिंदुत्ववादी राजनीति सरदार पटेल जैसे नेताओं की विरासत को अपने आख्यान में अपेक्षाकृत आसानी से शामिल कर पाई, लेकिन गांधी को पूरी तरह आत्मसात क्यों नहीं कर सकी?
गुहा ने माना कि कांग्रेस ने लंबे समय तक पटेल की विरासत को पर्याप्त स्थान नहीं दिया और इस रिक्तता का राजनीतिक लाभ दूसरे पक्ष ने उठाया। लेकिन गांधी की स्थिति अलग है।
गांधी को औपचारिक श्रद्धांजलि दी जा सकती है, उनकी तस्वीर लगाई जा सकती है, स्वच्छता जैसे किसी एक कार्यक्रम से उनका नाम जोड़ा जा सकता है, लेकिन उनके मूल विचारों को ग्रहण करना कहीं कठिन है। धार्मिक बहुलता, मुसलमानों और ईसाइयों की समान नागरिकता तथा अहिंसा उनके चिंतन के ऐसे आधार हैं जिन्हें उनसे अलग करके गांधी को समझना संभव नहीं। यही शायद गांधी को पूर्ण राजनीतिक विनियोग से बचाता है।
‘हिंदू असुरक्षा’ के प्रश्न को कौन संबोधित करेगा? एक श्रोता ने यह एक असुविधाजनक लेकिन विचारणीय प्रश्न उठाया। सार्वजनिक विमर्श में मुस्लिम असुरक्षा की चर्चा होती है, लेकिन हिंदुओं के एक हिस्से में मौजूद असुरक्षा और चिंता की बात कौन करेगा? क्या इसी खाली जगह को आरएसएस भरता है?
गुहा ने इस प्रश्न को गंभीर माना। उन्होंने श्रीलंकाई मानवविज्ञानी स्टैनली जे. तम्बैया की अवधारणा का उल्लेख किया: “majority with a minority complex”, अर्थात संख्या और शक्ति में बहुसंख्यक होने के बावजूद स्वयं को निरंतर संकटग्रस्त समझने वाला समुदाय।
श्रीलंका के अनुभव को सामने रखते हुए उनका व्यापक तर्क था कि बहुसंख्यकवाद अंततः केवल अल्पसंख्यकों को नुकसान नहीं पहुँचाता। वह पूरे देश की संस्थाओं, अर्थव्यवस्था, शिक्षा, सामाजिक विश्वास और भविष्य को प्रभावित कर सकता है। इसलिए धार्मिक बहुलता की रक्षा किसी अल्पसंख्यक समुदाय पर उपकार नहीं, बल्कि बहुसंख्यक सहित पूरे समाज के हित का प्रश्न है। गांधी और नेहरू आज फिर साथ क्यों जरूरी हैं? पूरे प्रश्नोत्तर से गुहा बार-बार एक निष्कर्ष की ओर लौटे–
वर्तमान भारत को समझने के लिए गांधी और नेहरू को एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा करना उपयोगी नहीं है।
गांधी हमें समाज के स्तर पर बताते हैं कि अलग-अलग धर्मों के लोग मित्र, पड़ोसी और बराबर मनुष्य की तरह कैसे रह सकते हैं। नेहरू हमें राज्य के स्तर पर याद दिलाते हैं कि कानून, प्रशासन और पुलिस को नागरिक की धार्मिक पहचान से निरपेक्ष होना चाहिए। एक का प्रश्न है सामाजिक बहुलता, दूसरे का संस्थागत समानता। दोनों के बिना संविधान का धर्मनिरपेक्ष वादा अधूरा रहता है।
चर्चा में एक और दिलचस्प सूत्र आया। गांधी, नेहरू, आंबेडकर और भगत सिंह के बीच वास्तविक और कभी-कभी बहुत गंभीर मतभेद थे। उन्हें मिटाना इतिहास के साथ अन्याय होगा। लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में उन मतभेदों को इस हद तक बढ़ा देना भी उचित नहीं कि स्वतंत्रता, समान नागरिकता, सामाजिक न्याय और बहुलतावाद के उनके साझा धरातल ही दिखाई देना बंद हो जाएँ।
पुरुषोत्तम अग्रवाल ने कार्यक्रम के अंत में इसे इतिहास से आगे भविष्य के प्रश्न के रूप में रखा। उनकी चिंता थी कि हमारी पीढ़ी ने जिस लोकतांत्रिक भारत को स्वाभाविक मान लिया था, उसकी कुछ बुनियादी मान्यताएँ आज फिर बहस के केंद्र में हैं।
इस पूरे प्रश्नोत्तर से मेरे लिए एक बात बहुत स्पष्ट होकर निकली है– गांधी को प्रासंगिक बनाने के लिए उन्हें निर्दोष सिद्ध करना आवश्यक नहीं। आंबेडकर को महत्त्वपूर्ण बनाने के लिए गांधी को निरर्थक सिद्ध करना भी आवश्यक नहीं।
नेहरू की ऐतिहासिक भूमिका स्वीकार करने के लिए उनकी नीतियों की आलोचना छोड़नी नहीं पड़ती। इतिहास का काम अपने नायकों को देवता और विरोधियों को खलनायक बनाना नहीं है। उसका काम यह समझना है कि वे कहाँ सही थे, कहाँ सीमित थे, कहाँ बदले, कहाँ असफल हुए और आज उनकी बहसों से हम क्या सीख सकते हैं।
शायद 28वें डॉ. असगर अली इंजीनियर स्मृति व्याख्यान के प्रश्नोत्तर सत्र की सबसे बड़ी उपलब्धि यही थी कि उसने गांधी को श्रद्धा की मूर्ति बनाकर सामने नहीं रखा, बल्कि सवालों के बीच रखा। और इतिहास में किसी बड़े व्यक्तित्व को जीवित रखने का इससे बेहतर तरीका शायद ही कोई हो।
Discover more from समता मार्ग
Subscribe to get the latest posts sent to your email.

















