श्री राममनोहर लोहिया जी से परिचय हो रहा है! – आचार्य राघवेंद्र दास

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Acharya Raghavendra Das

नारी स्वतंत्रता और समानता की जितनी जानदार कविता मैंने तुलसी की पढ़ी और सुनी उतनी और कहीं नहीं, कम से कम इससे ज़्यादा जानदार कहीं नहीं। अफ़सोस यह है कि नारी-हीनता वाली कविता तो हिंदू हिंदू नर के मुँह पर चढ़ी रहती है लेकिन नारी-सम्मान वाली कविता को वह भुलाए रहता है। मामला यहाँ तक बढ़ गया है कि अगर कुछ दिन पहले रामस्वरूप वर्मा ने मुझे याद न दिलाया होता तो मैं भी भूल गया था कि पराधीन सपनेहु सुख नाहीं’ का सबंध नारी से है। जब पार्वती का विवाह, तब उनकी माँ मैना विदाई के मौके पर दुःखी होकर और समझाने-बुझाने पर संताप की वह बेजोड़ बात कहती हैं, जो सारे संसार की नारी-हृदय की चीख है। “ कत विधि सृजी नारि जग माहिं। पराधीन सपनेहुँ सुखु नाहीं।” हिंदू नर इतना नीच हो गया है कि पहले तो चौपाई के पूर्वार्द्ध को भुला देने की कोशिश की और फिर, कहीं-कहीं, उसने इसका नया पूर्वार्द्ध ही गढ़ डाला।
“ कर विचार देखहु मन माहीं”। ग़ज़ब हैं तुलसी। क्या ममता, क्या नारी-हृदय की चीख, क्या नर-नारी आदर्श जीवन की सूचना। आख़िर उसने संसार को किस रूप में जाना है, “ सियाराम मय सब जग जानी”।

— श्री राममनोहर लोहिया जी के रामायण और रामायण मेला: कुछ विचार (१९६१, मार्च) आलेख से

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उक्त विचार समाजवादी पुरोधा के हैं, उन्होंने जिया, हल्ला कम मचाया। पिछले वर्षों से बिहार और उत्तरप्रदेश में समाजवाद के लिए घोषित पार्टियों के नेताओं ने जो बयानबाज़ी कर एक अलग बहस छेड़ दी थी उन्हें अपने ही आर्ष पुरुष को पढ़ना चाहिए था। लोहिया जी एक स्थान पर कहते हैं (रामायण मेला: तात्पर्य और काम; १९६०) – तुलसी के रामायण में आनंद के साथ- साथ धर्म भी जुड़ा हुआ है। धर्म शाश्वत मानी में और वक़्ती भी। तुलसी की कविता से निकली हैं अनगिनत रोज़ की उक्तियाँ और कहावतें, जो आदमी को टिकाती हैं और सीधे रखती हैं। साथ ही, ऐसी भी कविता है जो एक बहुत है जो एक बहुत ही क्रूर अथवा क्षण-भंगुर धर्म के साथ जुड़ी हुई है, जैसे शूद्र या नारी की निंदा और गऊ, विप्र की पूजा। मोती को चुनने के लिए कूड़ा निगलना जरूरी नहीं है, न ही कूड़ा साफ़ करते वक़्त मोती को फेंकना।

आज अपने जड़ से दूर समाजवाद के नाम पर कॉर्पोरेटवाद वाले दलों ने भारत-भारतीयता को अनदेखा या केवल भर्त्सना की दृष्टि के कारण एक अजीब स्थिति उत्पन्न कर दी है। राष्ट्रवाद के दुहाई देने वाले दलों की स्थिति तो बस भाषण और तस्वीरों तक में ही सीमित दिखता है। उनकी भारतमाता दैवीय हैं। उनका धर्म से संबध केवल लेने के लिए है कुछ देने को नहीं। बक़ौल लोहिया जी- “धर्म को दीर्घकालिक राजनीति और राजनीति को अल्पकालिक धर्म माना जाए। दोनों के बीच का रिश्ता अन्वेषण-योग्य है। धर्म मुख्यतः अच्छाई करता है और अच्छाई की स्तुति, जबकि राजनीति मुख्यतः बुराई से लड़ती है और बुराई की निंदा करती है। सिर्फ़ अच्छाई की स्मृति में धर्म निर्जीव हो जाता है और ऐसे ही सिर्फ़ बुराई से लड़ने से राजनीति कलही हो जाती है।”

धर्म को जो राजनीति को देना चाहिए था उसने नहीं दिया और उसने अपने चारणों को धर्मसंस्थाओं में बिठा दिया, परिणामत: को धर्म जहाँ कारुणिक होना चाहिए था रुग्ण होता चला गया और धर्मगुरुओं की भाषा राजनेताओं से भी बदतर होती चली जा रही।केवल घृणा, वैमनस्यता और हिंसा की भावना को बढ़ावा देना।

ITM-University ने यह शानदार पुस्तिका प्रकाशित की है, ज़रूर पढ़ें और समझे कि श्री लोहिया अपने समय के सबसे बड़े नेता थे, अर्थवत्ता किसी के बाहरी पूज्यता-अपूज्यता या जीत-हार से नहीं बल्कि उसकी दृष्टि और लोकमंगल की अभीष्टता से सिद्ध होती है।


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