मध्यकाल का पुनराविष्कार : विजयदेव नारायण साही का आलोचनात्मक हस्तक्षेप

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Vijaydev Narayan Sahi

Parichay Das

— परिचय दास

हिन्दी आलोचना के इतिहास में विजयदेव नारायण साही उन विरल आलोचकों में हैं जिन्होंने साहित्य को केवल रचनाओं का संसार न मानकर विचार, संवेदना और मनुष्य की स्वतंत्र चेतना का क्षेत्र माना। उन्होंने न तो परंपरा को अंधस्वीकार किया और न आधुनिकता को अंतिम सत्य के रूप में ग्रहण किया। उनकी आलोचना का सबसे बड़ा गुण यह है कि वह स्थापित मान्यताओं को पुनः परखने का साहस रखती है। साही जहाँ भी जाते हैं, वहाँ प्रश्न लेकर जाते हैं; और जहाँ से लौटते हैं, वहाँ नए प्रश्न छोड़ जाते हैं। यही कारण है कि उनकी आलोचना हिन्दी साहित्य में एक विशिष्ट बौद्धिक उपस्थिति के रूप में प्रतिष्ठित है।

मध्यकालीन साहित्य के संदर्भ में साही का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है। हिन्दी साहित्येतिहास ने लंबे समय तक मध्यकाल को मुख्यतः भक्ति, धर्म, सम्प्रदाय और सांस्कृतिक प्रवृत्तियों के आधार पर समझने का प्रयास किया। इससे मध्यकालीन काव्य की अनेक महत्त्वपूर्ण व्याख्याएँ सामने आईं, किंतु साथ ही कुछ ऐसी स्थिर धारणाएँ भी बन गईं जिन्होंने कवियों और उनकी रचनाओं को निश्चित खाँचों में सीमित कर दिया। कबीर संत बनकर रह गए, जायसी सूफी कवि बनकर, तुलसी भक्त कवि बनकर और रैदास सामाजिक समता के प्रतीक बनकर। इन परिचयों की अपनी ऐतिहासिक उपयोगिता अवश्य थी, परंतु इनके भीतर कवियों की बहुआयामी रचनात्मकता का बड़ा हिस्सा छिप गया।

साही का महत्त्व इसी बिंदु पर आरम्भ होता है। उन्होंने मध्यकालीन कवियों को उनके पारंपरिक परिचयों से मुक्त करके देखने का प्रयास किया। उनके लिए मध्यकालीन साहित्य केवल धर्म का इतिहास नहीं था, बल्कि मनुष्य की चेतना का इतिहास था। वे कवियों के भीतर उपस्थित उस स्वतंत्र व्यक्तित्व को खोजते हैं जो अपने समय की रूढ़ियों, सत्ताओं और स्थापित सत्यों से संवाद करता है, उनका प्रतिरोध करता है और अपने अनुभव के आधार पर जीवन की नई व्याख्या प्रस्तुत करता है। इस दृष्टि से साही का मध्यकाल-पाठ हिन्दी आलोचना में एक प्रकार की वैचारिक पुनर्खोज का कार्य करता है।

साही की पुनर्पाठ-पद्धति का आधार यह विश्वास है कि कोई भी महान रचना अपने समय में समाप्त नहीं हो जाती। वह प्रत्येक युग में नए अर्थ ग्रहण करती है। इसलिए मध्यकालीन साहित्य को केवल ऐतिहासिक संदर्भों में पढ़ना पर्याप्त नहीं है। उसे वर्तमान के प्रश्नों, संवेदनाओं और चिंताओं के आलोक में भी पढ़ना आवश्यक है। साही इसी कारण कबीर को केवल पंद्रहवीं शताब्दी के कवि के रूप में नहीं देखते, बल्कि एक ऐसी बेचैन चेतना के रूप में देखते हैं जिसकी प्रतिध्वनि आज भी सुनी जा सकती है। उनके लिए मध्यकाल कोई मृत इतिहास नहीं, बल्कि जीवित अनुभवों का संसार है।

साही की आलोचना का एक अन्य महत्त्वपूर्ण पक्ष उसकी प्रश्नधर्मिता है। वे किसी भी निष्कर्ष को अंतिम रूप में स्वीकार नहीं करते। उनकी दृष्टि में आलोचना का कार्य निर्णय सुनाना नहीं, बल्कि अर्थ की नई संभावनाओं को खोलना है। इसलिए वे मध्यकालीन साहित्य के संबंध में प्रचलित धारणाओं की पुनः जाँच करते हैं। वे पूछते हैं कि क्या भक्ति केवल आस्था है? क्या कबीर केवल संत हैं? क्या मध्यकालीन कवि केवल धार्मिक व्यक्ति हैं? क्या परंपरा केवल विरासत है? ऐसे प्रश्न उनकी आलोचना को नई दिशा प्रदान करते हैं।

वास्तव में साही का संपूर्ण मध्यकाल-बोध परंपरा के पुनर्सृजन का बोध है। वे मध्यकालीन साहित्य को अतीत की धरोहर के रूप में सुरक्षित रखने भर का कार्य नहीं करते, बल्कि उसे वर्तमान की बौद्धिक बहसों में सक्रिय रूप से शामिल करते हैं। उनके यहाँ मध्यकालीन कविता श्रद्धा की वस्तु नहीं, संवाद की वस्तु बन जाती है; इतिहास की सामग्री नहीं, जीवित अनुभव का स्रोत बन जाती है। इसी कारण उनकी पुनर्पाठ-दृष्टि हिन्दी आलोचना में एक नई वैचारिक ऊर्जा का संचार करती है।

यहां विजयदेव नारायण साही की इसी पुनर्पाठ-पद्धति को समझने का प्रयास किया गया है। विशेष रूप से यह देखने का प्रयास किया जाएगा कि वे पूरे मध्यकाल को किस आलोचनात्मक नजरिये से देखते हैं, मध्यकालीन कवियों की व्याख्या में कौन-से नए प्रश्न उपस्थित करते हैं और किस प्रकार परंपरा को पुनः अर्थवान बनाते हैं। यह अध्ययन केवल साही की आलोचना को समझने का प्रयास नहीं है, बल्कि उस व्यापक बौद्धिक दृष्टि को भी समझने का प्रयास है जिसके माध्यम से मध्यकालीन साहित्य आज भी हमारे समय का साहित्य बन जाता है।

।। एक ।।

मध्यकाल को धर्म नहीं, मनुष्य की खोज के रूप में देखना

विजयदेव नारायण साही की मध्यकालीन काव्य-दृष्टि का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि वे मध्यकाल को मुख्यतः धर्म, संप्रदाय और आध्यात्मिक विचारधाराओं के इतिहास के रूप में नहीं पढ़ते। उनके लिए मध्यकालीन साहित्य का वास्तविक केंद्र मनुष्य है। यह मनुष्य कभी भक्त के रूप में दिखाई देता है, कभी प्रेमी के रूप में, कभी विद्रोही के रूप में, तो कभी अपने अस्तित्व की गुत्थियों से जूझते हुए एक अकेले प्राणी के रूप में। साही की आलोचना का आग्रह इसी मनुष्य को खोजने का है, जो धार्मिक प्रतीकों और आध्यात्मिक शब्दावलियों के भीतर कहीं छिप गया है।

परंपरागत आलोचना ने लंबे समय तक मध्यकालीन काव्य को भक्ति, सूफीवाद, निर्गुणवाद, सगुणवाद और विभिन्न धार्मिक धाराओं के आधार पर समझने की कोशिश की। इससे साहित्य के वैचारिक और दार्शनिक पक्षों का अध्ययन तो हुआ, किंतु अनेक बार कवि के भीतर उपस्थित जीवंत मनुष्य ओझल हो गया। साही इसी ओझल मनुष्य को पुनः सामने लाने का प्रयास करते हैं। वे मानते हैं कि कोई भी महान कविता केवल धार्मिक उपदेश नहीं हो सकती। उसके भीतर मनुष्य की अनुभूतियों, संघर्षों, इच्छाओं और बेचैनियों का संसार भी सक्रिय रहता है।

कबीर की व्याख्या करते समय साही बार-बार इस बात की ओर संकेत करते हैं कि कबीर का महत्त्व केवल उनके आध्यात्मिक कथनों में नहीं है। उनके भीतर एक ऐसा मनुष्य भी मौजूद है जो अपने समय की हर जड़ता से टकरा रहा है। वह केवल ईश्वर की खोज नहीं कर रहा, बल्कि सत्य की खोज कर रहा है। वह केवल मोक्ष नहीं चाहता, बल्कि अनुभव की प्रामाणिकता चाहता है। साही की दृष्टि में यही खोज कबीर को असाधारण बनाती है। यहाँ धर्म एक माध्यम है, लक्ष्य नहीं।

साही मध्यकालीन कवियों को किसी धार्मिक शिविर के प्रतिनिधि के रूप में सीमित नहीं करते। वे इस बात पर ध्यान देते हैं कि धार्मिक भाषा के भीतर मनुष्य अपने दुःख, प्रेम, भय, अकेलेपन और आकांक्षाओं को किस प्रकार व्यक्त कर रहा है। उनके लिए भक्ति का अर्थ केवल ईश्वर के प्रति समर्पण नहीं है। भक्ति मनुष्य के भीतर मौजूद उस गहरी तड़प का भी नाम है जो उसे अपने से बड़े किसी सत्य की ओर ले जाती है। इस प्रकार वे भक्ति को धार्मिक कर्मकांड से अलग करके मानवीय अनुभव के रूप में पढ़ते हैं।

मध्यकालीन कविता में प्रेम का प्रश्न भी साही के लिए इसी कारण महत्त्वपूर्ण हो जाता है। चाहे वह कबीर का प्रेम हो या जायसी का, साही उसके भीतर छिपे मानवीय अर्थों की खोज करते हैं। वे प्रेम को केवल आध्यात्मिक प्रतीक नहीं मानते। उनके लिए प्रेम मनुष्य की अधूरी इच्छाओं, उसकी आकांक्षाओं और उसकी आत्मिक बेचैनी का भी रूप है। इस दृष्टि से मध्यकालीन प्रेमाख्यान केवल धार्मिक रूपक नहीं रह जाते, बल्कि मनुष्य की आंतरिक यात्रा के दस्तावेज़ बन जाते हैं।

साही का यह दृष्टिकोण मध्यकालीन साहित्य को नए ढंग से देखने की संभावना पैदा करता है। इससे कवि की पहचान किसी संप्रदाय विशेष के अनुयायी के रूप में नहीं, बल्कि एक संवेदनशील और संघर्षशील मनुष्य के रूप में उभरती है। कबीर तब केवल संत नहीं रहते, जायसी केवल सूफी कवि नहीं रहते, और तुलसी केवल भक्त कवि नहीं रह जाते। वे अपने समय के ऐसे मनुष्य बनकर सामने आते हैं जो जीवन, सत्य, प्रेम और अस्तित्व के प्रश्नों से जूझ रहे हैं।

इस प्रकार साही के लिए मध्यकाल का सबसे बड़ा सत्य धर्म नहीं, मनुष्य है। धर्म, दर्शन, भक्ति और आध्यात्मिकता उस मनुष्य तक पहुँचने के मार्ग हैं, स्वयं अंतिम लक्ष्य नहीं। उनकी पुनर्पाठ पद्धति का मूल आग्रह यही है कि मध्यकालीन कविता को उसके धार्मिक आवरण से परे जाकर पढ़ा जाए और उसके भीतर धड़कते हुए जीवंत मानवीय अनुभवों को पहचाना जाए। यही वह बिंदु है जहाँ साही की आलोचना मध्यकाल को अतीत के धार्मिक इतिहास से निकालकर सार्वकालिक मानवीय अनुभव की भूमि पर स्थापित करती है।

।। दो ।।

मध्यकालीन कवियों के मिथकों का विखंडन

विजयदेव नारायण साही की आलोचना-पद्धति का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि वे मध्यकालीन कवियों के चारों ओर समय के साथ निर्मित मिथकीय आभामंडलों को आलोचनात्मक दृष्टि से देखते हैं। उनके लिए साहित्य का अध्ययन श्रद्धा का अभ्यास नहीं, बल्कि समझ की प्रक्रिया है। इसीलिए वे उन तैयार छवियों को स्वीकार नहीं करते जो परंपरा ने कवियों के चारों ओर निर्मित कर दी हैं। साही का मानना है कि जब किसी कवि की प्रतिष्ठा अत्यधिक बढ़ जाती है, तब उसके वास्तविक रचनात्मक व्यक्तित्व पर अनेक प्रकार की मान्यताएँ, किंवदंतियाँ और सांस्कृतिक धारणाएँ जमा होने लगती हैं। परिणामस्वरूप कवि कम और उसका मिथक अधिक दिखाई देने लगता है।

साही की दृष्टि में मध्यकालीन कवियों को समझने की सबसे बड़ी बाधा यही मिथकीकरण है। कबीर के मामले में यह स्थिति विशेष रूप से दिखाई देती है। सदियों से कबीर को संत, महात्मा, समाज-सुधारक, क्रांतिकारी, धर्मगुरु, रहस्यवादी और न जाने कितने रूपों में प्रस्तुत किया जाता रहा है। इन सभी रूपों में कुछ न कुछ सत्य अवश्य है, किंतु साही यह प्रश्न उठाते हैं कि क्या इन तैयार छवियों के पीछे वास्तविक कबीर कहीं खो नहीं गए हैं? वे कबीर को उनके अनुयायियों द्वारा निर्मित प्रतिमाओं से अलग करके देखने का प्रयास करते हैं। उनके लिए कबीर किसी सम्प्रदाय के संस्थापक से पहले एक बेचैन और संघर्षशील चेतना हैं।

यह दृष्टिकोण केवल कबीर तक सीमित नहीं है। साही मध्यकालीन साहित्य की संपूर्ण परंपरा को इसी आलोचनात्मक विवेक के साथ पढ़ते हैं। वे मानते हैं कि किसी कवि की पूजा करने से उसकी समझ विकसित नहीं होती। पूजा और आलोचना की प्रकृति अलग-अलग होती है। पूजा प्रश्न नहीं पूछती, जबकि आलोचना का आरंभ ही प्रश्न से होता है। इसलिए साही मध्यकालीन कवियों को आलोचना के क्षेत्र में वापस लाने का प्रयास करते हैं, जहाँ उन्हें श्रद्धा के कारण नहीं, बल्कि उनकी रचनात्मक शक्ति के कारण महत्त्व दिया जाए।

मिथकों के विखंडन का अर्थ साही के यहाँ कवि का अवमूल्यन करना नहीं है। वे किसी कवि की प्रतिष्ठा को नष्ट नहीं करना चाहते। उनका उद्देश्य यह है कि कवि को उसकी वास्तविक जटिलता में देखा जाए। महान रचनाकार कभी भी एकरेखीय नहीं होते। उनके भीतर विरोधाभास, असमंजस, संघर्ष और परिवर्तन की प्रक्रियाएँ सक्रिय रहती हैं। मिथक इन जटिलताओं को समाप्त कर देता है और कवि को एक स्थिर प्रतिमा में बदल देता है। साही इस स्थिरता का विरोध करते हैं।

उनकी आलोचना में यह आग्रह बार-बार दिखाई देता है कि कवि को उसके समय, अनुभव और रचना के भीतर खोजा जाए, न कि उसके बारे में प्रचलित धारणाओं में। वे मानते हैं कि जब तक आलोचक स्थापित छवियों से मुक्त नहीं होगा, तब तक वह रचना के वास्तविक अर्थ तक नहीं पहुँच सकेगा। इसलिए साही की पुनर्पाठ पद्धति सबसे पहले उन मान्यताओं की जाँच करती है जिन्हें सामान्यतः निर्विवाद सत्य मान लिया गया है।

मध्यकालीन साहित्य के अध्ययन में यह दृष्टिकोण विशेष महत्त्व रखता है, क्योंकि यहाँ श्रद्धा और आस्था की भूमिका बहुत गहरी रही है। अनेक कवि धार्मिक परंपराओं से जुड़े रहे हैं और उनके अनुयायियों ने उन्हें लगभग पवित्र व्यक्तित्व का दर्जा दे दिया है। साही इस पवित्रीकरण की प्रक्रिया को आलोचना के लिए चुनौती मानते हैं। वे साहित्य को धर्मग्रंथ की तरह नहीं पढ़ते। उनके लिए कविता का मूल्य उसके विचार, संवेदना, भाषा और मानवीय अनुभव में निहित है, न कि उसके चारों ओर निर्मित धार्मिक प्रतिष्ठा में।

साही की यह पद्धति मध्यकालीन काव्य को नए प्रश्नों के लिए खोलती है। जब मिथक टूटते हैं तब कवि का वास्तविक संघर्ष सामने आता है। तब यह दिखाई देता है कि कबीर केवल उपदेश देने वाले संत नहीं थे, बल्कि अपने समय की रूढ़ियों से लड़ने वाले व्यक्ति भी थे। तब यह भी स्पष्ट होता है कि मध्यकालीन कवि पूर्ण और सर्वज्ञ नहीं थे, बल्कि अपने समय की सीमाओं और संभावनाओं के भीतर काम करने वाले मनुष्य थे।

यही कारण है कि साही की आलोचना मध्यकालीन साहित्य को पुनः जीवित बना देती है। वह कवियों को मूर्तियों के आसन से उतारकर संवाद की भूमि पर ले आती है। वहाँ वे पूजे जाने वाले देवता नहीं, बल्कि समझे जाने वाले रचनाकार बन जाते हैं। इस प्रकार मिथकों का विखंडन साही के लिए नकारात्मक प्रक्रिया नहीं, बल्कि रचनात्मक पुनर्स्थापन की प्रक्रिया है। मिथक टूटने के बाद ही कवि का वास्तविक स्वर सुनाई देता है और मध्यकालीन काव्य अपनी नई अर्थवत्ता के साथ हमारे सामने उपस्थित होता है।

।। तीन ।।

भक्ति आंदोलन का पुनर्पाठ : आस्था से अधिक प्रश्नाकुलता

विजयदेव नारायण साही की मध्यकालीन काव्य-दृष्टि का उल्लेखनीय पक्ष यह है कि वे भक्ति आंदोलन को केवल आस्था, समर्पण और धार्मिक अनुभव के रूप में नहीं देखते। उनके लिए भक्ति का संसार जितना विश्वास का संसार है, उतना ही प्रश्नों का संसार भी है। परंपरागत व्याख्याओं में भक्ति को प्रायः ईश्वर के प्रति अनन्य समर्पण की प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत किया गया है, किंतु साही इस व्याख्या के भीतर छिपी एक बड़ी कमी की ओर संकेत करते हैं। उनके अनुसार यदि भक्ति को केवल विश्वास की अभिव्यक्ति मान लिया जाए तो उसके भीतर सक्रिय बौद्धिक बेचैनी, आत्मसंघर्ष और सत्य की खोज के अनेक आयाम अदृश्य हो जाते हैं।

साही के लिए भक्ति आंदोलन का वास्तविक महत्त्व इस बात में है कि उसने मनुष्य को प्रश्न पूछने का साहस दिया। यह प्रश्न केवल धार्मिक संस्थाओं से नहीं था, बल्कि स्वयं अपने अनुभवों से भी था। भक्ति कवियों की रचनाओं में बार-बार ऐसी जिज्ञासाएँ दिखाई देती हैं जो स्थापित मान्यताओं को चुनौती देती हैं। कबीर इसका सबसे सशक्त उदाहरण हैं। वे केवल ईश्वर को स्वीकार नहीं करते, बल्कि ईश्वर की अवधारणा तक से जिरह करते हैं। वे केवल पूजा-पद्धतियों का विरोध नहीं करते, बल्कि उस मानसिकता पर भी प्रश्न उठाते हैं जो सत्य को तैयार रूप में स्वीकार कर लेना चाहती है।

साही मानते हैं कि भक्ति आंदोलन की ऊर्जा उसके उत्तरों में नहीं, बल्कि उसके प्रश्नों में अधिक निहित है। कबीर, रैदास, दादू या अन्य संत कवियों को पढ़ते हुए वे बार-बार इस बात की ओर ध्यान दिलाते हैं कि ये कवि किसी स्थापित व्यवस्था के प्रवक्ता नहीं हैं। वे खोज की प्रक्रिया में हैं। उनके कथनों में अंतिम सत्य की घोषणा से अधिक सत्य की तलाश दिखाई देती है। यही तलाश उन्हें जीवंत और आधुनिक बनाती है।

भक्ति का यह प्रश्नधर्मी स्वर केवल धर्म तक सीमित नहीं रहता। वह समाज, जाति, ज्ञान और सत्ता की संरचनाओं तक भी पहुँचता है। साही के अनुसार भक्ति आंदोलन ने मध्यकालीन समाज में एक वैचारिक हलचल पैदा की। उसने यह संकेत दिया कि सत्य केवल पुरोहितों, धर्माचार्यों या ग्रंथों की संपत्ति नहीं है। साधारण मनुष्य भी अपने अनुभव के आधार पर सत्य की खोज कर सकता है। यह विचार अपने समय में अत्यंत क्रांतिकारी था। साही इसी बिंदु को भक्ति आंदोलन की वास्तविक उपलब्धि मानते हैं।

उनकी दृष्टि में भक्ति का संसार स्थिर विश्वास का संसार नहीं है। वहाँ निरंतर संवाद, संघर्ष और आत्मपरीक्षण की प्रक्रिया चलती रहती है। कबीर की वाणी में जो तीखापन दिखाई देता है, वह केवल विद्रोह का परिणाम नहीं है। उसके पीछे एक गहरी असंतुष्टि और प्रश्नाकुलता काम कर रही है। वे किसी भी उत्तर को अंतिम रूप से स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। साही इसी मानसिकता को भक्ति आंदोलन की केंद्रीय शक्ति के रूप में देखते हैं।

साही की पुनर्पाठ पद्धति भक्ति को भावुकता के दायरे से भी बाहर निकालती है। वे इसे केवल भक्त और भगवान के संबंध तक सीमित नहीं रखते। उनके अनुसार भक्ति मनुष्य की उस आंतरिक बेचैनी का नाम है जो उसे अपने सीमित अस्तित्व से आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है। इस दृष्टि से भक्ति आध्यात्मिक अनुभव के साथ-साथ एक बौद्धिक और अस्तित्वगत अनुभव भी बन जाती है। यहाँ श्रद्धा और संशय एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक दिखाई देते हैं।

मध्यकालीन काव्य के अध्ययन में यह दृष्टिकोण विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इससे भक्ति आंदोलन की छवि बदल जाती है। वह केवल धार्मिक पुनर्जागरण का आंदोलन नहीं रह जाता, बल्कि मनुष्य की स्वतंत्र चेतना के विकास की प्रक्रिया के रूप में दिखाई देने लगता है। साही के लिए भक्ति का मूल्य इसी स्वतंत्र चेतना में है। वे देखते हैं कि भक्ति कवियों ने आस्था को जड़ विश्वास में बदलने के बजाय उसे सतत खोज और आत्मसंवाद की प्रक्रिया बनाए रखा।

इस प्रकार साही भक्ति आंदोलन का पुनर्पाठ करते हुए उसके भीतर छिपी प्रश्नाकुलता को सामने लाते हैं। उनके अनुसार भक्ति का सबसे जीवंत पक्ष उसकी बेचैनी है, उसका असंतोष है, उसकी निरंतर खोज है। आस्था वहाँ मौजूद है, किंतु वह निष्क्रिय स्वीकृति नहीं है। वह प्रश्नों से होकर गुजरती है, संघर्षों से होकर विकसित होती है और अनुभव की कसौटी पर स्वयं को बार-बार परखती है। यही कारण है कि साही की दृष्टि में भक्ति आंदोलन केवल धर्म का इतिहास नहीं, बल्कि मनुष्य की जिज्ञासा, स्वतंत्रता और सत्य-अन्वेषण का इतिहास भी है। यही उसकी स्थायी प्रासंगिकता का आधार है।

।। चार ।।

मध्यकालीन काव्य में प्रतिरोध और असहमति की पहचान

विजयदेव नारायण साही जब मध्यकालीन काव्य को पढ़ते हैं तो उनकी दृष्टि केवल भक्ति, अध्यात्म और काव्य-सौंदर्य तक सीमित नहीं रहती। वे उन स्वरों की भी तलाश करते हैं जो अपने समय की स्थापित व्यवस्थाओं, रूढ़ियों और वैचारिक प्रभुत्वों के विरुद्ध खड़े दिखाई देते हैं। उनके लिए मध्यकालीन कविता केवल समर्पण का साहित्य नहीं है, बल्कि असहमति का भी साहित्य है। यह असहमति कभी प्रत्यक्ष रूप में दिखाई देती है, कभी प्रतीकों और संकेतों में छिपी रहती है। साही की आलोचना का एक महत्त्वपूर्ण कार्य इन छिपे हुए प्रतिरोधी तत्वों को पहचानना है।

परंपरागत साहित्येतिहास ने मध्यकालीन काव्य को अक्सर धार्मिक आंदोलनों के संदर्भ में समझा है। इससे अनेक बार कवियों के भीतर उपस्थित प्रतिरोधी चेतना पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। साही इस स्थिति को बदलते हैं। वे देखते हैं कि मध्यकालीन कवियों का संघर्ष केवल आध्यात्मिक नहीं था। वे अपने समय की सामाजिक, सांस्कृतिक और मानसिक संरचनाओं से भी टकरा रहे थे। इसलिए उनकी कविता में विरोध और असहमति के स्वर स्वाभाविक रूप से उपस्थित हैं।

कबीर के संदर्भ में यह बात सबसे अधिक स्पष्ट होती है। साही की दृष्टि में कबीर का महत्त्व केवल उनके आध्यात्मिक अनुभव में नहीं, बल्कि उनके प्रतिरोधी व्यक्तित्व में भी निहित है। कबीर किसी एक धर्म, सम्प्रदाय या परंपरा के भीतर सुरक्षित रहने वाले कवि नहीं हैं। वे हर प्रकार की जड़ता के विरोध में खड़े होते हैं। वे मंदिर और मस्जिद दोनों से प्रश्न करते हैं। वे शास्त्र और परंपरा दोनों की परीक्षा लेते हैं। साही इस प्रतिरोध को केवल सामाजिक विद्रोह के रूप में नहीं देखते, बल्कि स्वतंत्र चेतना की अभिव्यक्ति के रूप में समझते हैं।

साही के अनुसार मध्यकालीन असहमति का स्वर आधुनिक राजनीतिक प्रतिरोध से भिन्न है। यह किसी संगठित आंदोलन का घोषणापत्र नहीं है। यह अधिकतर व्यक्तिगत अनुभव और नैतिक साहस से उत्पन्न होता है। कवि अपने समय की स्वीकृत धारणाओं को अस्वीकार करता है और सत्य की खोज में अकेला पड़ जाने का जोखिम उठाता है। इस प्रकार प्रतिरोध केवल बाहरी संघर्ष नहीं रहता, बल्कि आंतरिक स्वतंत्रता का भी प्रश्न बन जाता है।

मध्यकालीन काव्य में प्रतिरोध का एक रूप भाषा में भी दिखाई देता है। अनेक कवियों ने संस्कृत जैसी प्रतिष्ठित भाषाओं के स्थान पर लोकभाषाओं को अपनाया। साही इस चयन को केवल भाषिक परिवर्तन नहीं मानते। उनके लिए यह सांस्कृतिक असहमति का भी संकेत है। लोकभाषा में लिखना उस ज्ञान-व्यवस्था के विरुद्ध खड़ा होना था जो भाषा के आधार पर भी सत्ता का निर्माण करती थी। इस दृष्टि से भाषा स्वयं प्रतिरोध का माध्यम बन जाती है।

साही यह भी देखते हैं कि मध्यकालीन कवियों का प्रतिरोध केवल धार्मिक संस्थाओं तक सीमित नहीं था। वे मनुष्य के भीतर मौजूद भय, अंधविश्वास और आत्मसमर्पण की प्रवृत्तियों के विरुद्ध भी संघर्ष कर रहे थे। कबीर की वाणी में जो तीखी आलोचना दिखाई देती है, उसका लक्ष्य केवल सामाजिक व्यवस्था नहीं है। उसका लक्ष्य वह मानसिकता भी है जो बिना सोचे-समझे किसी सत्ता के आगे झुक जाती है। इसलिए साही के लिए असहमति का अर्थ केवल बाहरी विरोध नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर चिंतन की स्थापना भी है।

मध्यकालीन काव्य में प्रतिरोध को पहचानते हुए साही उसे किसी एक वैचारिक खाँचे में सीमित नहीं करते। वे कवियों को आधुनिक राजनीतिक विचारधाराओं का पूर्वज सिद्ध करने का प्रयास नहीं करते। उनका उद्देश्य यह दिखाना है कि मध्यकालीन साहित्य के भीतर स्वतंत्रता की एक ऐसी चेतना मौजूद है जो हर युग में नए अर्थ ग्रहण कर सकती है। यह चेतना किसी एक समय या विचारधारा की बंधक नहीं है।

साही की दृष्टि में असहमति का सबसे बड़ा मूल्य यह है कि वह मनुष्य को सक्रिय बनाती है। वह उसे तैयार उत्तरों और निश्चित मान्यताओं की दुनिया से बाहर निकालती है। मध्यकालीन कवियों का प्रतिरोध इसी कारण महत्त्वपूर्ण है कि वह मनुष्य को सोचने, प्रश्न करने और अपने अनुभव पर भरोसा करने की प्रेरणा देता है। यहाँ प्रतिरोध नकारात्मकता नहीं, बल्कि रचनात्मक ऊर्जा का स्रोत बन जाता है।

इस प्रकार साही मध्यकालीन काव्य को केवल भक्ति और आध्यात्मिकता की परंपरा के रूप में नहीं देखते। वे उसके भीतर मौजूद असहमति, प्रतिरोध और स्वतंत्र चेतना के उन स्रोतों को पहचानते हैं जिन्होंने भारतीय साहित्य को नई वैचारिक ऊँचाइयाँ प्रदान कीं। उनके लिए मध्यकालीन कविता की जीवंतता इसी में है कि वह अपने समय की स्वीकृत सच्चाइयों से संतुष्ट नहीं होती, बल्कि उन्हें निरंतर चुनौती देती रहती है। यही चुनौती उसे आज भी प्रासंगिक बनाती है और यही साही की पुनर्पाठ-दृष्टि का एक केंद्रीय आधार भी है।

।। पांच।।

साही की दृष्टि में कबीर : संत से अधिक एक बौद्धिक व्यक्तित्व

विजयदेव नारायण साही के कबीर-विमर्श का सबसे विशिष्ट पक्ष यह है कि वे कबीर को केवल संत, भक्त, समाज-सुधारक या धार्मिक क्रांतिकारी के रूप में नहीं देखते। वे इन सभी परिचित छवियों के भीतर प्रवेश करके उस बौद्धिक व्यक्तित्व की खोज करते हैं जो कबीर की वाणी को उसकी वास्तविक शक्ति प्रदान करता है। साही के लिए कबीर की महानता का आधार केवल उनकी भक्ति नहीं है, बल्कि उनकी विचारशीलता, प्रश्नाकुलता और सत्य के प्रति उनका अडिग आग्रह है। इसी कारण उनकी आलोचना में कबीर का व्यक्तित्व धार्मिक आभामंडल से निकलकर एक स्वतंत्र चिंतक के रूप में उभरता है।

साही का मानना है कि कबीर को केवल संत मान लेने से उनके रचनात्मक व्यक्तित्व का एक बड़ा हिस्सा अदृश्य हो जाता है। संत की छवि प्रायः श्रद्धा और विश्वास से निर्मित होती है, जबकि कबीर का व्यक्तित्व निरंतर प्रश्न करने वाली चेतना से निर्मित है। वे किसी भी स्थापित सत्य को बिना परखे स्वीकार नहीं करते। वे परंपरा से संवाद भी करते हैं और उसका प्रतिवाद भी करते हैं। साही इसी बिंदु को कबीर की बौद्धिकता का आधार मानते हैं।

उनकी दृष्टि में कबीर का संघर्ष केवल धार्मिक पाखंडों के विरुद्ध नहीं है। वे ज्ञान की उन सभी संरचनाओं को चुनौती देते हैं जो मनुष्य की स्वतंत्र चेतना को सीमित करती हैं। कबीर बार-बार अनुभव को पुस्तक से अधिक महत्त्व देते हैं, प्रत्यक्ष को परंपरा से अधिक विश्वसनीय मानते हैं और आत्मानुभूति को बाहरी प्रमाणों से ऊपर रखते हैं। साही इसे केवल आध्यात्मिक आग्रह नहीं मानते, बल्कि एक स्वतंत्र बौद्धिक दृष्टिकोण के रूप में देखते हैं।

कबीर की कविता में उपस्थित विरोधाभासों को भी साही विशेष महत्त्व देते हैं। वे यह स्वीकार करते हैं कि कबीर को किसी एक सूत्र में बाँधना संभव नहीं है। उनकी वाणी में अनेक स्तरों पर तनाव, द्वंद्व और जटिलताएँ मौजूद हैं। कभी वे ईश्वर के निकट दिखाई देते हैं, कभी ईश्वर की पारंपरिक अवधारणाओं को ही प्रश्नांकित करने लगते हैं। कभी वे प्रेम की भाषा बोलते हैं, तो कभी तीखी असहमति की। साही इन विरोधाभासों को कमजोरी नहीं, बल्कि एक बड़े चिंतक की पहचान मानते हैं।

साही के अनुसार कबीर का मूल स्वभाव उत्तर देने का नहीं, प्रश्न खड़ा करने का है। वे तैयार निष्कर्षों के कवि नहीं हैं। वे मनुष्य को एक ऐसी स्थिति में पहुँचा देते हैं जहाँ उसे स्वयं विचार करना पड़ता है। कबीर का यही पक्ष उन्हें मध्यकालीन भारतीय परंपरा के सबसे महत्त्वपूर्ण बौद्धिक व्यक्तित्वों में बदल देता है। साही बार-बार इस तथ्य को रेखांकित करते हैं कि कबीर की शक्ति उनके समाधानों में नहीं, बल्कि उनकी बेचैन करने वाली प्रश्नवाचकता में है।

कबीर की भाषा को भी साही इसी बौद्धिक व्यक्तित्व के संदर्भ में पढ़ते हैं। उनकी भाषा केवल काव्यात्मक नहीं है, बल्कि संवादात्मक और तर्कपूर्ण भी है। उसमें बहस है, चुनौती है, व्यंग्य है और प्रतिपक्ष को अस्थिर कर देने वाली तीक्ष्णता है। कबीर की वाणी पाठक को निष्क्रिय नहीं रहने देती। वह उसे सोचने के लिए विवश करती है। साही इस विशेषता को कबीर की बौद्धिक ऊर्जा का प्रमाण मानते हैं।

साही के लिए कबीर का महत्त्व इस बात में भी है कि वे किसी वैचारिक व्यवस्था के स्थायी प्रवक्ता नहीं बनते। वे किसी एक मत, सम्प्रदाय या सिद्धांत में पूरी तरह समाहित नहीं किए जा सकते। उनका व्यक्तित्व निरंतर गतिशील है। वे हर प्रकार की निश्चितता के विरुद्ध खड़े दिखाई देते हैं। यह अस्थिरता ही उनकी शक्ति है। साही इसे आधुनिक बौद्धिक चेतना के निकट पाते हैं, यद्यपि वे कबीर को आधुनिक सिद्ध करने का प्रयास नहीं करते।

कबीर के इस पुनर्पाठ में साही मूलतः एक नए कबीर की खोज करते हैं। यह कबीर केवल भक्त नहीं है, केवल संत नहीं है, केवल समाज-सुधारक नहीं है। यह एक ऐसा मनुष्य है जो सत्य की खोज में हर प्रकार की सुविधा, प्रतिष्ठा और सुरक्षा को त्यागने के लिए तैयार है। उसकी सबसे बड़ी निष्ठा किसी संस्था, किसी ग्रंथ या किसी सम्प्रदाय के प्रति नहीं, बल्कि सत्य के प्रति है।

यहीं साही की कबीर-दृष्टि अपनी विशिष्टता प्राप्त करती है। वे कबीर को श्रद्धा की मूर्ति से अधिक विचार की चुनौती के रूप में प्रस्तुत करते हैं। उनके लिए कबीर का सबसे बड़ा योगदान किसी धार्मिक मार्ग का निर्माण नहीं, बल्कि स्वतंत्र चिंतन की परंपरा को सशक्त बनाना है। इस प्रकार साही की आलोचना में कबीर एक संत से अधिक एक बौद्धिक व्यक्तित्व बनकर सामने आते हैं, और यही दृष्टि मध्यकालीन काव्य के पुनर्पाठ को एक नया आयाम प्रदान करती है।

।। छ: ।।

मध्यकालीन साहित्य और आधुनिक संवेदना का संवाद

विजयदेव नारायण साही की आलोचना-दृष्टि का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि वे मध्यकालीन साहित्य को केवल उसके ऐतिहासिक समय में बंद करके नहीं देखते। उनके लिए मध्यकाल अतीत का समाप्त अध्याय नहीं है, बल्कि वर्तमान के साथ लगातार संवाद करने वाली एक जीवित सांस्कृतिक उपस्थिति है। यही कारण है कि वे मध्यकालीन कवियों को पढ़ते समय केवल यह नहीं पूछते कि वे अपने समय में क्या कह रहे थे, बल्कि यह भी देखते हैं कि वे आज के मनुष्य से क्या कह सकते हैं। इस प्रकार उनकी आलोचना मध्यकालीन साहित्य और आधुनिक संवेदना के बीच एक सक्रिय संवाद स्थापित करती है।

साही की दृष्टि में किसी रचना की महानता केवल उसके ऐतिहासिक महत्त्व में नहीं होती। यदि कोई कृति अपने समय के समाप्त हो जाने के बाद भी मनुष्य को उद्वेलित करती है, नए प्रश्न उत्पन्न करती है और नई व्याख्याओं को जन्म देती है, तभी वह वास्तव में जीवित कृति कहलाने की अधिकारी है। मध्यकालीन कविता के प्रति उनका आकर्षण इसी कारण है। वे उसमें ऐसी मानवीय बेचैनियाँ देखते हैं जो समय बदल जाने पर भी समाप्त नहीं होतीं।

कबीर को पढ़ते हुए साही बार-बार इस बात की ओर संकेत करते हैं कि उनके प्रश्न केवल पंद्रहवीं शताब्दी के प्रश्न नहीं हैं। सत्य क्या है, मनुष्य की स्वतंत्रता क्या है, अनुभव का मूल्य क्या है, परंपरा की सीमा क्या है, सत्ता का स्वरूप क्या है, आत्म की पहचान कैसे संभव है, जैसे प्रश्न आज भी उतने ही महत्त्वपूर्ण हैं। साही के लिए कबीर का महत्त्व इसी स्थायी प्रश्नाकुलता में निहित है। वे कबीर को आधुनिक बनाने का प्रयास नहीं करते, बल्कि यह दिखाते हैं कि उनकी चेतना में ऐसे तत्व मौजूद हैं जो आधुनिक मनुष्य के अनुभव से संवाद स्थापित कर सकते हैं।

मध्यकालीन साहित्य और आधुनिक संवेदना के इस संवाद में साही इतिहास की दूरी को मिटाने का प्रयास नहीं करते। वे यह स्वीकार करते हैं कि मध्यकाल और आधुनिकता दो भिन्न ऐतिहासिक स्थितियाँ हैं। दोनों के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक संदर्भ अलग हैं। किंतु वे यह भी मानते हैं कि मनुष्य की कुछ मूलभूत चिंताएँ समय की सीमाओं से परे होती हैं। प्रेम, अकेलापन, असहमति, सत्य की खोज, भय, विश्वास और आत्मसंघर्ष जैसी अनुभूतियाँ हर युग में किसी न किसी रूप में उपस्थित रहती हैं। मध्यकालीन कविता की प्रासंगिकता इन्हीं अनुभूतियों के कारण बनी रहती है।

साही आधुनिकता को केवल तकनीकी विकास या सामाजिक परिवर्तन के रूप में नहीं समझते। उनके लिए आधुनिकता का एक महत्त्वपूर्ण अर्थ है प्रश्न करने की क्षमता। इसी कारण वे मध्यकालीन कवियों में उन तत्वों को विशेष महत्त्व देते हैं जो स्वतंत्र चिंतन को जन्म देते हैं। कबीर, रैदास और अन्य संत कवियों की वाणी में उन्हें ऐसी चेतना दिखाई देती है जो किसी भी स्थापित सत्य को अंतिम रूप से स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। यह मानसिकता आधुनिक संवेदना के निकट पहुँचती है।

उनकी आलोचना में मध्यकालीन साहित्य एक प्रकार का वैचारिक दर्पण बन जाता है। आधुनिक मनुष्य जब उसे पढ़ता है तो केवल अतीत को नहीं देखता, बल्कि स्वयं को भी देखने लगता है। कबीर की असहमति, जायसी का प्रेम, संत कवियों की बेचैनी और भक्त कवियों की आत्मसंघर्षपूर्ण चेतना आधुनिक पाठक को अपने समय के प्रश्नों पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित करती है। साही इसी संवाद को साहित्य की सबसे बड़ी उपलब्धि मानते हैं।

यह संवाद केवल विचारों का नहीं, संवेदना का भी है। साही देखते हैं कि मध्यकालीन कविता में मनुष्य की जो भावात्मक गहराई व्यक्त हुई है, वह आज भी उतनी ही प्रभावशाली है। प्रेम का विरह, आत्मा की व्याकुलता, सत्य की खोज का तनाव और जीवन की अनिश्चितता का अनुभव आधुनिक मनुष्य के लिए भी अपरिचित नहीं हैं। इसीलिए मध्यकालीन कविता केवल ऐतिहासिक जिज्ञासा की वस्तु नहीं बनती, बल्कि समकालीन अनुभव का हिस्सा बन जाती है।

साही की पुनर्पाठ पद्धति का एक महत्त्वपूर्ण योगदान यह है कि वह मध्यकालीन साहित्य को वर्तमान की बहसों में शामिल करती है। वह उसे संग्रहालय की वस्तु नहीं बनने देती। वहाँ मध्यकालीन कवि अतीत के प्रतिनिधि मात्र नहीं रहते, बल्कि वर्तमान के संवादकर्ता बन जाते हैं। उनकी रचनाएँ इतिहास की धरोहर होने के साथ-साथ जीवित वैचारिक और मानवीय अनुभव भी बन जाती हैं।

अंततः साही के लिए मध्यकालीन साहित्य और आधुनिक संवेदना का संबंध प्रभाव और अनुकरण का संबंध नहीं है। यह संवाद का संबंध है। आधुनिकता मध्यकाल को अपने भीतर समाहित नहीं करती और न ही मध्यकाल आधुनिकता पर हावी होता है। दोनों एक-दूसरे के सामने खड़े होकर मनुष्य के साझा प्रश्नों पर विचार करते हैं। इसी संवाद में मध्यकालीन साहित्य की नई अर्थवत्ता जन्म लेती है और इसी प्रक्रिया में साही की आलोचना अपने समय से आगे बढ़कर एक व्यापक सांस्कृतिक दृष्टि का रूप ग्रहण करती है।

।। सात ।।

इतिहास नहीं, जीवित अनुभव : साही का मध्यकाल-बोध

विजयदेव नारायण साही के मध्यकाल-बोध की सबसे विशिष्ट विशेषता यह है कि वे मध्यकाल को केवल इतिहास की एक समाप्त अवधि के रूप में नहीं देखते। उनके लिए मध्यकाल कोई ऐसी समय-सीमा नहीं है जो बीत चुकी हो और जिसका महत्त्व केवल इतिहास की पुस्तकों तक सीमित रह गया हो। वे मध्यकाल को एक जीवित अनुभव की तरह ग्रहण करते हैं, जिसकी प्रतिध्वनियाँ आज भी मनुष्य की चेतना में सुनी जा सकती हैं। यही कारण है कि उनकी आलोचना में मध्यकालीन साहित्य का अध्ययन इतिहास की पुनरावृत्ति नहीं, बल्कि मानवीय अनुभवों की पुनर्खोज बन जाता है।

सामान्यतः साहित्येतिहास की परंपरा मध्यकाल को राजनीतिक घटनाओं, धार्मिक आंदोलनों, राजवंशों और सांस्कृतिक प्रवृत्तियों के आधार पर समझने का प्रयास करती है। इस दृष्टि की अपनी उपयोगिता है, किंतु साही का मानना है कि केवल इतिहास के माध्यम से किसी युग की आत्मा तक नहीं पहुँचा जा सकता। इतिहास हमें घटनाएँ देता है, पर अनुभव नहीं देता। वह समय का बाहरी ढाँचा प्रस्तुत करता है, किंतु मनुष्य के भीतर घट रही प्रक्रियाओं को पूरी तरह व्यक्त नहीं कर पाता। इसलिए साही मध्यकालीन कविता के माध्यम से उस जीवित अनुभव तक पहुँचने की कोशिश करते हैं जो इतिहास के दस्तावेज़ों में अक्सर अनुपस्थित रहता है।

उनके लिए कबीर का महत्त्व इस बात में नहीं है कि वे पंद्रहवीं शताब्दी में पैदा हुए थे, बल्कि इस बात में है कि उनकी बेचैनी आज भी जीवित है। कबीर का समय समाप्त हो गया, पर उनके प्रश्न समाप्त नहीं हुए। इसी प्रकार मध्यकालीन कवियों के अनुभव इतिहास की सीमाओं में कैद नहीं रहते। वे समय को पार करके आने वाली पीढ़ियों के भीतर भी प्रवेश करते रहते हैं। साही इसी निरंतरता को मध्यकालीन साहित्य की वास्तविक शक्ति मानते हैं।

साही के मध्यकाल-बोध में तिथियों, राजाओं और घटनाओं की तुलना में मानवीय चेतना अधिक महत्त्वपूर्ण है। वे यह देखने का प्रयास करते हैं कि किसी युग का मनुष्य किन आशंकाओं, इच्छाओं, संघर्षों और आकांक्षाओं के साथ जी रहा था। उनके लिए मध्यकाल का अध्ययन मूलतः मनुष्य के अध्ययन का एक रूप है। इसीलिए वे साहित्य को इतिहास के पूरक के रूप में नहीं, बल्कि उसके भीतर छिपे हुए जीवन-सत्य को उद्घाटित करने वाले माध्यम के रूप में देखते हैं।

उनकी दृष्टि में मध्यकालीन कविता किसी युग का दर्पण नहीं है, बल्कि उस युग के भीतर चल रही मानसिक और आध्यात्मिक हलचलों का साक्ष्य है। कबीर की असहमति, रैदास की मानवीय समानता की आकांक्षा, जायसी का प्रेम और तुलसी की आस्था, ये सब केवल विचार नहीं हैं; ये मनुष्य के जीवित अनुभव हैं। साही इन अनुभवों को उनके ऐतिहासिक संदर्भों में समझते हुए भी उन्हें केवल उसी संदर्भ तक सीमित नहीं करते।

साही का मानना है कि साहित्य की सबसे बड़ी शक्ति यही है कि वह समय की सीमाओं को पार कर सकता है। इतिहास किसी युग को समाप्त घोषित कर सकता है, लेकिन कविता ऐसा नहीं करती। कविता में दर्ज अनुभव लगातार नए अर्थ ग्रहण करते रहते हैं। इसलिए मध्यकालीन साहित्य को केवल अतीत का साहित्य मानना उसकी रचनात्मक शक्ति को कम करके आँकना है। साही इस सीमित दृष्टि का विरोध करते हैं।

उनकी आलोचना में मध्यकाल बार-बार वर्तमान में लौटता है। यह वापसी किसी रोमानी मोह के कारण नहीं होती, बल्कि इसलिए होती है कि मनुष्य की मूलभूत समस्याएँ पूरी तरह समाप्त नहीं होतीं। सत्ता बदलती है, समाज बदलता है, भाषा बदलती है, लेकिन सत्य की खोज, स्वतंत्रता की आकांक्षा, प्रेम की व्याकुलता और असहमति का साहस जैसे अनुभव बने रहते हैं। मध्यकालीन कविता इन्हीं अनुभवों को अपने विशिष्ट रूप में अभिव्यक्त करती है। साही इसी कारण उसे आज भी प्रासंगिक मानते हैं।

उनका मध्यकाल-बोध किसी प्रकार के अतीतमोह पर आधारित नहीं है। वे मध्यकाल का महिमामंडन नहीं करते। वे यह नहीं कहते कि मध्यकाल वर्तमान से श्रेष्ठ था। वे केवल यह संकेत करते हैं कि किसी भी युग को समझने के लिए उसके भीतर के मानवीय अनुभवों को समझना आवश्यक है। मध्यकाल का मूल्य इसी मानवीय गहराई में है, न कि उसकी ऐतिहासिक दूरी में।

इस प्रकार साही की दृष्टि में मध्यकाल एक मृत इतिहास नहीं, बल्कि जीवित अनुभवों का विस्तृत संसार है। वहाँ कवि केवल ऐतिहासिक पात्र नहीं हैं, बल्कि आज भी संवाद करने वाले मनुष्य हैं। उनकी कविताएँ केवल अपने समय की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि मनुष्य की दीर्घकालिक चेतना की अभिव्यक्ति हैं। इसलिए साही का मध्यकाल-बोध इतिहास के अध्ययन से आगे बढ़कर अनुभव के अध्ययन में परिवर्तित हो जाता है। यही उनकी पुनर्पाठ पद्धति की एक केंद्रीय विशेषता है और यही वह आधार है जो मध्यकालीन साहित्य को आज भी जीवंत बनाए रखता है।

।। आठ ।।

मध्यकालीन काव्य में व्यक्ति की खोज

विजयदेव नारायण साही की मध्यकालीन काव्य-दृष्टि का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि वे मध्यकालीन साहित्य को केवल धार्मिक, सामुदायिक अथवा सांप्रदायिक चेतना की अभिव्यक्ति मानकर नहीं पढ़ते। वे उसके भीतर उस व्यक्ति की खोज करते हैं जो परंपराओं, व्यवस्थाओं और सामूहिक पहचानों के बीच अपनी स्वतंत्र सत्ता निर्मित करने का प्रयास कर रहा है। साही के लिए मध्यकालीन कविता का एक बड़ा आकर्षण यही है कि उसमें समूह की छाया के भीतर भी व्यक्ति का स्वर लगातार सुनाई देता है।

साहित्येतिहास में मध्यकाल को प्रायः सामूहिक चेतना का युग माना गया है। यह कहा जाता रहा है कि उस समय व्यक्ति की अपेक्षा धर्म, सम्प्रदाय, जाति और समुदाय अधिक महत्त्वपूर्ण थे। साही इस सामान्य धारणा को पूरी तरह अस्वीकार तो नहीं करते, किंतु उसके भीतर छिपे सरलीकरण की ओर अवश्य संकेत करते हैं। उनके अनुसार यदि मध्यकाल केवल सामूहिकता का युग होता, तो कबीर जैसी आवाज़ संभव ही नहीं होती। कबीर की पूरी काव्य-चेतना एक स्वतंत्र व्यक्ति की चेतना है, जो भीड़ से अलग खड़े होकर बोलने का साहस रखती है।

साही देखते हैं कि मध्यकालीन कवियों के यहाँ बार-बार ऐसा मनुष्य उपस्थित होता है जो अपने अनुभव को किसी बाहरी प्रामाणिकता से अधिक महत्त्व देता है। वह शास्त्र से पहले अपने अनुभव को रखता है, परंपरा से पहले अपनी अनुभूति को और समूह से पहले अपने विवेक को। यह स्थिति व्यक्ति की उपस्थिति का सबसे बड़ा प्रमाण है। कबीर का “मैं” केवल व्याकरण का सर्वनाम नहीं है; वह एक जाग्रत चेतना का संकेत है, जो अपने समय के स्थापित सत्यों से टकराने को तैयार है।

साही की दृष्टि में मध्यकालीन भक्ति साहित्य की एक बड़ी उपलब्धि यह है कि उसने साधारण मनुष्य को आध्यात्मिक और वैचारिक गरिमा प्रदान की। अब सत्य तक पहुँचने के लिए किसी संस्थागत अधिकार की आवश्यकता नहीं रह जाती। व्यक्ति स्वयं अपने अनुभव के आधार पर सत्य की खोज कर सकता है। यह विचार व्यक्ति की स्वतंत्रता की घोषणा जैसा है। साही इस बिंदु को मध्यकालीन चेतना के सबसे महत्त्वपूर्ण परिवर्तनों में से एक मानते हैं।

कबीर के अतिरिक्त अन्य मध्यकालीन कवियों में भी साही व्यक्ति की इसी उपस्थिति को खोजते हैं। वे देखते हैं कि प्रेम, विरह, आस्था और आत्मसंघर्ष जैसे अनुभव मूलतः व्यक्ति के अनुभव हैं। इन्हें कोई समुदाय सामूहिक रूप से अनुभव नहीं कर सकता। इसलिए मध्यकालीन कविता में व्यक्त भावनाएँ और संवेदनाएँ व्यक्ति की आंतरिक दुनिया को उजागर करती हैं। यही आंतरिकता साहित्य को जीवंत बनाती है।

साही यह भी मानते हैं कि मध्यकालीन व्यक्ति आधुनिक व्यक्ति की तरह नहीं है। वह आधुनिक व्यक्तिवाद का प्रतिनिधि नहीं है। वह स्वयं को समाज से काटकर नहीं देखता। उसके जीवन में समुदाय और परंपरा की उपस्थिति बनी रहती है। किंतु इसके बावजूद उसके भीतर एक ऐसी चेतना विकसित होती है जो स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता रखती है। साही के लिए यही बिंदु सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है। व्यक्ति पूरी तरह स्वतंत्र नहीं है, फिर भी वह पूरी तरह पराधीन भी नहीं है।

मध्यकालीन कविता में व्यक्ति की खोज करते हुए साही विशेष रूप से आत्मानुभूति के प्रश्न पर बल देते हैं। कबीर का अनुभव, रैदास का अनुभव या अन्य संत कवियों का अनुभव किसी सामूहिक आदेश का परिणाम नहीं है। वे अपने भीतर प्राप्त सत्य को व्यक्त करते हैं। यही कारण है कि उनकी कविता में इतनी तीव्रता और प्रामाणिकता दिखाई देती है। साही इसे व्यक्ति की रचनात्मक स्वतंत्रता का प्रमाण मानते हैं।

उनकी आलोचना में व्यक्ति केवल सामाजिक इकाई नहीं है, बल्कि एक नैतिक और बौद्धिक सत्ता भी है। कबीर की असहमति का स्रोत कोई संगठन नहीं है। वह उनके व्यक्तिगत विवेक से उत्पन्न होती है। वे अकेले होकर भी अपने समय की शक्तिशाली व्यवस्थाओं का सामना करते हैं। साही के लिए यह अकेलापन अत्यंत अर्थपूर्ण है। यहीं व्यक्ति अपनी वास्तविक पहचान प्राप्त करता है।

मध्यकालीन काव्य में व्यक्ति की यह खोज साही को परंपरागत साहित्येतिहास से अलग खड़ा करती है। जहाँ सामान्यतः मध्यकाल को सामूहिक धार्मिक चेतना का युग माना जाता है, वहीं साही उसके भीतर उभरते हुए स्वतंत्र मनुष्य को पहचानते हैं। वे दिखाते हैं कि मध्यकालीन कवि केवल किसी सम्प्रदाय के प्रतिनिधि नहीं थे; वे अपनी विशिष्ट संवेदना, अनुभव और विवेक वाले व्यक्ति भी थे।

इस प्रकार साही की पुनर्पाठ-दृष्टि मध्यकालीन साहित्य को एक नए परिप्रेक्ष्य में देखने की संभावना प्रदान करती है। उनके लिए मध्यकालीन कविता का एक बड़ा अर्थ यह है कि वह समूह के भीतर व्यक्ति की आवाज़ को सुरक्षित रखती है। यह आवाज़ कभी कबीर की असहमति बनकर प्रकट होती है, कभी प्रेम की व्याकुलता बनकर, कभी आत्मान्वेषण की बेचैनी बनकर। साही इसी आवाज़ को मध्यकालीन साहित्य की सबसे मूल्यवान उपलब्धियों में गिनते हैं। उनके यहाँ मध्यकाल का कवि सबसे पहले एक जाग्रत मनुष्य है, और उसके बाद किसी सम्प्रदाय, परंपरा या विचारधारा का प्रतिनिधि। यही दृष्टि उनके मध्यकाल-बोध को विशिष्ट और समकालीन बनाती है।

।। नौ ।।

मध्यकालीन काव्य के अध्ययन में साही की प्रश्नधर्मी आलोचना-पद्धति

विजयदेव नारायण साही की आलोचना का सबसे विशिष्ट गुण यह है कि वे साहित्य को तैयार निष्कर्षों की भूमि नहीं मानते। उनकी आलोचना का आरंभ उत्तरों से नहीं, प्रश्नों से होता है। यही कारण है कि जब वे मध्यकालीन काव्य का अध्ययन करते हैं, तब उनका उद्देश्य किसी कवि को किसी निश्चित वैचारिक खाँचे में स्थापित करना नहीं होता, बल्कि उसकी रचना के भीतर छिपे हुए जटिल प्रश्नों को उजागर करना होता है। साही की दृष्टि में आलोचना का कार्य निर्णय सुनाना नहीं, बल्कि समझ की नई संभावनाएँ खोलना है।

हिन्दी आलोचना की एक बड़ी परंपरा ऐसी रही है जिसमें आलोचक प्रायः कवि या कृति के बारे में अंतिम निष्कर्ष देने की कोशिश करता है। वह रचना का अर्थ निर्धारित करता है और उसे किसी वैचारिक, ऐतिहासिक अथवा सांस्कृतिक वर्गीकरण में रख देता है। साही इस प्रवृत्ति से अलग दिखाई देते हैं। वे मध्यकालीन कवियों को किसी अंतिम परिभाषा में बाँधने से बचते हैं। उनके लिए कबीर केवल भक्त नहीं हैं, केवल विद्रोही नहीं हैं, केवल रहस्यवादी नहीं हैं। वे इन सब सीमाओं से बाहर जाते हुए एक जटिल और बहुआयामी व्यक्तित्व हैं। इसलिए साही की आलोचना बार-बार प्रश्न उठाती है कि कबीर को वास्तव में किस प्रकार पढ़ा जाए।

साही की प्रश्नधर्मिता का संबंध उनकी बौद्धिक प्रकृति से भी है। वे किसी स्थापित सत्य को सहज रूप से स्वीकार नहीं करते। चाहे वह परंपरा द्वारा निर्मित सत्य हो, साहित्येतिहास द्वारा स्थापित सत्य हो या आधुनिक आलोचना द्वारा निर्मित सत्य हो, वे उसकी पुनः जाँच करते हैं। इसी कारण उनकी आलोचना में एक प्रकार की वैचारिक बेचैनी दिखाई देती है। वे उस आलोचक की भूमिका नहीं निभाते जो सब कुछ जानता है; वे उस जिज्ञासु की भूमिका निभाते हैं जो लगातार समझने की प्रक्रिया में है।

मध्यकालीन काव्य के अध्ययन में यह दृष्टि विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि वहाँ अनेक स्थिर धारणाएँ पहले से मौजूद हैं। कबीर के बारे में, भक्ति आंदोलन के बारे में, संत परंपरा के बारे में और मध्यकालीन समाज के बारे में अनेक निष्कर्ष लंबे समय से दोहराए जाते रहे हैं। साही इन निष्कर्षों को अंतिम सत्य मानने से इंकार करते हैं। वे पूछते हैं कि क्या वास्तव में कबीर को केवल एक धार्मिक व्यक्तित्व के रूप में समझा जा सकता है? क्या भक्ति केवल समर्पण का नाम है? क्या मध्यकालीन कवियों की चेतना केवल धार्मिक चेतना थी? ऐसे प्रश्न उनकी आलोचना को नए रास्ते प्रदान करते हैं।

साही के यहाँ प्रश्न केवल बौद्धिक उपकरण नहीं है, बल्कि आलोचना का मूल स्वभाव है। वे मानते हैं कि साहित्य की महानता भी इसी में है कि वह मनुष्य को प्रश्न करने के लिए प्रेरित करता है। यदि कोई कविता केवल तैयार उत्तर दे रही है, तो वह विचार की प्रक्रिया को समाप्त कर देती है। महान कविता इसके विपरीत पाठक को असुविधाजनक स्थिति में छोड़ देती है, जहाँ उसे स्वयं सोचना पड़ता है। साही कबीर में इसी गुण को विशेष रूप से पहचानते हैं। उनके अनुसार कबीर का वास्तविक महत्त्व उनके उत्तरों से अधिक उनके प्रश्नों में है।

इस प्रश्नधर्मी पद्धति का एक महत्त्वपूर्ण परिणाम यह है कि साही की आलोचना में मध्यकालीन काव्य स्थिर वस्तु नहीं रह जाता। वह लगातार नए अर्थ ग्रहण करता रहता है। प्रत्येक प्रश्न एक नई व्याख्या की संभावना उत्पन्न करता है। इस प्रकार आलोचना एक जीवित प्रक्रिया बन जाती है। रचना और पाठक के बीच संवाद निरंतर चलता रहता है। कोई भी अर्थ अंतिम नहीं होता।

साही की आलोचना में प्रश्नधर्मिता के साथ विनम्रता भी जुड़ी हुई है। वे यह दावा नहीं करते कि उन्होंने किसी कवि को पूरी तरह समझ लिया है। इसके विपरीत, वे अक्सर यह संकेत देते हैं कि महान रचनाएँ अपनी पूरी अर्थ-संपदा कभी प्रकट नहीं करतीं। उनमें हमेशा कुछ ऐसा बचा रह जाता है जो अगली पीढ़ियों के लिए नया प्रश्न बन सकता है। यही कारण है कि उनकी आलोचना में खुलापन दिखाई देता है।

मध्यकालीन काव्य के अध्ययन में साही की यह पद्धति अत्यंत रचनात्मक सिद्ध होती है। वह परंपरा को जड़ नहीं होने देती। वह श्रद्धा को विचार में बदलती है, निष्कर्ष को संवाद में और इतिहास को वर्तमान अनुभव में परिवर्तित करती है। उनके लिए आलोचना का अर्थ रचना पर अधिकार स्थापित करना नहीं, बल्कि उसके साथ निरंतर संवाद बनाए रखना है।

इस प्रकार साही की प्रश्नधर्मी आलोचना-पद्धति मध्यकालीन काव्य को पढ़ने का एक नया मार्ग प्रस्तुत करती है। यह मार्ग निश्चितताओं का नहीं, खोज का मार्ग है; अंतिम सत्यों का नहीं, संभावनाओं का मार्ग है। यहाँ आलोचक न्यायाधीश नहीं, सहयात्री होता है। वह रचना के भीतर प्रवेश करता है, उससे प्रश्न करता है, उसके प्रश्नों को सुनता है और पाठक को भी उसी संवाद में शामिल कर लेता है। यही साही की आलोचना की सबसे बड़ी शक्ति है और यही उनके मध्यकालीन काव्य-पाठ की विशिष्ट पहचान भी।

।। दस।।

परंपरा का पुनर्सृजन : साही की पुनर्पाठ-दृष्टि का वैचारिक आधार

विजयदेव नारायण साही की मध्यकालीन काव्य-दृष्टि को समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि वे परंपरा को किस रूप में देखते हैं। उनकी आलोचना का मूल आधार यह विश्वास है कि परंपरा कोई स्थिर, जड़ और अपरिवर्तनीय सत्ता नहीं होती। वह निरंतर बदलती रहती है, नए अर्थ ग्रहण करती रहती है और प्रत्येक युग में नए ढंग से समझी जाती है। इसी कारण साही के लिए मध्यकालीन काव्य का अध्ययन केवल अतीत को जानने का उपक्रम नहीं है, बल्कि परंपरा के पुनर्सृजन की प्रक्रिया भी है। वे परंपरा को विरासत की तरह ग्रहण करते हैं, किंतु उसे ज्यों का त्यों स्वीकार नहीं करते। वे उसके साथ संवाद करते हैं, उसे पुनः पढ़ते हैं और उसके भीतर छिपे हुए नए अर्थों को सामने लाते हैं।

साही की दृष्टि में परंपरा का सबसे बड़ा संकट तब उत्पन्न होता है जब उसे अंतिम सत्य मान लिया जाता है। जैसे ही कोई परंपरा प्रश्नों से मुक्त घोषित कर दी जाती है, उसका रचनात्मक विकास रुक जाता है। वह जीवित अनुभव की जगह स्मारक में बदलने लगती है। साही इस स्थिति के विरोधी हैं। वे मानते हैं कि परंपरा तभी जीवित रहती है जब प्रत्येक पीढ़ी उसे अपने अनुभवों और अपने प्रश्नों के आधार पर पुनः समझने का प्रयास करे। इसलिए उनके यहाँ पुनर्पाठ केवल आलोचनात्मक तकनीक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आवश्यकता है।

मध्यकालीन साहित्य के प्रति उनका दृष्टिकोण इसी आधार पर निर्मित होता है। वे कबीर, जायसी, रैदास या अन्य मध्यकालीन कवियों को इसलिए नहीं पढ़ते कि उनके बारे में पहले से स्थापित धारणाओं की पुष्टि कर सकें। वे उन्हें इसलिए पढ़ते हैं कि उनकी रचनाओं में ऐसे कौन-से तत्व हैं जो आज भी नए अर्थ पैदा कर सकते हैं। इस प्रकार उनका अध्ययन अतीत की पुनरावृत्ति नहीं, बल्कि परंपरा का पुनर्सृजन बन जाता है।

साही के लिए पुनर्सृजन का अर्थ अतीत को बदल देना नहीं है। इसका अर्थ यह भी नहीं है कि आधुनिक विचारों को मध्यकालीन साहित्य पर आरोपित कर दिया जाए। वे अतीत का सम्मान करते हैं, किंतु उसे पवित्र और अछूता नहीं मानते। उनका विश्वास है कि किसी भी महान रचना का जीवन उसकी पुनर्व्याख्या में निहित होता है। यदि किसी रचना को केवल उसी अर्थ में पढ़ा जाए जिसमें उसे उसके समय में पढ़ा गया था, तो उसकी संभावनाएँ सीमित हो जाएँगी। महान साहित्य की विशेषता यह है कि वह हर युग में नए अर्थ उत्पन्न करता है।

उनकी आलोचना में परंपरा और नवीनता विरोधी शक्तियाँ नहीं हैं। वे दोनों को एक-दूसरे का पूरक मानते हैं। नवीनता शून्य से पैदा नहीं होती; वह परंपरा के भीतर से निकलती है। उसी प्रकार परंपरा भी केवल अतीत की स्मृति नहीं होती; वह वर्तमान की व्याख्या में सक्रिय रहती है। साही इस पारस्परिक संबंध को गहराई से समझते हैं। इसलिए वे मध्यकालीन साहित्य को आधुनिक संवेदना से जोड़ते हैं, किंतु उसकी ऐतिहासिक विशिष्टता को नष्ट नहीं करते।

साही के अनुसार परंपरा का पुनर्सृजन तभी संभव है जब आलोचक श्रद्धा और स्वतंत्रता दोनों को साथ लेकर चले। केवल श्रद्धा होगी तो आलोचना संभव नहीं होगी, और केवल अस्वीकार होगा तो परंपरा का वास्तविक अर्थ नहीं समझा जा सकेगा। इसलिए वे एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हैं। वे परंपरा के मूल्य को स्वीकार करते हैं, किंतु उसकी सीमाओं की भी पहचान करते हैं। यही संतुलन उनकी पुनर्पाठ-दृष्टि को विशेष बनाता है।

मध्यकालीन कवियों के अध्ययन में यह दृष्टि विशेष रूप से दिखाई देती है। वे कबीर को संत परंपरा का हिस्सा मानते हैं, लेकिन केवल संत परंपरा तक सीमित नहीं करते। वे जायसी को सूफी परंपरा से जोड़ते हैं, किंतु उन्हें केवल सूफी कवि के रूप में नहीं देखते। वे हर कवि को उसकी परंपरा के भीतर भी पढ़ते हैं और उससे आगे भी। यही प्रक्रिया परंपरा को नए अर्थ प्रदान करती है।

साही का मानना है कि सांस्कृतिक स्मृति तभी सार्थक होती है जब वह वर्तमान जीवन से जुड़ी रहे। यदि परंपरा केवल स्मरण की वस्तु बन जाए, तो उसका प्रभाव धीरे-धीरे कम हो जाता है। इसलिए वे मध्यकालीन साहित्य को वर्तमान के प्रश्नों के साथ जोड़ते हैं। वे देखते हैं कि स्वतंत्रता, असहमति, प्रेम, सत्य और आत्मान्वेषण जैसे प्रश्न आज भी उतने ही महत्त्वपूर्ण हैं जितने मध्यकाल में थे। इस प्रकार परंपरा केवल अतीत की धरोहर नहीं रहती, बल्कि वर्तमान की सक्रिय शक्ति बन जाती है।

अंततः साही की पुनर्पाठ-दृष्टि का वैचारिक आधार यही है कि परंपरा कोई बंद व्यवस्था नहीं है। वह निरंतर खुलती हुई प्रक्रिया है। प्रत्येक युग उसे नए ढंग से पढ़ता है और उसके भीतर से अपने लिए नए अर्थ प्राप्त करता है। साही इसी प्रक्रिया को आलोचना का मूल कार्य मानते हैं। उनके लिए मध्यकालीन काव्य का अध्ययन इतिहास की पुनर्रचना नहीं, बल्कि परंपरा के पुनर्सृजन का कार्य है। इसी कारण उनकी आलोचना अतीत को सुरक्षित रखने के साथ-साथ उसे जीवित भी रखती है। परंपरा उनके यहाँ स्मृति नहीं, संवाद है; विरासत नहीं, सृजन है; और इसी बिंदु पर उनकी पुनर्पाठ-दृष्टि हिन्दी आलोचना को एक नया बौद्धिक आयाम प्रदान करती है।

उपसंहार

विजयदेव नारायण साही का मध्यकालीन काव्य-पाठ मूलतः मध्यकाल को पुनः खोजने का प्रयास है। वे मध्यकालीन साहित्य को न तो केवल धार्मिक साहित्य मानते हैं, न केवल ऐतिहासिक दस्तावेज़, न केवल सांस्कृतिक धरोहर और न ही केवल भक्तिपरक अभिव्यक्ति। उनकी दृष्टि में मध्यकालीन काव्य मनुष्य की चेतना, उसकी बेचैनी, उसके प्रश्नों, उसके प्रतिरोध, उसकी स्वतंत्रता और उसके आत्मसंघर्ष का विशाल आख्यान है। यही कारण है कि वे मध्यकालीन कवियों को उनके स्थापित परिचयों से बाहर निकालकर पढ़ते हैं।

साही के लिए कबीर, जायसी, रैदास अथवा अन्य मध्यकालीन कवि सबसे पहले मनुष्य हैं, बाद में संत, भक्त, सूफी या किसी परंपरा के प्रतिनिधि। वे इन कवियों को धार्मिक प्रतीकों और श्रद्धात्मक व्याख्याओं के भीतर कैद नहीं रहने देते। उनकी आलोचना का उद्देश्य कवियों के चारों ओर निर्मित मिथकों को तोड़कर उनके वास्तविक रचनात्मक व्यक्तित्व को सामने लाना है। वे मानते हैं कि साहित्य की समझ श्रद्धा से नहीं, प्रश्न से विकसित होती है। इसलिए उनकी आलोचना लगातार पूछती है, जाँचती है और पुनर्विचार करती है।

साही की दृष्टि में मध्यकाल का सबसे बड़ा महत्त्व उसकी मानवीयता में है। वे देखते हैं कि मध्यकालीन कविता के भीतर एक ऐसा मनुष्य उपस्थित है जो सत्य की खोज में है, जो परंपरा से संवाद भी करता है और उसका प्रतिवाद भी, जो सत्ता और रूढ़ि के सामने झुकने के बजाय अपनी स्वतंत्र चेतना को बचाने का प्रयास करता है। इस प्रकार साही मध्यकालीन साहित्य में प्रतिरोध, असहमति और आत्मनिर्णय की उन धाराओं को पहचानते हैं जिन्हें सामान्यतः भक्ति और अध्यात्म की व्यापक छाया ढँक देती है।

उनकी आलोचना का एक केंद्रीय बिंदु यह है कि मध्यकालीन काव्य को केवल उसके इतिहास में बंद करके नहीं समझा जा सकता। इतिहास किसी रचना की परिस्थितियाँ बता सकता है, किंतु उसकी सम्पूर्ण अर्थवत्ता नहीं। इसलिए साही मध्यकालीन साहित्य को जीवित अनुभव के रूप में पढ़ते हैं। उनके लिए कबीर का समय समाप्त हो चुका है, लेकिन कबीर की बेचैनी समाप्त नहीं हुई है। जायसी का युग बीत चुका है, किंतु प्रेम और खोज का उनका अनुभव आज भी जीवित है। इस प्रकार वे मध्यकाल को वर्तमान से जोड़ते हैं और अतीत तथा वर्तमान के बीच एक सृजनात्मक संवाद स्थापित करते हैं।

साही का पुनर्पाठ इस अर्थ में भी विशिष्ट है कि वह मध्यकालीन साहित्य में व्यक्ति की उपस्थिति को रेखांकित करता है। जहाँ साहित्येतिहास मध्यकाल को प्रायः सामूहिक चेतना का युग मानता रहा है, वहीं साही उसके भीतर उभरते हुए स्वतंत्र व्यक्ति को खोजते हैं। कबीर उनके लिए केवल किसी सम्प्रदाय की आवाज़ नहीं हैं, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति की आवाज़ हैं जो अकेले खड़े होकर अपने समय की सबसे बड़ी मान्यताओं को चुनौती देता है। यह व्यक्ति-बोध साही की मध्यकाल-दृष्टि को नया आयाम प्रदान करता है।

उनकी आलोचना की सबसे बड़ी शक्ति उसकी प्रश्नधर्मिता है। वे किसी भी निष्कर्ष को अंतिम नहीं मानते। उनके लिए आलोचना का कार्य निर्णय सुनाना नहीं, बल्कि अर्थ की नई संभावनाओं को खोलना है। इसलिए उनका मध्यकाल-पाठ स्थिर नहीं है। वह निरंतर गतिशील है। हर पुनर्पाठ में नए प्रश्न उत्पन्न होते हैं और हर प्रश्न मध्यकालीन साहित्य की नई व्याख्या का द्वार खोलता है।

साही परंपरा को भी जड़ विरासत के रूप में नहीं देखते। उनके लिए परंपरा का अर्थ केवल अतीत को सुरक्षित रखना नहीं, बल्कि उसे पुनः समझना और पुनः रचना है। इसी कारण वे मध्यकालीन साहित्य को आधुनिक संवेदना से जोड़ते हैं। वे यह सिद्ध करने का प्रयास नहीं करते कि मध्यकाल आधुनिक था, बल्कि यह दिखाते हैं कि महान साहित्य अपने समय से आगे जाकर भी मनुष्य के अनुभवों को स्पर्श करता रहता है। इस प्रकार परंपरा उनके यहाँ स्मृति की वस्तु नहीं, बल्कि निरंतर सक्रिय संवाद की प्रक्रिया बन जाती है।

यदि साही की संपूर्ण मध्यकाल-दृष्टि को एक वाक्य में व्यक्त करना हो, तो कहा जा सकता है कि उन्होंने मध्यकालीन काव्य को धर्म, सम्प्रदाय, इतिहास और मिथकों की स्थिर चौखटों से मुक्त करके मनुष्य की स्वतंत्र चेतना के दस्तावेज़ के रूप में पढ़ा। उनके लिए मध्यकाल का वास्तविक केंद्र न ईश्वर है, न सत्ता, न परंपरा; बल्कि वह मनुष्य है जो सत्य की खोज में है, जो प्रश्न करता है, जो असहमति व्यक्त करता है, जो प्रेम करता है, जो संघर्ष करता है और जो अपने अस्तित्व के अर्थ को समझने की कोशिश करता है।

यही कारण है कि साही का मध्यकाल-पाठ केवल साहित्यिक आलोचना नहीं रह जाता, बल्कि मनुष्य और उसकी चेतना की खोज में बदल जाता है। हिन्दी आलोचना में उनका सबसे बड़ा योगदान संभवतः यही है कि उन्होंने मध्यकालीन साहित्य को अतीत की वस्तु न मानकर वर्तमान की जीवित बौद्धिक और मानवीय शक्ति के रूप में देखने की दृष्टि प्रदान की। यही उनकी पुनर्पाठ-पद्धति का सार है, यही उसका वैचारिक आधार है और यही उसकी स्थायी प्रासंगिकता भी।


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