
तेहरान की एक न्यूज़ एजेंसी की खबर है कि ईरान में रविवार को नोबेल शांति पुरस्कार विजेता नरगिस मोहम्मदी को छह साल की सजा सुनाई गई। उनके वकील ने सजा की पुष्टि की है। मोहम्मदी को अपराध के लिए एकत्र होने और साजिश रचने का दोषी पाया गया। उनके देश छोड़ने पर भी दो साल का प्रतिबंध लगा दिया गया है।
ईरान में नोबेल शांति पुरस्कार विजेता नरगिस मोहम्मदी को छह साल की सजा सुनाए जाने की घटना केवल एक व्यक्ति के दंड तक सीमित नहीं है; यह समकालीन विश्व में सत्ता, असहमति, स्त्री-स्वर और मानवाधिकारों के बीच चल रहे गहरे टकराव का प्रतीक बन जाती है।
यह फैसला उस राजनीतिक-सांस्कृतिक संरचना को उजागर करता है, जिसमें राज्य स्वयं को नैतिकता, धर्म और सुरक्षा का एकमात्र संरक्षक घोषित कर देता है और नागरिक स्वतंत्रता को संदिग्ध गतिविधि के रूप में चिह्नित करता है। जब किसी समाज में शांति, अधिकार और न्याय की मांग ‘साजिश’ कहलाने लगे, तब प्रश्न केवल कानून का नहीं, बल्कि सत्ता की आत्मा का हो जाता है।
नरगिस मोहम्मदी का जीवन और संघर्ष इस संदर्भ में विशेष महत्व रखता है। वे केवल एक कार्यकर्ता नहीं हैं; वे ईरान की उस वैचारिक परंपरा का प्रतिनिधित्व करती हैं, जिसमें इस्लामी गणराज्य के भीतर रहते हुए भी लोकतांत्रिक मूल्यों, स्त्री-अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की मांग की जाती रही है।
वर्षों से वे मृत्युदंड के विरोध, कारागारों में महिलाओं के साथ होने वाले अत्याचार और नागरिक स्वतंत्रताओं के हनन पर मुखर रही हैं। उनका लेखन, उनके वक्तव्य और उनका सक्रिय हस्तक्षेप सत्ता के लिए इसलिए असुविधाजनक नहीं है कि वे हिंसक हैं, बल्कि इसलिए कि वे नैतिक रूप से सशक्त हैं। सत्ता को सबसे अधिक भय उसी आवाज़ से होता है, जो तर्क, नैतिकता और अंतरराष्ट्रीय समर्थन से लैस हो।
नोबेल शांति पुरस्कार स्वयं में केवल एक सम्मान नहीं, बल्कि एक नैतिक हस्तक्षेप है। यह पुरस्कार किसी व्यक्ति को वैश्विक अंतरात्मा के केंद्र में ला खड़ा करता है।
जब किसी देश की सरकार ऐसे व्यक्ति को दंडित करती है तो वह अनजाने में ही अपने राजनीतिक चरित्र को अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के कटघरे में प्रस्तुत कर देती है। ईरान द्वारा नरगिस मोहम्मदी को सजा दिया जाना इस अर्थ में एक द्वंद्व रचता है—एक ओर वैश्विक समुदाय उन्हें शांति और मानवाधिकारों की प्रतीक मानता है, दूसरी ओर राज्य उन्हें ‘साजिशकर्ता’ घोषित करता है। यह द्वंद्व बताता है कि सत्य और सत्ता के बीच की दूरी कितनी भयावह हो चुकी है।
‘अपराध के लिए एकत्र होना और साजिश रचना’—यह आरोप अपने आप में एक आधुनिक सत्तावादी भाषा का उदाहरण है। यह भाषा अस्पष्ट होती है, ताकि उसका उपयोग किसी भी असहमति के विरुद्ध किया जा सके। इसमें न तो अपराध की स्पष्ट परिभाषा होती है, न ही साजिश के ठोस प्रमाण सार्वजनिक किए जाते हैं। इस तरह के आरोप दरअसल कानून की नहीं, बल्कि भय की भाषा में लिखे जाते हैं। यह वह भाषा है, जिसमें नागरिकों को बताया जाता है कि विचार भी अपराध हो सकते हैं और एकत्र होना भी। समाज को व्यक्तियों में तोड़ा जाता है, ताकि सामूहिकता स्वयं एक अपराध बन जाए।
नरगिस मोहम्मदी पर देश छोड़ने का दो साल का प्रतिबंध भी इसी भय-राजनीति का हिस्सा है। यह प्रतिबंध केवल भौगोलिक नहीं है; यह विचारों के प्रवाह पर अंकुश लगाने का प्रयास है। सत्ता जानती है कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उनकी उपस्थिति ईरान के भीतर हो रहे दमन को उजागर कर सकती है। इसलिए कारावास के साथ-साथ निर्वासन का यह उल्टा रूप—जहाँ व्यक्ति को देश में रहते हुए भी वैश्विक संवाद से काट दिया जाता है—एक नई किस्म की राजनीतिक सजा है। यह शरीर को नहीं, बल्कि आवाज़ को कैद करने की कोशिश है।
इस घटना को ईरान की हालिया सामाजिक उथल-पुथल से अलग करके नहीं देखा जा सकता। महसा अमीनी की मृत्यु के बाद उठे व्यापक विरोध प्रदर्शनों ने ईरानी समाज में गहरे असंतोष को उजागर किया है, विशेषकर महिलाओं और युवाओं के बीच। नरगिस मोहम्मदी का संघर्ष इसी असंतोष की वैचारिक अभिव्यक्ति है। वे सड़कों पर नारे लगाने से अधिक खतरनाक इसलिए हैं, क्योंकि वे उस असंतोष को भाषा देती हैं, तर्क देती हैं और नैतिक आधार प्रदान करती हैं। सत्ता अक्सर हिंसक विद्रोह से उतनी नहीं डरती, जितनी संगठित, शांत और नैतिक असहमति से।
स्त्री होने के नाते नरगिस मोहम्मदी की सजा का प्रतीकात्मक अर्थ और भी गहरा है। ईरान जैसे समाज में, जहाँ स्त्री-शरीर और स्त्री-आचरण पर राज्य और धर्म दोनों का कठोर नियंत्रण रहा है, वहाँ एक स्त्री का स्वतंत्र राजनीतिक स्वर स्वयं में चुनौती बन जाता है। यह सजा केवल एक कार्यकर्ता को नहीं, बल्कि उस संभावना को दंडित करती है कि स्त्रियाँ सार्वजनिक नैतिकता और राजनीति की परिभाषा बदल सकती हैं। यह सत्ता का वह भय है, जिसमें स्त्री की स्वतंत्रता सामाजिक व्यवस्था के विघटन के रूप में देखी जाती है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह फैसला ईरान की छवि को और जटिल बनाता है। एक ओर ईरान स्वयं को पश्चिमी प्रभुत्व के विरुद्ध खड़े एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत करता है, दूसरी ओर वह उसी पश्चिम द्वारा सम्मानित एक मानवाधिकार कार्यकर्ता को कारावास में डाल देता है। इससे यह प्रश्न उठता है कि संप्रभुता की आड़ में क्या नागरिकों के मौलिक अधिकारों को कुचला जा सकता है। वैश्विक राजनीति में यह तनाव नया नहीं है, लेकिन नरगिस मोहम्मदी का मामला इसे अत्यंत स्पष्ट रूप में सामने लाता है।
यह भी विचारणीय है कि ऐसी सजाएँ वास्तव में सत्ता को कितना सुरक्षित करती हैं। इतिहास बताता है कि विचारों को कैद नहीं किया जा सकता। जेलें शरीर को थाम सकती हैं, परंतु प्रतीकों को नहीं। नोबेल पुरस्कार के बाद नरगिस मोहम्मदी अब केवल ईरान की कार्यकर्ता नहीं रहीं; वे वैश्विक मानवाधिकार विमर्श का हिस्सा बन चुकी हैं। उनकी सजा उन्हें चुप कराने के बजाय, उनके संघर्ष को और अधिक दृश्यमान बनाती है। सत्ता का यह विरोधाभास है कि दमन अक्सर उसी आवाज़ को अमर कर देता है, जिसे वह मिटाना चाहता है।
इस पूरे प्रकरण में कानून की भूमिका पर भी गंभीर प्रश्न उठते हैं। जब न्यायालय सत्ता के नैतिक औजार में बदल जाएँ, तब कानून अपनी आत्मा खो देता है। ऐसे मामलों में न्याय प्रक्रिया केवल औपचारिकता बन जाती है, और फैसला पहले ही राजनीतिक रूप से तय होता है। यह स्थिति किसी भी समाज के लिए घातक है, क्योंकि इससे नागरिकों का न्याय व्यवस्था पर विश्वास टूटता है। जब न्याय भय पैदा करने लगे, तब समाज चुप तो हो सकता है, पर स्थिर नहीं रह सकता।
नरगिस मोहम्मदी की सजा हमें यह सोचने पर विवश करती है कि शांति का अर्थ क्या है। शांति केवल युद्ध का अभाव नहीं, बल्कि न्याय की उपस्थिति है। जब शांति की बात करने वाले को ही अपराधी ठहराया जाए, तब शांति स्वयं संदिग्ध हो जाती है। नोबेल शांति पुरस्कार का नैतिक संदेश यही है कि असहमति, संवाद और अधिकारों की मांग शांति की शर्तें हैं, न कि उसके विरुद्ध षड्यंत्र। अंततः यह मामला केवल ईरान का आंतरिक प्रश्न नहीं रह जाता। यह वैश्विक नागरिकता, मानवाधिकारों की सार्वभौमिकता और स्त्री-स्वर की राजनीतिक वैधता का प्रश्न बन जाता है।
नरगिस मोहम्मदी की सजा एक चेतावनी है कि आज भी दुनिया के कई हिस्सों में सत्ता असहमति से डरती है और उसे अपराध घोषित करने से नहीं हिचकती। लेकिन यह भी एक संकेत है कि नैतिक साहस, चाहे जेल की दीवारों के भीतर ही क्यों न हो, इतिहास की दिशा को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। सत्ता क्षणिक हो सकती है, पर न्याय की स्मृति दीर्घकालिक होती
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