
जैसा कि केंद्रीय मंत्री रिजजु के मुताबिक लोक सभा स्पीकर के विरुद्ध अविश्वास मत 40 वर्षों बाद लाया गया है और उनके मुताबिक इस पर पहले पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और बाद में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव द्वारा महत्वपूर्ण टिप्पणी की है और उन्होंने पढ़ कर भी चर्चा के समय सुनाई। वैसे भाजपा संघ जवाहरलाल नेहरू और राजीव के साथ इत्तफाक नहीं रखते हैं पर फिर भी जब कभी भी फंसते हैं तो उन्हें मजबूरी में कोट करना पड़ता है यह होता है व्यक्ति का व्यक्तित्व!
खैर संसद में अविश्वास सरकारों पर लाया जाता है यह कोई नई बात नहीं है लोकतंत्र में व्यवस्था है ताकि सत्ता लोगों के प्रति जवाबदेह बने। भाजपा संघ क्योंकि सत्ता में इतनी मदमस्त है कि अपनी आलोचना और विरोध सह नहीं पाती है यह इनकी मानसिक दुर्बलता है और विरोध को धौंस से कुचलने में विश्वास रखती है। भाजपा संघ संवैधानिक पदों पर ऐसे लोगों को बैठाती है जो कठपुतली की तरह काम करें और ओम बिरला भी वही हैं। वो हमेशा सत्ता पक्ष को ऑब्लाइज करते नजर आते हैं। पिछले लोकसभा के समय से ही बहुत पक्षपातपूर्ण सदन को चलाते हैं।
पिछली लोकसभा में तो सौ के आसपास लोकसभा के सांसदों को निलंबित किया और फिर धड़ाधड़ विधेयक बिना चर्चा के पास किए जिसे रिजजू प्रोडक्शन की संज्ञा देते हैं। ठीक है विधयेक पास करवाना संसद का कार्य है पर इससे महत्वपूर्ण है कि विधेयक पर चर्चा हो और व्यापक चर्चा के बाद हो कानून बने यही सही मायने में लोकतंत्र है। दूसरे महत्वपूर्ण मसलों पर भी संसद में चर्चा होनी ही है। जैसे कि अब अमेरिका इजरायल ईरान युद्ध और इस युद्ध से मध्य पूर्व एशिया में हालात बने है और भारत अमेरिका डील एक पक्षीय है और दवाब में की गई है पर संसद में चर्चा होना जरूरी है। पर सत्ता पक्ष अपनी कमजोरियों को छुपाने के लिए इस पर चर्चा से भाग रही है। ऐसे ही पहलगाम आतंकी हमले और ऑपरेशन सिंदूर पर चर्चा को टालते नजर आए।
और जब चर्चा की तो सत्तापक्ष बहुत सी जानकारियां छुपाती रही। यह संसद के साथ देश के आवाम से एक किस्म का धोखा है जनता को जानने का अधिकार है कि आखिर सरकार की कारगुज़ारो क्या है और यह संसद में ईमानदार चर्चा से ही पता चलता है। इस बार भी लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के समय विपक्ष के नेता राहुल गांधी को एक सुनियोजित सत्ता पक्ष के योजना के तहत बोलने नहीं दिया क्योंकि राहुल गांधी महत्वपूर्ण तथ्य संसद के समक्ष पेश करने वाले हैं। बार बार लोकसभा स्पीकर विपक्ष के नेता को टोकते हैं। यह बिल्कुल संसदीय मर्यादा के अनुरूप नहीं है। ठीक है विपक्ष सत्ता पक्ष की दुखती नब्ज पर प्रहार करते हैं होना भी चाहिए यही लोकतंत्र की खासियत है।
भाजपा संघ जब विपक्ष थे तो इससे कहीं ज्यादा ऐसा करते थे हैं। तो अब वे क्यों अलोकतांत्रिक तरीके अपना कर विपक्ष की आवाज को दबा रहे हैं यह बहुत ही चिंताजनक है। दूसरी तरफ सत्ता पक्ष विपक्ष के नेता को संसदीय भाषा से संबोधित करते हैं। और इसमें प्रधानमंत्री स्वयं संसद और संसद के बाहर ऐसा आचरण कर रहे हैं। यह देश की आजादी के बाद पहली बार देखने को मिल रहा है। आज TMC की सांसद मोइत्रा ने ध्यान दिलाया कि पिछली लोकसभा में भाजपा संघ के सांसद बद्दूरी सांसद दानिश अली को संसद में गालियां देते रहे और उन्हें ओम बिरला ने न टोका और न ही निलम्बित किया। इसलिए लोकसभा स्पीकर ओम बिरला का पक्षपूर्ण रवैया भारतीय लोकतंत्र के लिए बहुत ही घातक है और उन्हें इस पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं है। यदि यह अविश्वास प्रस्ताव फेल भी होता है तो भी उन्हें इस पद पर बने नहीं रहना है उन्हें इस्तीफा दे कर खुद को अलग करना है। नहीं तो इनके हौसले और बुलंद होंगे और वे देश के लोकतांत्रिक व्यवस्था के साथ घोर अन्याय करेंगे।
जय हिंद जय लोकतंत्र जय संविधान
डॉ अशोक कुमार सोमल
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