— परिचय दास —
।। एक ।।
रैदास का साहित्य पढ़ते हुए सबसे पहले जो अनुभूति आती है, वह यह कि यहाँ शब्द किसी वैचारिक घोषणा-पत्र की तरह खड़े नहीं हैं बल्कि अनुभव की धूप में तपे हुए हैं। यह तपन ही उनकी कविता को विचार से अधिक जीवन के निकट ले जाती है। रैदास के यहाँ भक्ति कोई पलायन नहीं बल्कि संसार में रहते हुए संसार की कठोरताओं को पहचानने की कला~प्रक्रिया है। उनके पदों में ईश्वर की खोज किसी दूरस्थ, अलौकिक लोक में नहीं बल्कि उसी मिट्टी में है जहाँ मनुष्य अपमान, श्रम और पीड़ा के साथ जीता है।
रैदास की भाषा में जो सहजता दिखाई देती है, वह साधारणपन नहीं है। यह वह सहजता है जो गहरे आत्मविश्वास से आती है। वे जानते हैं कि जिस समाज ने उन्हें हाशिए पर रखा है, उसी समाज की भाषा में अपनी बात कहना सबसे बड़ा हस्तक्षेप है। इसलिए उनके यहाँ अलंकारों का बोझ नहीं बल्कि अनुभव की स्पष्टता है। शब्द कम हैं पर अर्थ बहुस्तरीय। एक-एक पंक्ति अपने भीतर सामाजिक इतिहास का भार उठाए हुए है।
उनकी भक्ति में विनय है पर दीनता नहीं। यह फर्क बहुत महीन है और यहीं रैदास कबीर से अलग एक स्वतंत्र स्वर निर्मित करते हैं। कबीर का स्वर जहाँ कई बार तीखा, आक्रामक और व्यंग्यपूर्ण हो उठता है, वहीं रैदास का स्वर स्थिर, संयत और गहन करुणा से भरा हुआ है।
यह करुणा किसी नैतिक उपदेश से नहीं बल्कि सह-अनुभूति से जन्म लेती है। वे जिस पीड़ा को जानते हैं, उसी से बोलते हैं।
रैदास के साहित्य में एक ‘नगर’ की कल्पना बार-बार आती है—बेगमपुरा। यह केवल एक धार्मिक स्वप्न नहीं बल्कि सामाजिक न्याय की काव्यात्मक संकल्पना है।
बेगमपुरा ऐसा नगर है जहाँ कोई दु:खी नहीं, कोई कर नहीं, कोई जाति नहीं। यह कल्पना अपने समय में जितनी क्रांतिकारी थी, आज भी उतनी ही प्रश्नवाचक है। यह हमें याद दिलाती है कि भक्ति आंदोलन केवल आत्मा की मुक्ति का आंदोलन नहीं था बल्कि सामाजिक कल्पना का भी आंदोलन था।
रैदास के यहाँ शरीर और आत्मा का द्वंद्व नहीं बल्कि उनका सह-अस्तित्व है। वे शरीर को हेय नहीं मानते क्योंकि शरीर ही श्रम करता है, सहता है और जीता है। इसीलिए उनकी भक्ति जीवन-विरोधी नहीं होती। वे संसार को छोड़ने की बात नहीं करते बल्कि संसार को बेहतर बनाने की आकांक्षा रखते हैं। यह आकांक्षा किसी राजनीतिक घोषणापत्र की तरह नहीं बल्कि कविता की कोमलता में प्रकट होती है।
उनकी कविता में जो संगीतात्मकता है, वह केवल छंद या लय का परिणाम नहीं है। यह उस जीवन-लय से आती है जो श्रम, प्रतीक्षा और आशा के बीच चलती रहती है। रैदास के पद गाए जाते हैं, क्योंकि वे बोलने से पहले सुने जाने की इच्छा रखते हैं। यह श्रवण-परंपरा ही उनकी कविता को लोक के निकट रखती है।
समालोचना की दृष्टि से देखें तो रैदास का साहित्य हमें भक्ति को नए सिरे से समझने के लिए विवश करता है। यहाँ भक्ति सत्ता के साथ समझौता नहीं करती, न ही वह केवल आंतरिक साधना बनकर रह जाती है। यह भक्ति सामाजिक स्मृति का हिस्सा है। यही कारण है कि रैदास केवल एक संत नहीं बल्कि एक सांस्कृतिक हस्तक्षेप हैं।
आज के समय में रैदास को पढ़ना केवल ऐतिहासिक रुचि का विषय नहीं बल्कि वर्तमान की बेचैनियों से संवाद का एक तरीका है। जब समाज फिर से वर्ग, जाति और वर्चस्व की नई भाषाएँ गढ़ रहा है, तब रैदास की कविता हमें याद दिलाती है कि मनुष्य की गरिमा किसी जन्मसिद्ध विशेषाधिकार से नहीं, बल्कि उसके होने मात्र से आती है।
रैदास का साहित्य इसीलिए टिकाऊ है। वह समय के साथ पुराना नहीं पड़ता बल्कि हर नए समय में नए अर्थों के साथ सामने आता है। उनकी कविता किसी संग्रहालय की वस्तु नहीं, बल्कि जीवित परंपरा है—ऐसी परंपरा, जो चुपचाप, बिना शोर किए, मनुष्य के पक्ष में खड़ी रहती है।
रैदास का साहित्य उस क्षण का साहित्य है जब भाषा पहली बार अपने पैरों पर खड़ी होती है~बिना किसी राजाश्रय, बिना किसी ग्रंथीय अनुमति, बिना किसी जातीय प्रमाणपत्र के। यह साहित्य शास्त्र से नहीं, अनुभव से जन्मा है। इसलिए उसमें विचार की कठोरता नहीं, अनुभूति की ऊष्मा है; तर्क की तलवार नहीं, जीवन की राख में दबा हुआ धीमा-सा अंगार है।
रैदास के यहाँ कविता कोई कलात्मक वस्तु नहीं बल्कि जीवन की दशा है। उनकी पंक्तियाँ पढ़ते हुए ऐसा लगता है मानो कविता लिखी नहीं गई, बल्कि कही गई हो~ किसी चर्मकार की गंध से भरी हथेलियों के बीच, किसी ऐसी आँख से देखी गई हो जिसने ईश्वर को मंदिर में नहीं, मनुष्य में खोजा हो। यही खोज रैदास के साहित्य को भक्तिकाल की भीड़ से अलग करती है।
उनका साहित्य प्रश्न से शुरू नहीं होता, स्थिति से शुरू होता है। वे यह नहीं पूछते कि ईश्वर क्या है; वे बताते हैं कि ईश्वर कहाँ नहीं है—जहाँ जाति है, जहाँ ऊँच-नीच है, जहाँ स्पर्श अपराध है। इस नकार में ही उनका सबसे बड़ा स्वीकार छिपा है। रैदास का ईश्वर निर्गुण है पर निराकार होने से पहले निष्पक्ष है। वह किसी एक वर्ण, एक कुल, एक भाषा का ईश्वर नहीं। वह मनुष्य की पीड़ा में उतर कर मनुष्य हो जाने वाला ईश्वर है।
रैदास की कविता में जो सरलता दिखाई देती है, वह भोलेपन से नहीं आती। वह एक गहरी जीवन-साधना का परिणाम है। उनकी भाषा सजाई नहीं गई है; वह घिसी हुई है—दिन-दिन की मेहनत से, तिरस्कार से, अपमान से। यही घिसावट उनकी भाषा को चमकदार नहीं, सच्चा बनाती है। वे अलंकारों का प्रयोग नहीं करते पर उनकी पंक्तियाँ स्वयं अलंकार बन जाती हैं—क्योंकि उनमें जीवन की चोट है।
उनके पदों में ‘बेगमपुरा’ केवल एक आदर्श नगर नहीं है; वह एक राजनीतिक कल्पना है, लेकिन सत्ता की भाषा में नहीं।
वह एक ऐसा समाज है जहाँ कर नहीं है, भय नहीं है, भेद नहीं है। यह कल्पना किसी राजदरबार में नहीं, एक बहिष्कृत नागरिक के मन में जन्मी है। इसलिए यह यूटोपिया कल्पनालोक नहीं बनता बल्कि एक नैतिक दबाव बन जाता है—समाज पर, धर्म पर, सत्ता पर।
रैदास का साहित्य भक्ति के नाम पर पलायन नहीं करता। वह भक्ति को ही प्रतिरोध में बदल देता है। उनका ईश्वर-स्मरण सामाजिक यथार्थ से मुँह मोड़ना नहीं बल्कि उसे बेधना है। वे कहते हैं—अगर राम वहाँ है जहाँ छुआछूत है तो वह मेरा राम नहीं। यह वाक्य किसी घोषणापत्र की तरह नहीं आता, वह सहज पद की तरह आता है—और इसी सहजता में उसकी विस्फोटक शक्ति छिपी है।
उनकी कविता का सबसे बड़ा गुण है—आत्मसम्मान। रैदास करुणा के कवि नहीं हैं, वे दया की भाषा नहीं बोलते। वे अपनी पीड़ा को दया का पात्र नहीं बनाते। उनकी आवाज़ में विनय है पर आत्महीनता नहीं। यह आत्मसम्मान ही है जो उन्हें भक्तिकाल के अन्य कवियों से अलग खड़ा करता है। वे झुकते हैं लेकिन टूटते नहीं।
रैदास के साहित्य में देह की उपस्थिति भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। यह देह किसी पाप का घर नहीं बल्कि अनुभव का केंद्र है। जिस देह को समाज ने अपवित्र कहा, उसी देह से रैदास ईश्वर की खोज करते हैं। यह खोज आध्यात्मिक होते हुए भी भौतिक है। वहाँ मिट्टी है, पसीना है, चमड़े की गंध है~और इन्हीं के बीच ईश्वर सांस लेता है।
उनकी कविता में शास्त्र का आतंक नहीं है। वे वेदों को नकारते नहीं लेकिन उनसे डरते भी नहीं। उनके लिए अनुभव सबसे बड़ा ग्रंथ है। यही कारण है कि उनका साहित्य लोक में गहराई से रचा-बसा है। वह पढ़ा कम जाता है, जिया अधिक जाता है। गाया जाता है, दोहराया जाता है, स्मृति में बसता है।
समालोचना की दृष्टि से देखें तो रैदास का साहित्य हमें आलोचना की सीमाओं पर भी प्रश्न करने को बाध्य करता है। क्या हम उन्हें केवल भक्ति-कवि कहकर समझ सकते हैं? क्या उनकी कविता को आध्यात्मिक कहकर उसके सामाजिक आयामों को अनदेखा किया जा सकता है? रैदास का साहित्य इन वर्गीकरणों को स्वीकार नहीं करता। वह कविता है, दर्शन है, समाजशास्त्र है—लेकिन किसी एक खाँचे में नहीं समाता।
रैदास की भाषा में जो मौन है, वह भी अर्थपूर्ण है। वे हर बात नहीं कहते; बहुत कुछ छोड़ देते हैं। यह मौन किसी कमजोरी का नहीं, अनुभव की गहराई का संकेत है। वे जानते हैं कि कुछ सत्य ऐसे होते हैं जिन्हें कहा नहीं जा सकता, केवल जिया जा सकता है।
आज के समय में रैदास का साहित्य किसी स्मारक की तरह नहीं, संवाद की तरह पढ़ा जाना चाहिए। न तो उन्हें केवल दलित चेतना का प्रतीक बनाकर सीमित किया जाना चाहिए, न ही उन्हें भक्तिकाल की सुरक्षित अलमारी में बंद किया जाना चाहिए। उनका साहित्य आज भी प्रश्न करता है—हमारे धर्म से, हमारी राजनीति से, हमारी भाषा से।
रैदास की कविता हमें यह याद दिलाती है कि साहित्य का सबसे बड़ा काम सौंदर्य पैदा करना नहीं, न्याय की आकांक्षा को भाषा देना है। यह भाषा ऊँची नहीं होती पर गहरी होती है। चमकदार नहीं होती, पर टिकाऊ होती है।
इस अर्थ में रैदास का साहित्य आज भी अधूरा है—क्योंकि वह जिस समाज का सपना देखता है, वह अभी पूरा नहीं हुआ। और शायद यही उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है।
।। दो ।।
रैदास के पदों की आलोचना करते समय सबसे पहले जिस बात पर ध्यान जाता है, वह है—पाठ और जीवन के बीच की दूरी का लगभग लुप्त हो जाना। यहाँ कविता किसी आत्मनिर्भर सौंदर्य-वस्तु की तरह नहीं खड़ी होती बल्कि सामाजिक यथार्थ से लगातार संवाद करती हुई दिखाई देती है। पदों का अर्थ केवल शब्दों में नहीं, बल्कि उन परिस्थितियों में खुलता है, जिनसे कवि स्वयं गुज़रा है और जिनसे उसका समुदाय गुजरता रहा है। इस दृष्टि से रैदास के पदों को केवल आध्यात्मिक अभिव्यक्ति कहना, उनके अर्थ-क्षेत्र को सीमित कर देना होगा।
रैदास के पद एक ऐसे वक्ता की रचना हैं, जिसकी स्थिति सत्ता के केंद्र में नहीं बल्कि हाशिए पर है। यही स्थिति उनके काव्य-वक्ता को एक विशिष्ट नैतिक अधिकार प्रदान करती है। यहाँ वक्ता का ‘मैं’ आत्ममुग्ध नहीं है; वह अनुभव-सिद्ध है। यह ‘मैं’ किसी निजी अहंकार का उद्घोष नहीं बल्कि सामूहिक पीड़ा का प्रतिनिधि स्वर है। आलोचनात्मक दृष्टि से यह महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पाठक के सामने एक ऐसा काव्य-विषय उपस्थित होता है, जो स्वयं को सार्वभौमिक बनाने का दावा नहीं करता फिर भी सार्वभौमिक अनुभवों को छूता है।
इन पदों की संरचना अत्यंत सादी प्रतीत होती है, किंतु यही सादगी उनकी सबसे बड़ी रणनीति है। भाषा अलंकरण से मुक्त है पर अर्थ-निर्माण अत्यंत सूक्ष्म है। वाक्य-विन्यास छोटा है, कथन सीधा है लेकिन उसके भीतर जो अंतर्ध्वनि है, वह लंबे समय तक पाठक के मन में गूंजती रहती है। यह गूंज पाठ की अस्पष्टता से नहीं बल्कि उसकी बहु-अर्थक्षमता से जन्म लेती है। रैदास के पद इस बात का उदाहरण हैं कि अर्थ की गहराई जटिल भाषा की मोहताज नहीं होती।
रैदास के पदों में ‘ईश्वर’ एक स्थिर, परिभाषित अवधारणा नहीं है। वह कभी सखा है, कभी सहचर, कभी आश्रय तो कभी प्रश्नों के घेरे में खड़ा एक मौन संबोधन। यह परिवर्तनशीलता किसी दार्शनिक अस्थिरता का संकेत नहीं बल्कि अनुभव की गतिशीलता का परिणाम है। आलोचनात्मक रूप से देखें तो यहाँ ईश्वर एक विमर्शात्मक संरचना बन जाता है—ऐसी संरचना, जिसके माध्यम से कवि सत्ता, अन्याय और सामाजिक असमानता पर टिप्पणी करता है।
इन पदों में स्थान की कल्पना विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है। ‘बेगमपुरा’ जैसे रूपक किसी काल्पनिक लोक से अधिक एक वैकल्पिक सामाजिक संरचना का संकेत हैं। यह स्थान-विमर्श कविता को एक नैतिक-राजनीतिक आयाम देता है। रैदास का नगर केवल सुख का वादा नहीं करता बल्कि उस व्यवस्था का निषेध करता है, जिसमें कर, भय और भेदभाव मौजूद हैं। इस प्रकार पदों में निहित स्थान-कल्पना प्रतिरोध की भाषा बन जाती है—एक ऐसी भाषा, जो सीधे टकराव के बजाय वैकल्पिक संभावना प्रस्तुत करती है।
रैदास के पदों में शरीर की उपस्थिति अत्यंत स्वाभाविक है। शरीर यहाँ तपस्या का शत्रु नहीं बल्कि अनुभव का माध्यम है। श्रमरत शरीर, अपमान सहता शरीर और फिर भी गरिमा के साथ खड़ा शरीर—यह सब कविता के भीतर बिना किसी घोषणात्मक आग्रह के उपस्थित है। आलोचना की दृष्टि से यह महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह उस काव्य-परंपरा से भिन्न है, जहाँ शरीर को त्याग या लज्जा के रूप में देखा जाता है। रैदास के पद शरीर को अर्थ-उत्पादन का केंद्र बना देते हैं।
इन पदों की समय-संरचना भी ध्यान देने योग्य है। यहाँ समय रैखिक नहीं है। अतीत का अनुभव वर्तमान में बोलता है और भविष्य की आकांक्षा वर्तमान के भीतर ही आकार लेती है। ‘बेगमपुरा’ भविष्य का स्वप्न है, लेकिन उसका नैतिक दबाव वर्तमान पर है। इस तरह रैदास के पद समय को केवल क्रम के रूप में नहीं बल्कि एक जीवंत अनुभव के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
रैदास की काव्य-वाणी में मौन का भी विशेष महत्व है। कई पदों में जो कहा नहीं गया है, वही सबसे अधिक अर्थपूर्ण बन जाता है। यह मौन किसी असमर्थता का परिणाम नहीं बल्कि एक सचेत काव्य-रणनीति है। मौन पाठक को सक्रिय करता है, उसे अर्थ-निर्माण की प्रक्रिया में सहभागी बनाता है। इस सहभागिता के बिना रैदास के पद पूर्ण रूप से खुलते नहीं।
इन पदों की ग्रहणशीलता—यानी उनका गाया जाना, स्मृति में रहना और लोक-जीवन का हिस्सा बन जाना—भी आलोचना का एक महत्वपूर्ण पक्ष है। यह गुण केवल लय या छंद के कारण नहीं बल्कि भावात्मक सघनता के कारण संभव होता है। पद सुनने वाले को यह महसूस होता है कि यह स्वर उसका अपना है या हो सकता है। यही पहचान कविता को जीवित परंपरा में बदल देती है।
रैदास के पद किसी एक विचारधारा में बंद नहीं होते। वे न तो केवल आध्यात्मिक हैं, न केवल सामाजिक। उनकी शक्ति इसी अंतर्विरोध में है। वे भक्ति को सामाजिक यथार्थ से काटते नहीं बल्कि उसे और अधिक ठोस बनाते हैं। आलोचनात्मक रूप से यह कहा जा सकता है कि रैदास के पद अर्थ के किसी एक स्थिर केंद्र को स्वीकार नहीं करते। वे अर्थ को एक प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत करते हैं—एक ऐसी प्रक्रिया, जो पाठक, समाज और समय के साथ बदलती रहती है।
समग्र रूप से देखें तो रैदास के पद उस कविता का उदाहरण हैं जो बिना किसी सैद्धांतिक घोषणापत्र के गहरे वैचारिक हस्तक्षेप करती है। उनकी आलोचना का रास्ता सीधे निष्कर्षों तक नहीं जाता बल्कि पाठ, संदर्भ और पाठक के बीच बने तनावों से होकर गुजरता है। यही तनाव रैदास के पदों को आज भी प्रासंगिक बनाता है—न केवल पढ़े जाने के लिए बल्कि बार-बार नए अर्थों के साथ पुनः पढ़े जाने के लिए।
।। तीन।।
बेगमपुरा शहर को नाउँ
दुख-अंदोह नहीं तिहि ठाउँ।
न तसवीस खिराज न माल
खौफ न खता न तरस जवाल॥
अब मोहि खूब वतन गह पाई
ऊँच-नीच सब एक समाई।
रैदास खालस चमारा
जो हमसहरी सो मीत हमारा॥
यह पद केवल एक आदर्श नगर का वर्णन नहीं है; यह भाषा के भीतर रची गई एक वैकल्पिक सामाजिक संरचना है। कविता यहाँ कल्पना नहीं बल्कि हस्तक्षेप है। “बेगमपुरा” किसी भूगोल का नाम नहीं बल्कि एक नैतिक संभावना का संकेत है—एक ऐसा स्थान, जो वर्तमान की असफलताओं से पैदा हुआ है।
“दुख-अंदोह नहीं तिहि ठाउँ”—इस पंक्ति से कविता स्पष्ट करती है कि यह नगर किसी भौतिक वैभव से परिभाषित नहीं होता बल्कि पीड़ा की अनुपस्थिति से। दु:ख यहाँ निजी भाव नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना का परिणाम है। कविता मानो यह कह रही हो कि यदि व्यवस्था ठीक हो तो दुख स्वाभाविक नहीं रह जाता। इस तरह पीड़ा को भाग्य से हटाकर व्यवस्था से जोड़ा गया है।
“न तसवीस खिराज न माल”—यहाँ सत्ता की आर्थिक भाषा पर सीधा प्रहार है लेकिन बिना किसी आक्रोश के। कर, माल और दंड—ये तीनों शब्द उस शासन-तंत्र की पहचान हैं जो नागरिक को संदेह की दृष्टि से देखता है। इस पद में कर का निषेध दरअसल शोषण का निषेध है। कविता यह नहीं कहती कि राज्य नहीं चाहिए बल्कि यह कि राज्य भय पर आधारित न हो।
“खौफ न खता न तरस जवाल”—यह पंक्ति विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है। भय, अपराध और दया—तीनों सत्ता की नैतिक मुद्रा हैं। भय से नियंत्रण, अपराध से दंड और दया से श्रेष्ठता। रैदास का नगर इन तीनों से मुक्त है। यहाँ मनुष्य को न अपराधी मानकर चला जाता है, न दया का पात्र। यह मनुष्य की गरिमा की घोषणा है—लेकिन अत्यंत शांत स्वर में।
“अब मोहि खूब वतन गह पाई”—यह ‘वतन’ किसी राष्ट्र का नाम नहीं है। यह वह स्थान है, जहाँ व्यक्ति पहली बार आत्मिक स्थिरता अनुभव करता है। यहाँ कविता विस्थापन की पीड़ा से निकलकर अपनत्व की ओर जाती है। आलोचनात्मक दृष्टि से देखें तो यह पंक्ति पहचान के संकट का समाधान नहीं बल्कि उसकी अस्वीकृति है—पहचान को संघर्ष नहीं, सहज स्थिति बनाया गया है।
“ऊँच-नीच सब एक समाई”—यह पंक्ति पद का वैचारिक शिखर है। यहाँ समानता कोई संघर्ष-सिद्ध उपलब्धि नहीं बल्कि रहने की सामान्य अवस्था है। कविता समानता को असाधारण नहीं बनाती। वह उसे सामान्य बनाकर क्रांतिकारी बना देती है। यही इसकी सबसे गहरी रणनीति है—विरोध को सामान्यता में बदल देना।
अंतिम दो पंक्तियाँ इस पद को असाधारण बना देती हैं—
“रैदास खालस चमारा
जो हमसहरी सो मीत हमारा।”
यहाँ कवि अपनी सामाजिक पहचान को छिपाता नहीं, न उससे मुक्ति चाहता है। वह उसे घोषित करता है लेकिन गर्व या चुनौती की मुद्रा में नहीं—सहजता में। यह आत्म-स्वीकृति है, आत्म-रक्षा नहीं। पहचान यहाँ बोझ नहीं बल्कि संवाद का आधार है। जो उसी नगर का नागरिक है, वही मित्र है—पहचान का माप साझा नैतिकता है, जन्म नहीं।
काव्य-शिल्प की दृष्टि से यह पद अत्यंत सुसंगठित है। न कोई पंक्ति व्याख्या मांगती है, न कोई अतिरिक्त है। भाषा लोकधर्मी है लेकिन अर्थ बहुस्तरीय। यह कविता सुनने में सरल है पर पढ़ने में गहरी। इसका सौंदर्य न अलंकार में है, न छवि-विलास में—बल्कि नैतिक स्पष्टता में है।
यह पद प्रतिरोध का घोषणापत्र नहीं, बल्कि विकल्प का प्रस्ताव है। यह वर्तमान से लड़ता नहीं, उसे अप्रासंगिक बना देता है। सत्ता, भय और भेद—तीनों को यह कविता चुपचाप बाहर कर देती है और पाठक को एक ऐसे संसार में खड़ा कर देती है, जहाँ अन्याय अस्वाभाविक लगता है।
यही इस पद की सबसे बड़ी साहित्यिक उपलब्धि है—यह पाठक को विद्रोही नहीं बनाता बल्कि उसे यह महसूस करा देता है कि जो वह जी रहा है, वह स्वाभाविक नहीं है।
।। चार ।।
ऐसा चाहूँ राज मैं,
जहाँ मिले सबन को अन्न।
छोट-बड़ो सब सम बसे,
रैदास रहे प्रसन्न॥
यह पद पहली दृष्टि में अत्यंत सरल, लगभग बाल-सुलभ प्रतीत होता है किंतु यही सादगी इसकी सबसे गहरी काव्य-रणनीति है। यहाँ “राज” किसी राजसिंहासन या सत्ता-प्राप्ति की आकांक्षा नहीं है बल्कि एक नैतिक संरचना का रूपक है।
कवि सत्ता की भाषा में बोलता है पर उसका लक्ष्य सत्ता नहीं—व्यवस्था है। यह सत्ता को उलट कर देखने की दृष्टि है, जहाँ शासन का मूल्य उसकी भव्यता से नहीं बल्कि उसकी करुणा से तय होता है।
“जहाँ मिले सबन को अन्न”—यह पंक्ति कविता को आध्यात्मिक आकाश से उतार कर भौतिक धरातल पर रख देती है। यहाँ अन्न केवल भोजन नहीं, बल्कि अस्तित्व की न्यूनतम गारंटी है। यह जीवन की पहली शर्त है, और उसी से नैतिकता की शुरुआत होती है। कविता इस बिंदु पर किसी दैवी अनुकंपा की प्रतीक्षा नहीं करती बल्कि व्यवस्था से जवाब माँगती है। यह आग्रह बहुत शांत है, लेकिन उसी शांति में उसकी कठोरता छिपी है।
“छोट-बड़ो सब सम बसे”—यह पंक्ति पद के वैचारिक केंद्र में स्थित है। यहाँ समानता कोई आदर्श वाक्य नहीं, बल्कि रहने की स्थिति है—“बसे”। समानता को व्यवहार में उतरना चाहिए, केवल घोषणा में नहीं। कवि किसी संघर्ष की भाषा नहीं अपनाता, न ही प्रतिशोध की। वह केवल इतना चाहता है कि भेदभाव का तर्क सामाजिक जीवन से हट जाए। इस तरह कविता नैतिक आग्रह को सौंदर्य में रूपांतरित कर देती है।
इस पद की सबसे सूक्ष्म और महत्त्वपूर्ण पंक्ति है—“रैदास रहे प्रसन्न।” यहाँ कवि स्वयं को केंद्र में रखता है लेकिन यह आत्मकेंद्रितता नहीं है। यह प्रसन्नता किसी व्यक्तिगत सुख का संकेत नहीं बल्कि सामूहिक न्याय के पूर्ण होने की अवस्था है। कवि की प्रसन्नता शर्तबद्ध है—यदि समाज में अन्न है, समता है, भय नहीं है, तभी वह प्रसन्न है। इस प्रकार ‘मैं’ और ‘हम’ के बीच की दूरी मिट जाती है।
काव्य-शिल्प की दृष्टि से देखें तो यह पद अत्यंत संतुलित है। चारों पंक्तियाँ एक नैतिक तर्क की तरह आगे बढ़ती हैं—इच्छा, शर्त, व्यवस्था और परिणाम। कोई भी पंक्ति अतिरिक्त नहीं है। लय सहज है किंतु उसमें लोक-स्मृति का भार है। यही कारण है कि यह पद केवल पढ़ा नहीं जाता बल्कि स्मृति में बस जाता है।
इस पद में विरोध प्रत्यक्ष नहीं है लेकिन अनुपस्थिति के माध्यम से तीखा है।
जहाँ अन्न नहीं, वहाँ सत्ता असफल है~यह बात बिना कहे स्पष्ट हो जाती है। जहाँ छोट-बड़ा है, वहाँ राज अपूर्ण है। कविता निषेध को प्रत्यक्ष भाषा में नहीं कहती, बल्कि एक वैकल्पिक संसार रच कर वर्तमान को प्रश्नांकित करती है।
यह पद किसी सिद्धांत का प्रचार नहीं करता बल्कि एक नैतिक कल्पना प्रस्तुत करता है। उसकी शक्ति इसी में है कि वह आदेश नहीं देता बल्कि संभावना दिखाता है। कविता पाठक से सहमति नहीं मांगती—वह पाठक को अपने भीतर झाँकने के लिए विवश करती है।
रैदास का यह पद केवल भक्ति का उदाहरण नहीं बल्कि भाषा, सत्ता और नैतिकता के संबंधों पर एक अत्यंत सघन काव्य-हस्तक्षेप है। इसमें सौंदर्य और विचार अलग-अलग नहीं बल्कि एक-दूसरे के भीतर घुले हुए हैं—और यही इसका स्थायी साहित्यिक मूल्य है।
।। पांच ।।
प्रभु जी, तुम चंदन हम पानी।
जाकी अंग-अंग बास समानी॥
प्रभु जी, तुम घन बन हम मोरा।
जैसे चितवत चंद चकोरा॥
प्रभु जी, तुम दीपक हम बाती।
जाकी जोति बरै दिन राती॥
प्रभु जी, तुम मोती हम धागा।
जैसे सोनहुँ मिलत सुहागा॥
प्रभु जी, तुम स्वामी हम दासा।
ऐसी भक्ति करै रैदासा॥
यह पद भक्ति की सामान्य विनय-भाषा से आरंभ होता है किंतु धीरे-धीरे वह एक गहरे काव्यात्मक संबंध में रूपांतरित हो जाता है। यहाँ “प्रभु” और “मैं” का संबंध किसी ऊर्ध्वाधर सत्ता-संरचना जैसा नहीं बल्कि परस्पर निर्भरता पर आधारित है। यह निर्भरता एकतरफा नहीं है—यही इस पद की सबसे सूक्ष्म और निर्णायक विशेषता है।
“तुम चंदन हम पानी”—यह रूपक केवल सुगंध का नहीं, रूपांतरण का है। चंदन अकेला अपनी गंध नहीं फैला सकता; पानी के संपर्क में आकर ही उसका सार प्रकट होता है। इस प्रकार ‘मैं’ स्वयं को केवल विनीत नहीं बल्कि प्रक्रिया का अनिवार्य घटक घोषित करता है। कविता यहाँ आत्म-लोप नहीं, आत्म-स्थितिकरण करती है। यह एक ऐसा ‘मैं’ है जो स्वयं को मिटाकर नहीं, जुड़कर अर्थवान बनता है।
“घन बन हम मोरा”—यह दृश्यात्मक बिंब काव्य में दृष्टि और आकांक्षा के संबंध को उद्घाटित करता है। मोर का नृत्य बादल को देखकर होता है—यह प्रतिक्रिया है, अधीनता नहीं। यहाँ प्रतीक्षा है, विवशता नहीं। कविता संबंध को इच्छा और प्रत्याशा के धरातल पर रखती है, जहाँ दोनों पक्ष सक्रिय हैं। यह भक्ति को निष्क्रिय समर्पण से निकालकर संवेदनात्मक संवाद में बदल देता है।
“दीपक–बाती” का रूपक विशेष रूप से अर्थगर्भित है। दीपक और बाती में से कोई भी अकेला प्रकाश नहीं दे सकता। यहाँ प्रकाश किसी एक सत्ता का गुण नहीं बल्कि संबंध का परिणाम है। कविता यह संकेत देती है कि अर्थ, ऊर्जा और प्रकाश—सब संबंधों से पैदा होते हैं, न कि अकेले अस्तित्व से। यह दृष्टि कविता को दार्शनिक गहराई प्रदान करती है।
“मोती–धागा” का बिंब सौंदर्य के सामाजिक पक्ष को सामने लाता है। मोती मूल्यवान है लेकिन बिखरा हुआ। धागा उसे रूप देता है, अर्थ देता है, उपयोग में लाता है। यहाँ ‘मैं’ को कमतर नहीं दिखाया गया; बल्कि वह संरचना का वह तत्त्व है जो मूल्य को दृश्य और ग्राह्य बनाता है। यह कविता मूल्य और व्यवस्था के बीच के संबंध पर मौन टिप्पणी करती है।
अंतिम पंक्ति—“तुम स्वामी हम दासा”—पहली दृष्टि में पारंपरिक प्रतीत होती है किंतु पूरे पद को पढ़ने के बाद इसका अर्थ बदल जाता है। यह दासता अपमान नहीं, चयन है। यह संबंध स्वीकृति पर आधारित है, भय पर नहीं। कविता यहाँ सत्ता को नैतिक अनुबंध में बदल देती है।
काव्य-शिल्प की दृष्टि से यह पद अत्यंत संगठित है। हर रूपक एक ही विचार को अलग-अलग स्तरों पर खोलता है—सुगंध, दृष्टि, प्रकाश, सौंदर्य और नैतिकता। यह क्रम आकस्मिक नहीं है। यह पाठक को इंद्रिय अनुभव से उठाकर नैतिक चेतना तक ले जाता है।
यह पद भाषा की सादगी में गहरी संरचना रचता है। इसमें कोई अनावश्यक अलंकार नहीं, कोई दार्शनिक शब्दावली नहीं फिर भी कविता विचार से परिपूर्ण है। इसका सौंदर्य कथन में नहीं, संबंध की रचना में है।
समग्र रूप से यह पद उस कविता का उदाहरण है, जहाँ भक्ति आत्म-निषेध नहीं बल्कि आत्म-संवाद बन जाती है। यहाँ ईश्वर कोई दूरस्थ सत्ता नहीं बल्कि अर्थ-निर्माण की प्रक्रिया में सहभागी है। यही कारण है कि यह पद केवल धार्मिक पाठ नहीं रहता—वह संबंधों, पहचान और गरिमा की एक गहन काव्यात्मक व्याख्या बन जाता है।
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