
आज के चौंसठ साल पहले डॉ राम मनोहर लोहिया ने नैनीताल में 23 जून 1962 को एक व्याख्यान दिया था, जिसका शीर्षक था ‘निराशा के कर्तव्य’। उनका कहना था कि उन्हें काफी समय से तीन तरह की निराशा है। एक राष्ट्रीय निराशा, दूसरी अंतरराष्ट्रीय निराशा और तीसरी मानवी निराशा। उनके इस व्याख्यान को आज नए सिरे से पढ़ने और उसकी नए संदर्भों में व्याख्या करने की आवश्यकता है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दुनिया में जिस तरह अमेरिकी साम्राज्यवाद का डंका बजाना शुरू कर दिया है उसे देख कर लगता है कि अंतरराष्ट्रीय निराशा ज्यादा प्रबल है। हमें पहले उसी से लड़ना और सोचना चाहिए। लेकिन अपने देश में अधिनायकवाद, घृणा और नागरिक अधिकारों का दमन जिस पैमाने पर हो रहा है उसे देखकर लगता है कि इसी से लड़ना जरूरी है। तीसरी निराशा मानव के स्वभाव को लेकर है। उसके भीतर करुणा, बंधुत्व, बराबरी और स्वतंत्रता की भावना का जिस तरह से लोप होता गया है उससे तो लगता है पहले उसी को जगाया जाना चाहिए।
यह दुविधा पिछली सदी में भी थी और इस सदी में भी है कि हमें अन्यायी ताकतों के आगे झुककर अपना काम निकालना चाहिए या उसका प्रतिरोध करके उससे लड़ना चाहिए। भारत में बीसवीं सदी में भी वैसी शक्तियां थीं जो कहती थीं कि अंग्रेजों की औपनिवेशिक सत्ता से टकराने से कुछ नहीं होगा। वे बहुत न्यायप्रिय हैं और जो देते जाएं उसे लेते जाना चाहिए। संयोग से वे शक्तियां आज भारत में सत्ता में हैं। पाकिस्तान में सत्ता में हैं और बांग्लादेश में भी वैसी ही ताकतें सत्ता में आने की राह देख रही हैं। इसलिए आज अगर भारत सरकार का नेतृत्व वेनेजुएला की संप्रभुता पर हमला कर उसके राष्ट्रपति को गिरफ्तार करने का विरोध नहीं करता तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। वह ईरान में खुमैनी की सत्ता के विरोध में चल रहे प्रदर्शन और उसमें अमेरिका और इजराइल के हस्तक्षेप पर कुछ नहीं बोलता इस पर आश्चर्य नहीं होता। वह सरकार जो राष्ट्र के आर्थिक हितों के आधार पर विदेश नीति बनाने का दावा करती है वह बिना कुछ बताए ईरान के चाबहार बंदरगाह से अपने को बाहर लेती है और भारत के हजार करोड़ रुपए के निवेश को डूब जाने देती है इस पर अवश्य आश्चर्य होता है। हालांकि सरकार इस पर साफ तौर पर कुछ नहीं कह रही है।
भारत से बेहतर तो वे युरोपीय देश हैं जो डेनमार्क के स्वायत्त क्षेत्र ग्रीनलैंड को अमेरिका द्वारा हथियाए जाने का विरोध कर रहे हैं। बर्फीली ठंड में भी ग्रीनलैंड के राजनैतिक दलों ने जोरदार प्रदर्शन किया और कहा कि वे अमेरिका का हिस्सा नहीं बनना चाहते। एक सर्वे में ग्रीनलैंड के 85 प्रतिशत लोगों ने कहा है कि वे अमेरिका में जाने के विरुद्ध हैं। जबकि 6 फीसदी लोग अमेरिका में मिलना चाहते हैं। यूरोपीय संघ के देश जो नाटो के भी सदस्य हैं उनमें डेनमार्क, फिनलैंड, फ्रांस, जर्मनी, नार्वे, स्वीडन नीदरलैंड यूनाइटेड किंगडम सभी अमेरिका के इस प्रयास के विरुद्ध हैं। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रां ने कहा है कि उन पर किसी भी तरह की धमकी का असर नहीं होगा। न ही ग्रीनलैंड के मामले में और न ही युक्रेन के मामले में। युरोपीय संघ अपनी संप्रभुता से समझौता नहीं करेगा। ग्रेट ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टामेर ने तो और भी सख्त बयान जारी किया है कि ऐसा कदम पूरी तरह से गलत है। यूरोपीय संघ ने कहा कि इस मामले में शुल्क लगाने से अमेरिका भी गरीब होगा और युरोपीय संघ भी। नाटो तो टूटेगा ही। जबकि अमेरिकी राष्ट्रपति अपने इरादे पर कायम हैं और कह रहे हैं कि युरोप के आठ देश ग्रीनलैंड की यात्रा पर जाकर खतरनाक खेल खेल रहे हैं। अमेरिका तो 150 वर्षो से ग्रीनलैंड को खरीदना चाहता है।
इन सबसे ज्यादा विडंबना यह है कि भारत में व्यापक मध्यवर्ग इन घटनाओं का मजा ले रहा है। उसके मन में युद्ध की हिंसा और शक्ति के दमनकारी कृत्यों के प्रति भय और चिंता नहीं गजब का आकर्षण है। वह जिस तरह से अपने देश में विपक्षी दलों, अल्पसंख्यकों और किसानों, मजदूरों के दमन के प्रति उदासीन ही नहीं समर्थन में खड़ा रहता है उसी तरह से वह दुनिया में फैल रही अंतरराष्ट्रीय अराजकता और दुर्व्यवस्था के प्रति रोमांच का भाव पाले हुए है। यह वही वर्ग है जो देश या दुनिया में अन्याय के विरोध में लड़ने वालों को आंदोलनजीवी मानता है और चाहता है कि सरकारें उसे कुचल दें ताकि देश दुनिया में शांति रहे। यह तबका आजादी के बाद देश में अन्याय के विरुद्ध हुए तमाम आंदोलनों को गैर जरूरी मानता है और कभी कभी तो आजादी के पहले के भी आंदोलनों को गैर जरूरी मानता है। उसका मानना है कि गांधीजी अधिक आंदोलन करते थे, इसीलिए मुस्लिम लीग और उसके नेता जिन्ना ने उनसे किनारा करके अलग देश मांगा और गांधी से नाराज अंग्रेजों ने उन्हें वह दे दिया।
ऐसे में सवाल यह है कि किया क्या जाए? एक तरीका तो यह है कि दुनिया में संप्रभुता और आत्मनिर्णय के अधिकार का सम्मान करने वाली जो अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था बनी थी उसकी रक्षा की जाए। ट्रंप के नए साम्राज्यवादी रवैए से जो देश परेशान हैं वे पहल करके संयुक्त राष्ट्र जैसा ही कोई नया संगठन बना सकते हैं। युरोप में जो सरकारें ट्रंप के खिलाफ गोलबंद हो रही हैं वे अपनी गोलबंदी को दिखावटी न रहने दें बल्कि उसे ताकत प्रदान करें। लेकिन इसके लिए उन्हें रूस और चीन जैसा विस्तारवादी वर्ताव छोड़ना होगा। रूस को युक्रेन पर हमला रोकना और उसकी कब्जा की गई जमीनें वापस करनी होंगी। लेकिन यह संघर्ष ईरान में जमा हुआ खुमैनीवाद कर पाएगा इसमें संदेह है। हालांकि इसमें संदेह नहीं कि खुमैनीवाद ने भारत में उभर रहे हिंदुत्व के मुकाबले अधिक साम्राज्यवाद विरोधी चरित्र प्रदर्शित किया है। पर उसकी कट्टरता और अपने नागरिकों पर अत्याचार करने की परंपरा डराती है।
दूसरा तरीका पूरी दुनिया में बची खुली कम्युनिस्ट और समाजवादी ताकतों को एकजुट करके प्रतिरोध की नई ताकत खड़ी करने का है। आज भी साम्राज्यवाद के विरुद्ध देश में समाजवादी ताकतों ने ही प्रतिरोध किया है। उसमें कम्युनिस्ट पार्टियां और ट्रेड यूनियन संगठन शामिल हैं। तीसरा तरीका वह है जो गांधी ने सुझाया था। वह तरीका लंबा है लेकिन हमें यह सोचना चाहिए कि इक्कीसवीं सदी न तो उन्नीसवीं और वीसवीं सदी की तरह सुस्ती से चलने वाली है और न ही उसका गांधी मोहनदास कर्मचंद जैसा होगा। गांधी का संघर्ष केवल ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध नहीं था। वह हर किस्म के अन्याय के विरुद्ध था। वह यह नहीं चाहते कि अमेरिका और इजराइल का सैनिक आतंक मिटे और अयातुल्ला खामेनी के सुरक्षा बलों का आतंक कायम हो। इसलिए यह कहना उचित है कि गांधी सिर्फ भारत की आजादी की लड़ाई नहीं लड़ रहे थे बल्कि वे ब्रिटेन को भी औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति दिला रहे थे। उस लिहाज से भारत ही नहीं युरोप और अमेरिका को भी इक्कीसवीं सदी के लिए कोई गांधी चाहिए। ध्यान रहे गांधी कोई अलौकिक और असंभव व्यक्तित्व नहीं थे।
यहां पर डॉ लोहिया के उस कथन का उल्लेख करना आवश्यक है जो वे तत्कालीन कांग्रेस पार्टी के सत्ताधारियों के बहाने कहते थे। कांग्रेस पार्टी के नेताओं का कहना था कि गांधी का काम था अंग्रेजी राज को खत्म करना और हिंदुस्तान को आजाद कराना। इसके अलावा वे गांधी की बातों को एक अद्भुत और अलौकिक व्यक्ति की बातें बताकर यह साबित कर देते हैं कि वैसा काम तो गांधी कर सकते थे और अब वे आने वाले नहीं। निश्चित तौर पर देश और दुनिया को इस तर्क प्रणाली से बाहर निकलना होगा।
इससे भी बड़ी बात है अच्छाई को पहचानना और उसके प्रेरणा स्रोत की तलाश करना। वह कहां मिलेगी? वह कैसे मिलेगी? निश्चित तौर पर वह मानव की चिंतन प्रणाली में मिलेगी, उसके डीएनए में मिलेगी और उसके लिए तीव्र गति से भागने और मिसाइलों के प्रयोग से बाहर निकलकर धीमी गति से सोचना और कार्य करना होगा। उसमें मानव का कल्याण, उसकी भावी पीढ़ियों का कल्याण और इस ग्रह और उसके तमाम जीव जंतुओं के कल्याण के बारे में सोचना होगा। निराशा के इस नए कर्तव्य के तौर पर हमें एक नैतिक आख्यान खड़ा करना होगा और उसके वाहक नैतिक साहस वाले मनुष्य तैयार करने होंगे। लोहिया को उम्मीद थी कि बीसवीं सदी के खत्म होने तक मनुष्य गैर बराबरी और नाइंसाफी से मुक्त हो जाएगा। हम उनके सपने को विफल न मानते हुए फिर से इस सदी में देख सकते हैं और ऐसा करने में किसी को कोई हर्ज नहीं होना चाहिए।
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