1857 के एलाननामे और हुक्मनामे — इंकबाल हुसैन

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The Proclamations and Decrees of 1857 — Iqbal Husain

सन 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की शुरुआत मेरठ से आज के ही दिन हुई थी। यूपी सरकार और केंद्र इस संग्राम से शिक्षा ग्रहण करके काम करें, अपना नजरिया बदलें। यह कोई इवेंट नहीं है। यहां हम एक महत्वपूर्ण लेख दे रहे हैं, आप पढ़ें और सरकार भी पढ़े—
1857 के एलाननामे और हुक्मनामे — इंकबाल हुसैन

1857 की जंग-ए-आजादी का एक सकारात्मक पक्ष यह है कि यह जंग हथियारों के अलावा एलाननामों और हुक्मनामों के द्वारा भी लड़ी गई थी, जो स्वतंत्रता सेनानियों ने उर्दू और हिंदी भाषा में प्रकाशित किए थे। यह जंग भारतीय फौजों ने शुरू की थी, बाद में उनके साथ अवाम और खास-ओ-आम विभिन्न कारणों से शामिल हो गए थे। स्वतंत्रता संग्रामियों ने आम भारतीयों के अंदर राष्ट्रीय और धार्मिक एकता पैदा करने के लिए आवश्यकतानुसार बहुत सारे एलाननामे जारी किए थे। अफसोस है कि एलाननामों की मूल प्रतियां नहीं के बराबर मिलती हैं। 1858 तक ये मौजूद थीं, जिन्हें अंग्रेज हुकूमत ने स्वतंत्रता सेनानियों के खिलाफ किए मुकदमों में सबूत के तौर पर अंग्रेजी में अनुवाद करवाकर पेश किया था, जो राष्ट्रीय अभिलेखागार, नई दिल्ली और इलाहाबाद, यूपी में सुरक्षित हैं। मैंने गोरखपुर के सैयद हामिद अली साहब के पुस्तकालय में मौजूद एलाननामों की मूल प्रतियां प्राप्त की हैं। इनमें अधिकतर उर्दू में हैं, तीन एलाननामे उर्दू और हिंदी में तथा कई फारसी में हैं।

इन एलाननामों को हम तीन विभिन्न दौर में बांट सकते हैं। पहले दौर के एलाननामों में जोशो-वलवला के साथ जनता को संबोधित किया गया है, अंग्रेजों की बुराइयां बताई गई हैं और हिंदू-मुस्लिम एकता का महत्व बताया गया है। दूसरे दौर के एलाननामों में हिंदू-मुस्लिम एकता पर जोर, एक-दूसरे के धर्म की रक्षा, अंग्रेजों का पूर्ण सफाया, नई हुकूमत के बनने के बाद अच्छी व्यवस्था, धर्म की आजादी, बेहतर खेती-बाड़ी और आर्थिक बंदोबस्त आदि के वादे हैं। तीसरे दौर के एलाननामों से मालूम होता है कि स्वतंत्रता सेनानी बचाव के लिए जंग लड़ रहे थे। इनमें अवाम-ओ-खास, सब से अपील की गई है कि वे दिलो-जान से अंग्रेजों के विरोध में एकजुट हों। जंग में विशेष सफलता पाने वालों को पुरस्कार देने के वादे भी किए गए हैं। भारतीयों को इस बात से भी खबरदार कराया गया है कि अगर अंग्रेज दोबारा सत्ता में आ गए तो भारतीयों का क्या हाल होगा।

यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि अधिकतर एलाननामे उर्दू में हैं। अगर हम उन्नीसवीं सदी के मध्य में प्रकाशित होने वाले अखबारों का जायजा लें, तो मालूम होगा कि उनमें से ज्यादातर हिंदुस्तानी भाषा और फारसी लिपि में छप रहे थे। अब उसे उर्दू जबान के नाम से जाना-पहचाना जाता है। इन उर्दू अखबारों के मालिक ज्यादातर हिंदू थे, वही उनके संपादक और प्रकाशक थे। इससे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि उस वक्त उर्दू भाषा एक मिली-जुली राष्ट्रीय भाषा की हैसियत से अपनी जगह बना चुकी थी, जिसकी उन्नति में हिंदू और मुसलमान बराबर के भागीदार थे।

1857-58 के स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा जारी किए गए एलाननामों से इसकी और जानकारी मिलती है। पहली जंग-ए-आजादी के एलाननामों से न केवल स्वतंत्रता सेनानियों की भावनाओं का पता लगता है, बल्कि हमें उन समस्याओं का भी पता चलता है कि वे इतनी बड़ी जंग में क्यों कूद पड़े थे, उन्होंने जनता से क्या-क्या वादे किए थे और वे अंग्रेजों के चंगुल से आजाद कराने के बाद देश को किस प्रकार चलाना चाहते थे।

एलाननामों से यह भी मालूम होता है कि स्वतंत्रता सेनानी, जिनमें अंग्रेजी फौज के बागी सिपाही भी थे, अंग्रेजों के आर्थिक शोषण, रंगभेद, असामान्य टैक्स, खेती-बाड़ी की पॉलिसी, बेरोजगारी और भारतीय कल-कारखानों के सर्वग्रासी विनाश को पिछली एक सदी से बर्दाश्त करते चले आ रहे थे। इस गरीबी के बावजूद वे शांत थे और सब्र कर रहे थे। लेकिन उनके सब्र का पैमाना उस वक्त टूट गया, जब अंग्रेजी शासन के प्रोत्साहन में ईसाई मिशनरियों द्वारा धर्मांतरण का प्रयास किया गया।

यह एक ऐसा कारण था, जिसने उन वफादार फौजियों को भी अंग्रेजों के खिलाफ हथियार उठाने पर मजबूर कर दिया, जो भारत में अंग्रेजी शासन के उद्भव और विकास में एक सदी से लगे हुए थे। 10 मई 1857 को मेरठ में बगावत का आरंभ करके फौजियों की टोली दिल्ली पहुंची और 11 मई 1857 को उनका पहला एलाननामा पेश किया गया…

[शेष पाठ यथावत]

उर्दू से अनुवाद : इंजहार अहमद नदीम


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