— प्रोफेसर राजकुमार जैन —
भाग (1)
सोशलिस्ट तहरीक में मजदूर किसान आंदोलन की अहमियत, अहम मुकाम रखती है। बरतानिया हुकूमत के खिलाफ जंगे-आजादी की लड़ाई महात्मा गांधी की रहनुमाई तथा कांग्रेस पार्टी के झंडे के नीचे लड़ी गई थी। 1930 का दांडी मार्च तथा 1932 का सविनय अवज्ञा आंदोलन खत्म होने के कारण मायूसी का आलम छाया हुआ था। स्वराज पार्टी जैसी कई तंजीमें कांग्रेस को टकराहट की जगह अंग्रेजी हुकूमत से ले देकर समझौता कराने का प्रयास कर रही थी। ऐसे माहौल में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना 17 मई 1934 को पटना में कांग्रेस पार्टी के अंदर ही की गई। कांग्रेस पार्टी का मकसद अंग्रेजी हुकूमत से निजात पाना था परंतु कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी आजादी के साथ-साथ सामाजिक आर्थिक बदलावो से वर्ग और वर्ण के आधार पर मजदूर-किसानों पर होने वाली गैर-बराबरी, बेइंसाफी ,जुल्मो, शोषण को खत्म कर उनकी बेहतर जिंदगी के लिए, उनके हकों के लिए, सेवा शर्तों, कानूनी हिफाजत के लिए दबाव बनवाना था।
कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना के वक्त ही उसके गठन प्रस्ताव में लिखा गया था कि ‘केवल समाजवाद ही शोषितो और पीड़ितों के अधिकारों की गारंटी दे सकता है। अतः जो लोग इस विचार से सहमत हैं उनके लिए यह अनिवार्य बन गया है कि वे कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का गठन कर एक मंच पर आयें जिससे कांग्रेस को तेजी से एक समाजवादी संगठन के रूप में बदला जा सके और भारत की जनता के संघर्ष को नया रूप और नया विचार दिया जा सके’।
प्रस्ताव में कामगार और मजदूरों के लिए कहा गया कि कामगारों के आर्थिक संघर्षो में हिस्सेदारी और पार्टी के कार्यक्रम हेतू उनके सक्रिय संगठन के लिंए व्यवसायी, उद्योगो और यातायात के कामगारों का ट्रेड यूनियनो में संगठन और जहां-जहां पहले से यूनियन है, उसमें जुड़ना तथा उनमें प्रवेश करना। सभी कामगारों को हड़ताल की आजादी, कामगारों किसानों एवं अन्य जुझारू संगठनो, समूह की परिषदों का निर्माण, कामगारों एवं किसानों को ऋण उपलब्ध कराने के लिए सहकारी संगठनों का निर्माण और वर्तमान सहकारी संगठनों में प्रवेश। मजदूरों के संघर्षों की रहनुमाई, तथा उनकी मदद करना। इसी समय यह भी तय किया गया कि आजादी मिलने के बाद कामगारों के लिए निम्नलिखित कार्यक्रमों को अमली जामा पहनाया जाएगा।
1. न्यूनतम मजदूरी;
2. 8 घंटे का दिन;
3. बेरोजगारी, वृद्धावस्था, बीमारी, दुर्घटना आदि का बीमा;
4. काम के लिए खुशनुमा स्वस्थ माहौल;
5. हड़ताल का अधिकार।
कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना सम्मेलन में अपने अध्यक्षीय भाषण में समाजवाद के पितामह आचार्य नरेंद्र देव ने कहा कि “भारत में श्रमिक आंदोलन शुद्ध ट्रेड यूनियन चरित्र से ऊपर उठ गया है। श्रमिक वर्गों में राजनीतिक चेतना धीरे-धीरे विकसित हो रही है। पूंजीवाद को उखाड़ फेंकने के लिए भारतीय श्रमिक अपने को संगठित कर रहे हैं। मैं जानता हूं कि इस देश में अभी कामगार आंदोलन को लंबा रास्ता तय करना है। यह अंदरूनी मतभेदों से क्षत-विक्षत और विभाजित है। अवसरवादी नेताओं ने इसमे विभाजन कर दिया है, और श्रमिकों कों दिग्भ्रमित कर दिया है। इस कारण श्रमिक वर्ग द्वारा की गई हड़ताले अक्सर विफल हुई है। फिर भी संगठनात्मक एकता प्राप्त करने और उसे पूर्ण बनाने का गंभीर प्रयास किया जा रहा है। कपड़ा कामगारों की मांग पूरी करवाने के लिए उनकी आम हड़ताल घोषित की गई है। अगर एकता की कोशिश सफल होती है और ठीक तरह का नेतृत्व उपलब्ध होता है तो श्रमिक वर्ग का आंदोलन बढ़कर शीघ्र ही एक महान और शक्तिशाली बन जाएगा”.
भाग (2)
इस लेख के पहले भाग में आप पढ़ चुके हैं कि कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के स्थापना सम्मेलन में किस प्रकार से कांग्रेस के एजेंडा पर मज़दूरों और किसानों के हितों के सर्वोपरि रखने के प्रयास शुरू हो गए थे। लेख के इस भाग में भी जारी हैं आचार्य नरेंद्र देव द्वारा दिए गए अध्यक्षीय भाषण मे मजदूर कामगारों से संबंधित अंश एवं उसके बाद कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के प्रथम सम्मेलन में पारित मज़दूरों से संबंधित प्रस्ताव।
‘कामगारों के संघर्ष को कांग्रेस के संघर्ष के साथ जोड़ना चाहिए और इसी तरह इसे किसानों एवं निम्न मध्यम वर्ग के संघर्ष के साथ जोड़ना चाहिए। श्रमिक वर्ग कांग्रेस आंदोलन से बहुत कम प्रभावित हुआ है। सामान्य तौर पर हमने उन्हें दूर रखा और भारतीय पूंजीपतियों के खिलाफ उनके संघर्ष में नियमत: हमने रुचि नहीं ली है। यही कारण है कि आज की सबसे प्रमुख घटनाओं में एक कठिन एवं विपरीत परिस्थिति के बावजूद बहादुरी से चलाई गई मुंबई के कपड़ा कामगारों की आम हड़ताल औसत कांग्रेस जन की कल्पना पर असर नहीं डालती और न हीं इसमें सक्रिय सहानुभूति उत्पन्न करती है। ऐसा लगता है कि उन्हें इसकी कोई चिंता नहीं। बड़ी संख्या में कामगार निकाले जा रहे हैं, उनकी मजदूरी घटाई जा रही है, उनका जीवन स्तर नीचा किया जा रहा है। हम कम से कम हड़ताल की अवधि में उनके निर्वाह के लिए धन तो इकट्ठा कर सकते थे। लेकिन हम इन चीजों पर नहीं सोचते क्योंकि जैसे तैसे हम सोचने लगे हैं की औद्योगिक झगड़ों में रुचि लेना हमारा काम नहीं है। क्या कामगारों का विश्वास प्राप्त करने का यही तरीका है? आश्चर्य नहीं कि श्रमिक वर्ग के संघर्षों का हमारे आंदोलन से कोई संबंध नहीं है। वे अपने तरीके से चलते हैं, यद्यपि यह एक तथ्य है कि उनके द्वारा शुरू किया गया कोई बड़ा संघर्ष देश के आगामी राजनीतिक संघर्ष का सूचक नही है। कांग्रेस द्वारा चलाए गए सभी बड़े राष्ट्रीय संघर्षों के पहले हड़ताले और औद्योगिक अशांति के अन्य रूप प्रकट हुए हैं। जब दोनों संघर्ष एक दूसरे के साथ मिल गए हैं, तभी राष्ट्रीय संघर्ष अपने उच्चतम बिंदु पर पहुंचा है। यदि दोनों शक्तियों में सचेतन संबंध स्थापित कर दिया जाता है तो संघर्ष अधिक प्रभाव और गति से लंबे समय तक चलाया जा सकता है। देश में अभी भी क्रांतिकारी वस्तुनिष्ठ परिस्थिति बनी हुई है और अगर हमने शक्तियों में समन्वय कर लिया तो आज जो उदासी और निराशा छायी हुई है वह हममें नहीं होती।
भारत में श्रम शक्ति गांवौ से आती है, औद्योगिक कामगार दिल से ग्रामीण बना रहता है।
असल में श्रमिक वर्ग हरावल दस्ता है, जबकि किसान और बुद्धिजीवी मात्र इसके पूरक हैं, कामगारों और किसानों को अपने साथ लाकर हमें अपने आंदोलन का सामाजिक आधार व्यापक बनाना चाहिंए।’
कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी ने एक रणनीति अपनाई हुई थी कि अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के अधिवेशन से पहले दिन सोशलिस्ट अपना सम्मेलन आयोजित कर अपना प्रस्ताव तैयार कर अगले दिन कांग्रेस के इजलास में पेश करते थे। हालांकि वे जानते थे कि कांग्रेस संगठन में यह पास होने वाला नहीं है, फिर भी एक प्रगतिशील माहौल बनाना तथा मजदूर किसानों के मसलों को उजागर करने के मकसद से यह कार्य करते थे।
कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के पटना स्थापना सम्मेलन में कई प्रस्ताव पार्टी ने पेश किये, जिसमें एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव वैकल्पिक प्रस्ताव था। जिसमें मुख्य रूप से लिखा गया था कि कांग्रेस को एक ऐसा कार्यक्रम अपनाना चाहिए जो कर्म और उद्देश्य से समाजवादी हो, तथा इसका उद्देश्य समाजवादी राज्य की स्थापना हो।
1. सभी शक्तियों का उत्पादक जनता को हस्तांतरण;
2. उत्पादन, वितरण एवं विनिमय के सभी संयंत्रों के उत्तरोत्तर समाजीकरण के उद्देश्य से इस्पात, कपड़ा, जूट, रेलवे, जहाजरानी, खदान, बैंक, एवं सार्वजनिक उपयोगिता जैसे प्रमुख एवं आधारभूत औद्योगिक का समाजीकरण;
3. राजाओं, जमीदारों एवं अन्य सभी शोषक -वर्गों का खात्मा;
4. किसानों एवं मजदूरों पर बकाया ऋणों की माफी;
कांग्रेसजन किसान एवं मजदूर संघों का संगठन करे, और जहां ऐसे संघ अस्तित्व में है वहां आम लोगों के रोजमर्रा संघर्षों में हिस्सा लेने और अंततः उन्हें अंतिम लक्ष्य तक ले जाने मे नेतृत्व करने के विचार से उनमें प्रवेश करें।
कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी ने जो प्रस्ताव कांग्रेस सम्मेलन में प्रस्तुत किये वह नामंजूर हो गये तथा कांग्रेस ने इसे कांग्रेस के सिद्धांतों के विपरीत भी बतलाया।
अखिल भारतीय कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का पहला सम्मेलन 21 अक्टूबर 1934 को मुंबई में हुआ था क्योंकि पटना के स्थापना सम्मेलन में तफसील से पार्टी की नीतियों को स्पष्ट नहीं किया जा सका था। परंतु इसके प्रथम सम्मेलन में पार्टी की नीतियों ,कार्यक्रमों, सिद्धांतों की विस्तार से व्याख्या की गई थी, जिसमें मजदूरों से संबंधित प्रस्ताव में यह कहा गया –
1. श्रमिकों की कृषि दासता तथा कृषि दासता की सीमा वाली स्थिति से मुक्ति।
2. धरना तथा हड़ताल के लिए यूनियन बनाने का अधिकार।
3. मालिकों तथा सरकारी उपक्रमों में श्रमिक संघो को अनिवार्य मान्यता।
4. जीवन-यापन योग्य वेतन,
5. 40 घंटे का सप्ताह,
6. स्वास्थ आवास एवं कार्य स्थिति,
7. बेरोजगारी, बीमारी, दुर्घटना, वृद्धावस्था आदि के लिए बीमाl
8. सभी कर्मचारियों को प्रतिवर्ष पूर्ण वेतन के साथ एक माह का अवकाश तथा महिला कर्मचारियों को गर्भावस्था के दौरान पूर्ण वेतन के साथ दो माह का अवकाश।
9. स्कूल जाने की उम्र वाले बच्चों की कारखाने में तथा 16 वर्ष से नीचे के बच्चों व औरतों की भूमिगत खानों में कार्य कराने पर प्रतिबंध।
10. समान कार्य के लिए समान वेतन।
11. जब कभी मांग हो तो वेतन का साप्ताहिक भुगतान।
भाग (3)
इस लेख के पहले दो भागों में आप पढ़ चुके हैं कि किस प्रकार कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के स्थापना सम्मेलन में कांग्रेस के एजेंडा पर मज़दूरों और किसानों के हितों के सर्वोपरि रखने के प्रयास शुरू हो गए थे और फिर आपने पढ़ा कि कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के प्रथम सम्मेलन में पार्टी की नीतियों ,कार्यक्रमों, सिद्धांतों की विस्तार से व्याख्या की गई और मज़दूरों से संबंधित प्रस्ताव में किस तरह से बहुत से प्रगतिशील कदमों की सिफारिश की गई। इस किश्त में डॉ लोहिया और जे पी की मज़दूरों और कामगारों के लिए प्रतिबद्धता की बानगी मिलती है। आइए पढ़ते हैं तीसरी किश्त।
हिंदुस्तान की सोशलिस्ट तहरीक के दो बड़े नेता जयप्रकाश नारायण, डॉ राममनोहर लोहिया ऐसे नेता थे जो जंगे आजादी के लिए लड़ते हुए भी मजदूरो, कामगारों के हक्कूको के लिए मुसलसल आवाज उठा रहे थे। हालांकि कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी जिसके वह सदस्य थे उसके बहुत सारे नेताओं को यह पसंद नहीं था उनका कहना था कि केवल अंग्रेजी हुकूमत से आजादी पाने तक ही हमको महदूद रहना चाहिए, क्योंकि इस तरह की मांगों से बड़े जमींदार और पूंजीपति कांग्रेस से छिटक जाएंगे। परंतु जयप्रकाश और लोहिया कहां मानने वाले थे?
मजदूर संगठन और आंदोलन के बारे में सोशलिस्ट नेता डॉ राममनोहर लोहिया ने 5 दिसंबर 1936 को बिहार प्रांतीय कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के सम्मेलन में अध्यक्ष पद से दिए गए भाषण में कहा,
‘मजदूर संगठन और आयोजन साम्राज्य विरोधी मोर्चे की एक बहुत बड़ी शक्ति हैl मजदूर ही एक ऐसी जमात है जो साम्राज्यवाद के आर्थिक बंदोबस्त के बिल्कुल बाहर हैl उसके पास न जमीन है, और न ही पूंजी, जिसकी हिफाजत साम्राज्यवाद करता हो, जिसके लुट जाने के डर से मजदूर सीधे और पूरे साम्राज्य विरोध से हिचकिचाएं। इसके अलावा एक ही जगह बड़ी तादाद में मजदूर उद्योग धंधों मे लगे हुए हैं। बतौर मिसाल, जमशेदपुर के लोह इस्पात के कारखाने में एक लाख से भी ज्यादा मजदूर एकत्रित होकर काम करते हैं। इनमें सहज ही एका होता है, इनकी तकलीफें एक हैं, इच्छाएं एक है, ज़रूरतें एक है। कम मजदूरी, ज्यादा घंटे, अत्याचार और दुर्व्यवहार के प्रश्नों को उठाकर मजदूर अपने-अपने मजबूत संगठन बनाते हैं। इनके संगठन कानूनी और बेकानूनी जुल्म के शिकार बनते हैं । इसका एक बड़ा कारण है मजदूर संगठन साम्राज्यवाद के आर्थिक बंदोबस्त के बड़े वजनी और महत्वपूर्ण स्थलों पर आघात करता है। रेल, जहाज, बंदरगाह, लोहे के कारखाने, तारघर और टेलीफोन, ऐसे कल कारखाने जिनमे इनका रुपया लगा हुआ है और कुछ हद तक सभी कल कारखाने, साम्राज्यवाद के आर्थिक बंदोबस्त के महत्वपूर्ण स्थल है इनमें काम करने वाले मजदूर अगर अपना संगठन और आंदोलन करते हैं तो साम्राज्यवाद को बड़ी चोट पहुंचती है।
इसी तरह जमालपुर का रेल कारखाना है। रेल मजदूरो का संगठन तो एक देशव्यापी संगठन होता है . किसी एक जगह की कमजोरी सारे संगठन को कमजोर बना देती है। जमालपुर को भी मुंबई से हावड़ा तक के मजदूर संगठन की कतार में खड़ा होना होगा। चीनी के कारखाने भी काफी हैं। इन कारखानों के मजदूर तो किसान ही है और इसलिए इनमें किए गए प्रचार, संगठन और आंदोलन का एक और फायदा है।
मजदूर आंदोलन की एक विशेषता है, यूं तो मजदूर संगठन (ट्रेड यूनियन) मजदूरों की कुछ तात्कालिक मांगो, यानी मजदूरी काम के घंटे के सवाल की बुनियाद पर बनता है। फिर भी मजदूर आंदोलन की वर्ग- चेतना और उसका वर्ग -लक्ष्य ऊंचे सिरे का होता है। जैसे-जैसे आंदोलन नीची-नीची मंजिलें तय करता है, वैसे-वैसे उसका मकसद देश की राजकीय सत्ता और आर्थिक जीवन पर अपना आधिपत्य जमाना होता है। मजदूरों की राजकीय सत्ता का लक्ष्य पूँजीवाद और उनके राजकीय बंदोबस्त को खत्म करना होता है। इसलिए हम देखते हैं कि मजदूर आंदोलन का लक्ष्य साम्राज्य विरोध से और आगे यानी समाजवाद है।
हमारी आजादी की लड़ाई का नेतृत्व न राजा, न जमींदार, न पूंजीपति कर सकते हैं। ये तबके साम्राज्यवादी प्रबंध के भीतर है। हमारी सफल लड़ाई का नेतृत्व तो सिर्फ ऐसा हो सकता है जो संग्राम के नए कार्यक्रम और रूप को काम में ला सके। ऐसा नेतृत्व तो सिर्फ मजदूर वर्ग की विचारधारा का हो सकता है। कांग्रेस में साम्राज्यवाद की नीति के उपायों का सफल मुकाबला करने की ताकत तभी होगी जब वह अपना कार्यक्रम और तरीका पहले बतलाये गए उन्नतिशील तब्दीलियां के मुताबिक बनाएं।
सोशलिस्टों ने कामगारों के हकों के लिए उन पर हो रही बेइंसाफी के खिलाफ,सरकारों ,मालिकों के खिलाफ तो लड़ाई लड़ी ही हैं, परन्तु ऐसी भी कई नजीरें है जहाँ उन्होंने अपनी ही सरकारों के द्वारा किये गए जुल्म की मुख्लाफत करने में कभी गुरेज नहीं किया।
1954 में केरल में पहली बार पत्तम थानु पिल्लई के नेत्तृव में सोशलिस्टों की गैर-कोंग्रसी सरकार बनी थी। 11 अगस्त 1954 को त्रावणकोर कोच्ची में प्रदशर्नकारियों पर पुलिस की गोलियों से कई लोग मारे गये। उत्तर-प्रदेश में जमींदारों के खिलाफ भूमिहीन मजदूरों के संघर्ष का नेत्तृव करते हुए डॉ. राममनोहर लोहिया गिरफ्तार होकर इलाहाबाद जेल में बंदी थे। लोहिया को जैसे ही केरल की खबर मिली उन्होंने जेल से ही मुख्यमंत्री पत्तम थानु पिल्लई से त्याग-पत्र देने की मांग कर दी। लोहिया का मानना था कि किसी भी अहिंसक प्रदर्शन, सत्याग्रह पर गोली नही चलनी चाहिए। . उनका कहना था कि फिर काग्रेंसी तथा सोशलिस्टों की सरकार में क्या फर्क रहेगा ? मुख्यमंत्री ने इस्तीफा देने से इन्कार कर दिया, पार्टी में भी इस सवाल पर मतभेद था . लोहिया ने इसके विरोध में पार्टी के महामंत्री पद तथा राष्ट्रीय समिति से भी इस्तीफा दे दिया था। इसी सवाल पर पार्टी में टूट तक हो गई।
हिन्दुस्तान के मजूदर आंदोलन में सोशलिस्टों ने अन्य मजूदर संगठनों से अलग एक ओर भूमिका भी निभाई, ज्यादातर मजूदर यूनियन कामगारों के मसले, उनके बेहतर वेतन-भत्ते, काम के घण्टे शिक्षा-चिकित्सा, स्थायी नौकरी ,पेंशन वेतन समानता, फैक्टी मालिकों दफ्तरों अफसरों बगैरह के सवालों पर संघर्ष करती रही है. सोशलिस्ट इन सवालों पर तो लड़ते रहे ही हैं, परन्तु साथ ही साथ मजदूरों को नागरिक अधिकारों, दूसरें तपको जन-संघर्षों जुल्म ज्यादती के खिलाफ भी लामबन्द करती रहे है। देश-भक्ति के सवाल पर भी मजदूर आंदोलन को लड़ने का जरिया इन्होंने बनाया है।
जंगे -आजादी के सिपहसालार सोशलिस्ट तहरीक के जन्मदाताओं में से एक जयप्रकाश जी की पहचान एक मजदूर नेता के रूप में भी इतिहास में दर्ज हैं।. 1930 में जयप्रकाश जी को कांग्रेस अध्यक्ष पं. जवाहरलाल नेहरू ने बुलाकर कांग्रेस की मजदूर सेल की जिम्मेदारी संभालने को कहा, मजदूर आंदोलन के साथ कांग्रेस का रिश्ता बनाए रखने के उद्देश्य से इसकी स्थापना की थी। जयप्रकाश जी ने राष्टीय और अन्तर्राष्ट्रीय- टेड्र यूनयनो से अपना सम्पर्क स्थापित किया। इस सिलसिले में उन्होने ब्रिटिश लेबर पार्टी तथा टेड्र-यूनियन कांग्रेस से भी सम्पर्क स्थापित किया। उन्होंने औद्योगिक श्रमिकों की समस्या पर अपनी रपट प्रस्तुत की।
• जयप्रकाश नारायण देशहित के लिए भी मजूदर यूनियन का उपयोग करते थे। 1939 में उन्होंने अंग्रेज सरकार के खिलाफ लोक आंदोलन का नेत्तृव किया। टाटा स्टील कम्पनी में हड़ताल करवाकर यह प्रयास किया कि अंगेज को स्टील आदि न पहुच सकें। जिसके लिए उन्होंने किराया और राजस्व रोकने का अभियान चलाया। इस कारण ब्रिटिश सरकार ने उनकों गिरफ्तार कर 9 महीने की सजा सुना दी। आजादी की लड़ाई में हजारीबाग जेल में बंद जयप्रकाश नारायण ने जेल से निकल भागने के बाद स्वतंत्रता सेनानियों के नाम दो पत्र लिखें। जिसमें उन्होंने कामगार और मजदूरों के लिए लिखा कि
‘मेहनतकशो का पूर्ण विद्रोह ही हमारा उद्देश्य है। अतः व्यापक तकनीकी काम के साथ हमें मेहनतकशों, गांवों के किसानों और कारखानों, खदानों, रेलवे एवं अन्य जगहों के मजदूरों के बीच सघन काम करना है। वर्तमान मांगों को पूरा करने के उद्देश्य से लड़ने के लिए हम उन्हें संगठित करें, उनमे से चुने हुंए लोगों को अपने क्रियाकलापों के लिए भर्ती करें और उन्हें राजनीतिक और तकनीक रूप से प्रशिक्षित करें। मजदूरों के पैसों का रोज गिरता हुआ मूल्य, क्या ये सब सरकार के युद्ध प्रयत्नों के लिए मजदूरों के दिल में हमदर्दी पैदा करेंगे? यदि दूसरी खुली बगावत हुई तो उसमे मजदूरो का हिस्सा पिछले अगस्त सितंबर से कम नहीं बल्कि अधिक ही रहेगा”।
1940 के दशक में जयप्रकाश नारायण ‘कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी’ के एक प्रमुख नेता थे और उनका प्रयास था हिंदुस्तान के मजदूर संघों को सीधे स्वतंत्रता संग्राम से जोड़ने का। जेपी ने देशभर में डाक- तार तथा रेलवे कर्मचारियों को संगठित करने में सक्रिय भूमिका निभाई। उन्होंने हड़ताली कर्मचारियों को ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष तेज करने के लिए भी प्रेरित किया। उस समय जेपी ‘ऑल इंडिया रेलवे मैन फेडरेशन’ के अध्यक्ष भी थे। रेलवे और डाक-तार कर्मचारी हड़ताल लगभग एक ही समय 1946 में हुई, जिससे ब्रिटिश प्रशासन पर भारी दबाव पड़ा। 1946 की पोस्ट एंड टेलीग्राफ यूनियन की हड़ताल 11 जुलाई 1946 को शुरू हुई थी जो 23 दिनों तक चली थी कर्मचारियों की मांग थी कि महंगाई के दौर में कम वेतन तथा अन्य 16 सूची अन्य मांगों को लेकर थी। हड़ताल बहुत सफल रही और ब्रिटिश सरकार ने यूनियन की अधिकतर मांगों को मान लिया। परंतु एक मुद्दा अभी भी था की हड़ताल के दौरान जो कर्मचारी काम पर नहीं आए थे उन्हें उस अवधि का वेतन नहीं मिल रहा था।
1951 में जेपी जब यूनियन के अध्यक्ष बन गए तो उन पर हड़ताल पर जाने का दबाव बढ़ा। उन्होंने तात्कालिक संचार मंत्री रफी अहमद किदवई से कर्मचारियों की मांगो तथा हड़ताल के समय के वेतन पर विस्तार से चर्चा की। रफी अहमद किदवई ने मौखिक रूप से इस मांग को स्वीकार कर लिया। इस आश्वासन के बाद कर्मचारियों ने हड़ताल पर जाने के निर्णय को छोड़ दिया। परंतु बाद में मंत्री रफी अहमद किदवई ने इस प्रकार के किसी भी समझौता होने की बात को अमान्य करार दे दिया। जेपी को अफसोस था कि इस संदर्भ में लिखित में कोई भी पत्र उनके पास नहीं था। उन्होंने इसको अपनी भयंकर भूल माना। 1951 में जेपी ने इस भूल का प्रायश्चित करते हुए अपने आत्म शुद्धि के लिए 21 दिन का उपवास शुरू कर दिया, तथा घोषणा की यह किसी के विरुद्ध नहीं है। 2 दिन के बाद प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने जेपी को खत लिखते हुए कहा कि तुम्हारा जीवन बहुत बहुमूल्य है, हमने तुम्हारी मांगों को मान लिया है इसलिए कृपया अपना उपवास समाप्त करें। उसके उत्तर में जेपी ने लिखा कि यह उपवास किसी के विरुद्ध नहीं बल्कि अपनी ही आत्म शुद्धि के लिए किया गया है। मुल्क भर में लोग जेपी के सेहत को लेकर चिंतित थे। चारों तरफ से जेपी पर उपवास समाप्त करने के लिए अनुरोध किया गया। 13 जुलाई को उन्होंने अपने उपवास को खत्म किया। जेपी ने तमाम मजदूर संघो को सलाह दी कि भविष्य में यूनियन कोई भी समझौता मौखिक रूप से न कर कर लिखित रूप में करें।
( भाग-4)
इस लेख के पहले तीन भागों में आप पढ़ चुके हैं कि किस प्रकार कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के स्थापना सम्मेलन में कांग्रेस के एजेंडा पर मज़दूरों और किसानों के हितों के सर्वोपरि रखने के प्रयास शुरू हो गए थे और फिर आपने पढ़ा कि कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के प्रथम सम्मेलन में मज़दूरों से संबंधित प्रस्ताव में किस तरह से बहुत से प्रगतिशील कदमों की सिफारिश की गई। इससे पिछली किश्त में डॉ लोहिया और जे पी की मज़दूरों और कामगारों के लिए प्रतिबद्धता की बानगी देखने को मिली। इस किश्त में आप पढ़ेंगे की कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी कांग्रेस से अलग हो गई और इधर 1948 में सोशलिस्टों के प्रभाव तले काम कर रहे इंडियन लेबर फेडरेशन और हिंद मजदूर पंचायत को मिलाकर एक नया मजदूर संगठन बनाया गया और इसका नाम ‘हिंद मजदूर सभा’ रखा गया। क्या उद्देश्य थे इसके और ऐसी ही अन्य तफसील जानने के लिए आइये पढ़ते है।
विदेशी दासता से आजादी मिलने के बाद “कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी” का राष्ट्रीय सम्मेलन कानपुर में आयोजित हुआl जिसमें पार्टी के नाम से कांग्रेस शब्द हटा दिया गया और पार्टी का नया नाम ‘सोशलिस्ट पार्टी’ रखा गयाl सम्मेलन में पार्टी का पॉलिसी स्टेटमैंट प्रारूप प्रतिनिधियों के सामने रखा गया। पार्टी का मकसद लोकतंत्रात्मक समाजवादी (Democratic Socialism ) समाज की स्थापना करना था, जिसमें हर व्यक्ति श्रमजीवी है, सभी व्यक्ति, स्त्रियों समेत समान है, जहां सभी के लिए समान अवसर है, जहां पारिश्रमिक में इतना अंतर नहीं है कि वर्ग भेद पैदा हो। जहां सारी संपत्ति समाज की है, जहां विकास योजनाबद्ध है। सोशलिस्ट पार्टी की श्रमिक संबंधी नीति, स्वतंत्र और समान जीवन के आधार पर नयी सामाजिक व्यवस्था के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए, ट्रेड यूनियनो, सहकारिता, लेबर कॉलेजो और श्रमिकों के समितियां के माध्यम से उनका समर्थन प्राप्त करने की है।
मजदूरों से संबंधित प्रस्ताव में लिखा गया कि देश के बिखरे छोटे-छोटे मजदूर संगठनों के स्थान पर अखिल भारतीय स्तर पर मजदूर संगठन बनाने की आवश्यकता और इसका महत्व समझकर राष्ट्रव्यापी ऐसे औद्योगिक मजदूर संघ के निर्माण पर बल दिया जो आंतरिक लोकतंत्र और संगठन स्वायत्तता के लिए प्रतिबद्ध हो। मेहनतकश लोगों को लोकतांत्रिक समाजवाद के सिद्धांतों से अवगत कराया जाये जिससे उनमें ऐसी वर्गीय एकता और उसके प्रति आस्था विकसित हो जो पुराने संकुचित और धार्मिक आस्था से अलग हो। पार्टी के पालिसी स्टेटमेंट में यह भी स्पष्ट किया गया कि मजदूर संघ और सहकारिता देश की मेहनतकश जनता के लिए लोकतंत्र के प्रशिक्षण के माध्यम है। प्रशिक्षण द्वारा ही श्रमिक वर्गो में राजनीतिक और आर्थिक क्षेत्रो में उत्तरदायित्व उठाने की क्षमता आ सकती है। समाजवादी व्यवस्था की स्थापना में श्रमिक वर्ग की बढ़ती हुई भागीदारी और उत्तरदायित्व पूर्ण भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।, इसलिए पार्टी की श्रमिक नीति पार्टी के पालिसी स्टेटमेंट का सार भाग है,’कांग्रेस से हटने के बाद मुल्क में तीन प्रमुख मजदूर संगठन थे। ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस, इंडियन फेडरेशन ऑफ़ लेबर तथा ऑल इंडिया नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस।
सोशलिस्ट पहले ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस मे कार्यरत थे, जहां कम्युनिस्ट भी शामिल थे। परंतु सोशलिस्ट अब अपना ट्रेड यूनियन बनाना चाहते थे। इसके अतिरिक्त ऑल इंडिया रेलवे मेंस फेडरेशन भी अस्तित्व में था।
कांग्रेस से अलग होने से पहले ही सोशलिस्ट मजदूरों के बीच में कार्यरत थे। 29 दिसंबर 1947 को सोशलिस्टों की मुंबई शाखा ने मजदूरों की एक सांकेतिक हड़ताल कराई जो बहुत ही कामयाब रही। दिसंबर 1948 में कोलकाता में समान विचार वाले कार्यरत मजदूर संघो के कार्यकर्ताओं और नेताओं का एक सम्मेल आयोजित हुआ। पंजाब में पहले से ही सोशलिस्टों के प्रभाव में हिंद मजदूर पंचायत के नाम से एक श्रमिक संगठन था। इंडियन लेबर फेडरेशन और हिंद मजदूर पंचायत को मिलाकर एक नया मजदूर संगठन बनाया गया और इसका नाम ‘हिंद मजदूर सभा’ रखा गया। इसी सम्मेलन में हिंद मजदूर सभा के संविधान का एक प्रारूप भी पास किया गया, जिसके अनुसार हिंद मजदूर सभा के निम्नलिखित उद्देश्य थे।
1 देश के श्रमिक वर्ग के आर्थिक, राजनीतिक, और सांस्कृतिक हितों को प्रोन्नत करना।
2 हिंद मजदूर सभा से ,सम्बद्ध संगठनों को दिशा निर्देश, संयोजन और सहायता देना।
3. श्रमिकों की सेवा से सम्बंधित उनके अधिकार, सहूलियतों और अन्य हितों को सुरक्षा देना। एक ही उद्योग और व्यवसाय के श्रमिक संगठनों का फेडरेशन निर्माण करना। एक ही उधोग और व्यवसाय में कार्यरत श्रमिकों द्वारा राष्ट्रीय श्रमिक संधो का गठन।
4. श्रमिकों की स्वतंत्रता, सुरक्षा और उनका सम्प्रेषण ।
5. संगठन बनाने की स्वतंत्रता, सभा करने की स्वतंत्रता, भाषण की स्वतंत्रता, समाचार पत्रों की स्वतंत्रता, रोजगार या सम्प्रेषण का अधिकार, सामाजिक सुरक्षा का अधिकार, हड़ताल करने का अधिकार,
6 देश में लोकतांत्रिक समाजवादी समाज की स्थापना के लिए श्रमिको को संगठित करना।
7 श्रमिकों के लिए सहकारिता समितियों और शिक्षा को प्रोन्नत देना।
8 देश और विदेश के समान उद्देश्य वाले संगठनों के साथ सहयोग करना।
औपचारिक एवं वैधानिक नजरिए से हिन्द मजदूर सभा एक स्वतंत्र संगठन थी। परंतु इसको सोशलिस्ट पार्टी के नेताओं द्वारा ही बनाया गया था। इसकी कमेटी में अधिकतर सोशलिस्ट ही थे।
मजदूरों के सम्बन्ध में लिखा गया कि देश के बिखरे छोटे-छोटे मजदूर संगठनों के स्थान पर अखिल भारतीय स्तर पर मजदूर संगठन बनाने की आवश्यकता और महत्व समझकर राष्ट्रव्यापी ऐसे औद्योगिक मजदूर संघ के निर्माण पर बल दिया जो आंतरिक लोकतंत्र और संगठन स्वायत्तता के लिए प्रतिबद्ध हो। मेहनतकश लोगों को लोकतांत्रिक समाजवाद के सिद्धांतों से अवगत कराया जाये। जिससे उनमें ऐसी वर्गीय एकता और उसके प्रति आस्था विकसित हो जो पुराने संकुचित और धार्मिक आस्था से अलग हो, पार्टी के पालिसी स्टेटमेंट में यह भी स्पष्ट किया गया कि मजदूर संघ और सहकारिता देश की मेहनतकश जनता के लिए लोकतंत्र 6के प्रशिक्षण के माध्यम है।
भाग 5
इस लेख के पहले चार भागों में आप पढ़ चुके हैं कि किस प्रकार कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के स्थापना सम्मेलन में कांग्रेस के एजेंडा पर मज़दूरों और किसानों के हितों के सर्वोपरि रखने के प्रयास शुरू हो गए थे और कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के प्रथम सम्मेलन में मज़दूरों से संबंधित प्रस्ताव में किस तरह से बहुत से प्रगतिशील कदमों की सिफारिश की गई। पिछली किश्तों में डॉ लोहिया और जयप्रकाश नारायण (जे पी) की मज़दूरों और कामगारों के लिए प्रतिबद्धता की बानगी देखने को मिली। आपने यह भी पढ़ा कि कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी कांग्रेस से अलग हो गई और इधर 1948 में सोशलिस्टों के प्रभाव तले काम कर रहे इंडियन लेबर फेडरेशन और हिंद मजदूर पंचायत को मिलाकर एक नया मजदूर संगठन बनाया गया और इसका नाम ‘हिंद मजदूर सभा’ रखा गया। इस किश्त में आप पढ़ेंगे कि सोशलिस्ट जहाँ कामगारों की ज़मीनी लड़ाई में आगे रहे है, वहीं आंदोलन के नये औजार और उसके वैचारिक पक्ष पर भी लीक से हटकर नये परिपेक्ष में मजदूरों के अधिकारों , चार्टर .मांगपत्र को भी गहन छान-बीन कर तथ्यों पर आधारित हकीकत से जोड़कर प्रस्तुत करते आये है। प्रस्तुत है पाँचवीं किश्त।
1952 के आम चुनाव से पहले सोशलिस्ट पार्टी ने अपना घोषणा पत्र ‘वि बिल्ड फॉर सोशलिज्म” अंग्रेजी में तथा “समाजवादी निर्माण की ओर” हिंदी’ शीर्षक से प्रकाशित किया। इसमें देश के उद्योगों को तीन वर्गों में विभाजित किया। राष्ट्रीयकृत सेक्टर, मध्य दर्जे के गैर सरकारी उद्योग के सेक्टर, सहकारी सेक्टर, घोषणा पत्र में यह मांग की गई थी कि क्रेडिट इंस्टीट्यूशंस और बीमा कंपनियों का राष्ट्रीयकरण हो, वस्त्र उद्योग, चीनी और सीमेंट उद्योग जिनकी आम आदमी को काफी मात्रा में आवश्यकता होती है उन्हें सार्वजनिक सेक्टर में रखा जाए। भारी उद्योग जैसे लोहा, इस्पात, बिजली, पावर, भारी रसायन, खान, जहाजरानी और रेलवे राष्ट्रीयकृत वर्ग में होना चाहिए। इन उद्योगों का प्रबंधन पूर्ण रूप से राज्य के हाथ में होना चाहिए। शेष उद्योगों को छोटे उद्यमियों में से ऐसे लोगों के हाथ में दिया जाना चाहिए जिनमें उद्योग के संगठन की क्षमता हो और जिन्होंने अनिश्चितता के समय में भी जोखिम उठाने की क्षमता दिखाई है।
सोशलिस्ट जहाँ कामगारों की ज़मीनी लड़ाई में आगे रहे है, वहीं आंदोलन के नये औजार और उसके वैचारिक पक्ष पर भी लीक से हटकर नये परिपेक्ष में मजदूरों के अधिकारों , चार्टर .मांगपत्र को भी गहन छान-बीन कर तथ्यों पर आधारित हकीकत से जोड़कर प्रस्तुत करते आये है। काग्रेसं सोशलिस्ट पार्टी के 84वे स्थापना दिवस (17 मई) के अवसर पर समाजवादी समागम की ओर से “समाजवादी घोषणा” पत्र प्रकाशित किया गया तथा इस दिशा में क्या होना चाहिए उसको भी रेखांकित किया गया। .
चार्टर में सरकार की मजदूर सम्बन्धित नीतियों का निचोड़ इन शब्दों में किया गया कि सरकार एक तरफा तरीकों से श्रम सुधारों के नाम पर वर्तमान श्रम कानूनों में संशोधन कर अपने कार्यक्रमो को गतिशीलता के साथ लागू कर रही है।.सरकार ने 44 केन्द्रीय श्रम कानूनों को समाप्त कर 4 कामगार एवं जन विरोधी, नियोजक समर्थक श्रम संहिताएँ औद्योगिक सम्बन्धो पर श्रम संहिता, वेतन पर श्रम संहिता, सामाजिक सुरक्षा पर श्रम संहिता तथा स्वास्थ्य एवं सुरक्षा पर श्रम संहिता बनाने का निर्णय ले लिया है। कुछ राज्य सरकारों ने कुछ मूलभूत श्रम कानूनों जैसे कारखाना कानून, औद्योगिक विवाद. अधिनियम ठेका कामगार कानून आदि को संशोधित कर दिया है। जन विरोधी, श्रमिक विरोधी नियोजन समर्थक उक्त संसाधनों सॉरी का उद्देश्य वर्तमान श्रम कानून में लंबे संघर्ष से प्राप्त श्रमिक हित वर्धक प्रावधानों को शिथिल संशोधित और समाप्त करना है।
हमारे देश में कार्यरत लाखो खेतिहर मजदूर अत्यंत दयनीय स्थिति में कार्य कर रहे है, उन्हें असीमित घंटे कार्य करना पड़ता है, पारिश्रमिक के नाम पर बहुत कम धनराशि ( जो अक्सर न्यूनतम वेतन से कम होती है ) दी जाती है, कोई कार्य सुरक्षा नहीं। इन खेतीहर मजदूरों के वेतन कार्य दशाओ में सुधार किया जाये तथा चिकित्सा लाभ एवं बुढ़ापे का सहारा पेंशन कि व्यवस्था की जाए। .
सोशलिस्ट मैनिफेस्टो समाजवादी समागम (दिल्ली) की ओर से हिन्द मजदूर सभा के महासचिव साथी हरभजन सिंह सिद्धू की और से प्रकाशित किया गया जिसको उन्होंने मजदूर संघो की कोआर्डिनेशन समिति को भी अग्रसारित किया जिसे समिति ने मंज़ूर कर कारवाई करने का इरादा जाहिर किया। .
हमें इस बात का फख्र हैं कि कामगारों द्वारा चुनी गई सबसे बड़ी यूनियन All Indian Railway Men’s Union द्वारा जॉर्ज फर्नांडिस के नेतृत्व में करवाई गई रेलवे हड़ताल, मजदूर आंदोलनों के इतिहास में दर्ज हो गई है। इससे बड़ी हडताल अभी तक हिंदुस्तान में कामगारों द्वारा नहीं हो पायी है। उसी तरह हिन्द मजदूर सभा जिसके साथ अनेकों मजदूर संघ जिनकी संख्या लाखों में है, वे इससे सम्बद्ध है।.मजदूर आंदोलन की एक बड़ी त्रासदी यह भी रही है कि कम्युनिस्ट विचारधारा वाली यूनियनों ने प्रतिस्पर्धा में सोशलिस्ट यूनियनों का प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से विरोध किया। खास तौर से पिछली काग्रेंसी सरकारों के शासन में क्योंकि कम्युनिस्ट पार्टी का तालमेल कभी खुला, कभी छुपा हुआ – कांग्रेस पार्टी के साथ रहा जिसके कारण उनकी यूनियनों को बढावा तथा सोशलिस्ट यूनियनों को नजरअंदाज किया गया।
अन्त में कहूंगा कि महान सोशलिस्ट नेताओं द्वारा स्थापित मजदूर यूनियनों ने अनेकों प्रकार के कष्ट उठाने, विरोध सहने के बावजूद मजदूरों के बीच में हमेशा आदर / समर्थन बनाये रखा। नतीजन आज भी HMS , All India Railway men’s यूनियनों को हमारे जुझारू नेताओ हरभजन सिंह सिद्धू (महामंत्री एचएमएस) तथा साथी शिवगोपाल मिश्रा अध्यक्ष( All India Raiway Men’s Union ) के कुशल नेत्तृव में दिन-प्रतिदिन बुलंदी पर हैं।

















