
दिल्ली के प्रगति मैदान में चल रहे पुस्तक मेले में पहले दिन ही दो मकसद ध्यान में रख कर गया था। एक तो नयी किताबों की दुनिया का जायजा लिया जाए तथा साथ ही वहां यूनिवर्सिटी जमाने के साथियों तथा अपनी जान पहचान के ‘बुद्धिजीवी कसरत’ के महारथियों से बतियाने का मौका भी मिलेगा।
मेले में तकरीबन सात घंटे बिताए, वहां के आंखों देखे मंजर पर लिखना भी चाहता था परंतु ‘सेतु प्रकाशन’ के स्टॉल पर एक किताब दिखाई दी इसके कुछ पन्ने पलट कर पढ़ने पर लगा कि मेले में आना सार्थक हो गया।
रामगोपाल सिंह वर्मा द्वारा लिखित- ‘मधु लिमए प्रतिरोध का परचम’ और ‘संविधान की आत्मा के सजग पहरी की जीवन गाथा’
यूं तो नयी किताब पर समीक्षा लिखने का रिवाज है। 280 पन्नों में लिखित इस किताब पर लिखना भी चाहता था परंतु किताब से पाठकों का तारूफ करवाने के लिए इसमें लिखी गई प्रस्तावना तथा अन्य महत्वपूर्ण बिंदुओं को पेश करना मुझे ज्यादा सार्थक तथा मेरी टिप्पणी से अनावश्यक रूप से लंबा ना हो ध्यान में रखते हुए प्रस्तुत कर रहा हूं।
भारतीय राजनीति में ऐसे कितने लोग हैं जिन्होंने सत्ता की दहलीज पर पहुँचकर भी विचारधारा का झण्डा गिरने नहीं दिया ? जिन्होंने अपने सिद्धान्तों के लिए दलों को, संसद को, यहाँ तक कि सहयोगियों की भी चुनौती दी ? जिनकी असहमति, केवल राजनीतिक विरोध नहीं थी बल्कि लोकतन्त्र की आत्मा को जगाने वाला नैतिक आह्वान थी ?
मधु लिमये ऐसे ही दुर्लभ राजनीतिज्ञों में से एक थे।
समाजवादी आन्दोलन के तेजस्वी प्रतिनिधि, लोहिया के अनन्य शिष्य, और संविधान की आत्मा के सजग प्रहरी।
यह पुस्तक उनके विचारों, संघर्षों, असहमतियों और राजनीतिक प्रयोगों की एक समर्पित यात्रा है; वह यात्रा जो कभी संसद से शुरू होकर जेल तक पहुँची, और कभी लेखनी से निकलकर सत्ताधारी दलों की नीतियों को चुनौती देती रही।
यह पुस्तक केवल एक जीवनी नहीं है, बल्कि एक वैचारिक दस्तावेज है जहाँ संघवाद, नागरिक स्वतन्त्रता, विचारधारा की प्रामाणिकता और विपक्ष की भूमिका जैसे प्रश्न फिर से उठते हैं। लेखक ने न केवल हमारे मानस में लिमये की स्मृति को ताजा किया है, बल्कि उन प्रश्नों की ओर भी हमारा ध्यान खींचा है जो आज के लोकतान्त्रिक विमर्श से गायब होते जा रहे हैं।
जब राजनीति छवियों और गठबन्धनों में सीमित हो रही है, यह किताब हमें याद दिलाती है कि राजनीति विचार का धर्म है, और असहमति उसकी पूजा। मधु लिमये की स्मृति, उनकी असहमति और उनके आत्मालोचन आदि सभी इस पुस्तक में ज्यों के त्यों उपस्थित हैं, प्रश्न पूछते हुए, चुनौती देते हुए। एक ऐसी विरासत जो अब भी बोलती है; बस, हम सुनना चाहें।
यह जीवनी क्यों ?
यह पुस्तक उन विचारों, आन्दोलनों और आत्मसंघर्षों की कथा है, जिनका केन्द्र एक ऐसा राजनेताः मधु लिमये था जो सत्ता के समीकरणों से अधिक वैचारिक ईमानदारी को महत्त्व देता था। उन्होंने इस सिद्धान्त के सामने न तो दल का अनुशासन सर्वोपरि माना, न ही वैचारिक लचीलेपन को राजनीति की शर्त। वे ऐसे समाजवादी थे जो न केवल भारतीय समाज की जटिलता को समझते थे, बल्कि समाजवाद के भारतीय संस्करण को लगातार पुनर्परिभाषित करने का साहस भी रखते थे। यह पुस्तक इस असाधारण राजनेता की विचार यात्रा, उनकी सार्वजनिक भूमिका, संसदीय संघर्षों और आत्मविश्लेषण की लम्बी परम्परा को समर्पित है।
भारतीय राजनीति के पिछले सात दशकों में अनेक चेहरे आए और गये, किन्तु जिन कुछ लोगों ने सत्ता की संहिता के बाहर रहकर विचारधारा की निरन्तरता बनाये रखी, उनमें मधु लिमये अग्रण्य हैं। वे संसद में थे, पर संसदवाद के यान्त्रिक स्वरूप के आलोचक भी। वे विपक्ष में थे, पर विपक्ष की नीतिहीनता के विरोधी भी। उन्होंने गोवा मुक्ति आन्दोलन से लेकर संघीय ढाँचे के पुनर्निर्माण तक हर विमर्श में भाग लिया, परन्तु कभी अपनी वैचारिक आत्मा को गिरवी नहीं रखा।
मधु लिमये के व्यक्तित्व को किसी एक राजनीतिक खाँचे में समाहित नहीं किया जा सकता। वे छात्र आन्दोलन से निकले, कार्ल मार्क्स और लोहिया दोनों को पढ़ा, गांधी की नैतिकता और अम्बेडकर की संरचनात्मक दृष्टि से प्रभावित हुए, किन्तु किसी के अन्ध अनुयायी नहीं बने। उन्होंने असहमति को अपने राजनीतिक जीवन की बुनियाद बनाया और तटस्थ आलोचना को सिद्धान्त का रूप दिया। जिस समय अधिकतर नेता पद और प्रतिष्ठा के पीछे भाग रहे थे, उस समय लिमये एकान्त और विचार के साथ खड़े दिखाई देते हैं।
उनकी सार्वजनिक भूमिका संसद तक सीमित नहीं रही। वे सड़कों पर उत्तरे, जेल गये, विचार विमर्शों में भाग लिया, लेख लिखे, पुस्तकों की रचना की और बौद्धिक हलकों में सत्ता के विरुद्ध स्वतन्त्र वैचारिक ध्वनि बनकर उभरे। उनकी किताबें गैर काँग्रेसवाद : एक पुनर्मूल्यांकन, जनता पार्टी प्रयोग, समाजवाद की विफलता और नया विकल्प आदि आज भी विचारशील राजनीति की विरासत हैं।
इस पुस्तक में प्रयत्न किया गया है कि लिमये के वैचारिक संघषों, सैद्धान्तिक टकरावों, और आत्मचिन्तनशील लेखन को समयानुकूल सन्दर्भों में देखा जाए। यह लेखन न स्तुति है, न आरोप; यह विश्लेषणात्मक, परन्तु सहृदय दृष्टि से लिखा गया प्रयास है जिससे हम यह समझ सकें कि लोकतान्त्रिक भारत में एक प्रतिबद्ध समाजवादी की यात्रा कैसी रही, और कैसे वह कभी किसी सत्ता-संरचना का बन्धक नहीं बना।
स्वतन्त्रता संग्राम में सराहनीय योगदान के लिए, लिमये को भारत सरकार द्वारा सम्मान और पेंशन प्रदान की गयी। हालाँकि, उन्होंने न तो पेंशन स्वीकार की और न ही सांसदों को मिलने वाली पेंशन योजना की नियमित धनराशि को स्वीकार किया। एक समर्पित समाजवादी के रूप में, लिमये ने निःस्वार्थ त्याग की भावना का परिचय दिया। लिमये एक उर्वर लेखक थे। उन्होंने अँग्रेजी, हिन्दी और मराठी में 60 से ज्यादा किताबें लिखीं और विभिन्न पत्रिकाओं, जर्नलों और समाचारपत्रों में सैकड़ों लेख लिखे।
प्रस्तुत पुस्तक केवल मधु लिमये के जीवन में घटित हुई घटनाओं का क्रम नहीं है; ये भारतीय लोकतंत्र में विचारधारा, नैतिकता और सत्ता के बीच तनाव की कथाएं हैं। हर अध्याय एक प्रसंग है जिसमें मधु लिमये अपने समय के बौद्धिक जूझते हैं। जनता पार्टी प्रयोग हो या संघवाद पर बहस, गैरकाँग्रेसी राजनीति ही या नागरिक स्वतन्त्रता, लिमये की उपस्थिति, विवेक और वैचारिक प्रतिरोध की एक जीवित मिसाल है।
आज जबकि भारतीय राजनीति में विचार की जगह नारे, और ईमानदारी की जगह रणनीति ने ले ली है, मधु लिमये का जीवन एक चेतावनी की तरह हमारे सामने खड़ा होता है। उन्होंने संसद को नारेबाजी का मंच नहीं, विचार का क्षेत्र समझा। जब वे लोकसभा में बोले, तो सत्ता और विपक्ष दोनों को विवेक के कठघरे में खड़ा किया। जब वे लिखा करते थे, तो वैचारिक मित्रों की आलोचना करने से भी नहीं चूके। जब वे पार्टी का हिस्सा बने, तो विचार की कसौटी को प्राथमिकता दी, और जब कोई पार्टी उस कसौटी पर खरी नहीं उत्तरी, तो अलग होने का साहस भी दिखाया।
इस पुस्तक के लेखन में केवल उनका ऐतिहासिक जीवन नहीं, बल्कि वह वैचारिक विरासत भी केन्द्र में है जिसे वे छोड़ गये। यह विरासत आसान नहीं है, यह कठोर है, अकेली है, और अक्सर अप्रिय भी। परन्तु यह वही विरासत है जिसकी भारतीय राजनीति को आज सबसे अधिक जरूरत है क्योंकि यह विरासत सत्ता के भीतर नैतिकता और सैद्धान्तिकता की जगह खोजती है।
यह पुस्तक इस बोध से प्रेरित होकर तैयार की गयी है कि शायद आज जब देश को विचार और दृष्टि की नयी लीक चाहिए, तो अतीत के उन व्यक्तित्वों की ओर लौटना अनिवार्य है जिन्होंने अपने समय में सत्ता को चुनौती दी, और अपने ही आत्मसंघर्षों से जूझते रहे। मधु लिमये ऐसे ही एक व्यक्ति थे, जटिल, सजग, निर्भीक और वैचारिक रूप से एकाग्र।
इस पुस्तक की रचना प्रक्रिया स्वयं एक वैचारिक अन्वेषण रही है। विभिन्न स्रोतों यथा मधु लिमये की प्रकाशित पुस्तकों, संसद में दिये गये भाषणों, पत्र-पत्रिकाओं में छपे लेखों, शोध-प्रबन्धों और निजी संस्मरणों को एकसाथ पढ़ते हुए यह स्पष्ट हुआ कि एक व्यक्ति के भीतर कितनी विविधता, कितनी वैचारिक बेचैनी और कितना नैतिक आग्रह समाहित हो सकता है।
लेखक राजगोपाल सिंह वर्मा ने मधु लिमए द्वारा लिखित कई प्रमुख पुस्तकों पर टिप्पणीयो सहित प्रस्तुत किया है।
जनतंत्र की तानाशाही (डिक्टेटरशिप ऑफ़ डेमोक्रेसी) , फेडरलिज्म इन इंडिया, भारतीय राजनीति में जातिवाद ( कास्टीज्म इन इंडियन पॉलिटिक्स) , राममनोहर लोहिया: एक आलोचनात्मक अध्यय, अंग्रेजी हटाओ आंदोलन: भाषा सत्ता और नीति,
द पेरल्स ऑफ प्रेसीडेंशियल रूल, डेमोक्रेसी इन पेरल, जेपी और संपूर्ण क्रांति का विमर्श, भारत की राजनीति और समाजवाद, संसदीय कार्रवाइयों पर लेख संग्रह (( एडिटेड वॉल्यूम्स आन पार्लियामेंट्री स्पीचेस) , इंडियन फेडरेलिज्म एण्ड नेशनल यूनिटी- , डेमोक्रेसी, डिसेंट एण्ड डिसरप्शन- , जनता पार्टी एक्सपेरिमेंट, डेमोक्रेसी एण्ड पॉलीटिकल मोरालिटी, कास्ट, क्लास एण्ड डेमोक्रेसी, - लोकतंत्र के भीतर जातीय वर्ग के अंतविरोधों की पड़ताल, पॉलीटिकल पावर एण्ड पीपल्स राइटस,- राजनीतिक शक्ति बनाम जनाधिकार का संघर्, ज्यूडिशल अकाउंटेबिलिटी इन ए डेमोक्रेसी,- लोकतंत्र में न्यायपालिका की उत्तरदायित्वशीलता, डेमोक्रेसी एण्ड डिसेंट: वॉइस ऑफ़ पोलिटिकल अपोजिशन इन इंडिया, - लोकतंत्र और असहमति: भारत में राजनीतिक विपक्ष की आवाजें, पॉलिटिकल इवोल्यूशन ऑफ़ इंडिया: (1947 – 1990) भारत की राजनीतिक विकास यात्रा
इंडियन फेडरेलिज्म एण्ड द यूनियन -स्टेट कनफ्लिक्ट,- भारतीय संघवाद और केंद्र- राज्य टकराव
हां एक बात जरुर कहूंगा इस किताब में मधु लिमए की शख्सियत, उनके विचार दर्शन, ज्ञान, त्याग, संघर्ष के साथ-साथ भारतीय राजनीति के जटिल सवालों, इतिहास पर बखूबी जानकारी मिलती है परंतु एक कमी भी खटकती है। मधु जी के जीवन के सांस्कृतिक पक्ष को पुस्तक में अनछुआ किया हुआ है। वह एक राजनीतिक चिंतक होने के साथ-साथ कला, साहित्य,संगीत, दर्शन के भी बहुत रसिक और ज्ञाता थे। भरत के नाट्यशास्त्र और शास्त्रीय संगीत के शास्त्रीय पक्ष के गहन जानकार भी थे उन्होंने अपने बारे में लिखा है:
‘शेक्सपियर की सभी रचनाओं, महाभारत और ग्रीक दु:खान्त रचनाओं के साथ मुझे एकांत आजीवन कारावास भुगतने में खुशी होगी और अगर जीवन के अंत तक मुझे यह अवसर नहीं मिला तो संत ज्ञानेश्वर की रचनाओं को पढ़ने की मेरी प्यास अतृप्त रहेगी’।
हिंदुस्तान के नामवर बौद्धिकों, पत्रकारों, के साथ-साथ संगीतकारों, कलाकारों, लेखकों का जमघट भी अक्सर उनके घर पर जमा रहता था।
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