दूसरे दौर ने खोल दी है SIR की पोल! – योगेन्द्र यादव

0
bihar Election

Yogendra yadav

इंसान की अजीब फ़ितरत है। हम कभी भी किसी भी तरह की हकीकत के आदी हो सकते हैं। किसी भी त्रासदी और बर्बरता के साथ जीना सीख लेते हैं। उसे रोजमर्रा की आदत में शुमार कर लेते हैं। आज अमरीका ने एक और देश में गुंडागर्दी की। हमारे शहर में प्रदूषण फिर ख़तरे के पार पंहुचा। ग़ज़ा में कुछ और बच्चे मारे गए। देश में एक और लिंचिंग हुई। एक और दिन, फिर कुछ और ख़बर। पहली बार यह ख़बर हमे विचलित करती है। फिर हम तटस्थ हो जाते हैं। फिर जिस दिन सबसे वीभत्स ख़बर आती है तब तक हम ऊब चुके होते हैं।

एसआईआर के साथ कुछ वैसा ही हुआ है। जब बिहार में वोटर लिस्ट के गहन पुनरीक्षण की शुरुआत हुई तो खूब हंगामा हुआ। न्यूज़रूम और कोर्ट रूम से ड्राइंग रूम तक बहुत चर्चा हुई। एक झटके में 65 लाख नाम कटने से सब विचलित भी हुए। फिर हमारा ध्यान बिहार चुनाव पर चला गया। ना जाने कैसे मगर चुनाव परिणाम से यह निष्कर्ष भी निकाल लिया गया कि एसआईआर में सब कुछ ठीक ठाक था। हमे पता ही नहीं चला कब एसआईआर का दूसरा दौर शुरू हो गया। देश में बारह राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में एसआईआर कब पूरा हो गया, कब उसकी सूची भी आ गई हमे याद भी नहीं। जब सबसे बड़ा खेल हुआ तब तक हम ऊब चुके थे।

उत्तर प्रदेश में एसआईआर की ड्राफ्ट सूची प्रकाशित होने से दुबारा कुछ धमाका हुआ है। पहले उत्तर प्रदेश की लिस्ट में 15 करोड़ 44 लाख नाम थे, लेकिन एसआईआर के बाद सिर्फ 12 करोड़ 56 लाख नाम बचे हैं। एक बार में ही उत्तर प्रदेश की वोटर लिस्ट से 2 करोड़ 88 लाख नाम कट गए हैं। दुनिया के अधिकांश देशों में कुल उतने वोटर नहीं होते जितने उत्तर प्रदेश की लिस्ट से बाहर निकाल दिए गए हैं। मजे की बात यह है कि जहाँ भारत का निर्वाचन आयोग उत्तर प्रदेश में ग्रामीण और शहरी मिलाकर कुल 12 करोड़ 56 लाख वोटर बता रहा है, वहीं उत्तर प्रदेश के राज्य चुनाव आयोग ने दिसंबर के महीने में सिर्फ ग्रामीण उत्तर प्रदेश की पंचायतों में 12 करोड़ 70 लाख वोटर की लिस्ट जारी की है।

उत्तर प्रदेश का आंकड़ा आने से पहले बाकी ग्यारह राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में एसआईआर की ड्राफ्ट सूची आ चुकी थी। वहाँ भी बड़े पैमाने पर वोट काटे, लेकिन किसी का ध्यान इस तरफ़ नहीं गया। शायद उत्तर प्रदेश के बहाने देश का ध्यान बाक़ी सभी राज्यों में एसआईआर के दौरान हुए वोटर नरसंहार पर जाए। उत्तर प्रदेश सहित इन सब प्रदेशों में एसआईआर शुरू होने से पहले कुल ५० करोड़ ९७ लाख वोटर थे। एसआईआर के गहन परीक्षण के बाद ड्राफ्ट लिस्ट में सिर्फ ४४ करोड़ ४० लाख बचे हैं। यानी अब तक एसआईआर के इस दूसरे दौर में कुल ६ करोड़ ५७ लाख नाम कट चुके हैं। तमिलनाडु में ९७ लाख, गुजरात में ७४ लाख, बंगाल में ५८ लाख, मध्य प्रदेश में ४३ लाख और राजस्थान में ४२ लाख नाम कट चुके हैं। कहने को ये लोग अभी भी अर्ज़ी देकर अपना नाम दुबारा जुड़वा सकते हैं। लेकिन व्यवहार में इतनी काग़ज़ी करवाई करना पाँच-दस फ़ीसद से ज़्यादा के बस की बात नहीं है। यानी की कोई छह करोड़ नाम तो हमेशा के लिए कट चुके।

यही नहीं, जिन लोगों का नाम ड्राफ्ट लिस्ट में आ चुका है, उनके बड़े हिस्से के सर पर भी तलवार लटक रही है। चुनाव आयोग के अनुसार कोई ढाई करोड़ लोग ऐसे हैं जिनका फॉर्म तो आ गया लेकिन जो 2002 या 2003 में की वोटर लिस्ट में अपना या अपने परिवार के किसी व्यक्ति का नाम नहीं दिखा सके हैं। उन्हें अपनी नागरिकता साबित करने का नोटिस मिलेगा। अगर ठीक सबूत ना दे पाए तो उनका नाम भी कट सकता है। इसके अलावा एक और समूह है जिसे अभी पता भी नहीं है लेकिन जो संदेह के घेरे में है। चुनाव आयोग के नए सॉफ्टवेर ने उनके विवरण में कुछ गड़बड़ी पायी है। उन्हें भी नोटिस जा सकता है। इनकी संख्या चुनाव आयोग ने घोषित नहीं की है लेकिन सिर्फ़ बंगाल और मध्य प्रदेश में यह संख्या तीन करोड़ से ज़्यादा है। अगर इन दोनों श्रेणियों में आए वोटरों का एक छोटा सा भी अंश कट जाता है तो यह संख्या एक करोड़ से ऊपर हो सकती है। मतलब एसआईआर का यह दौर ख़त्म होते-होते कुल सात करोड़ से ज़्यादा नाम कट सकते हैं। दुनिया के इतिहास में कभी भी इतने बड़े पैमाने पर वोटरों के नाम नहीं काटे गए हैं।

कहीं ऐसा तो नहीं कि गड़बड़ी एसआईआर में नहीं बल्कि पुरानी वोटर लिस्ट में थी? क्या पुरानी लिस्ट में बहुत फर्जी नाम थे जिन्हें काटने की जरूरत थी? यह सवाल वाजिब है। और इसका उत्तर आसानी से दिया जा सकता है। भारत सरकार यह आंकड़े प्रकाशित करती है कि हर वर्ष हर प्रदेश की वयस्क आबादी कितनी है। उस हिसाब से इन बारह प्रदेशों में एसआईआर शुरू होने से पहले कुल वयस्क आबादी थी 51 करोड़ 81 लाख और वहाँ मतदाता थे 50 करोड़ 97 लाख। यानी कि वोटर लिस्ट में ज़रूरत से ज़्यादा नहीं बल्कि ज़रूरत से कम वोटर थे। अगर वोटर लिस्ट का ठीक से संशोधन होता तो 84 लाख वोटर बढ़ने चाहिए थे। उलटा एसआईआर ने साढ़े छह करोड़ वोटर घटा दिए।

बिहार में नाम कटने पर ऐसा लगा था कि शायद यह इसलिए हो क्योंकि बिहार से बहुत लोग बाहर जाते हैं। लेकिन इस बार तो यह संदेह भी जाता रहा। तमिलनाडु और गुजरात जैसे प्रदेशों में बाहर जाने वालों से ज़्यादा अप्रवासी बाहर से आते हैं। लेकिन वहाँ भी नाम कटे हैं। एसआईआर से विदेशी घुसपैठियों के नाम कटने के प्रचार का तो पहले ही भंडाफोड़ हो चुका है। बिहार में एसआईआर के बाद निर्वाचन आयोग एक भी विदेशी का नाम नहीं बता पाया। इस दौर में रहा सहा शक भी दूर हो गया। बंगाल और राजस्थान जैसे अंतरराष्ट्रीय सीमा से लगे राज्यों में कम नाम काटे हैं और लेकिन तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश में ज़्यादा। बस एक बात समझ आती है। जहाँ-जहाँ एसआईआर हुआ है वहाँ-वहाँ वोटर लिस्ट में महिलाओं का अनुपात घटा है।

बस इसका एक ही अपवाद है। इन बारह राज्यों के साथ असम में भी वोटर लिस्ट का पुनरीक्षण हुआ। लेकिन असम में ना तो कुल वोटर की संख्या घटी, ना ही औरतों का अनुपात कम हुआ। इसका कारण? असम ही वह एकमात्र प्रदेश था जहाँ ना एन्युमेरेशन फॉर्म भरवाये गए, ना ही पुरानी वोटर लिस्ट से लिंक करने के सबूत मांगे गए। पुराने तरीके से घर-घर जाकर वोटरों की जांच हुई, ग़लत नाम कटे, नए नाम जुड़े। निष्कर्ष साफ़ है — गड़बड़ वोटर लिस्ट में नहीं एसआईआर की पद्धति में है। यह वोटर लिस्ट का गहन पुनरीक्षण नहीं, वोटबंदी है।


Discover more from समता मार्ग

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Leave a Comment