— परिचय दास —
इतिहास का एक अद्भुत स्वभाव है। वह कभी–कभी ऐसे व्यक्तियों को जन्म देता है, जिनकी उपस्थिति किसी प्रदेश की नियति को नया आकार दे देती है। बिहार की राजनीतिक और बौद्धिक स्मृति में डॉ. सच्चिदानन्द सिन्हा का नाम उसी तरह दर्ज है, जैसे किसी पुरानी नदी की धारा में एक स्थायी मोड़। वे केवल एक व्यक्ति नहीं थे; वे उस प्रतिभा~संपन्न बेचैन बुद्धि के प्रतिनिधि थे जो अपने समय से संतुष्ट नहीं रहती जो भूगोल को भी इतिहास में बदल देने का साहस रखती है।
10 नवम्बर , 1871 की एक साधारण सुबह में जन्मा वह बालक शायद नहीं जानता था कि आगे चलकर उसका नाम एक पूरे प्रदेश के स्वप्न से जुड़ जाएगा। शाहाबाद जिले के मुरार गाँव की मिट्टी में जन्मे सच्चिदानन्द सिन्हा उस परंपरा से आते थे जहाँ शिक्षा केवल ज्ञान का साधन नहीं बल्कि प्रतिष्ठा और जिम्मेदारी का संस्कार भी होती है। कुल की बौद्धिक परंपरा उनके व्यक्तित्व में सहज ही प्रवाहित थी। बचपन से ही उनमें अध्ययन के प्रति एक अनोखी ललक दिखाई देती थी, मानो शब्दों के भीतर ही कोई गुप्त संसार छिपा हो, जिसे खोज लेना उनका स्वभाव बन गया था।
आरा और पटना के शैक्षिक वातावरण में उनका मन जल्दी ही परिपक्व होने लगा। उस समय भारत औपनिवेशिक सत्ता के अधीन था और शिक्षा का अर्थ अक्सर अंग्रेजी शासन की सीमाओं में बँध जाना होता था लेकिन सच्चिदानन्द सिन्हा का मन उन सीमाओं से कहीं अधिक व्यापक था। उन्होंने लन्दन जाकर कानून की शिक्षा ग्रहण की। इंग्लैण्ड की ठंडी हवा में भी उनके भीतर भारत की गर्म मिट्टी की गंध बनी रही। वे बैरिस्टर बनकर लौटे लेकिन केवल एक सफल अधिवक्ता बनना ही उनके जीवन का लक्ष्य नहीं था। उनके भीतर एक प्रदेश का स्वप्न पल रहा था।
उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में बिहार बंगाल का हिस्सा था। प्रशासनिक रूप से वह बंगाल की विशाल संरचना में समाहित था लेकिन सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से उसकी पहचान अलग थी। उस समय शायद ही किसी युवा ने इतने साहस के साथ यह कहा हो कि बिहार को अपनी स्वतंत्र पहचान मिलनी चाहिए। परन्तु सच्चिदानन्द सिन्हा ने यह कहा। बीस वर्ष की आयु में अलग बिहार राज्य की माँग उठाना किसी साधारण युवा का कार्य नहीं था। यह एक दूरदर्शी मन की घोषणा थी।
उनके शब्दों में केवल तर्क नहीं था, एक भावात्मक आग्रह भी था। वे जानते थे कि भूगोल केवल नदियों और सीमाओं से नहीं बनता, वह स्मृतियों और संस्कृतियों से भी निर्मित होता है। बिहार की ऐतिहासिक चेतना, उसकी भाषा, उसकी लोकधारा और उसकी सामाजिक संरचना बंगाल से भिन्न थी। इस भिन्नता को उन्होंने राजनीतिक रूप देने का प्रयास किया। धीरे-धीरे यह आवाज़ आंदोलन में बदलने लगी।
राजनीति के क्षेत्र में उनका प्रवेश भी किसी नाटकीय घटना से कम नहीं था। 1910 के चुनाव में चार महाराजाओं को परास्त कर केन्द्रीय विधान परिषद में निर्वाचित होना उस समय एक बड़ी घटना थी। यह केवल चुनावी विजय नहीं थी बल्कि यह उस सामाजिक परिवर्तन का संकेत था जिसमें ज्ञान और बुद्धि ने वंश और वैभव को चुनौती दी थी। एक बैरिस्टर, एक पत्रकार और एक चिंतक ने सामंती शक्ति को पराजित कर लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व का नया अर्थ स्थापित किया।
सच्चिदानन्द सिन्हा की पहचान केवल राजनीतिज्ञ की नहीं थी। वे मूलतः एक बौद्धिक व्यक्ति थे। पत्रकारिता उनके व्यक्तित्व का एक महत्वपूर्ण पक्ष थी। लेखन के माध्यम से वे विचारों की दुनिया में हस्तक्षेप करते थे। उनके लेखों में स्पष्टता और निर्भीकता थी। वे जानते थे कि शब्द केवल सूचना नहीं देते, वे चेतना भी जगाते हैं। शायद इसी कारण उनके लेखन में एक तरह की तर्कपूर्ण दृढ़ता दिखाई देती है।
भारत की संविधान सभा के प्रथम अध्यक्ष के रूप में उनका नाम इतिहास में एक विशेष गरिमा के साथ दर्ज है। यह पद केवल औपचारिक नहीं था। संविधान सभा उस समय एक ऐसे भारत की कल्पना कर रही थी जो अभी जन्म लेने वाला था। उस ऐतिहासिक प्रक्रिया की शुरुआत में सच्चिदानन्द सिन्हा की उपस्थिति किसी शांत, अनुभवी मार्गदर्शक की तरह थी। वे उस पीढ़ी के प्रतिनिधि थे जिसने औपनिवेशिक शासन की कठोरता को भी देखा था और स्वतंत्रता के स्वप्न को भी।
उनके जीवन में कई ऐसे सम्मान आए जो उस समय भारतीयों के लिए दुर्लभ थे। वे प्रिवी कौंसिल के सदस्य बने और उन्हें हाउस ऑफ लॉर्ड्स से भी जोड़ा गया। ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर यह एक विशिष्ट स्थान था। परंतु इन सम्मान के बावजूद उनकी आत्मा भारतीय ही रही। उनके भीतर की पहचान सत्ता से नहीं, अपने समाज और प्रदेश से जुड़ी हुई थी।
बिहार को बंगाल से अलग कर एक स्वतंत्र प्रान्त के रूप में स्थापित करने की ऐतिहासिक प्रक्रिया में उनका योगदान विशेष रूप से स्मरणीय है। जब 1912 में बिहार और उड़ीसा का प्रान्त बना, तब यह केवल प्रशासनिक पुनर्गठन नहीं था। यह उस स्वप्न की आंशिक पूर्ति थी जिसे सच्चिदानन्द सिन्हा जैसे लोगों ने वर्षों पहले देखा था। उस क्षण में शायद उन्हें लगा होगा कि इतिहास कभी-कभी अपने स्वप्नदर्शियों को निराश नहीं करता।
उनका व्यक्तित्व कई स्तरों पर फैलता है। एक ओर वे विधि के गंभीर विद्यार्थी थे, दूसरी ओर पत्रकारिता की तीखी दृष्टि रखते थे। एक ओर वे संसद की बहसों में भाग लेते थे, दूसरी ओर प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान के प्रश्न पर भी उतनी ही गंभीरता से विचार करते थे। इस बहुआयामी व्यक्तित्व में एक तरह की संतुलित ऊर्जा दिखाई देती है।
6 मार्च , 1950 को जब उनका जीवन-प्रवास समाप्त हुआ तब भारत स्वतंत्र हो चुका था और संविधान लागू हो चुका था। एक अर्थ में यह उनके जीवन की ऐतिहासिक परिपूर्णता थी। जिस संविधान सभा की शुरुआत में वे अध्यक्ष बने थे, उसी प्रक्रिया का परिणाम स्वतंत्र भारत का संविधान था। जैसे किसी लंबी यात्रा का पहला दीपक अंत तक जलता रहा हो।
आज जब हम उनके नाम को स्मरण करते हैं, तो केवल एक व्यक्ति की जीवनी याद नहीं करते। हम उस समय को याद करते हैं जब विचार और संकल्प मिलकर इतिहास रचते थे। डॉ. सच्चिदानन्द सिन्हा उन दुर्लभ व्यक्तित्वों में थे जिनके भीतर बुद्धि की स्पष्टता और सार्वजनिक जीवन की प्रतिबद्धता एक साथ दिखाई देती है।
उनकी स्मृति बिहार की बौद्धिक परंपरा का एक उज्ज्वल अध्याय है। मुरार गाँव की मिट्टी से उठकर लन्दन के विधि विद्यालयों तक पहुँचना, वहाँ से लौटकर एक प्रदेश की पहचान के लिए संघर्ष करना, संसद और संविधान सभा तक पहुँचना और अंततः इतिहास के पृष्ठों में स्थायी हो जाना, यह यात्रा केवल एक व्यक्ति की नहीं, एक युग की कहानी है।
समय की धूल बहुत कुछ ढँक देती है, पर कुछ नाम ऐसे होते हैं जिन्हें मिटाना इतिहास के लिए भी संभव नहीं होता। सच्चिदानन्द सिन्हा उन्हीं नामों में से एक हैं। उनकी स्मृति में झुकना दरअसल उस साहस को प्रणाम करना है जिसने बिहार को केवल एक भूभाग नहीं, बल्कि एक स्वप्न और एक अस्मिता के रूप में देखने का साहस किया।
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