गांधी पाठशाला में गांधी से मुठभेड़

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Encounter with Gandhi at Gandhi Pathshaala

— कनक तिवारी —

गांधी हिन्दू-मुस्लिम, हिन्दू-ईसाई और सभी धर्मों और जातियों की एकाग्रता के प्रतीक थे। केवल मिलावट के नहीं। बस यही वह बिंदु था जो कुछ संकीर्ण विचारकों को पसंद नहीं आया। तिलिस्म यही है कि जो सौ करोड़ के पार हैं वे दूसरे मजहब के पंद्रह करोड़ से तनी प्रतिहिंसात्मक स्थायी नफरत करते हैं। उससे परिणाममूलक वोट सत्ता में चिपके रहने के लिए बरसते रहें। गांधी ने हमारी कौमों को प्यार, भाईचारा, कुर्बानी और पारस्परिकता का पाठ पढ़ाया। बहुमत उनके साथ था। फिर भी माचिस की एक साम्प्रदायिक तीली उनके विचार पुस्तकालय को जलाती रहती है। उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। अपनी पराजय का बोध लिए दृढ़ हनु के साथ आजादी के दिन नोआखाली में हिन्दू मुसलमान भाइयों के बीच फैली हिंसा के मुकाबिल इंसानी चट्टान के रूप में खड़े हो गये।

पश्चिमी विचार से गांधी का प्रत्यक्ष संपर्क 1888 में हुआ जब वे लंदन में कानून की पढ़ाई कर रहे थे। ‘आत्मकथा‘ के अनुसार उन्होंने अपने अध्ययन में गहरी रुचि ली थी। गांधी ने इसी दरम्यान लेटिन भाषा भी सीखी ताकि जस्टिनियन जैसे विद्वानों के मूल पाठों को पढ़ सकें। इस अध्ययन ने युवा गांधी के मस्तिष्क पर एक गहरा प्रभाव डाला कि नैतिक सिद्धांत किसी भी कानूनी ज्ञान से बेहतर और श्रेष्ठ हैं। इसकी व्याख्या ‘हिन्द स्वराज‘ के सत्रहवें अध्याय में गांधी ने की है। उन्होंने कहा ‘जिस आदमी में सच्ची इन्सानियत है, जो खुदा से डरता है, वह और किसी से नहीं डरेगा। दूसरे के बनाये हुए कानून उसके लिए बंधनकारक नहीं होते। बेचारी सरकार भी नहीं कहती कि ‘तुम्हें ऐसा करना ही पड़ेगा।‘

वह कहती है कि ‘तुम ऐसा नहीं करोगे तो तुम्हें सजा होगी।‘ हम अपनी अधम दशा के कारण मान लेते हैं कि हमें ‘ऐसा ही करना चाहिये, यह हमारा फर्ज़ है, यह हमारा धर्म है।‘……… अगर लोग एक बार सीख लें कि जो कानून हमें अन्यायी मालूम हो उसे मानना नामर्दगी है, तो हमें किसी का भी जुल्म बांध नहीं सकता। यही स्वराज्य की कुंजी है।‘ गांधी का व्यावहारिक विधिक ज्ञान जिसके तहत उन्होंने अंग्रेजी गद्य को ड्राफ्ट करने की असाधारण महारत हासिल की थी, विधि के विद्यार्थी के रूप में इंग्लैंड में की गई उनकी पढ़ाई का परिणाम था। राजनीति के प्रति उनका दृष्टिकोण कानून की शिक्षा से भी उपजा था।

1893 का वर्ष हिंदुस्तान की सियासी और सांस्कृतिक यात्रा के घुमावदार मोड़ के जरिए याद रखा जाएगा। 11 सितंबर 1893 को विवेकानंद ने शिकागो धर्म सम्मेलन में ‘अमेरिकी बहनों और भाइयों!‘ क्या कहा, 8 मिनट के भाषण में अंतहीन तालियां बटोरीं। संसार को लगा जैसे पूरा भारत अपनी सांस्कृतिक, समावेशी अस्मिता के साथ वहां परोस दिया गया था। एक नामालूम घटना 7 जून 1893 को दक्षिण अफ्रीका के पीटर मेरिट्सबर्ग स्टेषन पर घट चुकी थी। अंगरेजी ठसक के सूटबूट में लकदक एक आप्रवासी भारतीय युवा बैरिस्टर को प्रथम श्रेणी के डिब्बे का वैध टिकट होने पर भी अंगरेज सार्जेन्ट ने प्लैटफाॅर्म पर सामान की तरह उठाकर फेंक दिया था। प्रकटतः दब्बू, सहनशील और अपमानित तथा पीड़ा महसूस करते उस नौजवान वकील की आंखों में कालक्षण नया इतिहास लिखने को दफ्न हो गया था। उसके अंदर कोई अकुलाहट चुनौतियां बिखेरती मनुष्य की आजादी ढूंढ़ने की भवितव्यता को लेकर बेचैन हो गई थी। वह जन्मतः प्रतिभाशाली नहीं कर्मगत अध्यवसायी था।

इसलिए धीरे धीरे ही सही मनुष्य की समझ के सोपान पर चढ़ने सतह के ऊपर उठता गया। सोलह वर्ष तक उसे अकुलाहट, संशय, पराजय और अनिश्चितता की फड़कती अपशकुन वाली बाईं आंख के साथ जीना पड़ा। उसने संयम के साथ ढेरों किताबें पढ़ीं। एक के बाद एक आश्रम बनाए। अंगरेजी और गुजराती में अखबार निकाले। विदेशों में रहकर उसके अस्तित्व के हर आयाम में उसमें लेकिन हिन्दुस्तान जीता रहा। उसने साफ कहा मेरे जीवन पर तीन लोगों का सबसे ज्यादा असर है। समवयस्क लेकिन गुरु समान जैन साधु श्रीमद्राजचंद्र। महान रूसी उपन्यासकार और मानवतावादी काउंट लियो तालस्तोय और फिर ‘अन टु दिस लास्ट‘ को उसके जीवन में बौद्धिक चुनौतियों की तरह गाड़ देने वाले प्रसिद्ध अंगरेज लेखक जाॅन रस्किन लेकिन प्राथमिकताओं के इसी क्रम में।

पश्चिम और विशेषकर इंग्लैंड को समझने के प्रस्थान बिंदु पर महात्मा गांधी केवल भारतीय प्रज्ञा का गुण गायन नहीं करते जो आज भी इक्कीसवीं सदी के कई रूढ़ बल्कि मूढ़ भारतीय वैचारिकों का शगल बना हुआ है। गांधी का यह मानना था कि पश्चिम की भौतिक और नैतिक उपलब्धियों के पीछे ज्ञान को परिमार्जित करने की लगातार कोशिशों की एक विकसित परंपरा है जिससे असहमत होने के बावजूद उसका तिरस्कार नहीं किया जाना चाहिए। उनका केवल यह कहना नहीं था कि पश्चिम की अधुनातन मान्यताएं भारत के संदर्भ में अप्रासंगिक, बेअसर और असंगत हैं। ‘हिन्द स्वराज‘ केवल एक नवोन्मेशी देश की निर्मित हो रही आकांक्षाओं का प्रतिफलन नहीं है। उसे स्वयं पश्चिम और विशेषकर यूरोप के संदर्भों के साथ खंगालकर देखने की ऐतिहासिक जरूरत है। ‘हिन्द स्वराज‘ के गांधी के शब्दों में ‘काल ने चेतावनी बिखेरी है-‘ जैसा अमरत्व बोध भी अब उभरकर आता दिखाई पड़ता है। गांधी का समकालीन यूरोप प्रकारांतर से भविष्य का भारत भी रहा है।

इस अर्थ में कि यदि सभी तत्कालीन परंपराएं यूरोप में अप्रतिहत विकसित होती रहीं तो वे सब आगे चलकर भारत की भूमि पर रोपी जाएंगी और अप्रतिहत ही विकसित होंगी। गांधी इस दोहरे खतरे से बाखबर आशंकित बल्कि आतंकित तक दिखाई देते हैं। ‘हिन्द स्वराज‘ इस तरह गांधी की प्रज्ञा में कोई छिटका हुआ सवाल नहीं था। वह उनमें पारा बनकर रेंग रहा था ताकि इस थर्मामीटर से वे मनुष्यता और विचार के संलिष्ट रिश्तों को माप सकें।

और विशेषकर इंग्लैंड को समझने के प्रस्थान बिंदु पर महात्मा गांधी केवल भारतीय प्रज्ञा का गुण गायन नहीं करते जो आज भी इक्कीसवीं सदी के कई रूढ़ बल्कि मूढ़ भारतीय वैचारिकों का शगल बना हुआ है। गांधी का यह मानना था कि पश्चिम की भौतिक और नैतिक उपलब्धियों के पीछे ज्ञान को परिमार्जित करने की लगातार कोशिशों की एक विकसित परंपरा है जिससे असहमत होने के बावजूद उसका तिरस्कार नहीं किया जाना चाहिए। उनका केवल यह कहना नहीं था कि पश्चिम की अधुनातन मान्यताएं भारत के संदर्भ में अप्रासंगिक, बेअसर और असंगत हैं। ‘हिन्द स्वराज‘ केवल एक नवोन्मेशी देश की निर्मित हो रही आकांक्षाओं का प्रतिफलन नहीं है। उसे स्वयं पश्चिम और विशेषकर यूरोप के संदर्भों के साथ खंगालकर देखने की ऐतिहासिक जरूरत है।

‘हिन्द स्वराज‘ के गांधी के शब्दों में ‘काल ने चेतावनी बिखेरी है-‘ जैसा अमरत्व बोध भी अब उभरकर आता दिखाई पड़ता है। गांधी का समकालीन यूरोप प्रकारांतर से भविष्य का भारत भी रहा है। इस अर्थ में कि यदि सभी तत्कालीन परंपराएं यूरोप में अप्रतिहत विकसित होती रहीं तो वे सब आगे चलकर भारत की भूमि पर रोपी जाएंगी और अप्रतिहत ही विकसित होंगी। गांधी इस दोहरे खतरे से बाखबर आशंकित बल्कि आतंकित तक दिखाई देते हैं। ‘हिन्द स्वराज‘ इस तरह गांधी की प्रज्ञा में कोई छिटका हुआ सवाल नहीं था। वह उनमें पारा बनकर रेंग रहा था ताकि इस थर्मामीटर से वे मनुष्यता और विचार के संलिष्ट रिश्तों को माप सकें।


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