— रणधीर गौतम —
प्रोफेसर André Béteille से मेरी पहली मुलाकात उस समय हुई, जब मैं पटना विश्वविद्यालय का विद्यार्थी था। ए. एन. सिन्हा इंस्टिट्यूट में एक सेमिनार आयोजित किया गया था, जिसका शीर्षक था “Sociological Reasoning”। जैसा कि शुरू से मेरी आदत रही है, जैसे ही सेमिनार में श्रोताओं से प्रश्न पूछने के लिए कहा गया, मैंने दो सवाल पूछे।
सेमिनार समाप्त होने के बाद प्रोफेसर André Béteille ने मुझे व्यक्तिगत रूप से मिलने का अवसर दिया। मैंने उनसे अपना पहला ही सवाल यह पूछा कि एक स्नातक विद्यार्थी होने के नाते वे किन पुस्तकों को पढ़ने का सुझाव देंगे। उन्होंने चार पुस्तकों के नाम बताए, जिनमें से एक लखनऊ स्कूल के समाजशास्त्री मजूमदार द्वारा लिखित “Grammar of Sociology” भी थी।
वह मुलाकात मेरे मन पर हमेशा के लिए एक समाजशास्त्री होने का गौरव अंकित कर गई। मुझे यह देखकर हैरानी हुई कि इतना बड़ा कद और इतना ‘स्टारडम’ रखने वाला व्यक्ति कितनी सहजता और सरलता से पीठ पर हाथ रखते हुए एक युवक की जिज्ञासा का समाधान कर रहा था।
प्रोफेसर André Béteille के नाम पर हमारी संस्था Vishwaneedam center for Asian Blossoming ने एक मेमोरियल लेक्चर का आयोजन भी किया था। इस श्रृंखला के अंतर्गत दो मेमोरियल लेक्चर आयोजित किए गए, जिनमें प्रोफेसर अभिजीत दासगुप्ता और प्रोफेसर सुरेंद्र मुशी के उद्बोधन अत्यंत महत्वपूर्ण रहे।
आज यह देखने को मिलता है कि अधिकांश संस्थाएँ अपनी बौद्धिक विरासत को भूलती जा रही हैं। विरासत-बोध के अभाव में कई बार वे पूरी भारतीय समाजशास्त्रीय परंपरा पर ही सवाल खड़े कर देती हैं—यह कहकर कि वह पश्चिमी, यूरोप-केंद्रित या औपनिवेशिक है।
लेकिन वे यह नहीं सोचते कि लगभग दो सौ वर्षों की गुलामी के बाद भी, जब पूरी दुनिया आज तक एक यूरोप-केंद्रित ज्ञान-प्रणाली में फँसी हुई है, तब André Béteille जैसे विद्वानों ने न केवल भारतीय समाजशास्त्र को, बल्कि वैश्विक समाजशास्त्र को भी भारतीय समाजशास्त्रीय विमर्श के माध्यम से एक महत्वपूर्ण अवदान दिया है। मेरे विचार में उनका सबसे महत्वपूर्ण योगदान “पावर के विमर्श” को समाजशास्त्रीय विमर्श में सुसंगतता के साथ प्रस्तुत करना है। शक्ति-विमर्श (power discourse) के बिना भारतीय समाज में असमानता को समझना लगभग असंभव है।
प्रोफेसर André Béteille ने Social Anthropology की मेथडोलॉजी और डिस्कोर्स को गति देने के साथ-साथ समाजशास्त्र और Anthropology के बीच की द्वैतता (dichotomy) को कम करने का भी प्रयास किया।
वे रवींद्रनाथ टैगोर की शांतिनिकेतन परंपरा से उपजी एन. के. बोस की ज्ञान-परंपरा से स्वयं को जोड़ते थे। उनका मानना था कि ज्ञान का स्वरूप कॉस्मोपॉलिटन होना चाहिए और सर्वकल्याण के मार्ग से ही विश्व समाधान की दिशा में आगे बढ़ सकता है। एम. एन. श्रीनिवास के साथ समाजशास्त्र पढ़ाते हुए, स्ट्रक्चरल फ़ंक्शनलिस्ट शोध-परंपरा से जुड़े होने के बावजूद, वे हमेशा एक लिबरल इंटेलेक्चुअल बने रहे। साथ ही, भारतीय समाज की विविधता, स्वदेशी (indigenous) सांस्कृतिक तत्वों और ग्रामीण सामाजिक गतिशीलताओं को उन्होंने अपनी थ्योराइजेशन की प्रक्रिया में सदैव महत्वपूर्ण स्थान दिया।
इसके अतिरिक्त, एक पब्लिक इंटेलेक्चुअल के रूप में उन्होंने अनेक बौद्धिक विमर्शों को समाजशास्त्रीय रूप प्रदान किया। एक समाजशास्त्री को किस प्रकार समाज-विज्ञान की विभिन्न संकायों से सीखने और स्वयं को निरंतर परिष्कृत करने का अवसर मिलता है—प्रोफेसर André Béteille की साधना हमें उसी दिशा की ओर संकेत करती है।
उनकी प्रमुख कृतियाँ— Caste, Class and Power (1964), Inequality among Men (1977), The Idea of Natural Inequality and Other Essays (1983), Essays in Comparative Sociology (1988), Society and Politics in India: Essays in a Comparative Perspective (1988), Chronicles of Our Times (2000), Antinomies of Society: Essays on Ideologies and Institutions (2002), Marxism and Class Analysis (2007), Universities at the Crossroads (2010) तथा Sunlight on the Garden: A Story of Childhood and Youth (2012)—हमें समाजशास्त्र में स्वीकृत अवधारणाओं, पद्धतियों और बौद्धिक रूढ़ियों पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित करती हैं। ये रचनाएँ वर्ग, असमानता, जाति और समाज से संबंधित हमारी स्थापित समझ को नए सिरे से सोचने की चुनौती और आह्वान करती हैं।
ऐसे समाजशास्त्र के साधक ने अपनी साधना के माध्यम से न केवल सामाजिक विज्ञान को एक महत्वपूर्ण योगदान दिया, बल्कि समाजशास्त्र को भी एक सशक्त और समृद्ध ज्ञान-परंपरा के रूप में पल्लवित और पुष्पित किया।
उनकी बौद्धिक साधना के लिए हम सभी सदैव उनके ऋणी रहेंगे।
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