सामाजिकता के नाम पर इतिहास, दर्शन और साहित्य का एकांगीकरण

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Parichay Das

— परिचय दास —

1. प्रतिरोध की विचारधारा आलोचना से ऊपर कैसे हो गई?

आधुनिक भारतीय बौद्धिक जीवन की एक विडंबना यह है कि सामाजिकता के नाम पर विकसित कुछ विमर्श स्वयं आलोचना से बचने की प्रवृत्ति दिखाने लगते हैं। उनके सामने प्रश्न उठाइए, तो उत्तर में तर्क के स्थान पर सामाजिक पहचान प्रस्तुत कर दी जाती है; ऐतिहासिक दावे की प्रमाणिकता पूछिए, तो उसे वंचित समुदाय के अनुभव के प्रति असंवेदनशीलता बताया जाता है; साहित्यिक गुणवत्ता पर प्रश्न कीजिए, तो आलोचक की सामाजिक स्थिति को कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है।

यह स्थिति किसी भी विचारधारा के लिए खतरनाक है। विचार का अधिकार तभी सार्थक है, जब विचार की आलोचना का अधिकार भी सुरक्षित हो।

फुले और आंबेडकर ने भारतीय समाज की गंभीर समस्याओं को सामने रखा। जातिगत अपमान, अस्पृश्यता, शिक्षा से वंचना और सामाजिक अधिकारों का निषेध वास्तविक ऐतिहासिक प्रश्न हैं। लेकिन इन प्रश्नों को उठाने वाले विचारकों की प्रतिष्ठा के कारण उनके प्रत्येक निष्कर्ष को अंतिम सत्य मान लेना बौद्धिक स्वतंत्रता का परित्याग होगा।

किसी विचारक का ऐतिहासिक महत्त्व उसके प्रत्येक कथन की सत्यता का प्रमाणपत्र नहीं है।

फुले की ऐतिहासिक व्याख्याएँ, आंबेडकर के सामाजिक सिद्धांत, उनके राजनीतिक निर्णय और उनके साहित्यिक-सांस्कृतिक निष्कर्ष सभी आलोचनात्मक परीक्षण के विषय हैं। यह परीक्षण उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि का अपमान नहीं, बल्कि विचार को गंभीरता से लेने की पहली शर्त है।

किसी विचारधारा को केवल इसलिए सत्य मान लेना कि उसने ऐतिहासिक अन्याय का प्रतिरोध किया है, उसी प्रकार की तार्किक भूल है, जैसे किसी परंपरा को केवल पुराना होने के कारण सत्य मान लेना। न्यायपूर्ण उद्देश्य और सत्य निष्कर्ष दो अलग कसौटियाँ हैं।

2. फुले की सबसे बड़ी सीमा : इतिहास को सामाजिक संघर्ष की एक कथा में समेट देना

ज्योतिराव फुले की ‘गुलामगिरी’ भारतीय सामाजिक आलोचना की एक महत्त्वपूर्ण रचना है। उन्होंने जातिगत वर्चस्व, शिक्षा पर नियंत्रण और धार्मिक-सामाजिक असमानता पर तीखा प्रहार किया। लेकिन उनकी रचना का ऐतिहासिक महत्त्व स्वीकार करने का अर्थ यह नहीं कि उसमें प्रस्तुत प्रत्येक ऐतिहासिक व्याख्या को आधुनिक इतिहासलेखन का प्रमाणित निष्कर्ष मान लिया जाए।

फुले ने आर्य-अनार्य संघर्ष की व्याख्या के माध्यम से ब्राह्मणवादी वर्चस्व की आलोचना की। इस आख्यान में सामाजिक उत्पीड़न को समझने की एक शक्तिशाली प्रतिरोधी भाषा मौजूद है। लेकिन किसी आख्यान की राजनीतिक प्रभावशीलता और उसकी ऐतिहासिक प्रमाणिकता अलग-अलग प्रश्न हैं।

यदि प्राचीन भारत के इतिहास को मूलतः बाहरी आक्रमणकारियों और स्थानीय मूलनिवासियों के बीच संघर्ष की एक स्थायी कथा के रूप में प्रस्तुत किया जाए, तो अनेक जटिल प्रश्न अनुत्तरित रह जाते हैं। भाषाई परिवर्तन, पुरातात्त्विक साक्ष्य, जनसमूहों के प्रवास, सांस्कृतिक आदान-प्रदान, धार्मिक रूपांतरण और स्थानीय समाजों के अंतर्विरोधों की स्वतंत्र जाँच आवश्यक है।

आधुनिक शोध में आर्य भाषाओं के प्रसार और प्राचीन जनसमूहों के आवागमन पर गंभीर बहस हुई है। किंतु भाषाई परिवार, जैविक वंशावली, राजनीतिक प्रभुत्व और आधुनिक जातिगत पहचान एक ही चीज नहीं हैं। इनमें से किसी एक को दूसरे का स्वतः प्रमाण मान लेना वैज्ञानिक पद्धति के विपरीत है।

इसलिए फुले की आर्य-अनार्य व्याख्या को ऐतिहासिक परिकल्पना के रूप में जाँचना चाहिए, अपरिवर्तनीय सत्य के रूप में नहीं। यदि किसी प्राचीन संघर्ष को आधुनिक जातियों के बीच सीधे आरोपित किया जाता है, तो उसके लिए प्रमाणों की एक लंबी शृंखला चाहिए। केवल राजनीतिक रूप से प्रभावशाली आख्यान पर्याप्त नहीं है।

यहाँ मूल प्रश्न है: क्या हम इतिहास को प्रमाणों से समझ रहे हैं या वर्तमान सामाजिक संघर्ष को अतीत पर आरोपित कर रहे हैं?

3. ‘गुलामगिरी’ का नैतिक आक्रोश और इतिहास की प्रमाणिकता

फुले की भाषा में व्यंग्य, प्रतिरोध और नैतिक आक्रोश की तीव्रता है। उन्नीसवीं शताब्दी के सामाजिक संदर्भ में इस भाषा का अपना महत्त्व था। लेकिन तीखा आक्रोश अपने आप में ऐतिहासिक प्रमाण नहीं बन जाता।

यदि किसी सामाजिक व्यवस्था के विभिन्न कालखंडों को एक ही उत्पीड़क संरचना की निरंतरता के रूप में प्रस्तुत किया जाए, तो यह बताना आवश्यक है कि उस निरंतरता के संस्थागत, आर्थिक और राजनीतिक प्रमाण क्या हैं। कौन-सी व्यवस्था कहाँ लागू थी? उसका स्वरूप किस काल में बदला? किन समुदायों को किस प्रकार का अधिकार प्राप्त था? स्थानीय परिस्थितियों में क्या अंतर था?

इन प्रश्नों का उत्तर दिए बिना पूरे इतिहास को एक ही संघर्ष की कहानी बना देना विश्लेषण की जगह नैतिक वर्गीकरण को स्थापित करता है।

फुले की रचना को उसके समय की सामाजिक आलोचना के रूप में पढ़ना और उसके सभी ऐतिहासिक निष्कर्षों को प्रमाणित इतिहास मान लेना अलग-अलग बातें हैं। उनकी आलोचनात्मक ऊर्जा महत्त्वपूर्ण है, लेकिन ऐतिहासिक दावों की स्वतंत्र जाँच फिर भी आवश्यक है।

किसी विचारक ने सामाजिक अन्याय का वास्तविक प्रश्न उठाया हो, इससे यह सिद्ध नहीं होता कि उसने अतीत की हर घटना का सही कारण भी खोज लिया था। चिकित्सा में रोग की पहचान की आवश्यकता स्वीकार करना और किसी एक चिकित्सक की प्रत्येक दवा को प्रभावी मान लेना अलग बातें हैं। सामाजिक विचार में भी यही विवेक अपेक्षित है।

4. क्या ‘ब्राह्मणवाद’ इतिहास की हर बुराई की व्याख्या कर सकता है?

फुले की परंपरा से विकसित कुछ व्याख्याओं में ब्राह्मणवादी वर्चस्व को सामाजिक जीवन की लगभग सभी समस्याओं का केंद्रीय कारण बना दिया जाता है। ऐसी व्याख्या जातिगत सत्ता के महत्त्वपूर्ण पक्षों को उजागर कर सकती है, लेकिन जब वही एकमात्र व्याख्या बन जाती है, तो उसका विश्लेषणात्मक सामर्थ्य घटने लगता है।

समाज में सत्ता केवल धार्मिक प्रतिष्ठा से संचालित नहीं होती। भूमि का स्वामित्व, उत्पादन के साधनों पर नियंत्रण, राज्य की शक्ति, सैन्य संगठन, शिक्षा तक पहुँच, बाजार, श्रम-विभाजन और राजनीतिक गठबंधन भी सामाजिक पदानुक्रम को आकार देते हैं।

किसी क्षेत्र में जातिगत प्रभुत्व का संबंध भूमि से हो सकता है; दूसरे क्षेत्र में राजनीतिक सत्ता से; कहीं धार्मिक संस्थानों से और कहीं आधुनिक शिक्षा तथा प्रशासन में असमान प्रतिनिधित्व से। इन सभी स्थितियों को केवल एक ही वैचारिक सूत्र में बाँध देना स्थानीय भिन्नताओं को अदृश्य कर सकता है।

यह भी प्रश्न है कि यदि किसी समाज में जातिगत उत्पीड़न मौजूद था, तो विभिन्न गैर-ब्राह्मण प्रभुत्वशाली समूहों की भूमिका क्या थी? क्या सभी सामाजिक और आर्थिक शोषण केवल ब्राह्मणों द्वारा संचालित थे? क्या स्थानीय स्तर पर भूमि, श्रम और संसाधनों पर नियंत्रण रखने वाले अन्य समूहों की सत्ता का स्वतंत्र अध्ययन नहीं होना चाहिए?

इन प्रश्नों का उत्तर किसी जाति के पक्ष या विपक्ष में नहीं, बल्कि प्रमाण के आधार पर दिया जाना चाहिए।

जो सिद्धांत हर समस्या का एक ही कारण बताता है, वह कभी-कभी बहुत कुछ समझाने के प्रयास में वास्तविकता के महत्त्वपूर्ण हिस्सों को खो देता है।

5. आंबेडकर का जाति-विमर्श : असाधारण अंतर्दृष्टि, पर अंतिम व्याख्या नहीं

डॉ. भीमराव आंबेडकर ने जाति को केवल सामाजिक पूर्वग्रह नहीं, बल्कि सामाजिक संबंधों और अवसरों को व्यवस्थित करने वाली संरचना के रूप में समझने का प्रयास किया। ‘Annihilation of Caste’ में उन्होंने जाति की कठोर आलोचना की और सामाजिक लोकतंत्र के बिना राजनीतिक लोकतंत्र की सीमाओं पर बल दिया।

यह योगदान महत्त्वपूर्ण है। लेकिन किसी सामाजिक संरचना का प्रभावशाली विश्लेषण प्रस्तुत कर देना उसके इतिहास, सभी क्षेत्रीय रूपों और प्रत्येक समकालीन परिणाम की पूर्ण व्याख्या नहीं बन जाता।

आंबेडकर की जाति-संबंधी व्याख्याओं को समाजशास्त्र, मानवशास्त्र, आर्थिक इतिहास और क्षेत्रीय अध्ययनों के साथ रखकर जाँचना चाहिए। जाति की उत्पत्ति, अंतर्विवाह, सामाजिक बंदिशों, पेशागत संबंधों और सत्ता-संसाधनों के वितरण पर अलग-अलग शोध प्रश्न उठते हैं। किसी एक सिद्धांत से इन सभी का पूरा उत्तर मिल जाए, यह आवश्यक नहीं।

यहाँ एक महत्त्वपूर्ण आलोचनात्मक प्रश्न है: क्या जाति को समझने के लिए केवल धार्मिक वैधता पर्याप्त है, या आर्थिक हित, स्थानीय सत्ता, विवाह-संबंध, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सामाजिक प्रतिष्ठा को भी स्वतंत्र विश्लेषण में स्थान देना होगा?

यदि कोई व्याख्या इन कारकों को पर्याप्त रूप से नहीं समझाती, तो उसे संशोधित करना चाहिए। यही वैज्ञानिक दृष्टि है।

आंबेडकर के सिद्धांत की आलोचना करते समय यह भी ध्यान रखना होगा कि उन्होंने स्वयं जाति के विभिन्न पहलुओं पर अनेक संदर्भों में विचार किया। उनके विचारों को एक नारे में सीमित करना भी उतना ही अनुचित है, जितना उन्हें आलोचना से परे रखना।

6. सामाजिक न्याय का सिद्धांत और राजनीतिक रणनीति एक ही चीज नहीं

आंबेडकर के राजनीतिक जीवन में प्रतिनिधित्व, पृथक निर्वाचिका, आरक्षण, संवैधानिक अधिकार और राजनीतिक संगठन के प्रश्न महत्त्वपूर्ण रहे। इन प्रश्नों पर उनके निर्णयों का मूल्यांकन ऐतिहासिक परिस्थितियों के संदर्भ में किया जाना चाहिए।

उदाहरण के लिए, 1932 के कम्यूनल अवॉर्ड और पूना समझौते के संदर्भ में पृथक निर्वाचिका तथा आरक्षित सीटों के बीच अंतर को समझना आवश्यक है। आंबेडकर की रणनीति का मूल्यांकन इस आधार पर किया जा सकता है कि विभिन्न व्यवस्थाएँ राजनीतिक प्रतिनिधित्व, स्वतंत्र नेतृत्व, सामाजिक एकीकरण और समुदायों की स्वायत्तता पर क्या प्रभाव डाल सकती थीं।

लेकिन किसी एक राजनीतिक विकल्प को हर समय और हर परिस्थिति के लिए सर्वोत्तम मान लेना उचित नहीं होगा। राजनीतिक रणनीतियों में लाभ, सीमाएँ और समझौते होते हैं। लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के अलग-अलग मॉडलों के प्रभावों पर तर्कपूर्ण बहस संभव है।

इसी तरह आरक्षण की आवश्यकता और उसके क्रियान्वयन पर बहस को दो अतियों में नहीं बाँटना चाहिए। एक ओर यह मान लेना कि आरक्षण सभी सामाजिक समस्याओं का समाधान है, और दूसरी ओर यह मान लेना कि वह अपने आप में अनुचित है, दोनों ही अधूरे निष्कर्ष हैं। शिक्षा की गुणवत्ता, रोजगार का विस्तार, सामाजिक भेदभाव, आर्थिक संसाधन और संस्थागत जवाबदेही का स्वतंत्र अध्ययन आवश्यक है।

आंबेडकर का राजनीतिक योगदान महत्त्वपूर्ण है, पर लोकतांत्रिक संस्थाओं की हर समस्या का समाधान केवल उनके किसी एक प्रस्ताव में खोज लेना न तो आवश्यक है, न पर्याप्त।

7. संविधान और सामाजिक क्रांति के बीच की दूरी

आंबेडकर ने राजनीतिक लोकतंत्र के साथ सामाजिक लोकतंत्र की आवश्यकता पर बल दिया। इस विचार की शक्ति इसी में है कि संवैधानिक समानता और सामाजिक वास्तविकता हमेशा एक जैसी नहीं होतीं।

लेकिन इस समस्या का विश्लेषण करते समय यह भी देखना होगा कि सामाजिक परिवर्तन के लिए किन संस्थागत और आर्थिक प्रक्रियाओं की आवश्यकता है। कानून में समानता स्थापित करना, शिक्षा का प्रसार, न्यायपालिका तक पहुँच, आर्थिक अवसर, स्थानीय प्रशासन में जवाबदेही और सामाजिक व्यवहार में परिवर्तन एक-दूसरे से संबंधित, लेकिन अलग-अलग प्रक्रियाएँ हैं।

यदि सामाजिक असमानता बनी रहती है, तो केवल यह कह देना कि संविधान पर्याप्त नहीं था, समस्या की व्याख्या नहीं करता। प्रश्न यह है कि कौन-सी नीतियाँ कहाँ सफल हुईं, कहाँ विफल रहीं और क्यों?

आंबेडकर की सामाजिक लोकतंत्र संबंधी चिंता को आगे बढ़ाने का वास्तविक तरीका उनके नाम का राजनीतिक उपयोग नहीं, बल्कि इन संस्थागत प्रश्नों पर प्रमाण-आधारित शोध है।

8. आंबेडकर की बौद्ध व्याख्या पर भी आलोचनात्मक प्रश्न संभव हैं

आंबेडकर ने बौद्ध धर्म को नैतिकता, विवेक और सामाजिक मुक्ति की दृष्टि से पुनर्व्याख्यायित किया। ‘The Buddha and His Dhamma’ इस परियोजना की महत्त्वपूर्ण अभिव्यक्ति है।

लेकिन यहाँ भी एक आलोचनात्मक अंतर आवश्यक है। ऐतिहासिक बुद्ध के जीवन और शिक्षाओं का अध्ययन, प्राचीन बौद्ध परंपराओं का तुलनात्मक विश्लेषण और आधुनिक सामाजिक उद्देश्यों के लिए बौद्ध धर्म की पुनर्व्याख्या तीन अलग कार्य हैं।

आंबेडकर की बौद्ध व्याख्या का महत्त्व उनके आधुनिक सामाजिक और नैतिक उद्देश्य के संदर्भ में समझा जा सकता है। साथ ही यह भी पूछा जा सकता है कि उनकी व्याख्या प्राचीन बौद्ध ग्रंथों और विभिन्न बौद्ध परंपराओं से कहाँ सहमत है, कहाँ चयन करती है और कहाँ नया अर्थ विकसित करती है।

किसी आधुनिक विचारक की धार्मिक या दार्शनिक पुनर्व्याख्या को ऐतिहासिक बुद्ध के संपूर्ण विचार का पर्याय मान लेना उचित नहीं होगा। दूसरी ओर, उसे केवल इसलिए अस्वीकार कर देना कि वह परंपरागत व्याख्याओं से अलग है, भी उचित नहीं है।

यहाँ निष्पक्ष कसौटी वही है: पाठ, ऐतिहासिक संदर्भ, तर्क और व्याख्यात्मक संगति।

9. फुले और आंबेडकर के विचारों को एक अखंड विचारधारा मानने की समस्या

फुले और आंबेडकर दोनों ने सामाजिक असमानता का विरोध किया, लेकिन उनके ऐतिहासिक संदर्भ, बौद्धिक स्रोत और राजनीतिक कार्यक्षेत्र समान नहीं थे। दोनों के विचारों को एक ही अखंड सिद्धांत में बदल देना उनकी विशिष्टताओं को मिटा सकता है।

फुले की सामाजिक आलोचना, शिक्षा संबंधी दृष्टि और धार्मिक आख्यानों का पुनर्पाठ उन्नीसवीं शताब्दी के महाराष्ट्र की परिस्थितियों में विकसित हुआ। आंबेडकर का चिंतन औपनिवेशिक शासन, आधुनिक शिक्षा, प्रतिनिधित्व, संवैधानिकता और बीसवीं शताब्दी के राजनीतिक संघर्षों से गहरे रूप में जुड़ा था।

दोनों के बीच वैचारिक निरंतरता के साथ अंतर भी हैं। उनके विचारों को समझने के लिए यह पूछना आवश्यक है कि किन प्रश्नों पर वे समान धरातल पर हैं और किन प्रश्नों पर उनकी दृष्टि अलग होती है।

जब किसी विचारधारा को एक ही अंतिम सत्य के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तो उसके भीतर के मतभेद भी दब जाते हैं। इससे स्वतंत्र चिंतन का स्थान निष्ठा-परीक्षा ले लेती है। किसी विचारक का अनुयायी होना और उसके विचारों का आलोचनात्मक पाठ करना अलग बातें हैं।

10. दलित साहित्य की पहली समस्या : अनुभव को एकमात्र प्रमाण बना देना

दलित साहित्य ने जातिगत अपमान, सामाजिक बहिष्कार और प्रतिरोध के अनुभवों को साहित्यिक अभिव्यक्ति दी है। इसने उन जीवन-स्थितियों को सामने रखा है जिन्हें अनेक साहित्यिक संस्थानों और आलोचनात्मक परंपराओं ने पर्याप्त स्थान नहीं दिया था।

लेकिन अनुभव की प्रामाणिकता और अनुभव के आधार पर निकाले गए प्रत्येक निष्कर्ष की सत्यता अलग बातें हैं।

किसी व्यक्ति ने भेदभाव झेला है, तो उसका अनुभव वास्तविक और महत्त्वपूर्ण है। लेकिन उस अनुभव से पूरे समाज, सभी समुदायों या प्रत्येक ऐतिहासिक घटना के बारे में निकाला गया निष्कर्ष स्वतंत्र प्रमाण और तर्क की माँग करता है।

उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति को किसी संस्थान में जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ा, तो यह उस घटना का गंभीर प्रमाण है। लेकिन उससे यह निष्कर्ष अपने आप नहीं निकलता कि उस संस्थान का प्रत्येक सदस्य भेदभावकारी है या हर निर्णय केवल जाति से संचालित होता है। इसके लिए व्यापक आँकड़ों, तुलनात्मक अध्ययन और संस्थागत व्यवहार की जाँच आवश्यक है।

यह कसौटी दलित साहित्य के लिए ही नहीं, हर प्रकार के आत्मकथात्मक और अनुभवपरक साहित्य के लिए लागू होती है।

अनुभव को नकारना अन्याय है; अनुभव को बिना परीक्षण के सार्वभौमिक सिद्धांत बना देना भी बौद्धिक भूल हो सकती है।

11. दूसरी समस्या : साहित्य को पीड़ा का पर्याय बना देना

साहित्य में पीड़ा की अभिव्यक्ति महत्त्वपूर्ण है। लेकिन साहित्य केवल पीड़ा का विवरण नहीं है। उसमें भाषा, संरचना, कल्पना, चरित्र-निर्माण, समय-बोध, कथात्मक तनाव और संवेदना की कलात्मक अभिव्यक्ति भी निर्णायक हैं।

यदि किसी रचना का मूल्यांकन मुख्यतः इस आधार पर होने लगे कि उसमें कितनी पीड़ा व्यक्त की गई है, तो कलात्मक प्रश्न पीछे छूट सकते हैं। तब अनुभव की तीव्रता को भाषा की उपलब्धि और सामाजिक प्रतिबद्धता को साहित्यिक उत्कृष्टता का स्वतः प्रमाण मान लिया जाता है।

यहाँ सावधानी जरूरी है। पीड़ा का दस्तावेज भी साहित्यिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन हर दस्तावेज उत्कृष्ट साहित्य नहीं होता। इसी तरह कल्पना, हास्य, प्रेम, प्रकृति, आध्यात्मिक बेचैनी या दार्शनिक प्रश्नों पर आधारित रचना सामाजिक यथार्थ से विमुख नहीं होती।

साहित्यिक आलोचना का काम अनुभव की गरिमा को स्वीकार करते हुए यह भी देखना है कि अनुभव कलात्मक रूप में किस प्रकार रूपांतरित हुआ है।

12. तीसरी समस्या : जातिगत पहचान को साहित्यिक पात्रता का प्रमाण बना देना

यदि किसी लेखक को केवल इसलिए विशेष साहित्यिक प्रामाणिकता प्रदान की जाए कि वह किसी वंचित समुदाय से आता है, तो यह मान लिया जाता है कि सामाजिक पहचान अपने आप कलात्मक गुणवत्ता की गारंटी है।

यह निष्कर्ष उचित नहीं है। किसी समुदाय का सदस्य होना उसके अनुभवों को समझने के लिए महत्त्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन इससे प्रत्येक रचना समान रूप से प्रभावशाली या कलात्मक रूप से सफल नहीं हो जाती।

इसी प्रकार किसी अन्य सामाजिक समूह के लेखक को केवल उसकी पहचान के कारण संदिग्ध मान लेना भी उचित नहीं है। किसी लेखक ने जातिगत अनुभवों को किस संवेदनशीलता, गहराई और प्रामाणिकता से व्यक्त किया है, यह रचना के विश्लेषण का विषय है।

साहित्यिक संस्थानों में प्रतिनिधित्व का प्रश्न अलग है। यदि किसी समुदाय के लेखकों को ऐतिहासिक रूप से कम अवसर मिले हैं, तो संस्थागत सुधार आवश्यक हो सकते हैं। लेकिन प्रतिनिधित्व का विस्तार और साहित्यिक मूल्यांकन के मानदंडों का परित्याग एक ही बात नहीं हैं।

समान अवसर सुनिश्चित करना चाहिए; गुणवत्ता का प्रश्न फिर भी बना रहना चाहिए।

13. चौथी समस्या : प्रतिरोध के नाम पर नया नैतिक द्वैत

किसी साहित्यिक विमर्श में यदि एक पक्ष को स्वाभाविक रूप से उत्पीड़क और दूसरे को स्वाभाविक रूप से नैतिक मान लिया जाए, तो मनुष्य की जटिलता गायब होने लगती है।

वास्तविक समाज में व्यक्ति के विचार, व्यवहार और हित अनेक कारकों से बनते हैं। जाति का प्रभाव महत्त्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन वह हर परिस्थिति में अकेला कारण नहीं होता। आर्थिक स्थिति, शिक्षा, राजनीतिक हित, पारिवारिक पृष्ठभूमि, व्यक्तिगत अनुभव और संस्थागत परिस्थितियाँ भी भूमिका निभाती हैं।

साहित्य की विशेषता यह है कि वह इन विरोधाभासों को दिखा सकता है। यदि पात्र पहले से तय नैतिक श्रेणियों में बाँट दिए जाएँ, तो कथा की जटिलता घट जाती है और साहित्य विचारधारा के उदाहरणों का संग्रह बनकर रह जाता है।

प्रतिरोधी साहित्य में भी जटिल चरित्र, आत्मालोचना, आंतरिक विरोधाभास और मानवीय विविधता की आवश्यकता है। अन्यथा साहित्य जीवन को समझने के बजाय पहले से निर्धारित निष्कर्षों की पुष्टि करने लगता है।

14. पाँचवीं समस्या : सामाजिक नारे का कलात्मक भाषा पर दबाव

किसी रचना में सामाजिक संदेश होना उसकी कमजोरी नहीं है। अनेक महान रचनाएँ अपने समय के अन्याय से सीधे संवाद करती हैं। समस्या तब पैदा होती है जब संदेश इतना प्रधान हो जाए कि भाषा, रूप, चरित्र और कलात्मक संरचना केवल उसके वाहक बनकर रह जाएँ।

साहित्यिक रचना में विचार को कलात्मक रूपांतरण की आवश्यकता होती है। अनुभव को कथा में, आक्रोश को भाषा में, प्रतिरोध को चरित्रों और परिस्थितियों में तथा सामाजिक संघर्ष को रचना की संरचना में रूपांतरित करना पड़ता है।

यदि रचना केवल आरोपों, घोषणाओं और निष्कर्षों का संचय बन जाए, तो उसका साहित्यिक प्रभाव सीमित हो सकता है। लेकिन यह आलोचना किसी एक साहित्यिक धारा तक सीमित नहीं है। राष्ट्रवादी, धार्मिक, क्रांतिकारी और प्रगतिशील साहित्य में भी विचार के कलात्मक रूपांतरण की समस्या दिखाई दे सकती है।

इसलिए किसी रचना की समीक्षा करते समय यह देखना आवश्यक है कि उसका विचार भाषा और रूप के साथ किस प्रकार एकाकार हुआ है।

15. छठी समस्या : साहित्यिक आलोचना को पहचान की परीक्षा बना देना

यदि किसी रचना की आलोचना करने वाले से पहले उसकी जातिगत या राजनीतिक निष्ठा का प्रमाण माँगा जाए, तो स्वतंत्र आलोचना का वातावरण कमजोर पड़ता है।

किसी लेखक की सामाजिक पृष्ठभूमि उसके अनुभव और दृष्टि को प्रभावित कर सकती है। इसलिए आलोचक की स्थिति को समझना उपयोगी हो सकता है। लेकिन आलोचना का उत्तर आलोचक की पहचान बताकर समाप्त नहीं किया जा सकता।

यदि किसी आलोचक ने रचना की भाषा, कथानक, प्रमाण या वैचारिक संगति पर प्रश्न उठाया है, तो उन प्रश्नों का उत्तर देना होगा। आलोचक की सामाजिक स्थिति पर टिप्पणी अपने आप उसके तर्क को गलत सिद्ध नहीं करती।

इसी प्रकार किसी वंचित समुदाय के लेखक की आलोचना करना उसके अनुभव को नकारने के समान नहीं है। आलोचना का उद्देश्य रचना को समझना और उसकी उपलब्धियों तथा सीमाओं का परीक्षण करना है।

साहित्यिक स्वतंत्रता के लिए आवश्यक है कि किसी भी लेखक या आलोचक को केवल उसकी पहचान के कारण विचार-विमर्श से बाहर न किया जाए।

16. सातवीं समस्या : मुख्यधारा की आलोचना की सीमाओं का उत्तर केवल उलटा पदानुक्रम नहीं

हिंदी साहित्य के इतिहास और आलोचना में प्रतिनिधित्व, पाठ्यक्रम, प्रकाशन, पुरस्कार तथा संस्थागत प्रभाव के प्रश्नों पर गंभीर शोध की आवश्यकता है। यदि कुछ लेखकों को अनुपातहीन प्रतिष्ठा मिली और अन्य समुदायों की रचनाएँ उपेक्षित रहीं, तो यह आलोचना का वैध विषय है।

लेकिन किसी पुराने पदानुक्रम का उत्तर नया पदानुक्रम बनाकर नहीं दिया जा सकता। यदि पहले कुछ लेखकों को उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा के कारण बिना पर्याप्त आलोचना के महान मान लिया गया, तो समाधान यह नहीं कि अब किसी दूसरे समूह के लेखकों को उनकी पहचान के कारण स्वतः महान घोषित कर दिया जाए।

साहित्यिक इतिहास का पुनर्लेखन अधिक व्यापक पाठ, नए अभिलेख, उपेक्षित रचनाओं की खोज और आलोचनात्मक मानदंडों की पुनर्समीक्षा से होना चाहिए। इसमें दलित, स्त्री, आदिवासी, क्षेत्रीय और अन्य परंपराओं को अधिक स्थान मिल सकता है, लेकिन किसी रचना का मूल्यांकन फिर भी उसके साहित्यिक स्वरूप और ऐतिहासिक प्रभाव के आधार पर होना चाहिए।

साहित्यिक लोकतंत्र का अर्थ अवसरों का विस्तार है, आलोचनात्मक विवेक का विसर्जन नहीं।

17. आठवीं समस्या : सामाजिक विज्ञान के प्रश्नों को साहित्यिक निर्णय बना देना

जातिगत भेदभाव का अध्ययन और साहित्यिक गुणवत्ता का अध्ययन परस्पर संबंधित हो सकते हैं, लेकिन वे एक ही विषय नहीं हैं।

किसी समाज में जातिगत वर्चस्व रहा हो, तो उससे यह प्रश्न उठता है कि साहित्यिक संस्थानों, प्रकाशन और आलोचना पर उसका क्या प्रभाव पड़ा। यह एक महत्त्वपूर्ण सामाजिक-ऐतिहासिक प्रश्न है।

लेकिन इससे किसी विशिष्ट रचना की साहित्यिक गुणवत्ता का निर्णय स्वतः नहीं निकलता। इसके लिए भाषा, रूप, कल्पना, कथ्य और पाठकीय प्रभाव का विश्लेषण आवश्यक है।

इसी प्रकार किसी रचना की कलात्मक उत्कृष्टता यह प्रमाणित नहीं करती कि उसका सामाजिक दृष्टिकोण दोषरहित है। साहित्यिक उपलब्धि और सामाजिक न्याय के बीच संबंध जटिल है। एक को दूसरे का पूर्ण विकल्प नहीं बनाया जा सकता।

यह भेद जितनी स्पष्टता से समझा जाएगा, साहित्यिक बहस उतनी ही गंभीर होगी।

18. अंतिम प्रश्न : क्या विचारधारा को अपने निष्कर्षों की परीक्षा स्वीकार है?

फुले, आंबेडकर और दलित साहित्य के संदर्भ में सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं कि उनकी प्रशंसा कितनी की जाए या आलोचना कितनी तीखी हो। प्रश्न यह है कि क्या उनके विचारों को प्रमाण, तर्क, इतिहास और साहित्यिक विवेक की कसौटी पर जाँचा जा सकता है।

यदि हाँ, तो उनके योगदान का मूल्यांकन अधिक स्पष्ट होगा। यदि नहीं, तो कोई भी विचारधारा आलोचना से बचने के लिए अपने सामाजिक उद्देश्य को ढाल बना सकती है।

फुले की सामाजिक आलोचना को स्वीकार करते हुए उनकी ऐतिहासिक व्याख्याओं की जाँच की जा सकती है। आंबेडकर के जाति-विमर्श और संवैधानिक योगदान का सम्मान करते हुए उनके सिद्धांतों की सीमाओं पर प्रश्न उठाए जा सकते हैं। दलित साहित्य की ऐतिहासिक उपलब्धियों को स्वीकार करते हुए उसकी कुछ रचनाओं की कलात्मक कमजोरियों, वैचारिक सरलीकरणों और अनुभव के सार्वभौमीकरण की आलोचना की जा सकती है।

यह सब तभी उचित होगा जब आलोचना विशिष्ट पाठों, प्रमाणों और तर्कों पर आधारित हो। किसी पूरी साहित्यिक धारा को एक ही दोष का वाहक घोषित कर देना उसी सामान्यीकरण की पुनरावृत्ति होगी जिसकी आलोचना की जा रही है।

क्लासिकी को कठघरे में खड़ा करने का पूर्वाग्रह : क्या लेखक की जाति ही उसकी साहित्यिक नियति है?

हिंदी साहित्य की क्लासिकी पर विचार करते समय एक विचित्र प्रवृत्ति दिखाई देती है। भारतेंदु हरिश्चंद्र, प्रतापनारायण मिश्र, निराला, जयशंकर प्रसाद, मैथिलीशरण गुप्त, सुमित्रानंदन पंत, सुभद्रा कुमारी चौहान और रामधारी सिंह दिनकर जैसे लेखकों की रचनाओं को यदि केवल उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर संदेह के कठघरे में खड़ा कर दिया जाए, तो यह साहित्यिक मूल्यांकन की जगह जाति के आधार पर रचनाकारों की वर्गीकृत सूची तैयार करना होगा। इससे साहित्य का इतिहास नहीं बनता, उसका वैचारिक सरलीकरण होता है।

इसका अर्थ यह नहीं है कि इन लेखकों की आलोचना नहीं की जा सकती। निश्चय ही की जानी चाहिए। प्रश्न यह है कि आलोचना किस आधार पर होगी? रचना में उपस्थित किसी जातिगत पूर्वाग्रह के आधार पर, किसी पात्र के अपमानजनक चित्रण के आधार पर, सामाजिक यथार्थ की उपेक्षा के आधार पर अथवा लेखक की जन्मगत पहचान के आधार पर? इन चारों आधारों को एक-दूसरे का पर्याय बना देना बौद्धिक बेईमानी है।

भारतेंदु हरिश्चंद्र : सीमाएँ हैं, लेकिन क्या पूरा साहित्य निरस्त कर देंगे?

भारतेंदु हरिश्चंद्र आधुनिक हिंदी साहित्य के निर्माण, पत्रकारिता, नाटक, निबंध और सार्वजनिक बहस की नई भाषा विकसित करने वाले महत्त्वपूर्ण रचनाकार हैं। उनकी रचनाओं की सामाजिक सीमाओं पर प्रश्न उठाना उचित है। उदाहरण के लिए, भारत-दुर्दशा में राष्ट्रीय अवनति की चिंता जिस रूप में सामने आती है, उसमें वंचित जातियों के अनुभवों को पर्याप्त स्थान नहीं मिलता, ऐसी आलोचना की जा सकती है। आधुनिक शोध में भी भारतेंदु के साहित्य और सामाजिक बहिष्करण के प्रश्न पर चर्चा हुई है।

लेकिन किसी रचनाकार की सामाजिक दृष्टि में सीमाएँ दिखाना और उसकी संपूर्ण साहित्यिक उपलब्धि को शून्य घोषित कर देना दो अलग-अलग काम हैं। भारतेंदु की सीमाओं की पहचान कीजिए, उनके युग की सामाजिक संरचना का विश्लेषण कीजिए, उनकी भाषा, नाट्य-दृष्टि और आधुनिक चेतना के योगदान का भी मूल्यांकन कीजिए। यदि किसी आलोचक को केवल दोष ही दिखाई देते हैं, तो प्रश्न रचनाकार से उतना ही आलोचक की दृष्टि पर भी उठता है।

निराला : क्या ‘चतुरी चमार’ को पढ़े बिना निर्णय सुनाया जा सकता है?

सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की रचना चतुरी चमार सामाजिक विषमता, जातिगत स्थिति और आत्मसम्मान के प्रश्नों से सीधे जुड़ती है। निराला के साहित्य में वंचित समुदायों के जीवन की उपस्थिति और रूढ़ सामाजिक मर्यादाओं से टकराव पर हिंदी आलोचना में चर्चा हुई है।

इस रचना का उल्लेख मात्र करके निराला को दलित-विमर्श का अंतिम प्रामाणिक प्रतिनिधि घोषित करना भी उचित नहीं होगा; लेकिन उनकी सामाजिक दृष्टि की जटिलता को अनदेखा करके उन्हें एक ही खाने में डाल देना उससे भी अधिक अनुचित है। प्रश्न यह होना चाहिए कि कहानी में दलित पात्र किस रूप में उपस्थित है, उसकी एजेंसी कितनी है, लेखक का कथन और पात्र का अनुभव किस तरह संबंध बनाते हैं तथा रचना जातिगत सत्ता को चुनौती देती है या उसका पुनरुत्पादन करती है।

निराला की आलोचना कीजिए, पर उनकी रचनाओं को पढ़कर। उनकी जाति देखकर पहले फैसला और फिर फैसले के समर्थन में पाठ चुनना आलोचना की उलटी प्रक्रिया है।

मैथिलीशरण गुप्त : ‘साकेत’ और ‘यशोधरा’ को किस एक सूत्र में बाँधेंगे?

मैथिलीशरण गुप्त की साकेत में उर्मिला को कथा के केंद्र में प्रतिष्ठित करना और यशोधरा में बुद्ध के प्रस्थान के बाद पीछे छूट गई स्त्री के मन, प्रश्नों और पीड़ा को स्वर देना उनकी रचनात्मक दृष्टि के महत्त्वपूर्ण पक्ष हैं। हिडिम्बा जैसी कृति भी उन पात्रों की ओर ध्यान ले जाती है जिन्हें परंपरागत आख्यानों में प्रायः केंद्रीय स्थान नहीं मिला। इन रचनाओं के स्त्री-पात्रों और सामाजिक दृष्टि पर साहित्यिक अध्ययन उपलब्ध हैं।

यह तर्क दिया जा सकता है कि गुप्त की कल्पना में स्त्री की मुक्ति की सीमाएँ थीं, उनकी दृष्टि आधुनिक समानतावाद से पूरी तरह मेल नहीं खाती थी अथवा उनकी रचनाओं में जाति-संबंधी प्रश्न पर्याप्त रूप से नहीं आते। इन तर्कों पर गंभीर बहस संभव है। लेकिन यह कहना कि उनकी समूची क्लासिकी केवल किसी एक प्रभुत्वशाली विचारधारा का उपकरण है, उनकी रचनाओं की अंतर्वस्तु को पहले से तय खाँचे में बंद कर देना होगा।

किसी पात्र को साहित्य में स्थान देना और उस पात्र की सामाजिक मुक्ति की आधुनिक अवधारणा प्रस्तुत करना एक ही बात नहीं है। फिर भी साहित्यिक इतिहास में यह देखना आवश्यक है कि लेखक ने अपने समय की कथा-परंपरा में क्या बदला, किसकी उपेक्षा को कम किया और कहाँ उसकी दृष्टि स्वयं सीमित रह गई।

प्रसाद, पंत, सुभद्रा कुमारी चौहान और दिनकर : क्या एक ही आरोप सब पर लागू होगा?

जयशंकर प्रसाद की कामायनी, पंत की प्रकृति और मनुष्य संबंधी कविताएँ, सुभद्रा कुमारी चौहान की राष्ट्रीय चेतना से जुड़ी रचनाएँ तथा दिनकर की रश्मिरथी अपनी-अपनी साहित्यिक संरचना, विचार-दृष्टि और ऐतिहासिक संदर्भ में अलग-अलग मूल्यांकन की माँग करती हैं। इन्हें एक ही वैचारिक डंडे से हाँकना साहित्यिक विवेक नहीं है।

विशेष रूप से रश्मिरथी में कर्ण का चरित्र जन्म, सामाजिक प्रतिष्ठा, प्रतिभा और मान्यता के बीच के तनाव को सामने लाता है। यह कहना पर्याप्त नहीं होगा कि कर्ण की कथा अपने आप आधुनिक दलित चेतना की संपूर्ण अभिव्यक्ति बन जाती है; लेकिन यह भी नहीं कहा जा सकता कि सामाजिक अपमान और जन्मगत अवमानना का चित्रण करने वाली ऐसी रचना को पढ़े बिना केवल लेखक की जाति के आधार पर खारिज कर दिया जाए। यहाँ पाठ की जटिलता को स्वीकार करना होगा।

इसी तरह कामायनी की दार्शनिक संरचना, पंत की काव्य-दृष्टि और सुभद्रा कुमारी चौहान की राष्ट्रीय चेतना की आलोचना उनके विशिष्ट पाठों के आधार पर होनी चाहिए। यदि किसी रचना में जातिगत वर्चस्व का समर्थन है, तो उसे प्रमाण सहित सामने रखा जाए। यदि उसमें वंचित समुदाय अनुपस्थित है, तो उस अनुपस्थिति के ऐतिहासिक कारणों और साहित्यिक परिणामों का विश्लेषण हो। लेकिन अनुपस्थिति, विरोध और अपमान को बिना भेद किए एक ही निष्कर्ष में बदल देना तर्क की दृष्टि से दोषपूर्ण है।

और दलित परंपरा की अपनी क्लासिकी?

इस बहस का एक दूसरा पक्ष भी है। भारतीय साहित्यिक परंपरा किसी एक जाति, वर्ग या आधुनिक विचारधारा की निजी संपत्ति नहीं है। कबीर, रैदास, चोखामेला और अन्य संत-कवियों की वाणी सामाजिक विषमता, धार्मिक आडंबर और प्रतिष्ठा के जन्मगत दावों को चुनौती देती रही है। इन रचनाकारों की परंपरा को दलित-विमर्श सहित अनेक आलोचनात्मक धाराओं ने अपने ढंग से पढ़ा है। लेकिन उनकी ऐतिहासिक और साहित्यिक महत्ता को स्वीकार करने का अर्थ यह नहीं कि उनके नाम पर शेष साहित्य को अस्वीकार कर दिया जाए।

कबीर और रैदास की क्लासिकी को प्रतिष्ठित करने के लिए तुलसी, सूर, जायसी, भारतेंदु, निराला या दिनकर को साहित्येतिहास से बाहर निकालना आवश्यक नहीं है। इसके विपरीत, तुलनात्मक अध्ययन से यह अधिक स्पष्ट होगा कि विभिन्न रचनाकारों ने जाति, धर्म, सत्ता, भक्ति, श्रम और मनुष्यता के प्रश्नों को किन भिन्न रूपों में व्यक्त किया। क्लासिकी का विस्तार होना चाहिए, उसका जातिगत प्रतिस्थापन नहीं।

यहाँ एक बुनियादी अंतर समझना जरूरी है: किसी परंपरा का ऐतिहासिक रूप से उपेक्षित होना और उसकी प्रत्येक रचना का अपने आप उत्कृष्ट हो जाना अलग बातें हैं। उसी प्रकार किसी स्थापित परंपरा का प्रभावशाली होना और उसकी प्रत्येक रचना का अपने आप दमनकारी होना भी अलग बातें हैं। साहित्यिक मूल्यांकन में दोनों ही प्रकार के पूर्वनिर्णय बाधक हैं।

आलोचना या पूर्वनिर्णय?

यदि किसी आलोचक का निष्कर्ष पहले से तय है कि सवर्ण लेखक मूलतः दलित-विरोधी हैं, तो वह हर रचना में अपने निष्कर्ष का प्रमाण खोजेगा। जहाँ विरोध मिलेगा, वहाँ उसे केंद्रीय बनाएगा; जहाँ सहानुभूति मिलेगी, वहाँ उसे अपवाद, पितृसत्तात्मक दया या छिपी हुई सत्ता-चाल कहकर छोटा कर देगा। इस प्रकार की आलोचना अपने निष्कर्ष को गलत सिद्ध करने की संभावना ही बंद कर देती है। ऐसी दृष्टि वैज्ञानिक परीक्षण की कसौटी पर कमजोर पड़ती है।

इसका उलटा भी स्वीकार्य नहीं है। किसी लेखक की प्रतिष्ठा, राष्ट्रीय योगदान या साहित्यिक महानता के नाम पर उसके जातिगत पूर्वाग्रहों को छिपाया नहीं जा सकता। क्लासिकी का अर्थ आलोचना से छूट नहीं है। लेकिन आलोचना का अर्थ भी क्लासिकी का सामूहिक निषेध नहीं है।

सही प्रश्न यह नहीं है कि लेखक किस जाति में पैदा हुआ; सही प्रश्न यह है कि उसकी रचना मनुष्य, समाज, सत्ता और अन्याय को किस तरह देखती है। लेखक की सामाजिक स्थिति उसके अनुभव और दृष्टि को प्रभावित कर सकती है, लेकिन उसे रचना के प्रत्येक अर्थ का अंतिम प्रमाण मान लेना साहित्यिक विश्लेषण को सामाजिक पहचान की गणना में बदल देता है।

साहित्य का न्याय किसी लेखक की जाति देखकर नहीं, उसकी रचना को पढ़कर होना चाहिए। यदि किसी क्लासिक में अन्याय है, तो उसे उजागर कीजिए। यदि उसमें मानवीय प्रतिरोध है, तो उसे भी स्वीकार कीजिए। यदि उसमें दोनों हैं, तो दोनों को सामने रखिए। यही आलोचना की ईमानदारी है।

सामाजिक न्याय का उद्देश्य साहित्यिक इतिहास में नए दरवाजे खोलना होना चाहिए, पुराने दरवाजों पर ताला लगाना नहीं। अन्यथा एक समय जिस जन्मगत श्रेष्ठता के विरुद्ध प्रश्न उठाया गया था, उसी की जगह जन्मगत दोष का नया सिद्धांत खड़ा हो जाएगा। विचारधारा का नाम बदल जाएगा, लेकिन निर्णय की पद्धति वही रहेगी।

सामाजिक न्याय को बौद्धिक ईमानदारी चाहिए

जातिगत अन्याय का विरोध आवश्यक है। लेकिन अन्याय के विरोध में प्रस्तुत हर विचार अपने आप सही नहीं हो जाता। फुले और आंबेडकर की ऐतिहासिक भूमिका महत्त्वपूर्ण है पर उनके निष्कर्षों की समीक्षा भी आवश्यक है। दलित साहित्य ने भारतीय अनुभव की सीमा का विस्तार किया है, लेकिन उसके भीतर भी कलात्मक उत्कृष्टता, वैचारिक जटिलता और आलोचनात्मक आत्मपरीक्षण की आवश्यकता बनी रहती है।

किसी विचारक को आलोचना से ऊपर रखना उसके विचार को जीवित रखना नहीं, बल्कि उसे प्रश्नों से दूर कर देना है। किसी साहित्यिक धारा को उसकी सामाजिक पहचान के आधार पर स्वतः श्रेष्ठ मान लेना उसके लेखकों की कलात्मक क्षमता का वास्तविक सम्मान भी नहीं है।

सामाजिक न्याय की विश्वसनीयता इस बात से बढ़ती है कि वह अपने पक्ष के विचारों को भी आलोचना की कसौटी पर रख सके।

इतिहास को जातिगत आरोपों से नहीं, प्रमाणों से समझना होगा। समाज को एकमात्र कारण वाली व्याख्याओं से नहीं, बहुस्तरीय विश्लेषण से समझना होगा। साहित्य को लेखक की जन्मगत पहचान से नहीं, रचना के गंभीर पाठ से समझना होगा।

और सबसे बढ़कर, किसी विचारधारा की नैतिक प्रतिष्ठा को उसकी तार्किक शुद्धता का पर्याय नहीं बनने देना होगा।

विचार का सम्मान प्रश्न पूछने से घटता नहीं। वह प्रश्नों का सामना करने से अधिक स्पष्ट और अधिक विश्वसनीय बनता है।


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