कंधे पर बहन की हड्डियां और फ़ुटबॉल के ठहाके – डॉ योगेन्द्र

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सुबह- सुबह बूँदों से लदे बादल आकाश में मँडरा रहे हैं । हवा में फ़िलहाल ठंडक बस गयी है । अप्रैल का आख़िरी समय है। बंगाल का चुनावी कुहराम आज पूरी तरह से थम जाएगा । सभी सरकारी महारथी देश के अन्य कोनों पर विजय प्राप्त करने चल पड़ेंगे । देश के छँटे हुए पुलिस अधिकारी बंगाल में राजनेताओं को भी धमकी देने से नहीं चूक रहे। यह सच है कि बंगाल में नवजागरण पहले आया। राजाराम मोहन राय, बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय, रामकृष्ण परमहंस,स्वामी विवेकानंद, ईश्वर चंद्र विद्यासागर, रवींद्रनाथ ठाकुर, सुभाष चन्द्र बोस , क़ाज़ी नज़रुल इस्लाम आदि हुए । ज्ञान का प्रसार भी पहले हुआ । कलकत्ता विश्वविद्यालय सबसे पुराने विश्वविद्यालयों में एक है। बावजूद इसके बंगाल में हिंसा भी एक महत्वपूर्ण कारक है। 1967 में नक्सलवाद का उदय हुआ । सामाजिक और आर्थिक गैर बराबरी इसकी जड़ में थी। बंगाल पर धीरे-धीरे वामपंथ ने क़ब्ज़ा जमाया । पूरे पैंतीस वर्ष तक राज किया । वामपंथियों के गिरोह बने । ऐसे गिरोह जिसे विचारधारा से कोई मतलब नहीं था। चुनाव में बूथ पर क़ब्ज़ा जमाना उनकी आदत थी। फिर ममता बनर्जी आयी। वह गिरोह इनके साथ लग गई । उसे तोड़ने के लिए प्रधानमंत्री का गिरोह बंगाल आया । दोनों में रस्साकसी जारी है । दोनों की लड़ाई में लोकतंत्र सुषुप्तावस्था में है। दोनों में से कौन ज़्यादा ख़तरनाक है, इसका आकलन कर हम सबने अपनी – अपनी पक्षधरता क़ायम कर ली है। खैर ।

नरेंद्र मोदी जी अकेले प्रधानमंत्री हैं जो कई बार रोये । वह भी घर में नहीं, सार्वजनिक मंचों पर रोये । लगता है कि उनका ह्रदय बात- बात में पिघल जाता है, मगर आश्चर्य होता है कि उनका ह्रदय मणिपुर, कठुआ, हाथरस, किसान आंदोलन में शहीद हुए किसान आदि पर क्यों नहीं पिघले ? क्या उनका ह्रदय रिमोट से चलता है? मणिपुर में जितनी वीभत्स घटना हुई, उस पर प्रधानमंत्री चुप रहे। दो दिन पहले उड़ीसा में घटी घटना पर किसका दिल नहीं रोया होगा? पाँच किलोमीटर से अपनी बहन कालरा की लाश कब्र से उखाड़कर कंधे पर लाद कर जीतू मुंडा बैंक के दरवाज़े पर इसलिए पहुंचता है कि बैंक अधिकारियों के सामने यह सबूत पेश कर सके कि उसकी बहन मर चुकी है । देश में करोड़ों लोग हैं जिनके पास माँ-बाप , बेटा- बहू और बहन- भाई के मरने के सरकारी दस्तावेज नहीं होते । लोग मरते हैं, प्रथानुसार कोई लाश को जलाता है, कोई गाड़ता है। जीतू मुंडा की बहन के खाते में 19,300 रुपये हैं। वह बैंक अधिकारी के पास जाकर गिड़गिड़ाता है कि उसकी बहन मर चुकी है । पैसा दे दीजिए । बैंक अधिकारी या तो बहन को लाने या मृत्यु प्रमाण पत्र लाने के लिए कहता है। रोजमर्रे की ज़िन्दगी मुश्किल से जी रहे आदमी के पास राजकीय ज्ञान नदारद होता है। जीतू मुंडा को कुछ समझ में नहीं आता। वह बहन की लाश उखाड़ कर कंधे पर लाद लेता है। रास्ते कितने लोग मिले होंगे, कितने थाने होंगे, सरकारी कार्यालय होगा, कितने पास मोबाइल होगी- क्या प्रशासन और सरकार को इसकी ख़बर नहीं मिली? चाँद पर दौड़ कर जा रहे हैं । पीठ थपथपा रहे हैं और पड़ोस के बारे में कुछ पता नहीं ।

समय का व्यंग्य यह है कि अपने को कट्टर राष्ट्रवादी कहनेवाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जर्सी पहनकर उसी वक़्त फ़ुटबॉल खेल रहे हैं । बारह साल से प्रधानमंत्री हैं, क्या उन्हें देश की हालत का अंदाज़ा नहीं है? क्या दिमाग़ एकदम भोथरा हो गया है? हिन्दू- मुसलमान करने से देश उन्नत होगा या ड्रेस बदलने से ? प्रधानमंत्री पर कभी-कभी दया आती है । यह आदमी वोट के लिए अपना चेहरा तक काला करवा लेता है । विकास के नाम पर एक तरफ हम अड़ानी को देश लुटा दें और दूसरी तरफ़ करोड़ों जीतू मांझी की चिंदी ज़िंदगियाँ! सचमुच नैशांधकार चतुर्दिक फैल गया है।


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