— राजेश कुमार —
दिग्गज पत्रकार प्रभाष जोशी ने कभी डॉ प्रेम सिंह के बारे में ‘जनसत्ता’ के अपने लोकप्रिय कॉलम ‘कागद कारे’ में लिखा था “हमारे मित्र प्रेम सिंह भी कोई इलाज नहीं है। लाइलाज समाजवादी हैं।” संदर्भ लोहिया जन्मशती मनाने का था। वे मुलायम सिंह समेत किसी भी ‘सरकारी समाजवादी’ के साथ लोहिया जन्मशती मनाने के खिलाफ थे। खैर, क़रीब 20 सालों की संगत, उनका छात्र रहने और पत्रकार के तौर पर मैं यक़ीन के साथ कह सकता हूं कि उदारवादी शक्तियों और सांप्रदायिकता के खिलाफ समाजवाद की जमीन पर खड़े रह कर किया गया उनका संघर्ष इस बात का गवाह है कि वे किसी सूरत में समझौता नहीं कर सकते। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन पर लिखी गई उनकी पुस्तक ‘भ्रष्टाचार विरोध: विभ्रम और यथार्थ’ की भूमिका में ‘युवा संवाद’ हिंदी मासिक के संपादक और सक्रिय राजनीततिक कार्यकर्ता डॉ एके अरुण लिखते हैं, “पूंजीवाद और बहरतीय शासाक-वर्ग के गठजोड़ के विरुद्ध डॉ प्रेम सिंह वही काम कर रहे हैं जो पचास और साथ के दशक में डॉ लोहिया ने किया था।” वरिष्ठ पत्रकार और समाजवादी विचारक अरुण त्रिपाठी अक्सर अपने भाषणों में कहते हैं कि केवल डॉ प्रेम सिंह लगातार यह कहते रहे हैं कि देश में बाढ़ की तरह फैलती जा रही सांप्रदायिकता का संविधान विरोधी कारपोरेट पूंजीवाद के साथ सीधा रिश्ता है, जिसकी शुरुआत 1991 में नई आर्थिक नीतियों के साथ होती है।
डॉ प्रेम सिंह जिस दौर में सच बोल रहे हैं उस दौर में कई लोग ऐसे हैं जिनकी लेखनी के हमारे जैसे लोग क़ायल हुआ करते थे। लेकिन उनमें से अधिकांश लोगों ने बदलाव को भांपते हुए या तो तेवर बदल लिया या लिखना बंद कर दिया। ऐसे लोगों की तादाद लगातार बढ़ रही है, जिनकी आग उगलने वाली कलम अब पॉलिटिकल पोस्ट लिखने से घबराती है। लेकिन इस दौर में भी डॉ प्रेम सिंह का तेवर ज़रा भी नहीं बदला। ये सच है कि रोशनी बिखेरने वाली तमाम मीनारें दरक रही हैं, टूट रही हैं, अंधेरी रात में टिमटिमाने वाले जुगनू कम हो रहे हैं। बावजूद इसके हम जब डॉ प्रेम सिंह की तरफ देखते हैं तो हमें लगता है कि अभी भी ऐसे लोग हैं जो सच बोलने, लिखने और राजनीतिक संघर्ष करने का साहस रखते हैं।
एक व्यक्तित्व, एक विचार, एक सतत संघर्ष:
दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के पूर्व शिक्षक डॉ प्रेम सिंह के 70वें जन्मदिन पर उन्हें याद करना सिर्फ एक शिक्षक को याद करना भर नहीं है, बल्कि एक पूरे दौर की वैचारिक प्रतिबद्धता, संघर्ष और बेबाकी को सलाम करना भी है। वे उन दुर्लभ शिक्षकों में रहे हैं, जो सिर्फ कक्षा तक सीमित नहीं रहे, बल्कि छात्रों और युवाओं के बीच एक विचार, एक ऊर्जा और एक भरोसे के रूप में स्थापित हुए। यही कारण है कि वे जितने अपने समय में लोकप्रिय थे, उससे ज्यादा आज लोकप्रिय हैं। डॉ प्रेम सिंह ने विश्वविद्यालय और हिन्दी विभाग के भीतर छात्रों के अधिकारों के लिए लगातार संघर्ष किया। यह लड़ाई पद, प्रतिष्ठा या व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं, बल्कि उस शिक्षा-व्यवस्था के लिए थी जिसके केंद्र में छात्र थे। उनका ये संघर्ष सेवानिवृति के बाद भी थमा नहीं है, विद्यार्थियों के हक़ के लिए वे आज भी उसी जिद और जुनून के साथ खड़े रहते हैं।
उन्होंने पूर्वी दिल्ली से 2009 और 2014 में दो बार लोकसभा का चुनाव लड़ा। 2014 के चुनाव में मैं भी उनके साथ सक्रिय था। बतौर पत्रकार भी मैंने उनके चुनाव प्रचार को क़रीब से देखा। डॉ प्रेम सिंह और उनके छात्रों-शुभचिंतकों और देश भर से जुटे समाजवादियों की टोली पूर्वी दिल्ली की सड़कों प्रचार करती नज़र आती। हमने सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार डॉ प्रेम सिंह को खुद परचा बांटते भी देखा है। वे चुनाव भी खांटी समाजवादी शैली में लड़ते थे। नुक्कड़ सभाएं होती, पर्चे बांटे जाते और समाजवादी साथी अपनी बात रखते। 2014 के चुनाव में सच्चर साहब और कुलदीप नैयर जैसी शख्सियत को मैंने उम्र के आखिरी पड़ाव में डॉ प्रेम सिंह के लिए पूर्वी दिल्ली की गलियों में भटकते देखा है। मुझे अच्छी तरह याद है, जब पूर्वी दिल्ली में पर्चा बांटने के क्रम में जामिया इलाक़े के एक ज्वैलरी दुकानदार से सच्चर साहब ने कहा था कि ‘जितना खरा आपका कारोबार (सोने का) है उतना ही खरा हमारा उम्मीदवार है’। इसके बाद बाटला हाउस की चुनावी सभा में सच्चर साहब ने कहा था कि बीजेपी की सांप्रदायिक और नवउदारवादी राजनीति का मुक़ाबला केवल डॉ प्रेम सिंह जैसे लोग कर सकते हैं।
राजनीति में भी डॉ प्रेम सिंह का रास्ता वही रहा, स्पष्ट, समाजवादी, सिद्धांतनिष्ठ और अडिग। ऐसे समय में जब विचारधाराएं अक्सर सुविधा के हिसाब से बदल दी जाती हैं, प्रेम सिंह ने कभी रत्ती भर भी समझौता नहीं किया। चाहे अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार रही हो, मनमोहन सिंह का दौर हो या नरेंद्र मोदी का वर्तमान समय, डॉ प्रेम सिंह की आवाज़ में कोई बदलाव हमने कभी महसूस नहीं किया।
दूरदृष्टि वाले नागरिक एवं विचारक:
अन्ना आंदोलन और अरविंद केजरीवाल के उभार के वक्त, जब अधिकांश लोग एक उत्साह में बह रहे थे, तब डॉ प्रेम सिंह ने उस आंदोलन का गहराई से विश्लेषण किया। उन्होंने बिल्कुल शुरुआत में टीम अन्ना और केजरीवाल कंपनी की असलीयत भांप ली। नतीजा, जब ज्यादातर बुद्धिजीवी अन्ना हजारे और केजरीवाल को समर्थन देने को उतावले होने लगे तो डॉ प्रेम सिंह ने एक के बाद एक कई लेख लिखकर तथाकथित भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की पोल खोलनी शुरू की। तथाकथित भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की आलोचना करते हुए लेख डॉ प्रेम सिंह की क़िताब ‘भ्रष्टाचार विरोध: विभ्रम और यथार्थ’ में संकलित है। उस वक्त उन्होंने इस आंदोलन के परिणाम को लेकर जो आशंका जाहिर की, बाद के दिनों में सच साबित हुई। हालांकि अन्ना आंदोलन के वक्त उन्हें कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा, लेकिन वे अडिग रहे। अन्ना आंदोलन पर उनके लेख इस बात का प्रमाण है कि वे सिर्फ प्रतिक्रिया नहीं देते, बल्कि समय की नब्ज को पहचानकर उसकी परतें खोलते हैं।
डॉ प्रेम सिंह उन लोगों में शामिल हैं जो लगातार सक्रिय रहते हैं। जब वे दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में थे तब भी जल्दी चले आते थे और अक्सर देर तक अलग-अलग कार्यक्रमों में सक्रिय रहते थे। उनके सफल शिष्यों की एक लंबी श्रृंखला है। कई छात्र आज भी देश भर के विश्वविद्यालयों में शिक्षण कार्य कर रहे हैं, कई छात्र आज अखबारों में, टीवी चैनलों में या दूसरे समाचार माध्यमों में सेवाएं दे रहे हैं। और कई ऐसे हैं जो राजनीतिक कार्यकर्ता के तौर पर बेहतर कर रहे हैं। उनकी शख्सियत ही ऐसी है कि, आज भी अगर हिन्दी विभाग में, किसी विश्वविद्यालय में, किसी समाचार पत्र या टीवी चैनल में या किसी राजनीतिक पार्टी के दफ्तर में अगर कोई मुठ्ठी बांधकर सच बोलने की हिम्मत कर जाए तो अचानक उस शख्स में डॉ प्रेम सिंह की छवि दिखने लगती है।
नवउदारवाद बनाम सांप्रदायिकता:
डॉ प्रेम सिंह अक्सर कहते हैं कि सांप्रदायिकता से बड़ी समस्या नवउदारवाद की है। उनके अनुसार, देश की बड़ी आबादी को सांप्रदायिक बहसों में उलझाकर इसलिए रखा जाता है ताकि नवउदारवादी एजेंडा आसानी से लागू किया जा सके। आज हम विकास के जिस आर्थिक मॉडल की बात करते हैं उसमें इस देश के 90-95 फीसदी लोगों की कोई जगह ही नहीं बचती है। नतीजा 5 प्रतिशत से कम आबादी का हित साधने के लिए 95 प्रतिशत की आबादी को सांप्रदायिक झगड़ों में झोंक दिया गया है। डॉ प्रेम सिंह ये बात अक्सर कहते हैं कि आज की कांग्रेस, जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी या राजीव गांधी की कांग्रेस नहीं रह गई है, ये पार्टी एक बदली हुई राजनीतिक-आर्थिक सोच को लेकर चल रही है। ये न तो आजादी के आंदोलन वाली कांग्रेस है और न ही आजादी के बाद राष्ट्र के नवनिर्माण में अग्रणी भूमिका निभाने वाली कांग्रेस है। वे 1991 में नरसिम्ह राव की सरकार में नई आर्थिक नीतियां लागू करते वक्त अटल बिहारी वाजपेयी के भाषण को भी कोट करते हैं जिसमें उन्होंने कहा था कि, ‘कांग्रेस ने अब हमारा काम आसान कर दिया है’।
आंदोलन, संवाद और निरंतर सक्रियता:
डॉ प्रेम सिंह अपनी नौजवानी के शुरुआती दिनों से ही समाजवादी विचारधारा की राजनीति में सक्रिय हो गए। वे न केवल देश भर के समाजवादियों से संवाद करते थे, बल्कि हर स्तर पर सक्रिय रहकर संघर्षों और आंदोलनों में भागीदारी भी करते थे। इसी सिलसिले में महत्वपूर्ण कड़ी थी सोशलिस्ट पार्टी का पुनर्गठन। सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना 2011 में हैदराबाद में हुई थी। उस वक़्त मेरी नौकरी हैदराबाद में ही थी। मुझे उस दो-दिवसीय स्थापना सम्मेलन को देखने-सुनने का मौका मिला था। इतने लंबे अंतराल के बाद सोशलिस्ट पार्टी के पुनर्गठन का मकसद था कि समाजवादी विचारों में आस्था रखने वाले सभी लोगों को एक राष्ट्रीय मंच उपलब्ध कराना और मौकापरस्त और सत्ता से चिपके समाजवादी नाम वाली पार्टियों के बरक्स एक राष्ट्रीय विकल्प तैयार करना। स्थापना सम्मेलन में 21 राज्यों के प्रतिनिधि आए थे। सम्मेलन को प्रो. केशवराव जाधव, राजेंद्र सच्चर, भाई वैद्य, पन्नालाल सुराणा, बलवंत सिंह खेड़ा, कुलदीप नैयर जैसे वरिष्ठ सोशलिस्ट नेताओं और विचारकों समेत समाजवादी जन परिषद के तत्कालीन अध्यक्ष लिंगराज ने संबोधित किया था।
सम्मेलन में भाई वैद्य को पार्टी का अध्यक्ष और डॉ. प्रेम सिंह को महासचिव व प्रवक्ता बनाया गया था। महासचिव की जिम्मेदारी मिलने के बाद डॉ प्रेम सिंह लगातार सक्रिय रहे और बाद में राष्ट्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी संभाली। सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) में डॉ प्रेम सिंह के महासचिव और फिर अध्यक्ष रहते पार्टी ने निजीकरण-निगमीकरण के खिलाफ राजधानी दिल्ली और देश के अन्य हिस्सों में कई बड़े कार्यक्रम किए। सबका यहां जिक्र संभव नहीं, लेकिन कुछ बड़े कार्यक्रम हुए जिनका जिक्र जरूरी है। 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम की याद में पार्टी 10-11 मई को हर साल कार्यक्रम करती थी। जिस साल लाल किला का रख-रखाव एक व्यापारिक घराने को सौंपा गया सोशलिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं ने 10 मई को मेरठ स्थित क्रांति-स्थल से दिल्ली दरवाजा और लाल किला तक मार्च निकाला। कई साल पहले ही यूपीए सरकार के कार्यकाल में पार्टी ने बहादुरशाह जफर के अवशेष यांगून से दिल्ली लाने की मांग का ज्ञापन राष्ट्रपति को सौंपा था। दूसरा बड़ा कार्यक्रम अगस्त क्रांति की याद में होने वाला सालाना आयोजन था जिसे पार्टी ज़ोर शोर से मनाती थी। पार्टी की युवा इकाई सोशलिस्ट युवजन सभा (एसवाईएस) के सक्रिय सहयोग से किए जाने वाले इन आयोजनों का मकसद नवउदारवाद पर निर्णायक चोट करना और नव-साम्राज्यवाद विरोधी राष्ट्रीय चेतना को मजबूत करना था। साथ ही पार्टी की ओर से जारी होने वाले प्रस्ताव, ज्ञापन, प्रेस विज्ञप्ति आदि नवउदारवादी नीतियों के विरोध के साथ एक मुकम्मल विकल्प प्रस्तुत करते थे। इनका स्थायी महत्व अब भी है और पुस्तकाकार प्रकाशित होने की सूरत में ये दस्तावेज महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
सशिक्षा के निजीकरण और बजारिकरण का सवाल हो, देश की सौ ऐतिहासिक धरोहरों सहित लाल क़िला, जिसकी प्राचीर से हर स्वतंत्रता दिवस पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया जाता है, का रख-रखाव निजी हाथों में सौंपने की बात हो, रेलवे जैसे वृहद विभाग का बड़े पैमाने पर निजीकरण करते जाने का फैसला हो, या फिर इस तरह के अन्य दूसरे फैसले, डॉ प्रेम सिंह के नेतृत्व में सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) की तरफ से मजबूत विपक्ष की मिसाल देखने को मिली। देश में जब एक के बाद एक मॉब लिन्चिंग की घटनाएं घटनी शुरू हुई, उसी दौरान दिल्ली से फरीदाबाद के बीच ट्रेन में एक और मॉब लिन्चिंग की घटना हुई। सांप्रदायिकता के इस जघन्य रूप की ओर समाज का ध्यान खींचने के लिए डॉ प्रेम सिंह ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक सप्ताह का अनशन किया था। ये ऐसी घटनाएं थीं जिसका वैचारिक राजनीति के लिहाज़ से दूरगामी असर पड़ता था। ख़ैर, बाद के दिनों में डॉ प्रेम सिंह ने यह देख कर कि पार्टी के साथी लंबे संघर्ष में लगे रहने के बजाय ठहराव का शिकार हो रहे हैं, उन्होंने 2019 के आम चुनाव के बाद अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। तब से वे भारत संवाद अभियान के तहत देश में नागरिक चेतना फैलाने का काम कर रहे हैं। बिहार के साथी विजेंद्र यादव ने इस अभियान की कमान सम्हाली हुई है।
समाजवादी राजनीतिक विकल्प के हिमायती:
कोई मुख्यधारा राजनीतिक या एनजीओ सपोर्ट न होने के बावजूद डॉ प्रेम सिंह ने पूरे देश में समाजवादी धारा के प्रति प्रतिबद्ध युवाओं की एक मजबूत टोली तैयार की है। ऐसे ही युवाओं ने 31 अक्टूबर- 1 नवंबर 2025 को देश की राजधानी दिल्ली में दो-दिवसीय युवा सोशलिस्ट सम्मेलन का शानदार आयोजन किया। डॉ प्रेम सिंह के मार्गदर्शन में जिस टीम ने इस सम्मेलन को सफल बनाया मैं भी उसका हिस्सा था। केवल 4 महीना पहले इस कार्यक्रम की परिकल्पना की गई, कार्यक्रम करने पर सहमति बनी, युवा सोशलिस्ट पहल (यूथ सोशलिस्ट इनिशिएटिव) की टीम का गठन हुआ और फिर तैयारी का सिलसिला शुरू हुआ। कार्यक्रम के आयोजन में एक तरफ जहां दिल्ली/एनसीआर के युवा समाजवादी साथियों ने महती भूमिका निभाई, वहीं पूरे देश के कई वरिष्ठ समाजवादी बुद्धिजीवियों और नेताओं ने तत्परता के साथ हर तरह की मदद की। उनमें से कई ने लंबी यात्रा करके सम्मेलन में सक्रिय हिस्सेदारी भी की। देश के कई राज्यों से युवा साथी कार्यक्रम में पहुंचे और सभी प्रस्तावों पर होने वाली चर्चा को जीवंत बनाया। दिल्ली, जवाहरलाल और जामिया विश्वविद्यालयों की छात्राओं और छात्रों ने सम्मेलन में बड़ी संख्या में सक्रिय हिस्सेदारी करके इसे एक सार्थक आयोजन बनाया। अन्य परिवर्तनकारी विचारधाराओं और राजनीति से जुड़े कई नौजवान और वरिष्ठ साथियों ने सम्मेलन में होनी वाली चर्चाओं को समृद्ध बनाया। सबसे अहम ये है कि इतना बड़ा कार्यक्रम पूरी तरह आम कार्यकर्ताओं से चंदा लेकर आयोजित किया गया। जिसने प्रतिकूल राजनीतिक परिस्थिति के बीच भी समाजवादी आंदोलन के 90 साल पूरे होने पर देश की राजधानी में एक दमदार मौजूदगी दर्ज कराई। सोककियालिस्ट आंदोलन के 100 साल पूरे होने तक युवा सोशलिस्ट पहल के कार्यक्रम जारी रहेंगे।
डॉ. प्रेम सिंह समाजवादी चिंतकों एवं नेताओं में डॉ लोहिया और किशन पटनायक से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। शायद इसका करण यह है कि लोहिया ने आजादी के आंदोलन और स्वतंत्र भारत में किसी भी तरह की साम्राज्यवादी गुलामी का डट कर विरोध किया तो किशन पटनायक ने नवसाम्राज्यवाद के दौर की गुलामी का डट कर विरोध किया; दोनों ने ही साम्राज्यवाद का एक समुचित सैद्धांतिक-राजनीतिक विकल्प भी पेश किया। हम उनके छात्र और सहयोगी 70वें जन्मदिन पर उन्हें हार्दिक शुभकामनाएं देते हैं। हम कामना करते हैं कि वे स्वस्थ रहें, सक्रिय रहें और अपनी बेबाक आवाज़ से हमें मार्गदर्शन देते रहें। हम यह भरोसा भी जताते हैं कि उनके संघर्ष में हम सहभागी हैं और आगे भी रहेंगे।
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