बा(कस्तूरबा गांधी) : जिनके बिना ‘मोहन’ का ‘महात्मा’ होना अधूरा था

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Ba (Kasturba Gandhi): The one without whom 'Mohan's' transformation into 'Mahatma' would have been incomplete.

स्तूरबा गांधी, जिन्हें स्नेह से पूरा भारत ‘बा’ कहता है, भारतीय स्वाधीनता संग्राम की एक ऐसी मूक शक्ति थीं जिन्होंने अपने आत्म-बलिदान और दृढ़ निश्चय से इतिहास को प्रभावित किया। वे केवल गांधीजी की सहगामिनी ही नहीं, बल्कि उनकी सबसे बड़ी प्रेरणा भी थीं। गांधीजी के ‘मोहन’ से ‘महात्मा’ बनने की यात्रा में कस्तूरबा ने हर कदम पर उनका साथ दिया। जब भी बापू जेल गए, ‘बा’ ने स्वयं स्वाधीनता आंदोलनों की कमान संभाली और महिलाओं को शिक्षा एवं राष्ट्र-सेवा के लिए प्रेरित किया। उनके नेतृत्व में वह अदम्य साहस और धैर्य था, जिसने अहिंसक संघर्षों को और अधिक प्रभावी और मानवीय बनाया।

बापू और ‘बा’ का व्यक्तित्व एक-दूसरे में इस कदर रचा-बसा था कि उन्हें अलग करके देखना असंभव है। जी. रामचंद्रन के अनुसार, बापू के पद-चिन्हों की गहराई में ‘बा’ की मूरत समाई हुई है। वे सरलता, शुचिता और अटूट आत्मशक्ति का प्रतीक थीं, जिन्होंने कभी गांधीजी के ऊर्ध्वगामी मार्ग में बाधा नहीं डाली, बल्कि अपनी सहभागिता से उसे सुगम बनाया। साठ वर्षों के साझा सफर में कस्तूरबा ने अपनी व्यक्तिगत पहचान को सेवा और राष्ट्रभक्ति में विलीन कर दिया। आज उनकी विरासत हमें सिखाती है कि बिना शोर मचाए भी कैसे एक महान व्यक्तित्व समाज और राष्ट्र के भविष्य की आधारशिला रख सकता है। महादेव देसाई ने ठीक ही कहा था “गांधी का सचिव होना मुश्किल है मगर गांधी की पत्नी होना दुनिया में सबसे अधिक मुश्किल है।”

आजादी के अहिंसक संघर्ष की महत्वपूर्ण नेत्री होने के वाबजूद उनका कार्यक्षेत्र भले गांधीजी के हिमालयीन व्यक्तित्व जितना व्यापक न हो, लेकिन इसके बावजूद चार दशक तक चले भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में वे गांधीजी के साथ कदमताल करती रहीं। बा पहली महिला स्वतंत्रता सेनानी थी जो दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह करते हुए जेल में गईं और उनकी मृत्यु भी जेल में ही हुई।

कस्तूरबा गाँधी का जन्म 11 अप्रैल सन 1869 को काठियावाड़ के पोरबंदर नगर में हुआ था। लगभग निरक्षर होने के बावजूद कस्तूरबा के अन्दर एक व्यापक दृष्टि थी। उन्होंने ताउम्र बुराई का डटकर सामना किया और कई मौकों पर तो गांधीजी को चेतावनी देने से भी नहीं चूकीं। बकौल महात्मा गाँधी, “जो लोग मेरे और बा के निकट संपर्क में आए हैं, उनमें अधिक संख्या तो ऐसे लोगों की है, जो मेरी अपेक्षा बा पर कई गुना अधिक श्रद्धा रखते हैं”। गांधीजी ने स्वयं बा के बारे में लिखा कि “कस्तूरबा उनके जीवन की कारयित्री शक्ति और जीवन का अभिन्न अंग थीं ।” इसके वावजूद कई मौके ऐसे आये जब स्वयं गांधीजी कस्तूरबा को नहीं समझ पाए। बा ने जहां पत्नी धर्म पूरी निष्ठा से निभाया वहीं कई स्थानों पर अपने अधिकारों का बेझिझक उपयोग किया।

गांधीजी पर दुनियाभर में इतना लिखा गया है कि सही सही आंकिक जानकारी शायद ही किसी पर उपलब्ध हो। लेकिन दुर्भाग्य से बा के ऊपर ले देकर तीन महत्वपूर्ण पुस्तकें हमें उपलब्ध होती हैं। पहली गांधीजी के सहयोगी नरहरि पारीक की पुत्री बनवाला पारीक और सुशीला नैयर द्वारा लिखी पुस्तक ‘हमारी बा, दूसरी पुस्तक अरुण गांधी और उनकी पत्नी सुनंदा गांधी द्वारा लिखी गई “द फॉरगेटेन वूमेन” और तीसरी पुस्तक गिरिराज किशोर की “बा” है जो व्यापक शोध और प्रमाणिकता के साथ लिखी गयी है। इन तीनों पुस्तकों से हम माँ कस्तूरबा के जीवन की व्यापकता को कुछ हद तक समझ पाते हैं।

गांधीवादी रंगनाथ दिवाकर ने ठीक ही लिखा है
कि “कस्तूरबा के संबंध में संक्षेप में कुछ कह पाना दुष्कर है और यह उनके प्रति न्याय भी न होगा। उनके लिए यह कह देना कि सीता, सावित्री,अरुंधति अथवा यशोधरा सदृश थीं, अपर्याप्त होगा। हम केवल यह भी नहीं कह सकते कि वे रामकृष्ण की पत्नी शारदादेवी के सदृश थीं। इतिहास भले स्वयं को दोहराता हो ,किंतु व्यक्ति फिर से नहीं दुहराए जाते। कस्तूरबा कई कारणों से अद्वितीय थीं और उसका जीवन गांधीजी के असाधारण जीवन के लिए कई अर्थों में महत्वपूर्ण है। जिसके कारण वे 20 वीं सदी के पैगम्बर बन सके।”

भारत छोड़ो आंदोलन के बाद जब महात्मा गांधी, कस्तूरबा और महादेव देसाई को पुणे के आगा खां पैलेस में रखा गया तो महादेव देसाई ने कहा था कि बापू से पहले मुझे उठा ले। 15 अगस्त 1942 को भगवान ने महादेव की सुन ली और वे महात्मा गांधी की गोद में प्राण त्यागकर भगवान को प्यारे हो गए। महादेव को गांधीजी अपना पुत्र मानते थे । महादेव के मरने के सदमे के कारण कस्तूरबा की तबियत भी बिगड़ने लगी। गांधीजी ने अंग्रेजों के खिलाफ आगा खां पैलेस में आमरण अनशन की घोषणा की। चर्चिल ने बेबेल से गांधी के मरने के बाद उत्पन्न स्थिति से निपटने के लिए आगा खान महल में ही चुपके चुपके उनके अंतिम संस्कार की पूरी व्यवस्था के आदेश दिए।

भगवान को कुछ और ही मंजूर था। 22 फरवरी 1944 को शाम 7 बजकर 35 मिनिट पर जब महाशिवरात्रि पर मंदिरों के घण्टे घनघना रहे थे, कस्तूरबा, बापू की गोद में भगवान को प्यारी हो गईं। गांधीजी चाहते थे कि बा का अंतिम संस्कार बिल्कुल साधारण तरीके से हो लेकिन अंग्रेजों ने चन्दन की लकड़ी, शुद्ध घी के कनस्तर आगा खां महल में रख दिये। गांधीजी ने इसका विरोध किया और कहा कि मेरे जैसे साधारण आदमी की पत्नी का अंतिम संस्कार में चन्दन की लकड़ी और शुद्ध घी कैसे प्रयुक्त किये जा सकते हैं? अंततः मौलाना आजाद, सी. गोपालाचारी ने गांधीजी को समझाया कि ये सामग्री तोआपके अंतिम संस्कार के लिए रखी गयी थी, इसलिए आपकी धर्मपत्नी होने के नाते इस सामग्री को बा लिए प्रयुक्त किया जा सकता है। आखिर में गांधीजी मान गए । गांधीजी की इच्छा के अनुरूप आगा खां महल पूना में ही उनके प्रिय शिष्य महादेव के बगल में उनकी माँ तुल्य कस्तूरबा का अंतिम संस्कार किया गया। मां बेटे की समाधि के प्रतीक के रूप में दो पौधे आज भी लगे हुए हैं।

महान स्वतंत्रता सेनानी और राष्ट्र पिता महात्मा गाँधी की धर्मपत्नी मां कस्तूरबा के जन्मदिन पर उनके चरणों में सादर नमन।


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