क्या ‌‌ऐसे भाजपा को हराया जा सकता है? – प्रोफेसर राजकुमार जैन

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Raj kumar Jain

श्चिम बंगाल,असम, पांडूचेरी,में भाजपा ने जीत के लिए क्या-क्या हथकंडे अपनाए हैं, हर कोई इससे वाकिफ है परंतु सवाल है कि इसका मुकाबला कैसे किया जाए। जितने भी विरोधी दल हैं उनकी संगठनात्मक संरचना कैसी है तथा भाजपा की कैसी इसको जानना बेहद जरूरी है।

इस बात में कोई शक सुबहा नहीं कि भाजपा की सारी रणनीति हिंदू मुसलमान की खाई को चौड़ा करने की गोलबंदी पर टिकी है। परंतु इस नीति को‌ ज़मीनी जामा‌ पहनाने में अगर आरएसएस जैसे फौलादी, जमीनी पकड़ वाले संगठन के कार्यकर्ताओं की फौज जी जान से न जुटी होती तो प्रधानमंत्री की लाख चाहत और जुमलेबाजी के बावजूद जीत हासिल नहीं हो सकती थी। 1925 में बना संघ 100 साल की लंबी यात्रा में कैसे अपनी विचारधारा, संगठन, अनुशासन से बंध कर उसके स्वयंसेवक दुर्गम रास्तों, झंझावातों को झेलते हुए जीतोड़ मेहनत के बल पर आगे बढ़ा इसको जानना ‌ अत्यंत जरूरी है।

दिल्ली का बाशिंदा होने के कारण मैंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कार्य प्रणाली को बहुत नजदीक से देखा है। आरएसएस ‌ द्वारा राजनीतिक पार्टी बनाकर सियासत शुरू करने के लिए दिर्ल्ली की एक धर्मशाला में चंद लोगों की मौजूदगी में‌ जनसंघ की स्थापना हुई थी। हिंदुस्तान में पहली बार दिल्ली में म्यूनिसिपल कमेटी के चुनाव में‌ पाकिस्तान से आए हुए बड़ी तादाद में शरणार्थियों तथा दिल्ली के बनियों के समर्थन से उनकी जीत से शुरू हुई थी। इनकी जीत के जुलूस का कारवां बढ़ते बढ़ते बिहार‌, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश राजस्थान, उत्तराखंड, हरियाणा, ‌ अब बंगाल, पांडिचेरी, असम तक जा पहुंचा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के भारतीय जनता पार्टी के अलावा‌ 100 से अधिक सहमना संगठन जैसे बजरंग दल, भारतीय मजदूर संघ, विद्यार्थी परिषद, पूर्व सैनिक परिषद, सेवा भारती, भारतीय किसान संघ राष्ट्र सेवा भारती, राष्ट्र सेविका समिति, विश्व हिंदू परिषद, हिंदू स्वयंसेवक संघ, स्वदेशी जागरण मंच,‌ वनवासी सेवा संघ, लघु उद्योग भारती, भारतीय विचार केंद्र, विश्व संवाद केंद्र, राष्ट्रीय सिंह सिख संगत, हिंदू जागरण मंच, विवेकानंद केंद्र‌‌ जैसे नामों से भी‌ कार्यरत है।

इन संगठनों में लाखों कार्यकर्ता जिसमें हजारों पूर्ण कालिक भी हैं, चाहे कैसा भी मौसम हो, आंधी तूफान हो कड़कती सर्दी में भी किसी भी हिंदू की नई नस्ल के लड़के को भोर में आवाज लगाकर शाखा में शामिल करने की कवायद इनकी ओर से मुसलसल जारी रहती है। वहां शिक्षण के नाम पर हिंदू गौरव तथा मुस्लिम नफरत का पाठ पढ़ाया जाता है। सत्ता का जितना दोहन भाजपा अपने संगठन के फैलाव के लिए करती रही इसका अंदाजा लगाना आसान नहीं। दिल्ली में हर जिले में करोड़ों की मिल्कियत के उनके अपने कार्यालय हैं। झंडेवालान में नयी तामीर‌ की गई‌ आरएसएस की भव्य इमारत का बड़ी से बड़ी इमारत भी उसका मुकाबला नहीं कर सकती। कनॉट प्लेस से सटे हुए सबसे आलीशान, महंगे इलाके दीनदयाल मार्ग में कम से कम 800 गज से लेकर 2000 गज के भूखंडों पर 8-१० बिल्डिंगों में उनके संगठन कार्यरत हैं। हजारों वर्ग गज में बना केंद्रीय कार्यालय तो किसी रियासत से कम नहीं। उससे चंद कदमों के आगे एक नई इमारत में सैकड़ो सुसज्जित, आधुनिक सुविधा से लैस कमरों में पार्टी का रिसर्च‌ विंग मुल्क भर से सैकड़ो ‌ मुख्तलिफ रिसर्च स्कॉलर को हर तरह की सुविधा प्रदान कर इस मकसद से कार्यरत है कि भाजपा का विचार दर्शन, संगठन के प्रचार प्रसार को कैसे ‌ व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ाया जाए। कोई माने या ना माने परंतु एक सच्चाई है कि आरएसएस के वैचारिक जाल में हजारों हजार स्वयंसेवकों को बिना किसी लालच स्वार्थ के हिंदू राष्ट्र को स्थापित करने में जीवनदायिनी बनाकर जुटा दिया।

जाहिर है कि इसका आर्थिक जरिया सरकारों के मंत्रियों तथा बड़े पूंजीपतियों ‌ के द्वारा दिए गए धन पर आश्रित है। अगर कोई यह कहे कि भाजपा के मंत्री, एमपी, एमएलए भ्रष्टाचारी नहीं है तो वह हकीकत कबूल नहीं कर रहे। परंतु इसके आर्थिक दोहन का बड़ा हिस्सा संगठन में जाता है। इसके ‌ बरक्स कांग्रेस के राज में मंत्रियों की धन लूट का सारा हिस्सा उनकी जेब में ही रहा। जिसका नतीजा हुआ कि कांग्रेस के केंद्रीय कार्यालय के बिजली, पानी के बिल, कर्मचारियों को तनख्वाह देने के भी टोटे पड़ गए। अपने संगठन के फैलाव बढ़ाने में बीजेपी किस तरह के तरीके अख्तियार कर रही है उसकी सबसे बड़ी मिसाल दिल्ली की कावड़ यात्रा है। अब हर साल दिल्ली में कावड़ यात्रा के जुलूस में दिल्ली की मलिन बस्तियों, कच्ची कॉलोनी, झुग्गी झोपड़ियां,गरीबों के कटरों में रहने वाले अधिकतर बेरोजगार पिछड़े, दलित हिंदू ‌ नौजवानों को पहले से संपर्क कर कावड़ यात्रा में शिरकत करने के लिए तैयार किया जा रहा है। कावड़ यात्रा ‌ से पहले बैठक कर यात्रा में हर तरह की सुख सुविधा का‌ इंतजाम तथा यात्रा से धार्मिक लाभ की घुट्टी भी पिलाई जाती है।

नवयुवकों के इन ‌ जत्थेबंदी को बजरंग दल के झंडे और उत्तेजित नारे लगाए जाने की‌ ट्रेनिंग देकर मुस्लिम नफरत की चासनी चटवाने की भी कवायद की जाती है। चुनाव के वक्त यही नौजवान भाजपा का बूथ मैनेजमेंट करते लगते हैं। और इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भाजपा के किसी भी उच्च वर्ग का बेटा इसमें शिरकत नहीं करता।भाजपा अपने संगठन और अनुशासन की ताकत पर चुनाव में फायदे के मद्देनजर बड़े से बड़ा उलट फेर किसी भी वक्त करने की ताकत रखती है। हरियाणा में मनोहर लाल खट्टर को हटाकर पिछड़े वर्ग के सैनी को मुख्यमंत्री घोषित कर पासा पलट दिया गया। मध्य प्रदेश में बड़े-बड़े नामवर भाजपा नेताओं के होने के बावजूदश मोहन यादव को मुख्यनमंत्री का चेहरा बना दिया गया, मजाल की कोई भी नेता चूं तक कर सका, क्या यह और किसी पार्टी में संभव है? भाजपा के वरिष्ठतम, तजुर्बेकार बड़े नेताओं के होने के बावजूद राष्ट्रपति पद पर दलित रामनाथ कोविंद ‌ जिन्हें एक वक्त‌ मांगने पर भी लोकसभा का टिकट भाजपा ने नहीं दिया था। तथा अब राष्ट्रपति पद पर एक आदिवासी‌ महिला को राष्ट्रपति बना दिया। किसी भी सुबे पर केंद्रीय‌ आला कमान कोई भी फैसला ले ले, मजाल कि इसकी मुखालफत पार्टी में किसी प्रकार देखने को मिले।

अब दूसरी तस्वीर को देखिए। विरोधी पक्ष की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस के संगठन का मुलाहिजा किया जाए, किसी भी स्तर पर वैचारिक ढांचा तैयार करने की कोई कार्य योजना उसमें नहीं। नेताओं की परिक्रमा ही सबसे बड़ी सीढ़ी है पद पाने की। कांग्रेस सत्ता का सबसे ज्यादा फायदा कुछ तथाकथित वामपंथी, प्रगतिशील, कम्युनिस्ट छाप ‌ ने कांग्रेस के मंत्रीयो को ‌ प्रगतिशील का तमगा‌ बांट कर उठाया। बरसों बरस मुख्यमंत्री पद पर रहे उनके नेता, ‌‌ केंद्र में मंत्री, राज्यों के गवर्नर, एमपी ,एमएलए‌,पार्टी के पदाधिकारी थोक में सत्ता, डर के लालच में‌ पाला बदलकर दूसरी पार्टियों में जाते रहे और जब चाहा‌ वापस आकर पार्टी में शामिल हो गए।

मजहब, जाति, क्षेत्रीयता के बल पर खड़े क्षेत्रीय दलों में विचारों, संगठन की कोई अहमियत नहीं होती कैडर किस चिड़िया का नाम है, जो नेता, क्षत्रप, ‌‌सूबेदार है उसका फैसला अंतिम है। पुरानी कहावत के अनुसार “किंग कैन डू नो रोगं” राजा कभी गलती नहीं करता। दरबारीयो, खानदानियों, चापलूसों विदूषकों चारण -भाटो से घिरे ये नेता अपनी तारीफ तथा जनता में अपनी जय जयकार का उद्घोष, इन मुंहलगे, गिद्ध की तरह‌ इनकी नजर धन कमाने तथा सत्ता में शिरकत करने की जुगाड़ में ‌ नेता के इर्द-गिर्द घेरा डाले लगे रहते हैं। टिकट बंटवारे, मंत्रिमंडल में स्थान, राज्यसभा विधान परिषद में भेजने के वक्त घर परिवार रिश्तेदारों‌ ,चापलूसों‌ धन पशुओं का नाम ही याद रहता है। साधारण कार्यकर्ताओं के लिए उन दिनों दरवाजे बंद होते हैं।
ऐसे दलों का मूल्क के पैमाने पर सोचने का कोई मेनिफेस्टो नहीं होता। चुनाव के वक्त अधिक से अधिक रेवड़ी बांटने की मुहीम ही‌ होती है। जैसे तैसे बेमेल विधायकों की जुगाड़ कर बनी सरकारों में जल्द से जल्द जितना धन कमाया जा सके होड़ लगी रहती है। रुपए देकर पार्टी टिकट पाने वाला विधायक बनकर जहां मुनाफा हो वहां जाने में एक पल भी देर नहीं करता। सत्ता का जरा सा समीकरण बिगड़ने पर सरकार धडाम से गिरने भी देर नहीं लगती।

वैचारिक आस्थावान दलों की आंतरिक सच्चाई क्या है, उसको भी जानना जरूरी है। सोशलिस्ट, कम्युनिस्ट बाहरी तौर पर एक ही राह के राही लगते हैं, उनकी एकता की दुहाई उनकी लगती रहती है। परंतु जमीनी हकीकत कुछ और ही है, जमीन पर सबसे ज्यादा संघर्ष इन्हीं में है। कम्युनिस्ट नहीं चाहता कि गरीब तबको, मजदूरों किसानों, नौजवानों में उसके अलावा और किसी विचारधारा वाले का दखल हो, जो हमारे साथ नहीं वह हमारा प्रतिस्पर्धी है। कम्युनिस्ट चाहता है कि मैदान में केवल दो ही झंडे लहराते रहे क्या तो ‌ कम्युनिस्ट का लाल झंडा या बीजेपी का भगवा। विचारधारा पर आधारित न होने‌ के बावजूद कैसे-कैसे फिल्मी सितारे, नौटंकी बाज जिनका ज्ञान, त्याग, संघर्ष से दूर-दूर तक भी कोई रास्ता नहीं रहा हजारों‌ लाखों करोड़ों की संपत्तियों के मालिक, एश्वर्य आराम से जिंदगी बसर करते हैं। एक रात में ही सत्ता पर काबिज हो जाते है दो-तीन चुनाव के बाद उनके स्थान पर नए एक्टर का राज्यतिलक हो जाता है। जनता का असूल है कि जैसे आती है, वैसे ही चली भी जाती है।

ऐसे कार्यकर्ता जिन्होंने तमाम उम्र अपनी पार्टी के सिद्धांतों, झंडे के साथ बंध कर गुजारे हो अगर उसका कोई वली वारिस, गॉडफादर, जात, मजहब, दौलत मसल पावर, क्षेत्रीयता का दम अगर नहीं है, तो उसकी पार्टी में क्या हैसियत है, क्या उसको उम्मीदवार बनाया जा सकता है?
चुनाव से पहले किस पार्टी का क्या मेनिफेस्टो था, उसके नेता दूसरी पार्टी, उनके नेताओं के लिए सार्वजनिक रूप से क्या कह रहे थे ?वह सब अब बेमानी है।

“चुनाव के बाद बहुमत न मिलने के बावजूद, सरकार बनाने की हवस में, जो पार्टी उनके उसूलों से बिल्कुल उलट थी और जिसके नेता उनके सबसे बड़े दुश्मन थे, उनसे हाथ मिलाने में किसी प्रकार का कोई शर्म या गुरेज़ नहीं।”
वैचारिक तालीम, शिक्षण शिविर, संगठन को बनाने के लिए लोहिया के फार्मूले वोट, जेल, फावड़ा का पाठ पढ़ाने का क्या ‌प्रयास किया गया। वोट प्रतीक था लोकतंत्र का जम्हूरियत का डेमोक्रेसी का। जेल से अभिप्राय संघर्ष का लोहिया का कथन था कि अगर सड़क सुनी हो जाएगी तो संसद आवारा हो जाएगी अर्थात अन्याय, गैर- बराबरी, जुल्म ज्यादती के खिलाफ आंदोलन सड़क से लेकर संसद तक चलना चाहिए, और इसके लिए जेल जाने के लिए हमेशा तैयार रहो। फावड़ा ‌ प्रतीक था रचना का, निर्माण का एक घंटा देश को देने का।

भाजपा के कारवां को मौजूदा सियासी औजारों से स्थाई रूप से रोकना मुश्किल होगा। उसके लिए वैचारिक प्रतिबद्ध कार्यकर्ता और लोकतांत्रिक पार्टी का ढांचा है, न कि सुप्रीमो स्टाइल का नेतृत्व या खानदानी विरासत के दावेदार, सत्ता-लोलुप, सिद्धांत-विहीन अवसरवादी धन्धेबाज। बीजेपी से लंबी लड़ाई लड़ने के लिए जोडतोड़ की सियासत, बेपैन्दी के तथाकथित नेताओं की और आशा भरी निगाहों से देखना ख़ुदकुशी के अलावा और कुछ नहीं। विचारधारा पर खड़ी पार्टीया ही अपना अस्तित्व बचा सकती है। पार्टी सुप्रीमो की शैली, जात, मजहब तथा जिताऊ उम्मीदवारों के बल पर चलने वाली पार्टियों के गुब्बारे की हवा कब निकल जाएगी, कोई गारंटी नहीं।

पुरानी कहावत है की बड़ी मछली छोटी मछली को निगल जाती है, जो नेता, पार्टी भाजपा की सोहबत में गए उनका क्या हस्र हुआ उसको जानना भी जरूरी है। एक वक्त पंजाब की सबसे मजबूत पार्टी अकाली दल जो भाजपा के साथ गलबाही करती थी रसातल में चली गई। उड़ीसा के नेता नवीन पटनायक जो भाजपा के साथ आंख मिचोनी का खेल खेलते थे भाजपा ने उनका सुपड़ा साफ कर दिया। हिंदू हृदय सम्राट उद्धव ठाकरे भाजपा के हमजोली, की पार्टी को भाजपा हाईजैक कर ले गई। चौटाला खानदान के बड़बोले दुष्यंत चौटाला की क्या दुर्गत भाजपा ने की सबके सामने है। मायावती की भाजपा से मिली भगत के खेल में, देश की तीसरे नंबर की पार्टी, बहुजन समाज पार्टी का लोकसभा में एक भी नुमाइंदा जीत ना सका। नीतीश कुमार ‌‌ जो कभी प्रधानमंत्री पद के सबसे सुयोग ‌ व्यक्ति थे आज राज्यसभा की ‌ सदस्य तक सिमट गए। ममता बनर्जी भी भाजपा का दामन‌ पकड़ कर केंद्र में रेल मंत्री जरूर बन गई थी परंतु आज उनके चेलों से ही भाजपा ने उनको ‌‌ ‌ शिकस्त दिलवाई। हालांकि एक बात बिल्कुल साफ है की ममता जैसी‌ लड़ाकू, ईमानदार ‌ नेता‌ को राजनीति से बहुत देर तक दखल नहीं किया जा सकता।

आजके हालात में ‌ भाजपा का मुकाबला करने के लिए कांग्रेस का साथ, सहयोग बेहद जरूरी है। अपनी सीमाओं के बावजूद राहुल गांधी भाजपा के हर सुनियोजित हमले, प्रचार के बावजूद‌ उनके खिलाफ लड़ रहा है, ललकार रहा है उसको नजअंदाज नहीं किया जा सकता। ऐसा नहीं है कि भाजपा को ‌ शिकस्त नहीं दी जा सकती, ‌ हमारे राजनीतिक इतिहास में, के कामराज, चंद्रभानु गुप्ता, ई एम एस नबूद्रीपाद, कर्पूरी ठाकुर, ज्योति बसु जैसे मुख्यमंत्री भी हुए हैं जिनके कारण विचारधारा का फैलाव, कैडर का सम्मान तथा भ्रष्टाचार, सांप्रदायिकता का कोई दाग दूर-दूर तक उन पर नहीं लगा। उन जैसा नया ‌ नेतृत्व ही भाजपा के राक्षसी राज के रथ को रोक सकता है। आरएसएस बीजेपी से लंबी लड़ाई लड़ने के‌ लिए जोड़-तोड़ की सियासत, बेपैदी के तथाकथित नेताओं की ओर आशा भरी निगाह से देखना खुदकुशी के अलावा और कुछ नहीं‌ हो सकता। विचारधारा पर खड़ी ‌ पार्टियां ही अपना अस्तित्व बचा सकती हैं। पार्टी सुप्रीमो की शैली, जात, मजहब तथा जिताऊं उम्मीदवार के बल पर चलने वाली‌ पार्टीयों के गुब्बारे की हवा कब निकल जाएगी कोई गारंटी नहीं।


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