जयप्रकाश मानस की कविताएँ!

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Jaiprakash Manas
मेरा बेटा कॉकरोच नहीं है
मेरा बेटा उन लाखों लड़कों में है
जो हर साल
फॉर्म भरते हैं, फीस भरते हैं
और फिर किसी घोटाले, किसी पेपर लीक, किसी स्थगन के नीचे
दबे रह जाते हैं।

वह चौराहे पर खड़ा दिखता है आपको
क्योंकि इस देश ने उसके लिए
कोई दरवाज़ा खुला नहीं छोड़ा।

आप कहते हैं—
वे सड़कें घेरते हैं, शोर करते हैं, गुस्से में हैं।
हाँ, गुस्से में हैं।
जिस पीढ़ी से उसका काम छीन लिया जाए
उसके हाथ ख़ाली नहीं रहते
वे सवाल पूछने लगते हैं।

लेकिन सुनिए –
मेरा बेटा कॉकरोच नहीं है।

कॉकरोच अँधेरे में पैदा होते हैं।
मेरा बेटा धूप में बड़ा हुआ है –
सरकारी स्कूल की टूटी बेंच पर
माँ की बचाई हुई रोटियों पर
और इस भरोसे पर
कि पढ़-लिख लेने से आदमी की ज़िंदगी बदलती है।

अगर वह आज सड़कों पर है
तो इसलिए नहीं कि वह निकृष्ट है
बल्कि इसलिए कि व्यवस्था ने
उसे बार-बार दरवाज़े तक बुलाकर
भीतर घुसने नहीं दिया।

उसे अपमानित करना आसान है।
उसकी जगह खड़े होकर देखना कठिन।

याद रखिए :
जिस दिन बेरोज़गार लड़कों को
आप कीड़ों की तरह देखने लगेंगे
उसी दिन लोकतंत्र
अपने नागरिकों को मनुष्य की तरह देखना भूल जाएगा।

ईश्वर की चुप्पी मनुष्य की आवाज़ से बड़ी थी
डरे हुए मनुष्य को तराशनी थी केवल आग
कि रात थोड़ी कम काली लगे
मरे हुए मनुष्य को तलाशना था केवल पानी
कि भीतर बची हुई राख थोड़ी देर भीग सके।

डरे हुए मनुष्य ने तराशा देवता
उसमें जोड़े –
कुछ अधिक ताकतवर हाथ
कुछ अधिक गतिमान पैर
कुछ अधिक वीभत्स युद्ध
कुछ अधिक भयानक बैर

मरे हुए मनुष्य ने तलाशा ईश्वर
उसमें माँगा –
कुछ अधिक लंबी धरती
कुछ अधिक चौड़ा आकाश
कुछ अधिक गहरी आस
कुछ अधिक ठहरा विश्वास

देवता ने और अधिक डराया
डरे हुए मनुष्य को
ईश्वर ने और अधिक सताया
मरे हुए मनुष्य को

धीरे-धीरे
देवता के हाथ मनुष्य के हाथों से बड़े हो गए।
और ईश्वर की चुप्पी मनुष्य की आवाज़ से।
अब हालत यह है
कि डर प्रार्थना में बदल गया है
और प्रार्थना डर में।
अब दोनों
अपनी-अपनी रचना के सामने
धीरे-धीरे छोटे होते जा रहे हैं।
एक ने अपनी रक्षा के लिए
जो बनाया था – वही उसका पीछा कर रहा है।
दूसरे ने अपनी सांत्वना के लिए
जिसे पुकारा था – वही उसकी नींद में अँधेरा भर रहा है।
अब दोनों एक साथ बैठे हैं।
एक के हाथ में आग है – एक के हाथ में पानी।
लेकिन दोनों के हाथ काँप रहे हैं।
और दूर कहीं मनुष्य
अब भी मनुष्य होने से डर रहा है।
अगर हाथ न होते
हाथ
बिना बताये कितने काम कर लेते हैं
जैसे किसी पेड़ पर
पत्ता अपने आप हिलता है
और पेड़ को पता ही नहीं चलता
कि हवा अभी गुज़री है।

कभी लगता है
हाथ हमारे सबसे आज़ाद हिस्से हैं—
मन से पहले दौड़ जाते हैं
और लौटते समय
कुछ न कुछ साथ ले आते हैं :
मिट्टी की ठंडक
किसी चीज़ की गोलाई
किसी बात की गरमाहट।

उँगलियाँ
जैसे पाँच सरल कविताएँ
जो किसी भी वस्तु को छूते ही
उसका अर्थ समझ लेती हैं।
कई बार वे जो समझती हैं
हम नहीं समझते—
फिर भी उँगलियाँ हमसे नाराज़ नहीं होतीं।

हथेली एक छोटा-सा कमरा है।
इसमें जो रखा जाए
कुछ देर वही घर हो जाता है—
चिड़िया का फड़फड़ाता डर
किसी बुज़ुर्ग के हाथ की सिकुड़न
या किसी बच्चे की
अब तक बिना भाषा की इच्छा।

हाथों को देखो—
ये किसी वादे की तरह
धीरे-धीरे पुराने होते हैं पर टूटते नहीं।
ये काम करते-करते थकते नहीं
बस थोड़ा झुक जाते हैं जैसे किसी का इंतज़ार हो।

कभी-कभी सोचता हूँ—
अगर हाथ न होते
तो दुनिया का आधा काम
मन को करना पड़ता।
और मन इतना काम कैसे करता?
वह तो बिना वजह भी थक जाता है।

हाथ
दरअसल हमारी सबसे सादी चीज़ें हैं
और सबसे अद्भुत भी—
वे बिना आवाज़ के
हर दिन
हमारी दुनिया को थोड़ा-सा ठीक कर देते हैं।

बाक़ी सारे मारे जाएँगे
जंगल की दिशाओं में फैला हुआ भय
तब ही थमेगा
जब किसी एक खरगोश को
अपने भीतर वह पुरानी कहानी याद आएगी—
कुएँ का शांत पानी
उसमें काँपती हुई शेर की परछाई
और छलाँग की वह एक अदृश्य ध्वनि
जिसने सबको बचा लिया था।

वही खरगोश
अपनी बिरादरी में
सिर उठाकर लौटेगा —
जैसे डर के अँधेरे में
किसी ने साहस की एक माचिस जलाई हो।
उसी के आने से
जंगल के पत्तों में थोड़ा-सा भरोसा फिर हरा होगा
हवा में लौटेगी थकी हुई मुस्कान।

पर जब तक ऐसा कोई खरगोश मिल नहीं जाता—
कहानी सुनाने वाला
और कहानी पर यकीन करने वाला—
तब तक जंगल की सल्तनत में
घासें भी काँपती रहेंगी
और
बाक़ी सारे मारे जाएँगे।

बुज़ुर्गों का कोना
घर के उस धूसर कोने में
धूप का एक टेढ़ा-मेढ़ा टुकड़ा
हर दिन आकर टिक जाता है—
मानो किसी पुरानी रजाई का
छितरा हुआ पीला धागा।

उसी रोशनी के सहारे
बैठते हैं हमारे पुराने लोग
जिनके चेहरे पर
समय अपने हल्क़े, थके हुए निशान
धीरे-धीरे उकेरता रहता है।

उनकी चुप्पी
घर की समूची हलचल को
धीमे से निगल लेती है—
बस दीवार की घड़ी अपनी टिक-टिक से
समय का बोझ ढोती रहती है।

यह कोना
उनकी यादों का अंतिम आसन है—
जहाँ हर साँस किसी पुराने प्रसंग को
एक बार फिर उजाले में रख देती है।

और हम
दरवाज़े पर खड़े होकर देखते हैं—
कि घर में सबसे स्थिर
सबसे कोमल धूप यहीं बैठी रहती है।

ईश्वर का बचा हुआ काम
ईश्वर ने
शायद दुनिया बनाकर
उसे एक छोटे कस्बे की तरह
धीरे-धीरे चलने के लिए छोड़ दिया।
फिर कुछ काम
मनुष्यों के हिस्से आए।
जैसे —
सुबह सबसे पहले – आधी खुली दुकानों के शटर उठाना
दूध उबलने से पहले – चूल्हे की आँच कम कर देना
और रात में
आख़िरी साइकिल वाले के गुज़र जाने तक
गली की बत्ती जलती रहने देना।
उसने सड़कें बना दीं
पर उन पर
किस तरफ चलना है – यह हमें तय करना था।
उसने घर बना दिए
पर किस खिड़की से
शाम की हवा भीतर आएगी – यह नहीं बताया।
उसने आवाज़ें दे दीं —
सब्ज़ी वाले की, रिक्शे की घंटी की, दूर जाती ट्रेन की।
पर किस आवाज़ को
अपना समझकर रुक जाना है – यह हमारे ऊपर छोड़ दिया।
हम सब
ईश्वर के पूरे किए हुए काम में
थोड़ा-थोड़ा बचा हुआ काम हैं।
शायद इसी कारण
वह अब भी दुनिया को देखता रहता है
जैसे कस्बे का कोई पुराना घड़ीसाज़
दुकान बंद करने से पहले
हर घड़ी को कान से लगाकर सुनता है
कि कहीं समय धीरे चलना तो नहीं भूल गया।


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