23 मार्च 1931 को अंग्रेजी हुकूमत ने रात के अंधेरे में शहीदे आजम भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी के फंदे पर लटका दिया था और वे हंसते हंसते फांसी के तख्त पर चढ़े। ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने अपना बचाव भी नहीं किया। तीनों के उम्र 23 , 22 और 24 वर्ष थी यानी युवा अवस्था में देश के लिए कुर्बान हुए।
शहादत के समय से ही पूरा भारत इन तीनों को बड़े सम्मान से याद करते हैं। पर आज की युवा पीढ़ी उनके विचारों से से पूरी तरह से वाकिब नहीं हैं। शहीदे आजम भगत सिंह समाजवादी विचारों के थे । सांप्रदायिकता के बिल्कुल खिलाफ थे। खुद को नास्तिक कहते थे यानी वे अंधविश्वास के खिलाफ थे और तर्क संगत जीवन पद्धति में विश्वास करते थे वैज्ञानिक सोच के हिमायती थे। समता मुल्क समाज के हितैषी थे। किसी प्रकार के शोषण के विरुद्ध थे। वे कहते थे कि हमारी लड़ाई केवल ब्रिटिश साम्राज्यवाद के ही विरुद्ध नहीं है बल्कि किसी प्रकार के भी शोषण के विरुद्ध है अतः वे आजाद भारत को सभी प्रकार के शोषण से मुक्ति चाहते रहे हैं।
फिर अभी ध्यान दें कि यदि हम शहीदे आजम भगत सिंह के साथ राजगुरु सुखदेव जैसे हजारों शहीदों के साथ महात्मा गांधी को सच्ची श्रद्धांजलि देना चाहते हैं तो हमें आज के निजाम जिसमें भ्रष्टाचार बेइमानी बदमाशी धांधली सांप्रदायिकता अन्याय के साथ तानाशाही रवैया चरम पर है इनके विरुद्ध बहुत बड़ा आंदोलन खड़ा करना है। और ऐसा तंत्र बनाने के लिए संघर्ष करना जो हमारे स्वतंत्रता सेनानियों के सपने का भारत हो जिसमें हर नागरिक शान से जीवन जीने का अवसर मिले।
हम शहीदे आजम भगत सिंह राजगुरु सुखदेव के साथ देश पर मर मिटने वाले सभी शहीदों को शत शत नमन करते हैं और संकल्पित हैं कि उनके सपनों का भारत बनाने में तन मन धन अर्जित ज्ञान सब कुछ समर्पित है।
जय हिंद जय लोकतंत्र जय संविधान
डॉ अशोक कुमार सोमल
स्वराज सत्याग्रही व पर्यावरण एवं लोकतंत्र प्रेमी
लोकतांत्रिक राष्ट्रनिर्माण अभियान
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