ईरान में अभी चल रहा महिलाओं का आंदोलन – परिचय दास

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The women's movement currently underway in Iran.

Parichay Das

रान में अभी चल रहा महिलाओं का आंदोलन किसी एक घटना की तात्कालिक प्रतिक्रिया नहीं है बल्कि वह वर्षों से भीतर ही भीतर सुलगती असहमति का सार्वजनिक रूप है। यह आंदोलन उस क्षण से अधिक व्यापक है, जब वह सड़कों पर दिखाई देता है; वह भाषा, देह, स्मृति और रोज़मर्रा के व्यवहार में घटित होता हुआ प्रतिरोध है। आज का ईरान उस बिंदु पर खड़ा दिखाई देता है जहाँ स्त्री केवल पीड़ित या प्रतीक नहीं रह गई बल्कि वह स्वयं इतिहास को संबोधित करने लगी है।

इस आंदोलन की पृष्ठभूमि में ईरानी राज्य की वह संरचना है, जिसमें धार्मिक कानून और राजनीतिक सत्ता एक-दूसरे में गुँथे हुए हैं। स्त्री का शरीर इस संरचना का सबसे दृश्य और सबसे नियंत्रित क्षेत्र रहा है। अनिवार्य हिजाब, सार्वजनिक आचरण के नियम, नैतिक पुलिस की निगरानी—ये सब मिलकर स्त्री को निरंतर अनुशासित करने की व्यवस्था बनाते हैं। वर्तमान आंदोलन इसी अनुशासन के विरुद्ध उठी वह असहमति है जो अब व्यक्तिगत अवज्ञा से आगे बढ़कर सामूहिक घोषणा बन चुकी है।

आज का विरोध केवल हिजाब तक सीमित नहीं है, यद्यपि हिजाब उसका सबसे स्पष्ट प्रतीक बन गया है। यह आंदोलन जीवन के अधिकार की माँग करता है—स्वयं को जैसा चाहें वैसा जीने का अधिकार। “स्त्री, जीवन, स्वतंत्रता” जैसे नारे इसी व्यापक आकांक्षा की अभिव्यक्ति हैं। यहाँ ‘स्त्री’ केवल जैविक पहचान नहीं बल्कि वह चेतना है जो दमन के विरुद्ध खड़ी होती है; ‘जीवन’ केवल अस्तित्व नहीं बल्कि गरिमा के साथ जीने की आकांक्षा है; और ‘स्वतंत्रता’ केवल राजनीतिक अवधारणा नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के निर्णयों में स्वायत्तता का आग्रह है।

इस आंदोलन की एक विशेषता उसकी पीढ़ीगत ऊर्जा है। युवा महिलाएँ, विशेषकर छात्राएँ, इसके केंद्र में हैं। उन्होंने सोशल मीडिया, कला, संगीत और फैशन तक को प्रतिरोध के औज़ार में बदल दिया है। बाल काटना, सार्वजनिक रूप से हिजाब उतारना, दीवारों पर लिखे गए वाक्य—ये सब प्रतीकात्मक क्रियाएँ हैं जो राज्य की शक्ति को सीधे चुनौती देती हैं। यह प्रतीकवाद इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह हिंसा के बजाय दृश्य और नैतिक दबाव का निर्माण करता है।

राज्य की प्रतिक्रिया इस आंदोलन की गंभीरता को स्वयं प्रकट करती है। गिरफ़्तारियाँ, इंटरनेट बंदी, बल प्रयोग और भय का वातावरण—ये सभी सत्ता की असुरक्षा को उजागर करते हैं। जब एक राज्य अपने नागरिकों की अभिव्यक्ति से डरने लगे, तब यह स्पष्ट हो जाता है कि समस्या केवल कानून-व्यवस्था की नहीं बल्कि वैधता की है। महिलाओं का आंदोलन इसी वैधता पर प्रश्नचिह्न लगाता है—क्या कोई व्यवस्था तब तक टिक सकती है, जब तक वह आधी आबादी की इच्छा के विरुद्ध खड़ी हो?

इस आंदोलन का एक गहरा नैतिक पक्ष भी है। यह केवल अधिकारों की सूची प्रस्तुत नहीं करता बल्कि यह पूछता है कि नैतिकता किसकी है। क्या नैतिकता वह है जो ऊपर से थोप दी जाए या वह, जो व्यक्ति की अंतरात्मा से उपजे? ईरानी महिलाएँ इस प्रश्न को अपने जीवन से पूछ रही हैं और उत्तर भी अपने व्यवहार से दे रही हैं। यही कारण है कि यह आंदोलन केवल राजनीतिक नहीं बल्कि दार्शनिक भी है।

पुरुषों की भागीदारी इस आंदोलन को और व्यापक बनाती है। जब पिता, भाई और मित्र सड़कों पर महिलाओं के साथ खड़े होते हैं तब यह स्पष्ट होता है कि प्रश्न केवल स्त्री-अधिकार का नहीं बल्कि नागरिक स्वतंत्रता का है। यह साझेदारी आंदोलन को एकल पहचान के दायरे से निकालकर सामाजिक परिवर्तन की दिशा में ले जाती है। यह संकेत देती है कि पितृसत्ता केवल महिलाओं का नहीं, पूरे समाज का बोझ है।

अंतरराष्ट्रीय दृष्टि से यह आंदोलन ईरान की छवि को नए सिरे से परिभाषित करता है। लंबे समय से ईरान को या तो परमाणु संकट के संदर्भ में देखा गया या धार्मिक कट्टरता के प्रतीक के रूप में। वर्तमान महिला आंदोलन उस एकांगी छवि को तोड़ता है। वह दिखाता है कि ईरान एक जीवित, प्रश्नाकुल और परिवर्तनशील समाज है, जहाँ नागरिक अपनी शर्तों पर भविष्य गढ़ना चाहते हैं। हालाँकि बाहरी समर्थन और हस्तक्षेप के बीच की रेखा को लेकर ईरानी समाज सजग भी है क्योंकि इतिहास ने सिखाया है कि बाहरी दख़ल अक्सर आंतरिक संघर्षों को और जटिल बना देता है।

इस आंदोलन का सांस्कृतिक आयाम भी गहरा है। कविता, गीत, ग्रैफिटी और दृश्य कला इसके भीतर निरंतर जन्म ले रही है। यह रचनात्मकता बताती है कि प्रतिरोध केवल नकार नहीं बल्कि वैकल्पिक कल्पना भी है। महिलाएँ केवल यह नहीं कह रहीं कि वे क्या नहीं चाहतीं बल्कि यह भी संकेत दे रही हैं कि वे कैसा जीवन चाहती हैं। यही रचनात्मक आयाम आंदोलन को दीर्घजीवी बनाता है।

फिर भी, यह कहना आसान नहीं कि यह आंदोलन तुरंत किसी ठोस राजनीतिक परिवर्तन में परिणत होगा। सत्ता संरचनाएँ जड़ होती हैं और परिवर्तन अक्सर लंबा, थकाने वाला और असमान होता है परंतु आंदोलन का मूल्य केवल उसके तात्कालिक परिणामों से नहीं आँका जा सकता। उसका वास्तविक प्रभाव उस चेतना में है जो एक बार जागकर वापस सोती नहीं। ईरान में आज जो महिलाएँ बोल रही हैं, वे आने वाले समय की स्मृति बन जाएँगी—एक ऐसी स्मृति, जिसे दबाना कठिन होगा।

महिलाओं का वर्तमान आंदोलन इस अर्थ में भी महत्त्वपूर्ण है कि वह भय के विरुद्ध खड़ा होता है। भय वह उपकरण है जिससे सत्ता आज्ञाकारिता सुनिश्चित करती है। जब महिलाएँ उस भय को सार्वजनिक रूप से अस्वीकार करती हैं तब वे केवल अपने लिए नहीं बल्कि पूरे समाज के लिए स्थान खोलती हैं। यह साहस संक्रामक होता है; वह दूसरों को भी बोलने का अवसर देता है। ईरान में अभी चल रहा महिलाओं का आंदोलन किसी निष्कर्ष पर पहुँचा हुआ अध्याय नहीं है बल्कि एक जीवित पाठ है जो हर दिन लिखा जा रहा है।

यह आंदोलन बताता है कि इतिहास केवल शासकों द्वारा नहीं लिखा जाता; वह उन स्त्रियों द्वारा भी लिखा जाता है जो अपने बालों, अपनी आवाज़ और अपने जीवन से सत्ता को चुनौती देती हैं। चाहे परिणाम जो भी हों, यह आंदोलन ईरान की सामाजिक चेतना में एक ऐसी दरार डाल चुका है, जिससे होकर भविष्य की रोशनी भीतर आ सकती है।


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