पूर्व प्रधानमंत्री श्री चंद्रशेखर… जैसा मैंने देखा !!

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Chandra Shekhar

— गोपाल शर्मा —

“मुझे यह भ्रम नहीं है कि मुझे याद रखा जाएगा। मैं केवल एक ही बात चाहता हूँ कि लोग याद रखें कि इस व्यक्ति ने जो समझा, वह कहा। किसी के प्रति दुर्भाव से नहीं कहा, कुछ प्राप्त करने के लिए नहीं कहा। आज नहीं तो कल, मेरे चले जाने के बाद भी लोग सही समझ सकें तो मैं समझूंगा कि मेरा जीवन सार्थक रहा।”

यह कहते हुए चले गए चंद्रशेखर जी! संसद और देश में उनके नहीं होने का सूनापन खलता रहेगा। जन्मजात विद्रोही, गाँव और गरीब के हितैषी, देशभक्त, बेबाक मुखर, सबसे अलग! वे उस बिरली जमात का हिस्सा थे, जिनकी खासियत के बारे में पीढ़ियाँ भरोसा नहीं कर पातीं। जो किनारों पर सुकून नहीं पाते, जिन्हें तूफान के आगोश में करार आता है।

लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने माना, “चंद्रशेखर इतिहास की धारा बदलने की कुव्वत रखते हैं।” वे पहले नेता थे, जो सरकार में सीधे प्रधानमंत्री पद पर पहुँचे। उन्होंने कांग्रेस में रहते हुए श्रीमती इंदिरा गांधी जैसी शख्सियत को चुनौती दी। इंदिरा जी की मर्जी के खिलाफ कांग्रेस कार्यसमिति का चुनाव जीता और युवा तुर्क के रूप में पहचान पाई। सत्ता खिसकने लगी तो उफ तक नहीं की और ठसक से सड़क पर रहना मंजूर किया। उनकी आवाज कभी दबाई नहीं जा सकी। उन्होंने कभी कारवाँ बनाने की चिंता नहीं की और न किसी के साथ चलने की। जो अच्छा लगा, करते रहे। लोग क्या कहेंगे, इसके डर से दोस्ती नहीं छोड़ी। उनका सिद्धांत था, “मैं अपनी चेतना में ठीक हूँ तो दुनिया को सफाई क्यों दूँ!”

मुझे याद है वह शाम, जब बनारस के कैंट स्टेशन पर मेरी चंद्रशेखर जी से पहली मुलाकात हुई। 1982-83 की बात है। तब वे प्रधानमंत्री नहीं बने थे, फिर भी कम बड़े नेता नहीं थे। जनता पार्टी के अध्यक्ष रह चुके थे और पूर्वी उत्तर प्रदेश में पैदा हुए श्री कमलापति त्रिपाठी से लेकर श्री राजनारायण तक नेताओं में उनका अलग रुतबा था। वे प्लेटफॉर्म पर लंबे-लंबे डग भरते आगे बढ़ रहे थे। साथ में कोई तामझाम नहीं था। आगे जाकर बेंच पर बैठ गए। शायद उन्हें बलिया की ट्रेन का इंतजार था। दूसरी ओर, हम लोग यों ही घूमते हुए स्टेशन चले आए थे। काशी विद्यापीठ के दो गुरुजन साथ थे, डॉ. परमानंद सिंह और श्री विजय बलियाटिक। दोनों के लिए चंद्रशेखर जी आदर्श थे। चंद्रशेखर जी को भीड़ में छाँटना भी मुश्किल नहीं था। उन पर हमारी नजर पड़ी तो उधर ही चल पड़े। नजदीक पहुँचने पर नजर मिली तो चंद्रशेखर जी भी खड़े हो गए। गुरुजनों से उनकी भोजपुरी में खूब बतकही, हँसी-ठिठौली हुई।

पत्रकार के रूप में चंद्रशेखर जी से कई मुलाकातें हुईं। उनसे मिलना-बातें करना कई तरह की अनुभूतियों भरा होता। तीखे तेवर, हँसी-मजाक, दूरदृष्टि, सपनों वाला भारत… कई दृश्य तैरते दिखाई देते। कितने ही दर्दों को समेटे, लेकिन फीकी हँसी और सांकेतिक कटाक्ष में सबकुछ भुला देने की कोशिश। गरीब घर में जन्म लेने के कारण बेबसी के खिलाफ गुस्सा भरे चंद्रशेखर जी जबरदस्त आत्मविश्वास के धनी थे। उनका मानना था कि अगर आदमी का विश्वास अपने ऊपर से नहीं टूटे तो वह बेसहारा नहीं हो सकता। जीवन के झंझावातों से गुजरते हुए उनका फलसफा था, “अपनी राह पर चलने की कीमत तो चुकानी ही होती है।”

श्री अटल बिहारी वाजपेयी के प्रति चंद्रशेखर जी गहरा आदर भाव रखते थे और उन्हें गुरु कहते थे। हालाँकि आलोचना के मुद्दों पर भी वे मुखर रहे। परमाणु शक्ति होने को लेकर उनकी राय कुछ अलग थी। उनका कहना था, “दो पटाखे फोड़ देने से देश नहीं चला करता।”

राजनीतिक विषयों पर गंभीरता से बात रखने वाले चंद्रशेखर जी निजी मुलाकातों में और मित्रों के बीच चुटकी लेते हुए भी नजर आते। धीमे-धीमे मुसकराते हुए गहरा कटाक्ष करते। एक बार वे जयपुर में अपने विश्वस्त सहयोगी श्री लोकेश कुमार सिंह के यहाँ श्री भैरोसिंह शेखावत के साथ बैठे थे। शेखावत साहब तब तीसरी बार राजस्थान के मुख्यमंत्री बने थे। चंद्रशेखर जी ने उनकी कंजूसी को लेकर मजाक किया। शेखावत साहब भी बातचीत का आनंद ले रहे थे। मैं पास ही बैठा था। मैंने दो गहरे मित्रों की बातचीत में हलका सा रोचक पुट डालते हुए कहा, “शेखावत साहब जो कोट पहने हुए हैं, वह पिछले 25 सालों से पहन रहे हैं। 14-15 सालों से मैं देख रहा हूँ, इसकी मरम्मत होती रहती है।” चंद्रशेखर जी तत्काल बोले, “इनका वश चले तो कोट का 100 साल कुछ नहीं बिगड़ेगा। खुद पहनेंगे नहीं और किसी को देंगे भी नहीं।” वहाँ पास बैठी श्रीमती मेनका गांधी और अन्य लोग भी हँस पड़े।

एक बार मैंने पूछा कि अगर वे राजनीति में नहीं आते तो क्या बनना पसंद करते ? उन्होंने कहा, “बचपन से मुझे सिपाही बनने के प्रति बड़ा क्रेज रहा है। किसी को ट्रैफिक कानून तोड़ते हुए देखता हूँ तो सोचता हूँ कि अगर में वहाँ खड़ा होता और कोई नियमों का उल्लंघन कर रहा होता तो उसको खींचकर एक थप्पड़ मारता।” इस बातचीत के दौरान वे बीच-बीच में पूर्व केंद्रीय मंत्री श्री संजय सिंह को साफा बाँधने की स्टाइल भी बताते रहे।

मैंने एक ज्योतिषी तांत्रिक लाल बाबा से चंद्रशेखर जी को भविष्य के बारे में रुचि लेते देखा और जयपुर के भविष्यवक्ता पं. केदार शर्मा के घर भी उसी भाव में पाया। वे भाग्य में भरोसा करते थे, लेकिन उनके लिए यह जिज्ञासा जैसा विषय ही था।

12 अक्तूबर, 2002 को जयप्रकाश नारायण की जन्मशताब्दी के अवसर पर उनके पैतृक गाँव सिताबदियरा में चंद्रशेखर जी से मुलाकात हुई। उपराष्ट्रपति श्री भैरोंसिंह शेखावत, जनसंघ के वरिष्ठ नेता रहे श्री नानाजी देशमुख, केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल श्री दिग्विजय सिंह और श्री जगमोहन सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति वहाँ उपस्थित थे। जयप्रकाश के खपरैल घर की छत तक पक्की नहीं थी। बाहर के छोटे से बरामदे में उनकी एक प्रतिमा जरूर लगवा दी गई थी। एक अन्य स्थान पर लोकनायक की स्मृति को जिंदा रखने वाले चित्रों की प्रदर्शनी लगाई गई थी। यह सब चंद्रशेखर जी की बदौलत ही हुआ था, लेकिन चंद्रशेखर जी ने इन सबका श्रेय जेपी के निकटतम सहयोगी रहे जगदीश भाई को दिया। यह उनके विराट व्यक्तित्व का पहलू था।भाषण के दौरान नानाजी देशमुख के बारे में चंद्रशेखर जी ने कहा कि उनके काम को देखकर यह महसूस किया जा सकता है कि एक व्यक्ति अकेला अपने बूते पर कितना कुछ कर सकता है।

उनके अपोलो अस्पताल में भर्ती होने से पहले मैं भोंडसी आश्रम में मिलकर आया था। वे सुबह-शाम टहलाने के लिए निकाले जाते। कैंसरग्रस्त बाघ जैसे एक कमरे में कैद होकर रह गया था। तकियों के सहारे पलंग पर बैठाए जाते, लेकिन आवाज अब भी उतनी ही गहरे से निकलती पूरे दम और आत्मविश्वास के साथ। हड्डियों का उभार अधिक कमजोर नहीं दिखता था, लेकिन मौत तेजी से नजदीक आ रही थी। उनकी चिंताओं में देश-दुनिया से लेकर खेत फसल और शिक्षा-स्वास्थ्य जैसे विषय शामिल थे। थक चुके शरीर और जानलेवा बीमारी से जूझते हुए भी वे देश की चिंता कर रहे थे। वे कहते, “मुझे अपना बचपन याद आता है, गाँव के कीचड़ भरे रास्ते याद आते हैं, जिनमें चलते हुए पैर सड़ जाते थे। मैंने नजदीक से समझा है कि जनता की क्या बेबसी होती है। पता नहीं यह मेरी जिंदगी में होगा या नहीं कि भारत ऐसा देश बन सके, जिसमें भूख से बिलखता हुआ बच्चा और बेबसी से तड़पती हुई महिला न दिखाई पड़े।”

महापुरुष को कोटिशः नमन !!


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