— डॉ राजेंद्र रंजन चतुर्वेदी —
सांस में जिसकी निवसती क्रांति है,
वह युवा ही शांति का बल है महा ।
सृष्टि का निर्माण जिस संकल्प में
उसी को कॉक्रोच क्यों किसने कहा?
कहीं नेता युवक को भरमा रहा,
कहीं आरक्षण महाबाधा बना।
यह परीक्षातंत्र धोखा दे रहा,
सत्य पथ में है मकड़जाला तना।
युवा परजीवी हुआ किस न्याय से,
जीविका तो प्राकृतिक अधिकार है।
जिंदगी के कण जो कुदरत ने दिए
करो वापस,न्याय की दरकार है।
शब्द के सब अर्थ बदले आपने
झूठ परिभाषित किया सच रूप में।
स्वार्थ को ही त्याग तुम बतला रहे,
मूल्य फेंके अंधता के कूप में।
क्या जगाने के लिए उस शक्ति को,
जो महाज्वाला सुक्रांति प्रचंड है।
शक्ति है निर्माण की संशय नहीं,
किंतु शंकर की प्रलय बरबंड है।
दासता के बंधनों को तोड़ कर
राष्ट्र सिरजा जिस युवा की शक्ति ने
न्याय सत्य समानता के मूल्य को
विश्व में स्थापित किया जिस शक्ति ने।
कांपते गिरि सिंधु जिस संकेत से
क्या चुनौती दे रहे उस शक्ति को?
सभ्यता का जो सबल आधार है
उस मनुजता की परम अनुरक्ति को?
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न्याय सत्य की शक्ति था
वही बना कॉक्रोच।
परिवर्तन कैसे हुआ,
क्यों आया यह सोच।
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