संघ का अनुशासन मनुष्य को किस हद तक अविवेकी बना सकता है, इसका एक अनुभव मुझे बहुत पहले हुआ था। गोलवलकर साहब यानी संघ के गुरु जी की किसी किताब में स्वयंसेवकों को संबोधित करते हुए उनका लिखा मैंने पढ़ा था कि जिस काम में आप लगे हैं, उस काम से यदि आपको मुक्त कर किसी दूसरे काम में लगा दिया जाए, तो आपको यह सोचने की जरूरत नहीं है कि जिस काम को आप कर रहे थे, उससे हटाकर दूसरे काम में आपको क्यों लगाया गया। यानी, मनुष्य के रूप में प्रकृति ने आपको जो सोचने-समझने और सवाल करने की क्षमता दी है, उसका प्रयोग आपको नहीं करना है। केवल आदेश का पालन करना है ।
यहीं से मेरे मन में एक सवाल पैदा होता है—आखिर मनुष्य को मनुष्य बनाने वाली सबसे बड़ी चीज क्या है? मेरी समझ में वह उसका विवेक है। प्रकृति ने मनुष्य को दूसरे जीवों से इसलिए अलग बनाया है कि वह सोच सकता है, तर्क कर सकता है, सही और गलत में फर्क कर सकता है और अपने निर्णय खुद ले सकता है। यही चेतना और विवेक उसे अन्य जीवों से अलग बनाते हैं।
लेकिन मुझे आश्चर्य होता है कि संघ का अनुशासन कई बार मनुष्य की इसी स्वाभाविक क्षमता को कुंठित करता हुआ दिखाई देता है। स्वयंसेवक से अपेक्षा की जाती है कि वह आदेश पर सवाल न करे, यह न पूछे कि ऐसा क्यों किया जा रहा है, बल्कि जो कहा जा रहा है, उसे स्वीकार कर ले।
मैंने इसका अनुभव बहुत करीब से किया है, विशेष रूप से आपातकाल के दौरान फुलवारी शरीफ जेल में। उस समय इंदिरा गांधी की सरकार ने संघ पर भी प्रतिबंध लगा दिया था। संघ के अनेक लोग गिरफ्तार होकर जेल में हमारे साथ थे। उनमें कुछ वरिष्ठ नेता भी थे, जो बाद में मंत्री बने।उन्हीं में से एक से जुड़ी एक घटना मुझे आज भी याद है।
फुलवारी शरीफ जेल बहुत छोटा था। एक चक्कर लगाने में चार-पाँच मिनट से अधिक नहीं लगते थे। जाड़े का दिन था। मैं धूप में बैठा हुआ अंग्रेजी के टाइम्स ऑफ इंडिया के संपादकीय पृष्ठ पर दिलीप पंडगांवकर का माओत्से तुंग पर लिखा हुआ एक लेख पढ़ने में पूरी तरह डूबा हुआ था।
उन दिनों माओत्से तुंग युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय थे। उनकी ‘लाल किताब’ की भी बहुत चर्चा थी। वह सामान्य अर्थों में कोई व्यवस्थित किताब नहीं थी, बल्कि उपदेशात्मक अंदाज में छोटी-छोटी बातों और विचारों को प्रस्तुत किया गया था।
इसी दौरान संघ के एक वरिष्ठ नेता मेरे पास से गुजरे। मुझे इतने मनोयोग से पढ़ते देखकर उन्होंने पूछा—
क्या तिवारी जी, इतने ध्यान से क्या पढ़ रहे हैं?
मैंने कहा कि माओत्से तुंग पर एक लेख पढ़ रहा हूँ।
उन्होंने एक रहस्यमयी मुस्कान के साथ कहा—
“अच्छा-अच्छा, माओ को पढ़ रहे हैं!”
उनके कहने के अंदाज से मुझे लगा कि माओ के बारे में शायद वे कोई ऐसी खास बात जानते हैं, जिसकी जानकारी मुझे नहीं है। मेरे मन में उत्सुकता पैदा हो गई। मैंने सोचा, आखिर माओ के बारे में इनके पास ऐसी कौन-सी जानकारी है, जो मुझे नहीं मालूम?
थोड़ी देर बातचीत के बाद उन्होंने माओत्से तुंग के बारे में जो कहानी सुनाई, वह कुछ इस तरह थी।
छपरा जिले के एक गाँव में गंगूआ नाम का एक धोबी रहता था। उसका एक बेटा था—रमुआ। रमुआ में विलक्षण प्रतिभा थी। एक दिन वह घर से भागकर कलकत्ता पहुँच गया। वहाँ वह चोरी-छिपे पानी के एक जहाज पर चढ़ गया। जहाज जर्मनी पहुँच गया।
जर्मनी में पकड़े जाने के बाद उससे पूछताछ हुई। पूछताछ करने वाले उसकी असाधारण प्रतिभा से इतने प्रभावित हुए कि बात हिटलर तक पहुँच गई। हिटलर ने भी उसका इंटरव्यू लिया और उसकी प्रतिभा से प्रभावित हुआ। इसके बाद हिटलर ने अपनी देखरेख में रमुआ को प्रशिक्षण दिलवाया और फिर उसे चीन भेज दिया।और वही रमुआ आगे चलकर माओत्से तुंग बना!यह कहानी सुनकर मेरे सामने दो ही रास्ते थे—या तो हँसू या अपना सिर पीटूँ।
मैं सोचने लगा कि एक सामान्य अनपढ़ आदमी भी किसी भारतीय चेहरे और किसी चीनी चेहरे के बीच का फर्क पहचान सकता है। इसके बावजूद यह कहानी किसी के दिमाग में इस तरह बैठा दी गई थी कि वह उसे सच मानकर दूसरों को भी सुना रहा था।
मुझे इस घटना में सिर्फ एक हास्यास्पद कहानी दिखाई नहीं देती। यह उस मानसिकता का उदाहरण है, जिसमें व्यक्ति को किसी बात की सत्यता परखने की जरूरत महसूस ही नहीं होती। उसे जो बताया गया, वह उसके लिए सत्य हो गया।
यही संघ के अनुशासन को लेकर मेरा मूल सवाल है।
अनुशासन आवश्यक है, लेकिन ऐसा अनुशासन जो मनुष्य से सवाल करने का अधिकार छीन ले, वह अनुशासन नहीं, विवेक का दमनकर्ता बन जाता है। मनुष्य को आदेश मानने वाली मशीन में बदल देना किसी संगठन की उपलब्धि नहीं हो सकती।
मनुष्य की सबसे बड़ी ताकत उसका विवेक है। वह पूछता है—क्यों? वह कहता है—यह सही है या गलत? वह किसी बात को इसलिए स्वीकार नहीं करता कि किसी बड़े व्यक्ति ने कह दिया है; वह उसे अपने अनुभव, तर्क और ज्ञान की कसौटी पर परखता है।
लेकिन यदि प्रशिक्षण का उद्देश्य ही यह बना दिया जाए कि व्यक्ति सवाल न करे, आदेश के पीछे का कारण न पूछे और संगठन द्वारा कही गई बात को अंतिम सत्य मान ले, तो धीरे-धीरे उसका स्वतंत्र विवेक कमजोर पड़ता जाता है।
तब वह वही मानने लगता है जो उसे बताया जाता है और स्थिति इतनी आगे जा सकती है कि गंगूआ के बेटे रमुआ को भी माओत्से तुंग मान लिया जाए।
मेरे लिए उस घटना का असली अर्थ यही है—मनुष्य को अनुशासित करना ठीक है, लेकिन उसके विवेक को समाप्त करके नहीं। क्योंकि जिस दिन मनुष्य ने सवाल करना छोड़ दिया, उस दिन वह मनुष्य नहीं रह जाता है।
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