
महापंडित राहुल सांस्कृत्यायन भारतीय वाङ्मय के ऐसे पुरोधा हैं जो अपने सूक्ष्म एवं चिन्तकवृत्ति से हमें प्राचीन के प्रति आस्था, इतिहास के प्रति गौरव और वर्तमान के प्रति सधी हुई दृष्टि से परिचित कराते हैं। वे जितने बड़े साहित्यकार, भाषाविद्, पुरातत्वविद् और इतिहासकार रहे हैं, उससे अधिक वे सच्चे अर्थों में जनपक्षधर चिन्तक और मानवतावादी लेखक रहे हैं। उनकी सत्यान्वेषीवृत्ति हमें इतिहास को पुन: समझने व परखने के लिए एक नई दृष्टि प्रदान करती है। मानव सभ्यता के क्रमिक विकास के अध्ययन की कड़ी में जहाँ हमें वे तात्कालीन सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक परिवेशों से परिचित कराते हैं, वहीं रूढ़ियों, धार्मिक मिथ्याचार, वर्ण व जाति सम्बन्धी तमाम मिथ्या भ्रांतियों का निर्ममतापूर्वक पर्दाफाश भी करते हैं। इतिहास बोध की इस प्रक्रिया में वे इलियट की इस आवधारणा से सहमत दिखाई देते हैं –
“The historical sense involves a perception, not only of the pastness of the past, but of its presence.” (इतिहास बोध का अर्थ अतीत के अतीतत्व का ही नहीं अपितु वर्तमानत्व का भी अध्ययन है।)
राहुल जी की विचारधारा को समझने के लिए हमें उनके जीवनयात्रा के विभिन्न सोपानों को भी जानना होगा। राहुल जी की जीवनयात्रा, उनकी वैचारिक यात्रा है। उनके विचारधारा के निर्माण में उनकी यायावरीवृत्ति का भी काफी योगदान रहा है। सन् १९०७ से १९१२ तक वे विभिन्न साधु-सन्यासियों के सम्पर्क में रहे जिसके कारण उन पर अध्यात्म का गहरा असर पड़ा। इसी दौरान उनकी भेंट परसामठ (छपरा) के महन्त से हुई तथा बाद में उसी मठ के महन्त बने। वर्ष १९१५-१९१६ के बीच वे आर्यसमाज के प्रभाव में आए तथा इसके बाद लाहौर प्रवास के दौरान वे बौद्ध धर्म के अध्येता तथा अनुयाई बने। सन् १९१७ के रूसी क्रांति का राहुल जी पर गहरा असर पड़ा, इसी समय १९१९ में प्रेमचन्द्र ने भी ‘पुराना जमाना, नया जमाना’ नामक लेख लिखकर सुदूर पश्चिम के इस क्रान्ति का स्वागत किया।
इस प्रकार वे शैव, वैष्णव, आर्यसमाजी, बौद्ध व मार्क्सवादी विचारधारा के पोषक बने। बाइसवीं सदी (१९२३) उनकी प्रकाशित कृति, साम्यवादी विचारधारा पर आधारित रचना है, जिसमें दो सौ वर्ष बाद के भारतीय समाज की परिकल्पना की गई है।
राहुल जी कलम के साथ-साथ स्वाधीनता आंदोलन में भी भाग लेते रहे। वे क्रान्तिकारी किसान नेता के रूप में कई बार जेल भी गए। शोषितों के प्रति उनका यह तीव्र लगाव ही उन्हें बौद्ध-दर्शन के करीब ले गया। छपरा कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में उन्होंने समस्त बौद्ध मंदिरों को बौद्धों को सौपने का एक प्रस्ताव भी पास किया था। राहुल जी वास्तव में समाज के यथास्थितवाद के सख्त खिलाफ थे। उनकी राजनीतिक विचारधारा में यह बदलाव उनके व्यक्तित्व के अनुरूप ही था। बौद्ध धर्म के प्रति उनकी आस्था बनी रही क्योंकि यह धर्म परिवर्तन की निरन्तरता में विश्वास
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रखता है और स्थिर नहीं गतिमान और वर्धमान रहा है। वेदान्त और वैराग्य ने उनके जीवन में जो विद्रोही प्रवृत्तियों को जन्म दिया, उसे बौद्ध धर्म ने एक सुदृढ़ वैचारिक अवलम्ब प्रदान किया। इसीलिए वे लंका प्रवास के दौरान इस धर्म से दीक्षित हो गए। उन्होंने महसूस किया कि मार्क्सवाद को समझने के लिए बौद्ध दर्शन एक सीढ़ी है, उन्हें बुद्ध और मार्क्स में अद्भुत साम्य दिखाई दिया। राहुल जी के ही शब्दों में “आर्थिक और सामाजिक साम्यवाद, अहिंसा और शान्ति का आदर्श, वस्तु की अधिकता का सिद्धान्त, अनात्मवाद और अनीश्वरवाद, कार्य के प्रति कारण सामग्री का सिद्धान्त, वस्तुवाद और जनतंत्र के प्रति दोनों में अद्भुत साम्य हैं। (राहुल स्मृति)
व्यक्तिगत सम्पत्ति और भोगवाद की बुराइयों को समझकर बुद्ध ने साम्यवाद कबूल किया लेकिन बुद्ध का साम्यवाद पूरे समाज पर लागू नहीं होता था। उनका साम्यवाद केवल भिक्षु संघ पर आधारित था, इसलिए वह समाज में किसी तरह के क्रांतिकारी परिवर्तन के लिए सक्षम नहीं था। बुद्ध के प्रतीत्य समुत्यवाद में ईश्वर के लिए कोई स्थान नहीं था, क्योंकि इसमें भौतिकवाद तक पहुँचने की संभावना थी। बुद्ध भौतिकवाद को भी आत्मवाद की तरह अपना विरोधी समझते थे। दुःखों से उबरने के लिए उन्होंने ब्रह्मचर्य और इच्छाओं के दमन का रास्ता बताया। राहुल जी इस प्रसंग में भौतिकवाद का पक्ष लेते है वे कहते है, “आदमी ब्रह्मचर्य तब तक करता है जबकि इस जीवन के बाद भी उसे फल पाने या काम करने का अवसर मिलने वाला हो, भौतिकवादी के लिए ब्रह्मचर्य व्यर्थ है। (दर्शन दिग्दर्शन, पृष्ठ ५२२)। बुद्ध ने तमाम शोषितों को भी प्रवज्या देने से इंकार कर दिया। उन्होंने ऋणियों, दासों एवं और सैनिकों को भी प्रवज्या देने से मना कर दिया था। राहुल जी कहते हैं, “बुद्ध का दर्शन क्षणिकवादी है, किसी भी वस्तु को एक क्षण से ज्यादा ठहरने वाला नहीं मानते, किन्तु इस दृष्टि को आर्थिक व्यवस्था पर लागू नहीं करना चाहा। सम्पत्तिशाली शासक वर्ग से इस प्रकार शांति स्थापित कर लेने से उनके जैसे प्रतिभाशाली दार्शनिक का ऊपरी तबके में सम्मान बढ़ना लाजिमी था। राजा लोग उनके आवभगत को उतावले दिखाई देते थे।” (दर्शन दिग्दर्शन, पृष्ठ ५११-५१२)
इस प्रकार हम देखते हैं कि बौद्ध धर्म के प्रति उनके अन्दर एक वैचारिक अन्तर्विरोध भी दृष्टिगत होता है। अपनी खुली दृष्टि सम्पन्नता के कारण वे बुद्ध के विचारों से आगे बढ़ते दिखाई देते है। वास्तव में बौद्ध-दर्शन उनके साम्यवादी विचारधारा तक पहुँचने के क्रम में एक सोपान ही है, अन्तिम पड़ाव नहीं। मेहनतकश, शोषित जनता के मुक्ति के मार्ग में, मार्क्सवाद ही उनके विचारों के अनुरूप था।
भारतीय राजनीति के इसी बिन्दु पर भगत सिंह आदि क्रान्तिकारियों ने वैज्ञानिक समाजवाद को अपना लक्ष्य घोषित किया। इसी दौरान आजादी के तमाम क्रांतिकारी नौजवानों का झुकाव मार्क्सवाद की तरफ हो रहा था। इन्हीं परिस्थितियों में राहुल जी ने १९३१ में आचार्य नरेन्द्र देव के साथ मिलकर कम्युनिस्ट घोषणा-पत्र का हिन्दी अनुवाद किया तथा इसे प्रकाशित करने के लिए प्रेमचन्द्र के पास ले गए। १९३४ में राहुल जी ने ‘साम्यवाद ही क्यों’ की रचना की, इसी समय जयप्रकाश नारायण की पुस्तक ‘समाजवाद क्यों’ (Why Socialism) भी प्रकाशित हुई।
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‘साम्यवाद ही क्यों’ में राहुल जी पूँजीवाद का आरम्भ आपकी भौतिक शक्तियों द्वारा मशीनों के आविष्कार के साथ मानते है। वे कहते है, “पूँजीवाद का भयंकर परिणाम व्यक्तियों को घोर दरिद्रता में रखना है और साम्यवाद इस दरिद्रता का अंत कर सकता है, क्योंकि वही सदुपयोग के साथ सभी लोगों को काम दे सकता है।” (पृष्ठ २७, साम्यवाद ही क्यों )
राहुल जी जाति-पाँति को हमारे देश के विकास में सबसे बड़ा बाधक मानते थे, “वे कहते हैं कि हर एक विचारशील व्यक्ति जानता है कि उसके देश को पतित व पददलित करने में सबसे प्रधान कारण जाति प्रथा की बुरी प्रथा है।” (पृष्ठ २९, साम्यवाद ही क्यों )
राहुल जी हमेशा मनुष्य की जागृति बुद्धि (तर्क) की महत्ता पर जोर देते थे नकल का विरोध करते थे। ‘वोल्गा से गंगा’ में धर्मकीर्ति कहता है, “बुद्धि के भी ऊपर पोथी को रखना, संसार का कर्ता ईश्वर को मानना, स्नान करने की धर्म होने की इच्छा, जन्म-जाति का अभिमान, पापनाश के लिए शरीर को संतप्त करना – अक्ल मारे हुओं की जड़ता के ये पाँच लक्षण हैं। राहुल जी भारत के पिछड़ेपन के लिए उसकी दासता को जिम्मेदार ठहराते है। ‘दिमागी गुलामी’ में वे गाँधीवाद, हिन्दू-मुस्लिम समस्या, शिक्षा के आमूल परिवर्तन, अछूतों को क्या चाहिए आदि विषयों पर विचार व्यक्त करते है।
गाँधीवाद का योगदान वे भारतीय जनता तक क्रांति के संदेश को पहुँचाने में मानते हैं। वे कहते हैं- “गाँधीवाद ने भारतीय इतिहास में सबसे महत्व की जो बात की वह है साधारण जनता तक क्रांति के संदेश को पहुँचाना और उसके लिए स्वार्थ त्याग का भाव उत्पन्न करना —– उसके साथ ही उसने राष्ट्र का सबसे बड़ा अपकार भी किया है और वह है, हमारी पुरानी बेवकूफियों के प्रति गाढ़ी श्रद्धा पैदा कर देना”। (पृष्ठ १२, दिमागी गुलामी)
गाँधी को पूँजीपतियों का एजेन्ट कहने वाले राहुल जी जीवन के अन्तिम क्षणों में गाँधी जी को एक महान आत्मा मानते थे और उन्हें बुद्ध के समान वन्दनीय भी। वियोगी हरि से एक वार्तालाप में राहुल जी कहते हैं,
“त्रिवेणी में गाँधी का अस्थिकलश विसर्जित करने के लिए जा रहा था। मैं वही पर खड़ा होकर सिगरेट पी रहा था, मैंने तत्काल सिगरेट फेंक दी और अनुभव किया कि इस महान आत्मा के प्रति मैंने हमेशा नाइन्साफी की, वह बोधिसत्व व वन्दनीय था। तब से आज तक मैंने सिगरेट हाथ नहीं लगाया।” (पृष्ठ ९, राहुल स्मृति)
राहुल जी समतामूलक समाज की स्थापना के लिए कटिबद्ध थे, वे कहते हैं, “जोंकों का राज्य खत्म करना होगा। जोंक का जीव बड़ा कड़ा होता है, उनको जब तक गतर-गतर काटकर चीथकर न फेंका जाय मरते नहीं हैं।” (पृष्ठ ४६, “भागों नहीं दुनिया बदलो”)
राहुल जी शिक्षा में आमूल परिवर्तन के हिमायती थे। वे विज्ञान, साहित्य व इतिहास की शिक्षा के साथ शारीरिक शिक्षा पर बल देते थे, उनकी यह अवधारणा प्लेटो की शिक्षा प्रणाली पर आधारित है जो कि सोवियत संघ में लागू थी।
वे समतामूलक वर्गहीन समाज की स्थापना के लिए प्रतिबद्ध थे। वे कहते हैं, “हमें मानसिक दासता की एक-एक बेड़ी को बेदर्दी के साथ फेंकने के लिए तैयार रहना चाहिए और इसके लिए नए सिरे से नए महल बनाने के लिए नींव डालनी पड़ेगी। (पृष्ठ 10, दिमागी गुलामी)
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प्रगति जिसकी भी प्रकृति बन गई, वह स्वयं अपनी सीमाओं का निर्धारण कर सकता है, उसकी सीमा अगर कोई हो तो यही कि- स्वतंत्रता का नहीं परतंत्रता का शत्रु है। कलाकार की कृतियाँ प्रतिगामी शक्तियों की सहायक न बनें, उनके शोषण और उत्पीड़न का हथियार न बनें।” (साहित्य निबंधावली, पृष्ठ ११५)
राहुल जी हिन्दी के प्रबल समर्थक थे, हिन्दी के प्रबल समर्थक होने के कारण उन्हें उर्दू का विरोधी मान लिया गया तथा अपनी पार्टी के कोपभाजन का शिकार बनना पड़ा और अन्तत: १९५१ में पार्टी से भी अलग होना पड़ा। राहुल जी हिन्दी के साथ-साथ मातृभाषा को भी बढ़ावा देने के पक्षधर थे। वे मानते थे कि मातृभाषा में शिक्षा देने से अशिक्षा की समस्या अपने आप समाप्त हो जाएगी।
नारियों के प्रति होने वाले अत्याचारों के समाप्ति के लिए वे पूर्णतया कटिबद्ध थे। वे मानते थे कि औरत और मर्द एक गाड़ी के दो पहिए हैं। एक-दूसरे के बिना गाड़ी चल ही नहीं सकती है।
वे साम्यवाद का सच्चा अनुयाई श्रमिक वर्ग को ही मानते थे। वे कहते हैं, “बुद्धिजीवी एक समय सच्चे भाव के साथ आते हैं और कितने हमेशा के लिए रह जाते हैं। साथ ही साम्यवाद को उनकी सेवा अनमोल है। तो भी समय-समय पर किए गए विश्वासघातों से उनको आन्दोलन का मुख्य आधार न बनाना अच्छा है। इसका असली आधार श्रमिक वर्ग ही हो सकता है”। (पृष्ठ ५४, साम्यवाद ही क्यों)
राहुल जी का सम्पूर्ण व्यक्तित्व व विचारधारा अनेक अन्तर्विरोधों एवं विरोधाभासों से भरा है। ये विरोधाभास हमें कदम-कदम पर दृष्टिगत होता है। वे बौद्ध धर्म के प्रति अत्यधिक आग्रह रखने के कारण अन्य बौद्धेतर धर्मो के प्रति पूरी तरह न्याय नहीं कर पाए हैं। वेदों के आडम्बरों एवं ब्राह्मणों के पाखण्ड का तीव्र प्रतिवाद करने वाले राहुल ऋग्वेद की परम्परा को आधुनिक ज्ञान से जोड़ने की बात भी करते हैं।
कुछ मार्क्सवादी आलोचकों का मत है कि उनकी ऐतिहासिक कृतियां (विशेषकर “सिंह सेनापति” एवं “जय यौधेय”) में उनकी इतिहास दृष्टि मार्क्सवाद विरोधी है। डॉ. रामकृपाल पाण्डेय (मार्क्सवादी आलोचक) कहते हैं, “राहुल जी गणतंत्र के पक्ष का समर्थन करते हैं लेकिन ध्यातव्य है कि उत्पादन व्यवस्था के साथ गणों का विनाश अवश्यसंभावी है और गणों के विनाश के साथ गणतंत्र का विनाश होने लगता है। इसलिए गणतंत्र की श्रेष्ठता का राग अलापना, मार्क्सवाद विरोधी इतिहास दृष्टि है”। (साम्य २१) (११-१२ नवम्बर दिल्ली अधिवेशन प्रगतिशील लेखक संघ)
इस प्रकार हम देखते है कि उनके विचारों में भले ही कहीं थोड़ा अन्तर्विरोध हो, लेकिन वे पूर्णतया एक प्रतिबद्ध मार्क्सवादी विचारक थे। वे शोषणमुक्त, वर्गविहीन व समतावादी समाज की रचना में इसी विचारधारा को सक्षम मानते थे। वे कहते थे कि अगर आज बुद्ध जीवित होते, तो वे मार्क्सवादी होते। वे अपने साम्यवादी विचारधारा का आदर्श रूप सोवियत संघ को मानते थे और कहते थे कि सोवियत संघ की आलोचना करने वाला व्यक्ति अपने को साम्यवादी या समाजवादी कैसे कहता है। वे मार्क्सवाद को राष्ट्रीय परिस्थितियों के अनुरूप लागू करने के भी पक्षधर थे। इसलिए जब आज उनके आदर्शों का सोवियत संघ विघटित हो चुका है, तो भारतीय वामपंथियों को राष्ट्रीय संदर्भ में मार्क्सवादी विचारधारा को व्यवहृत करने का प्रयास करना चाहिए, क्योंकि सोवियत संघ के विघटन का यह अर्थ नहीं है कि आज वर्गहीन, शोषणमुक्त और समतावादी समाज व्यवस्था की आवश्यकता ही समाप्त हो गई है।
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