अकेला राही, अटूट विश्वास: नोआखाली के खेतों में गूंजता ‘एकला चलो रे’

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Noakhali

तारीख थी 1 जनवरी, 1947 जब पूरी दुनिया नए साल के जश्न में डूबी हुई थी, बंगाल के श्रीरामपुर (नोआखाली) की एक धूल भरी झोंपड़ी में इतिहास का एक नया अध्याय लिखा जा रहा था। मिट्टी के धरातल पर सोया हुआ 77 वर्ष का वह वृद्ध कोई साधारण व्यक्ति नहीं था। वह भारत का राष्ट्रपिता था जिनकी हड्डियों के ढांचे में ब्रिटिश साम्राज्य को हिला देने वाली फौलादी शक्ति छिपी थी।

​गांधी जी का व्यक्तित्व भौतिक रूप से सामान्य और दुर्बल दिखता था। 5 फीट का कद और महज 114 पाउंड का वजन। बड़े कान, उभरी हुई नाक और बिना दांतों का वह चेहरा—जिसे प्रकृति ने सुंदर बनाने की कोशिश नहीं की थी। लेकिन उस झुर्रियों भरे चेहरे पर जो आत्मविश्वास चमकता था, उसने दुनिया के सबसे बड़े साम्राज्य की जड़ों को खोखला कर दिया था।

​उनका अनुशासन यन्त्रवत था। दोपहर के ठीक बारह बजे पेडू और सिर पर गीली मिट्टी की पट्टी रखना उनके प्राकृतिक उपचार का हिस्सा था। उनके पास ‘संपत्ति’ के नाम पर एक इस्पाती फ्रेम का चश्मा, भोजन के समय प्रयुक्त होने वाले नकली दांत, एक चरखा, तीन बंदरों की छोटी सी मूर्ति और कुछ धार्मिक पुस्तकें। लेकिन इसी सीमित संसाधनों वाले व्यक्ति ने दुनिया को वह रास्ता दिखाया जिसकी मिसाल कहीं नहीं मिलती।

​गांधी जी केवल एक राजनेता नहीं थे, वे एक ‘मौलिक क्रांतिकारी’ थे। उन्होंने युद्ध के मैदान को ही बदल दिया। जब दुनिया तोपों और मशीनगनों के शोर से गूंज रही थी, गांधी जी ने खामोशी, धैर्य और प्रार्थना को अपना हथियार बनाया। उन्होंने सिखाया कि दुश्मन को मारने से बेहतर है उसका हृदय जीत लेना।

​यूरोप के तानाशाहों ने अपने समर्थकों को रंगीन गणवेश,खाकी और डरावनी टोपियां पहनाईं और तमगे दिए, लेकिन गांधी ने अपने अनुयायियों को ‘खादी’ पहनाई। हाथ से कता हुआ वह सूती कपड़ा केवल वस्त्र नहीं, बल्कि एकता और स्वावलंबन का मनोवैज्ञानिक प्रतीक बन गया। जिसने खादी पहनी, वह जात-पात और ऊंच-नीच से ऊपर उठकर एक-दूसरे का भाई हो गया।

​नोआखाली की वह यात्रा गांधी जी के जीवन की सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक थी। चारों तरफ हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिकता की आग लगी थी। सदियों पुरानी नफरत और हिंसा की जड़ों ने भारत की भूमि को जकड़ रखा था। ऐसे समय में, जब लोग एक-दूसरे के खून के प्यासे थे, गांधी जी अकेले शांति की अलख जगाने निकल पड़े।

देश के जन जन तक अपनी बात पहुंचाने का, गांधीजी का सबसे मौलिक तरीका थीं उनकी प्रार्थना-सभाएं। शहरों हों या गांव, लन्दन की झोंपड़पट्टी हों अंग्रेजों की जेल, गांधीजी जहां होते, शाम को अपनी प्रार्थना सभा का आयोजन जरूर करते। उन सभाओं में वे जो भी कहते, वह एक मुंह से दूसरे मुंह, एक अखबार से दूसरे अखबार,एक समूह से दूसरे समूह सारे भारत में जन जन तक पहुंच जाता था।

​हाथ में लकड़ी का चम्मच, मिट्टी का कुल्हड़ और हृदय में ईश्वर का नाम लिए जब वे चावल के खेतों के बीच से गुजरते थे तो दुबले-पतले झुकी हुई कमर वाले शरीर की छाया जहां से गुजरती, वहाँ उन्माद धीरे-धीरे ठंडा पड़ने लगता। अपने अदम्य उत्साह से प्रेरित होकर जब गांधीजी का सीमित काफिला अपने दुखते हुए नंगे पाँव घसीटता हुआ गाँव-गाँव घूमता तो पीड़ित मानवता के घावों पर अपना प्रेम का मरहम लगाता हुआ निकल जाता था। उनकी गुनगुनाहट फिजाओं में तैरती थी— “यदि तेरी पुकार सुनकर कोई न आए, तो चल अकेला, चल अकेला…” रवींद्रनाथ टैगोर का यह गीत गांधी जी के उस अटूट आत्मविश्वास का परिचायक था, जो उन्हें भीड़ से अलग एक ‘महात्मा’ बनाता था।

​गांधी जी ने अपने अनुयायियों को कोई सुख-सुविधाओं का सपना नहीं दिखाया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि मेरे साथ चलने का अर्थ है— नंगे फर्श पर सोना, सादा भोजन करना और यहाँ तक कि स्वयं का संडास साफ करना। यह आत्म-शुद्धि का वह मार्ग था जिसने भारतीय जनता के भीतर सोए हुए आत्मसम्मान को जगा दिया।

​आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो गांधीजी का वह रूप किसी चमत्कार से कम नहीं लगता। वह वृद्ध, जो शारीरिक रूप से अत्यंत कमजोर था, मानसिक रूप से इतना प्रबल था कि ब्रिटिश प्रधानमंत्री को मजबूर होकर भारत की आजादी का रास्ता ढूंढना पड़ा।

​गांधी का जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि हिंसा केवल प्रति-हिंसा को जन्म देती है, लेकिन अहिंसा और सत्य वह प्रकाश हैं जो घोर अंधकार में भी रास्ता दिखा सकते हैं। श्रीरामपुर की वह दोपहर और वह बूढ़ा आदमी आज भी हमें याद दिलाता है कि असली शक्ति हथियारों में नहीं, बल्कि अडिग नैतिक चरित्र में होती है।
​”एक दुबला-पतला शरीर, एक हाथ में लाठी और दूसरे में सत्य की मशाल—यही थे महात्मा गांधी।”

मूल स्त्रोत: फ्रीडम एट मिडनाइट


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