— परिचय दास —
।। एक ।।
कबीर हिंदी साहित्य की उन विरल काव्य-उपस्थितियों में हैं जिनके बारे में जितना लिखा गया है, उतना ही उन्हें लेकर मतभेद भी बढ़े हैं। वे केवल एक कवि नहीं, बल्कि एक व्याख्यात्मक क्षेत्र हैं। हर युग ने अपने प्रश्नों के अनुसार कबीर को पुनः पढ़ा है। किसी ने उन्हें समाज-सुधारक बनाया, किसी ने धार्मिक विद्रोही, किसी ने वर्ग-संघर्ष का कवि, किसी ने दलित अस्मिता का प्रवक्ता, किसी ने भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का महान संश्लेषक, तो किसी ने आधुनिक मनुष्य की स्वतंत्र चेतना का अग्रदूत। इस बहुव्याख्यात्मक परंपरा में विजयदेव नारायण साही का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। उन्होंने कबीर को उन पूर्वनिर्धारित वैचारिक खाँचों से निकालकर देखने का प्रयास किया जिनमें बीसवीं शताब्दी की आलोचना उन्हें लगातार रखती रही थी।
साही का महत्व इस बात में नहीं है कि उन्होंने कबीर के बारे में कुछ बिल्कुल नया तथ्य खोज लिया था। उनका महत्व इस बात में है कि उन्होंने कबीर को देखने का कोण बदल दिया। उन्होंने कबीर को केवल सामाजिक क्रांति, धार्मिक सुधार, जाति-विरोध, वर्ग-संघर्ष या सांप्रदायिक समन्वय की सीमाओं में नहीं बाँधा। उनके लिए कबीर सबसे पहले एक अद्वितीय काव्य-व्यक्तित्व थे, जिनकी चेतना अपने समय से संवाद करती हुई भी किसी राजनीतिक कार्यक्रम में समाहित नहीं होती।
हिंदी आलोचना में लंबे समय तक कबीर की चर्चा मुख्यतः दो दिशाओं में चलती रही। एक दिशा उन्हें सामाजिक और धार्मिक विद्रोह के प्रतीक के रूप में देखती थी। दूसरी दिशा उन्हें भक्ति परंपरा के महान संत के रूप में। साही ने इन दोनों को पर्याप्त नहीं माना। उन्होंने कहा कि कबीर की वास्तविक शक्ति उस अस्तित्वगत बेचैनी में है जो मनुष्य को हर प्रकार के बने-बनाए सत्य के विरुद्ध खड़ा कर देती है।
यहीं से साही की आलोचना शुरू होती है।
कबीर के संबंध में हजारी प्रसाद द्विवेदी का कार्य एक महान मील का पत्थर है। उनकी पुस्तक कबीर ने आधुनिक हिंदी संसार को पहली बार एक व्यापक, व्यवस्थित और सहानुभूतिपूर्ण दृष्टि से कबीर को समझने का अवसर दिया। द्विवेदी ने कबीर को भारतीय सांस्कृतिक परंपरा के भीतर रखकर देखा। उन्होंने नाथपंथ, सिद्ध परंपरा, योग, वेदांत, सूफी प्रभाव और निर्गुण भक्ति की विविध धाराओं के बीच कबीर की स्थिति स्पष्ट की।
द्विवेदी के यहाँ कबीर एक ऐसे संत हैं जो भारतीय आध्यात्मिक इतिहास में एक महान संश्लेषण का कार्य करते हैं। वे विद्रोही हैं, लेकिन उनका विद्रोह अंततः एक व्यापक आध्यात्मिक सत्य की स्थापना के लिए है। वे परंपरा को तोड़ते हैं, लेकिन किसी शून्य की स्थापना नहीं करते। वे रूढ़ियों का विरोध करते हैं, किंतु मनुष्य और परम सत्य के बीच एक नए संबंध का उद्घाटन भी करते हैं।
द्विवेदी की दृष्टि में कबीर का व्यक्तित्व अत्यंत तेजस्वी है। वे उन्हें “मस्तमौला”, “फक्कड़” और “अक्खड़” कहते हैं। इस चित्रण ने हिंदी समाज में कबीर की लोकप्रिय छवि निर्मित करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई।
किन्तु साही को लगता है कि इस व्याख्या में कबीर की मूल बेचैनी कुछ हद तक सांस्कृतिक संतुलन के भीतर समा जाती है। द्विवेदी जहाँ कबीर को भारतीय संस्कृति के व्यापक प्रवाह में समाहित करते हैं, वहीं साही उनके भीतर उपस्थित उस असुविधाजनक तत्व को अधिक महत्त्व देते हैं जो हर प्रकार की स्थिरता को चुनौती देता है।
साही के लिए कबीर केवल एक संत नहीं हैं। वे चेतना के ऐसे विस्फोट हैं जो किसी अंतिम व्यवस्था में विश्वास नहीं करते। उनकी दृष्टि में कबीर का महत्व उनके द्वारा दिए गए उत्तरों में कम और उनके द्वारा उठाए गए प्रश्नों में अधिक है।
यही कारण है कि साही का कबीर द्विवेदी के कबीर से अधिक बेचैन, अधिक अस्थिर और अधिक आधुनिक दिखाई देता है।
यदि द्विवेदी कबीर के भीतर सांस्कृतिक समन्वय खोजते हैं, तो साही उनके भीतर अस्तित्वगत असहमति खोजते हैं।
यह अंतर अत्यंत सूक्ष्म है किंतु अत्यंत महत्त्वपूर्ण भी।
पुरुषोत्तम अग्रवाल व धर्मवीर की पुस्तकें साही के बाद आईं किंतु साही इन पुस्तकों में उपस्थित निहितार्थों को सिद्धांत रूप में पहले ही एकायामी निरूपित कर चुके हैं।
पुरुषोत्तम अग्रवाल की कबीर-दृष्टि एक अन्य महत्वपूर्ण पड़ाव है। उन्होंने कबीर को भारतीय आधुनिकता की पूर्वपीठिका के रूप में पढ़ा। उनके लिए कबीर ऐसे चिंतक हैं जिन्होंने व्यक्ति की स्वतंत्रता, विवेक और आत्मनिर्णय की चेतना को स्थापित किया। वे मध्यकालीन समाज में एक वैकल्पिक सार्वजनिक क्षेत्र का निर्माण करते हैं।
पुरुषोत्तम अग्रवाल कबीर के भीतर संवादशीलता, बहुलता और लोकतांत्रिक चेतना की खोज करते हैं। उनकी प्रसिद्ध व्याख्या में कबीर किसी बंद धार्मिक व्यवस्था के कवि नहीं, बल्कि एक ऐसे मनुष्य हैं जो हर प्रकार के आधिपत्य का विरोध करते हैं।
यह दृष्टि आधुनिक राजनीतिक और सांस्कृतिक विमर्शों से गहरे रूप में जुड़ी हुई है।
साही यहाँ भी अलग रास्ता चुनते हैं।
उनके लिए कबीर को आधुनिक लोकतंत्र, उदारवाद या बहुलतावाद के पूर्वज के रूप में प्रस्तुत करना एक प्रकार का अनैतिहासिक सरलीकरण हो सकता है।
साही कबीर को किसी आधुनिक विचारधारा का अग्रदूत नहीं बनाना चाहते। वे उन्हें उनके अनुभव की मौलिकता में समझना चाहते हैं।
कबीर के भीतर जो स्वतंत्रता है, वह राजनीतिक स्वतंत्रता से भी अधिक गहरी है। वह आत्मा की स्वतंत्रता है।
कबीर का विद्रोह केवल सत्ता के विरुद्ध नहीं है। वह स्वयं मनुष्य की आदतों, उसकी मानसिक जड़ताओं, उसके अर्जित विश्वासों और उसकी आत्मसंतुष्टि के विरुद्ध भी है।
इस प्रकार जहाँ पुरुषोत्तम अग्रवाल कबीर में आधुनिक नागरिकता के बीज खोजते हैं, वहीं साही कबीर में उस मनुष्य की खोज करते हैं जो हर पहचान से परे जाकर अपने अस्तित्व का सामना करता है।
साही का यह दृष्टिकोण उन्हें अस्तित्ववादी संवेदनाओं के निकट ले जाता है।
वे कबीर को किसी समाजशास्त्रीय मॉडल में नहीं रखते।
वे उनके भीतर मनुष्य की अंतिम अकेलेपन की अनुभूति, सत्य की खोज की यातना और आत्मबोध की तीव्र आकांक्षा देखते हैं।
इसी कारण साही का कबीर कई बार आधुनिक यूरोपीय अस्तित्ववादी चिंतकों की याद दिलाता है, यद्यपि वे पूरी तरह भारतीय सांस्कृतिक धरातल पर खड़े हैं।
दलित आलोचक धर्मवीर की कबीर-दृष्टि एक अलग प्रकार की वैचारिक चुनौती प्रस्तुत करती है।
धर्मवीर ने हिंदी आलोचना की उस पूरी परंपरा पर प्रश्नचिह्न लगाया जो कबीर की जातीय स्थिति और सामाजिक संघर्ष को गौण बना देती थी। उन्होंने तर्क दिया कि कबीर मूलतः दलित चेतना के कवि हैं और ब्राह्मणवादी आलोचना ने उनके वास्तविक स्वरूप को विकृत किया है।

धर्मवीर के यहाँ कबीर एक सामाजिक योद्धा हैं।
वे जाति-व्यवस्था के सबसे प्रखर विरोधी हैं।
उनकी कविता दलित अस्मिता की ऐतिहासिक अभिव्यक्ति है।
इस दृष्टि का ऐतिहासिक और राजनीतिक महत्व है। उसने हिंदी आलोचना को नए प्रश्न दिए।
साही आरम्भ से ही अपने विचारों में इस प्रकार की एकरेखीय व्याख्या से सहमत नहीं रहे हैं।
उनके लिए कबीर को केवल जाति-संघर्ष के कवि के रूप में देखना उनके विराट व्यक्तित्व को सीमित कर देना है।
निश्चय ही कबीर जाति का विरोध करते हैं।
निश्चय ही वे सामाजिक विषमता पर प्रहार करते हैं।
किन्तु उनका संघर्ष केवल सामाजिक नहीं है।
वे मनुष्य की चेतना के भीतर उपस्थित हर प्रकार की दासता के विरुद्ध हैं।
उनका लक्ष्य केवल जाति-मुक्ति नहीं, बल्कि समग्र मानवीय मुक्ति है।
साही के अनुसार कबीर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे किसी एक संघर्ष में सीमित नहीं हो जाते।
वे धर्म के विरुद्ध भी हैं, लेकिन धर्म-विरोधी नहीं।
वे समाज के विरुद्ध भी हैं, लेकिन समाज-विरोधी नहीं।
वे परंपरा के विरुद्ध भी हैं, लेकिन परंपरा-विरोधी नहीं।
वे हर उस चीज़ के विरुद्ध हैं जो मनुष्य की चेतना को जड़ बना देती है।
यहीं साही का कबीर अन्य सभी आलोचनात्मक प्रतिमानों से अलग दिखाई देता है।
सबसे रोचक अंतर साही और प्रगतिशील आलोचकों के बीच दिखाई देता है।
बीसवीं शताब्दी के अनेक प्रगतिशील आलोचकों ने कबीर को सामाजिक विद्रोह के कवि के रूप में प्रस्तुत किया।
उनके लिए कबीर सामंती और धार्मिक शोषण के विरुद्ध जनता की आवाज़ थे।
यह व्याख्या अपने समय की राजनीतिक आवश्यकताओं से प्रेरित थी।
उसने कबीर को जनवादी परंपरा का प्रतिनिधि सिद्ध किया।
किन्तु साही को लगता है कि इस प्रक्रिया में कबीर का आध्यात्मिक और काव्यात्मक आयाम कई बार दब जाता है।
वे मानते हैं कि कबीर की कविता को केवल सामाजिक दस्तावेज़ की तरह पढ़ना उसके साथ अन्याय है।
कबीर के यहाँ जो आध्यात्मिक अनुभव है, वह कोई पलायन नहीं है।
वह मनुष्य की चेतना का सबसे प्रखर रूप है।
कबीर का “राम” केवल धार्मिक प्रतीक नहीं है।
वह अस्तित्व के अंतिम सत्य की खोज का नाम है।
प्रगतिशील आलोचना कई बार इस अनुभव को वैचारिक संदेह की दृष्टि से देखती रही।
साही इस प्रवृत्ति का प्रतिरोध करते हैं।
वे मानते हैं कि कबीर की क्रांतिकारिता का स्रोत उनकी आध्यात्मिकता ही है।
उनकी सामाजिक असहमति किसी राजनीतिक सिद्धांत से नहीं, बल्कि सत्य के प्रति उनकी निष्ठा से उत्पन्न होती है।
यहीं से साही और मार्क्सवादी आलोचना के बीच सबसे बड़ा अंतर सामने आता है।
।। दो ।।
साही और मार्क्सवादी अथवा कम्युनिस्ट आलोचकों के बीच कबीर को लेकर जो मूलभूत अंतर दिखाई देता है, वह केवल व्याख्या का अंतर नहीं है, बल्कि मनुष्य और इतिहास को देखने की दो अलग-अलग दृष्टियों का अंतर है। यह अंतर इतना गहरा है कि कई बार दोनों एक ही कविता को पढ़ते हुए भी बिल्कुल भिन्न निष्कर्षों तक पहुँचते हैं।
मार्क्सवादी आलोचना का मूल आग्रह सामाजिक संरचना, वर्ग-संबंधों और ऐतिहासिक शक्तियों की पहचान पर रहता है। उसके लिए साहित्य का महत्व इस बात में भी निहित होता है कि वह अपने समय के सामाजिक अंतर्विरोधों को किस प्रकार व्यक्त करता है। इसलिए जब प्रगतिशील आलोचक कबीर को पढ़ते हैं तो उनका ध्यान स्वाभाविक रूप से उन पदों और साखियों पर जाता है जिनमें धार्मिक पाखंड, सामाजिक असमानता, जाति-अहंकार और सत्ता के ढोंग पर तीखे प्रहार हैं।
इस दृष्टि से कबीर एक ऐतिहासिक विद्रोही हैं।
वे मध्यकालीन समाज के भीतर उत्पीड़ित जन की आवाज़ हैं।
वे पुरोहितवाद के विरोधी हैं।
वे सामंती संरचना के आलोचक हैं।
वे सामाजिक न्याय के पक्षधर हैं।
इन निष्कर्षों में बहुत कुछ सत्य भी है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब कबीर का संपूर्ण व्यक्तित्व इन्हीं निष्कर्षों में सीमित कर दिया जाता है।
साही को यही सीमितीकरण स्वीकार नहीं था।
वे यह नहीं कहते कि कबीर सामाजिक विद्रोही नहीं हैं। वे यह कहते हैं कि कबीर केवल सामाजिक विद्रोही नहीं हैं।
यह “केवल” शब्द ही साही की पूरी आलोचना को समझने की कुंजी है।
उनके लिए कबीर का विद्रोह समाज से शुरू होकर अस्तित्व तक पहुँचता है।
वे मनुष्य की बाहरी बेड़ियों को भी तोड़ते हैं और भीतरी बेड़ियों को भी।
वे मंदिर और मस्जिद पर प्रश्न उठाते हैं, लेकिन उतने ही कठोर प्रश्न मनुष्य के भीतर बैठी हुई आत्ममुग्धता पर भी उठाते हैं।
वे पंडित को चुनौती देते हैं, किंतु साधक को भी नहीं छोड़ते।
वे मुल्ला का उपहास करते हैं, किंतु स्वयं को ज्ञानी समझने वाले मनुष्य को भी कटघरे में खड़ा करते हैं।
मार्क्सवादी आलोचना कई बार बाहरी संघर्षों पर अधिक केंद्रित रहती है। साही का ध्यान उस भीतरी संघर्ष की ओर भी है जो कबीर की कविता का केंद्रीय स्रोत है।
यहीं उनकी आलोचना एक गहरे साहित्यिक धरातल पर पहुँच जाती है।
क्योंकि साहित्य केवल समाजशास्त्र नहीं होता।
साहित्य मनुष्य की आंतरिक संरचना का भी इतिहास होता है।
कबीर के यहाँ यह आंतरिक इतिहास अत्यंत तीव्र रूप में उपस्थित है।
साही इसी तीव्रता को पहचानते हैं।
उनकी दृष्टि में कबीर का सबसे बड़ा संघर्ष ब्राह्मण से नहीं, मुल्ला से नहीं, राजा से नहीं, बल्कि उस अज्ञान से है जो मनुष्य के भीतर बैठा हुआ है।
यह अज्ञान सामाजिक भी है, आध्यात्मिक भी, मानसिक भी और अस्तित्वगत भी।
यही कारण है कि साही कबीर को किसी राजनीतिक घोषणापत्र में बदल देने के प्रयासों से असहमत दिखाई देते हैं।
उनके अनुसार कबीर का काव्य किसी दल, किसी विचारधारा या किसी आंदोलन का परिशिष्ट नहीं है।
वह एक स्वतंत्र चेतना का दस्तावेज़ है।
साही का यह आग्रह उन्हें हिंदी आलोचना में विशिष्ट बनाता है।
वे कबीर के आध्यात्मिक अनुभव को भी गंभीरता से लेते हैं।
मार्क्सवादी आलोचना की एक प्रवृत्ति रही है कि वह रहस्यवाद को संदेह की दृष्टि से देखती है। उसे कई बार रहस्यवाद सामाजिक यथार्थ से पलायन जैसा प्रतीत होता है।
साही इस धारणा को कबीर के संदर्भ में अपर्याप्त मानते हैं।
उनके लिए कबीर का रहस्यवाद कोई धुँधली धार्मिक भावुकता नहीं है।
वह अनुभव की चरम तीक्ष्णता है।
वह मनुष्य के भीतर सत्य की ऐसी खोज है जो सभी तैयार उत्तरों को अस्वीकार कर देती है।
कबीर का रहस्यवाद किसी अंधविश्वास का संसार नहीं बनाता।
वह प्रश्नों का संसार बनाता है।
वह बेचैनी का संसार बनाता है।
वह जागरण का संसार बनाता है।
साही बार-बार इस बात की ओर संकेत करते हैं कि कबीर का आध्यात्मिक अनुभव उन्हें सामाजिक यथार्थ से दूर नहीं ले जाता, बल्कि उसे अधिक तीव्रता से देखने की शक्ति देता है।
क्योंकि जिसने अपने भीतर के भ्रमों को पहचान लिया हो, वह बाहर के भ्रमों को भी अधिक स्पष्ट रूप से पहचान सकता है।
यहीं साही कबीर को आधुनिक संवेदना से जोड़ते हैं।
लेकिन उनका आधुनिकता-बोध पुरुषोत्तम अग्रवाल की तरह राजनीतिक आधुनिकता का बोध नहीं है।
वह अस्तित्व की आधुनिकता का बोध है।
मनुष्य अकेला है।
मनुष्य को सत्य स्वयं खोजना है।
कोई संस्था, कोई परंपरा, कोई धार्मिक प्रतिष्ठान उसके लिए सत्य का अंतिम प्रमाण नहीं बन सकता।
यह भावना कबीर में बार-बार दिखाई देती है।
साही इसी को उनकी सबसे बड़ी शक्ति मानते हैं।
कबीर का यह रूप उन्हें केवल भक्तिकालीन कवि नहीं रहने देता।
वे समय की सीमाओं का अतिक्रमण करने लगते हैं।
उनकी कविता आधुनिक मनुष्य की आत्मिक स्थिति से संवाद करने लगती है।
साही की आलोचना का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष उनकी साहित्यिक संवेदनशीलता है।
वे कबीर को केवल विचारक के रूप में नहीं पढ़ते।
वे उन्हें कवि के रूप में पढ़ते हैं।
यह बात साधारण लग सकती है, लेकिन वास्तव में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
हिंदी में कबीर पर लिखी गई अनेक आलोचनाएँ उनकी विचारधारा, समाज-दृष्टि, धर्म-दृष्टि या राजनीति पर केंद्रित रही हैं।
कविता कई बार पीछे छूट जाती है।
साही इस भूल को नहीं करते।
वे कबीर की भाषा पर ध्यान देते हैं।
उनकी बिंब-रचना पर ध्यान देते हैं।
उनकी वाणी की ऊर्जा पर ध्यान देते हैं।
उनकी काव्यात्मक संरचना पर ध्यान देते हैं।
उनके लिए कबीर की महानता केवल इसलिए नहीं है कि वे जाति-विरोधी हैं या पाखंड-विरोधी हैं।
उनकी महानता इसलिए भी है कि उन्होंने भाषा को एक अद्भुत काव्यात्मक शक्ति प्रदान की।
कबीर का शब्द किसी अलंकरण की तरह नहीं आता।
वह प्रहार की तरह आता है।
वह बिजली की तरह गिरता है।
वह चेतना को झकझोर देता है।
साही इस काव्यात्मक विस्फोट को समझते हैं।
वे जानते हैं कि कबीर की शक्ति उनके विचारों में जितनी है, उससे कम उनकी भाषा में नहीं है।
यहीं वे कई वैचारिक आलोचकों से अलग हो जाते हैं।
क्योंकि वैचारिक आलोचना कई बार कविता को विचारों के उदाहरण में बदल देती है।
साही कविता को कविता बने रहने देते हैं।
वे उसके भीतर की कलात्मकता को नष्ट नहीं करते।
कबीर की भाषा के संबंध में साही का दृष्टिकोण विशेष ध्यान देने योग्य है।
उनके लिए कबीर की भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं है।
वह एक वैचारिक और अस्तित्वगत क्रिया है।
कबीर जिस प्रकार बोलते हैं, उसी प्रकार संसार को देखते भी हैं।
उनकी भाषा में जो असभ्यता दिखाई देती है, वह वास्तव में एक गहरी सांस्कृतिक रणनीति है।
वे संस्कृतनिष्ठ शिष्टता को तोड़ते हैं।
वे धार्मिक वाक्य-विन्यास को तोड़ते हैं।
वे स्थापित भाषिक मर्यादाओं को तोड़ते हैं।
क्योंकि उनकी चेतना भी स्थापित मर्यादाओं को स्वीकार नहीं करती।
साही इस भाषिक विद्रोह को केवल शैलीगत घटना नहीं मानते।
वे इसे कबीर की संपूर्ण दृष्टि से जोड़कर देखते हैं।
यही साहित्यिक आलोचना की परिपक्वता है।
साही का कबीर इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि वह किसी एक पहचान में कैद नहीं होता।
आज का समय पहचान-राजनीति का समय है।
हर समूह अपने लिए एक कबीर चाहता है।
दलितों का कबीर।
वामपंथियों का कबीर।
उदारवादियों का कबीर।
धर्मनिरपेक्षता का कबीर।
आध्यात्मिकता का कबीर।
राष्ट्रवाद का कबीर।
लेकिन साही का कबीर इन सबकी पकड़ से बार-बार बाहर निकल जाता है।
वह किसी एक शिविर का सदस्य नहीं बनता।
वह हर शिविर से प्रश्न करता है।
वह हर विचारधारा को असुविधा में डालता है।
वह हर निश्चितता को तोड़ता है।
यही उसकी शक्ति है।
और यही कारण है कि साही को पढ़ते हुए लगता है कि वे कबीर की व्याख्या नहीं कर रहे, बल्कि उनकी बेचैनी को सुन रहे हैं।
उनकी आलोचना में कबीर कोई संग्रहालय की वस्तु नहीं हैं।
वे जीवित हैं।
वे बोल रहे हैं।
वे चुनौती दे रहे हैं।
वे हमारी सुविधाजनक व्याख्याओं को अस्वीकार कर रहे हैं।
यहीं विजयदेव नारायण साही हिंदी आलोचना में अद्वितीय हो जाते हैं।
उन्होंने कबीर को न तो केवल संत बनाया, न केवल क्रांतिकारी, न केवल समाज-सुधारक, न केवल दलित नायक, न केवल आधुनिक लोकतांत्रिक चिंतक और न केवल रहस्यवादी साधक।
उन्होंने इन सब रूपों को स्वीकार करते हुए भी कबीर के भीतर उस विराट मानवीय चेतना को खोजा जो हर परिभाषा से बड़ी है।
साही के लिए कबीर का अंतिम अर्थ किसी विचारधारा में नहीं, बल्कि मनुष्य की स्वतंत्र चेतना में निहित है।
यही स्वतंत्र चेतना उनके यहाँ कविता बनती है, विद्रोह बनती है, आध्यात्मिकता बनती है, करुणा बनती है और अंततः मनुष्य होने के सबसे कठिन अर्थ का उद्घाटन करती है।
इसीलिए साही का कबीर हिंदी आलोचना में केवल एक और व्याख्या नहीं है। वह कबीर को पढ़ने की एक नई पद्धति है, जहाँ कविता विचार से बड़ी हो जाती है, अनुभव सिद्धांत से बड़ा हो जाता है और मनुष्य हर प्रकार की वैचारिक कैद से मुक्त होकर सामने खड़ा दिखाई देता है।
।। तीन ।।
विजयदेव नारायण साही के कबीर-विवेचन को आगे बढ़ाने का सबसे महत्वपूर्ण मार्ग यह है कि कबीर को लेकर निर्मित उन आलोचनात्मक रूढ़ियों की पुनः परीक्षा की जाए, जो पिछले सौ वर्षों में लगभग स्थापित सत्य का रूप ले चुकी हैं। हिंदी आलोचना में कई बार ऐसा हुआ है कि किसी बड़ी व्याख्या ने इतनी प्रतिष्ठा प्राप्त कर ली कि उसके भीतर छिपी हुई सीमाओं पर चर्चा कम होने लगी। कबीर के साथ भी यही हुआ है। हजारी प्रसाद द्विवेदी, रामविलास शर्मा, नामवर सिंह, पुरुषोत्तम अग्रवाल, धर्मवीर और अन्य आलोचकों की व्याख्याएँ अत्यंत महत्त्वपूर्ण होने के बावजूद एक समय के बाद स्वयं एक नई परंपरा और नए अनुशासन में बदल गईं। साही की सबसे बड़ी देन यह है कि वे किसी स्थापित व्याख्या को अंतिम सत्य नहीं मानते। इसलिए साही के बाद का कबीर-अध्ययन भी तभी सार्थक होगा जब वह आलोचना की आलोचना करने का साहस रखे।
कबीर के संबंध में सबसे पहले उस धारणा की समीक्षा की जा सकती है कि वे मुख्यतः समाज-सुधारक थे। हिंदी के सामान्य पाठक की चेतना में कबीर की यही छवि सबसे अधिक लोकप्रिय है। पाठ्यपुस्तकों, जनभाषणों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में कबीर को प्रायः ऐसे संत के रूप में प्रस्तुत किया जाता है जिसने जाति-पाँति, अंधविश्वास और धार्मिक कट्टरता का विरोध किया। यह बात तथ्यतः सही है, लेकिन क्या कबीर का अंतिम लक्ष्य समाज-सुधार था?
साही की दृष्टि से देखें तो इसका उत्तर नकारात्मक होगा।
समाज-सुधारक सामान्यतः समाज को बेहतर बनाना चाहता है। वह व्यवस्था की मरम्मत करता है। वह दोषों को हटाकर एक स्वस्थ सामाजिक संरचना का निर्माण करना चाहता है। किंतु कबीर का स्वर इससे कहीं अधिक उग्र और मूलगामी है। वे केवल व्यवस्था के दोषों पर प्रहार नहीं करते, बल्कि व्यवस्था की वैधता पर ही प्रश्न उठाते हैं। वे केवल जाति की आलोचना नहीं करते, वे उस मानसिकता की आलोचना करते हैं जो किसी भी प्रकार के श्रेणीकरण को जन्म देती है। वे केवल धर्म के भ्रष्टाचार का विरोध नहीं करते, बल्कि धार्मिकता के आत्ममुग्ध रूप पर भी हमला करते हैं।
इसलिए कबीर को समाज-सुधारक कहना कई बार उनकी क्रांतिकारी चेतना को सीमित कर देता है। साही के बाद की आलोचना इस प्रश्न को उठा सकती है कि क्या कबीर सुधारक कम और अस्तित्व के विघटनकारी चिंतक अधिक हैं? क्या वे निर्माण से पहले विध्वंस की आवश्यकता को पहचानते हैं? क्या उनका लक्ष्य किसी आदर्श समाज की स्थापना नहीं, बल्कि मनुष्य की चेतना को झकझोरना है?
इसी प्रकार कबीर को केवल “विद्रोही” कह देने की प्रचलित आदत पर भी पुनर्विचार किया जा सकता है।
विद्रोह शब्द आकर्षक है, लेकिन यह भी एक सरलीकरण बन सकता है। विद्रोह हमेशा किसी सत्ता के विरुद्ध होता है। किंतु कबीर का संघर्ष केवल बाहरी सत्ता से नहीं है। वे अपने ही अहंकार के विरुद्ध भी खड़े हैं। वे उस “मैं” को भी चुनौती देते हैं जो विद्रोह का दावा करता है। यह एक अत्यंत सूक्ष्म बिंदु है।
आधुनिक राजनीतिक आंदोलनों में विद्रोह अक्सर पहचान का स्रोत बन जाता है। व्यक्ति स्वयं को विद्रोही कहकर संतुष्ट हो जाता है। कबीर इस संतोष को भी स्वीकार नहीं करते। वे विद्रोह को भी आत्मालोचना के दायरे में लाते हैं। इस दृष्टि से वे आधुनिक क्रांतिकारी प्रतिमानों से भिन्न दिखाई देते हैं।
साही की व्याख्या को आगे बढ़ाते हुए यह कहा जा सकता है कि कबीर केवल प्रतिरोध के कवि नहीं हैं, बल्कि प्रतिरोध की भी आलोचना करने वाले कवि हैं। वे हर प्रकार की आत्मसंतुष्टि के विरोधी हैं, चाहे वह धार्मिक हो या क्रांतिकारी।
एक नया आलोचनात्मक मार्ग यह भी हो सकता है कि कबीर को “पहचान-विरोधी कवि” के रूप में पढ़ा जाए।
समकालीन विमर्शों में पहचान का प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है। जाति, धर्म, लिंग, भाषा, क्षेत्र और समुदाय के आधार पर मनुष्य अपनी अस्मिता को परिभाषित करता है। यह ऐतिहासिक रूप से आवश्यक भी रहा है। लेकिन कबीर की चेतना इन पहचानों के पार जाने का आग्रह करती है।
यहाँ सावधानी आवश्यक है। इसका अर्थ यह नहीं कि कबीर सामाजिक यथार्थ को नकारते हैं। वे जाति की वास्तविकता से परिचित हैं। वे धार्मिक विभाजनों को भी जानते हैं। लेकिन वे मनुष्य को केवल इन पहचानों में सीमित नहीं करना चाहते।
साही की आलोचना को आगे बढ़ाते हुए यह तर्क विकसित किया जा सकता है कि कबीर का मूल संघर्ष पहचानों के अस्तित्व से नहीं, बल्कि उनकी अंतिमता के दावे से है। वे किसी भी पहचान को अंतिम सत्य नहीं मानते। यही कारण है कि वे आज के समय में भी असुविधाजनक कवि बने रहते हैं।
कबीर के रहस्यवाद की पुनर्व्याख्या भी एक नया क्षेत्र हो सकता है।
प्रगतिशील आलोचना ने कई बार रहस्यवाद को सामाजिक चेतना के प्रतिकूल माना, जबकि परंपरावादी आलोचना ने उसे आध्यात्मिक उत्कर्ष का प्रमाण माना। दोनों दृष्टियाँ आंशिक हैं।
साही की प्रेरणा से यह प्रश्न उठाया जा सकता है कि कबीर का रहस्यवाद वास्तव में “अनुभव की भाषा-संकट” की अभिव्यक्ति है। जब मनुष्य ऐसे अनुभव से गुजरता है जिसे सामान्य भाषा में व्यक्त नहीं किया जा सकता, तब वह प्रतीकों, विरोधाभासों और उलटबासियों का सहारा लेता है। कबीर की उलटबासियाँ केवल धार्मिक पहेलियाँ नहीं हैं। वे भाषा की सीमाओं से संघर्ष का प्रमाण हैं।
इस दृष्टि से कबीर आधुनिक कविता के भी पूर्वज प्रतीत होते हैं।
वे अर्थ को स्थिर नहीं रहने देते।
वे भाषा को लगातार अस्थिर करते हैं।
वे शब्दों को उनके प्रचलित अर्थों से मुक्त कर देते हैं।
यहाँ साही के विचारों को उत्तर-आधुनिक भाषा-सिद्धांतों के साथ भी संवाद में रखा जा सकता है, यद्यपि सावधानी के साथ। उद्देश्य कबीर को आधुनिक सिद्धांतों में फिट करना नहीं, बल्कि यह समझना होगा कि उनकी भाषा स्वयं कितनी जटिल और बहुअर्थी है।
एक और नया मार्ग कबीर को “असहमति के सौंदर्यशास्त्र” के कवि के रूप में पढ़ने का हो सकता है।
हिंदी आलोचना ने कबीर के विचारों पर बहुत लिखा है, लेकिन उनकी असहमति की कलात्मक संरचना पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया गया है। कबीर केवल असहमत नहीं होते, वे असहमति को काव्य में रूपांतरित करते हैं। उनकी भाषा में जो झटका है, जो विडंबना है, जो व्यंग्य है, जो अप्रत्याशितता है, वह केवल वैचारिक नहीं, बल्कि सौंदर्यात्मक भी है।
साही की साहित्यिक दृष्टि इसी दिशा में संकेत करती है।
कबीर की कविता का सौंदर्य उसके विरोध में निहित है।
उसकी ऊर्जा उसकी असहमति में निहित है।
उसकी लय उसके प्रश्नों में निहित है।
इसलिए कबीर का सौंदर्यशास्त्र तुलसी, सूर या बिहारी के सौंदर्यशास्त्र से भिन्न है। वह सामंजस्य का नहीं, टकराव का सौंदर्यशास्त्र है।
कबीर पर एक और नई बहस यह हो सकती है कि क्या वे वास्तव में “लोककवि” हैं, जैसा अक्सर कहा जाता है?
यह प्रश्न सुनने में अजीब लग सकता है, लेकिन गंभीर है। लोककवि कह देने से अक्सर यह मान लिया जाता है कि उनकी कविता सीधे जनता की चेतना की अभिव्यक्ति है। लेकिन कबीर की भाषा और चिंतन दोनों अत्यंत जटिल हैं। उनकी उलटबासियाँ, प्रतीक और आध्यात्मिक संकेत साधारण अर्थ में लोकभाषिक नहीं हैं।
संभव है कि कबीर लोक और दार्शनिकता के अद्भुत संयोग का नाम हों।
वे जनता की भाषा में बोलते हैं, लेकिन जनता की तत्काल समझ से आगे की चीज़ों की ओर संकेत करते हैं।
यह द्वंद्व भी आगे के अध्ययन का विषय बन सकता है।
साही की आलोचना से प्रेरित होकर यह भी कहा जा सकता है कि कबीर का सबसे बड़ा महत्व किसी सामाजिक कार्यक्रम में नहीं, बल्कि चेतना की स्वतंत्रता में है। वे हमें तैयार उत्तर नहीं देते। वे हमें उत्तर खोजने की बेचैनी देते हैं। वे किसी विचारधारा का अनुयायी बनाने की बजाय हर विचारधारा से प्रश्न पूछना सिखाते हैं।
यहीं उनकी आधुनिकता है।
यहीं उनकी कालजयी शक्ति है।
और यहीं साही की आलोचना का सबसे बड़ा योगदान भी है।
उन्होंने कबीर को विचारधाराओं के बीच फँसे हुए संत से मुक्त करके एक जीवित, बेचैन, असुविधाजनक और निरंतर प्रश्न करने वाले मनुष्य के रूप में देखा। आगे की आलोचना यदि सचमुच नया मार्ग बनाना चाहती है, तो उसे कबीर के भीतर इसी बेचैन मनुष्य की खोज जारी रखनी होगी। क्योंकि कबीर का सबसे बड़ा सत्य शायद किसी निष्कर्ष में नहीं, बल्कि उस सतत प्रश्न में है जो हर युग की निश्चितताओं को भंग करता रहता है।
।। चार ।।
विजयदेव नारायण साही के यहाँ कबीर की धार्मिकता को समझने के लिए सबसे पहले “धर्म” शब्द को उसके प्रचलित अर्थों से अलग करना पड़ता है। साही के लिए कबीर न तो परंपरागत अर्थ में धार्मिक व्यक्ति हैं, न आधुनिक अर्थ में धर्म-विरोधी। वे ऐसी चेतना के कवि हैं जो धर्म की संस्थाओं, कर्मकांडों और स्थापित आध्यात्मिक सत्ता-केंद्रों पर लगातार प्रश्न उठाती है।
यही कारण है कि साही कबीर को केवल संत-परंपरा के भीतर रखकर नहीं देखते। उनके लिए कबीर की धार्मिकता किसी संप्रदाय की धार्मिकता नहीं है। वह अनुभव की धार्मिकता है।
कबीर के यहाँ मंदिर, मस्जिद, तीर्थ, व्रत, जप, तप, रोज़ा, नमाज़, मूर्ति, शास्त्र, वेद, कुरान, गुरु, योगी, सिद्ध, मुल्ला, पंडित सब आलोचना के घेरे में आते हैं। सामान्यतः इसे धर्म-विरोध मान लिया जाता है। लेकिन साही का संकेत इससे भिन्न है। वे समझते हैं कि कबीर धर्म का निषेध नहीं कर रहे, बल्कि धर्म के वस्तुकरण का निषेध कर रहे हैं।
कबीर के लिए सत्य किसी संस्था में कैद नहीं है।
सत्य जीवित अनुभव है।
जब धर्म अनुभव की जगह व्यवस्था बन जाता है, तब कबीर उसका विरोध करते हैं।
साही के अनुसार कबीर की धार्मिकता का मूल तत्व “अनुभूत सत्य” है, न कि “स्वीकृत सत्य”।
स्वीकृत सत्य वह है जिसे समाज ने मान लिया हो।
अनुभूत सत्य वह है जिसे व्यक्ति स्वयं खोजता है।
कबीर दूसरे प्रकार के सत्य के कवि हैं।
इसीलिए वे बार-बार प्रत्यक्ष अनुभव की बात करते हैं।
उनके लिए धर्म विश्वास का नहीं, अनुभव का विषय है।
यहीं साही का कबीर आधुनिक प्रतीत होता है।
क्योंकि वह परंपरा से उत्तर ग्रहण नहीं करता, बल्कि स्वयं सत्य की परीक्षा करता है।
साही की दृष्टि में कबीर का “राम” भी इसी कारण विशेष महत्व रखता है। मार्क्सवादी आलोचना के कुछ रूपों ने राम को धार्मिक प्रतीक मानकर गौण किया, जबकि परंपरागत भक्तिपरक आलोचना ने उसे ईश्वर का नाम मानकर स्वीकार किया। साही इन दोनों के बीच एक तीसरा मार्ग खोजते हैं।
उनके लिए कबीर का राम मुख्यतः अनुभव का केंद्र है।
वह तुलसी के सगुण राम नहीं है।
वह पुराणों का अवतार नहीं है।
वह किसी मूर्ति में स्थित देवता नहीं है।
वह चेतना की उस अंतिम उपस्थिति का नाम है जिसे भाषा पूरी तरह व्यक्त नहीं कर सकती।
इसलिए कबीर का राम धर्मशास्त्रीय अवधारणा कम और अस्तित्वगत अनुभव अधिक है।
साही के यहाँ यह बिंदु अत्यंत महत्वपूर्ण है कि कबीर की धार्मिकता किसी सिद्धांत की धार्मिकता नहीं है।
वह एक खोज की धार्मिकता है।
एक बेचैनी की धार्मिकता है।
एक निरंतर प्रश्न की धार्मिकता है।
इसलिए कबीर श्रद्धालु भी हैं और विद्रोही भी।
वे विश्वास करते हैं, लेकिन अंधविश्वास नहीं करते।
वे आध्यात्मिक हैं, लेकिन संस्थागत धर्म के अनुयायी नहीं हैं।
योग के प्रश्न पर साही का दृष्टिकोण और भी रोचक हो जाता है।
हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कबीर को नाथपंथ, सिद्धों और योग परंपरा से जोड़कर समझने का महत्वपूर्ण कार्य किया था। ऐतिहासिक रूप से यह बिल्कुल सही भी है। कबीर की भाषा, प्रतीक और अनेक अवधारणाएँ योग-साधना की पृष्ठभूमि से प्रभावित हैं।
लेकिन साही की रुचि योग की तकनीकी संरचना में कम है।
वे योग के आध्यात्मिक अर्थ की तलाश करते हैं।
उनके लिए कबीर योगी इसलिए महत्वपूर्ण नहीं हैं कि वे कुण्डलिनी, षट्चक्र या प्राणायाम की चर्चा करते हैं।
वे इसलिए महत्वपूर्ण हैं कि उन्होंने योग को आत्मानुभूति की प्रक्रिया में बदल दिया।
कबीर बार-बार हठयोगियों की आलोचना करते हैं।
वे कान फड़वाने, भस्म रमाने, देह को यातना देने और बाहरी योग-प्रदर्शनों का उपहास करते हैं।
यदि कबीर स्वयं योग-विरोधी होते तो यह आलोचना समझ में नहीं आती।
असल में वे योग-विरोधी नहीं हैं, बल्कि योग के बाहरीकरण के विरोधी हैं।
साही इस अंतर को बहुत महत्त्व देते।
उनके अनुसार कबीर योग को भीतर की घटना बनाना चाहते हैं।
उनके लिए वास्तविक योग शरीर की मुद्राओं में नहीं, चेतना के रूपांतरण में है।
यही कारण है कि कबीर का योग साधना की तकनीक से अधिक जागरण की स्थिति है।
यहाँ साही कबीर को नाथपंथ से जोड़ते हुए भी उससे अलग पहचानते हैं।
नाथ योगियों के यहाँ शरीर एक साधना-क्षेत्र है।
कबीर के यहाँ भी शरीर महत्त्वपूर्ण है, लेकिन अंततः उनका लक्ष्य शरीर नहीं, अनुभूति है।
वे योग की भाषा का उपयोग करते हैं, किंतु उसे एक व्यापक आध्यात्मिक अर्थ प्रदान करते हैं।
कहा जा सकता है कि साही की दृष्टि में कबीर योग के लोकतंत्रीकरण का कार्य करते हैं।
वे योग को गुफाओं, अखाड़ों और विशिष्ट साधकों की संपत्ति नहीं रहने देते।
वे उसे साधारण मनुष्य के जीवन में ले आते हैं।
उनका योग खेत में भी संभव है।
करघे पर भी संभव है।
बाजार में भी संभव है।
गृहस्थ जीवन में भी संभव है।
यही कबीर की मौलिकता है।
साही को संभवतः सबसे अधिक आकर्षित यही बात करती है कि कबीर धार्मिक और योगिक अनुभव को रहस्यवादी विशिष्टता से निकालकर मानवीय अनुभव का हिस्सा बना देते हैं।
उनकी दृष्टि में कबीर का योग किसी सिद्धि की प्राप्ति नहीं, बल्कि मिथ्या से मुक्ति की प्रक्रिया है।
यहाँ कबीर और परंपरागत योगियों के बीच एक गहरा अंतर दिखाई देता है।
बहुत से योगी शक्ति चाहते हैं।
कबीर सत्य चाहते हैं।
बहुत से योगी सिद्धि चाहते हैं।
कबीर जागरण चाहते हैं।
बहुत से योगी विशेष बनना चाहते हैं।
कबीर सामान्य मनुष्य के भीतर असाधारण चेतना जगाना चाहते हैं।
साही की आलोचना का सार यही है कि कबीर की धार्मिकता और योग दोनों को किसी धार्मिक अनुशासन या साधना-पद्धति तक सीमित नहीं किया जा सकता। वे उन्हें मनुष्य की स्वतंत्र चेतना की खोज के रूप में देखते हैं। धर्म उनके यहाँ जीवित अनुभव है और योग उस अनुभव तक पहुँचने की आंतरिक प्रक्रिया।
इसलिए साही का कबीर न तो मठ का संत है, न अखाड़े का योगी, न केवल समाज-सुधारक, न केवल विद्रोही। वह ऐसा मनुष्य है जो सत्य की खोज में हर स्थापित सत्ता, हर निश्चित ज्ञान और यहाँ तक कि अपनी स्वयं की आध्यात्मिक उपलब्धियों को भी अंतिम मानने से इंकार करता है। यही उसकी धार्मिकता है, और यही उसका योग।
।। पांच ।।
विजयदेव नारायण साही की दृष्टि में कबीर किसी विचारधारा, संप्रदाय, सामाजिक कार्यक्रम, धार्मिक व्यवस्था या ऐतिहासिक भूमिका में समा जाने वाले कवि नहीं हैं। वे मनुष्य की स्वतंत्र चेतना के सबसे बड़े कवि हैं।
साही की पूरी आलोचना में बार-बार एक बात उभरती है कि कबीर को समझने में सबसे बड़ी बाधा स्वयं हमारी व्याख्याएँ हैं। हर युग अपने अनुसार कबीर को छोटा करता रहा है। किसी ने उन्हें हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रवक्ता बनाया, किसी ने समाज-सुधारक, किसी ने वर्ग-संघर्ष का कवि, किसी ने दलित क्रांति का नायक, किसी ने रहस्यवादी संत, किसी ने निर्गुण भक्त। साही इन सबको आंशिक सत्य मानते हैं, पूर्ण सत्य नहीं।
उनके लिए कबीर का वास्तविक स्वरूप इन सबके बीच नहीं, इन सबके पार है।
साही का कबीर सबसे पहले एक ऐसी चेतना है जो किसी भी तैयार सत्य को स्वीकार नहीं करती।
वह पंडित से पूछती है।
मुल्ला से पूछती है।
योगी से पूछती है।
राजा से पूछती है।
संत से पूछती है।
यहाँ तक कि स्वयं से भी पूछती है।
कबीर के भीतर प्रश्न उत्तर से बड़ा है।
यही साही की सबसे मौलिक पहचान है।
अधिकांश आलोचक कबीर के उत्तर खोजते हैं।
साही कबीर के प्रश्नों को समझते हैं।
उनके अनुसार कबीर का महत्व इस बात में नहीं कि उन्होंने क्या स्थापित किया, बल्कि इस बात में है कि उन्होंने किन-किन झूठी निश्चितताओं को तोड़ा।
साही के लिए कबीर की केंद्रीय विशेषता “असहमति” भी नहीं है बल्कि “स्वतंत्रता” है।
असहमति स्वतंत्रता का परिणाम है।
कबीर किसी दल से असहमत नहीं हैं।
वे हर प्रकार की बौद्धिक गुलामी से असहमत हैं।
वे मनुष्य को स्वतंत्र देखना चाहते हैं।
जाति से स्वतंत्र।
धर्म से स्वतंत्र।
ग्रंथ से स्वतंत्र।
परंपरा से स्वतंत्र।
यहाँ तक कि अपनी स्वयं की उपलब्धियों से भी स्वतंत्र।
यही कारण है कि कबीर की चेतना किसी स्थिर पहचान में नहीं रुकती।
साही के अनुसार कबीर को केवल क्रांतिकारी कहना भी पर्याप्त नहीं है।
क्योंकि क्रांतिकारी अक्सर नई व्यवस्था स्थापित करना चाहता है।
कबीर नई व्यवस्था से भी सावधान हैं।
उन्हें पता है कि हर व्यवस्था अंततः जड़ हो सकती है।
इसलिए वे केवल विद्रोही नहीं हैं।
वे चेतना के सतत जागरण के कवि हैं।
साही के यहाँ कबीर का धर्म भी धर्म नहीं, बल्कि अनुभव है।
उनका राम भी राम नहीं, बल्कि सत्य की अनुभूति का संकेत है।
उनका योग भी योग नहीं, बल्कि आत्म-जागरण की प्रक्रिया है।
उनकी भक्ति भी भक्ति नहीं, बल्कि अस्तित्व की गहराइयों में उतरने का साहस है।
यहीं साही कबीर को संत-साहित्य की सीमाओं से बाहर ले जाते हैं।
उनके लिए कबीर मुख्यतः धार्मिक व्यक्ति नहीं हैं।
वे आध्यात्मिक व्यक्ति भी केवल आंशिक अर्थ में हैं।
वे सबसे पहले एक जाग्रत मनुष्य हैं।
और यही जाग्रत मनुष्य उनकी कविता का स्रोत है।
साही कबीर की कविता को भी केवल विचार का माध्यम नहीं मानते।
वे समझते हैं कि कबीर की महानता उनके विचारों में जितनी है, उनकी भाषा में उससे कम नहीं।
कबीर का शब्द उपदेश नहीं देता।
वह झकझोरता है।
वह पाठक को आराम नहीं देता।
वह उसके भीतर बैठी हुई सुविधाजनक धारणाओं को तोड़ता है।
साही के लिए कबीर की कविता का सौंदर्य इसी झटके में है।
वह सामंजस्य का सौंदर्य नहीं है।
वह विघटन का सौंदर्य है।
वह जागरण का सौंदर्य है।
वह बेचैनी का सौंदर्य है।
साही की दृष्टि में कबीर का सबसे बड़ा योगदान किसी सामाजिक सुधार, धार्मिक आंदोलन या सांस्कृतिक परिवर्तन में नहीं है।
उनका सबसे बड़ा योगदान मनुष्य की आत्मनिर्भर चेतना की स्थापना में है।
उन्होंने मनुष्य को यह साहस दिया कि वह स्वयं देखे।
स्वयं सोचे।
स्वयं अनुभव करे।
स्वयं सत्य तक पहुँचे।
बिना किसी मध्यस्थ के।
बिना किसी पुरोहित के।
बिना किसी संस्था के।
बिना किसी विचारधारा के।
यहीं साही का कबीर आधुनिक हो जाता है।
लेकिन वह आधुनिकता यूरोप से आयी आधुनिकता नहीं है।
वह आत्म-स्वातंत्र्य की आधुनिकता है।
वह ऐसी आधुनिकता है जिसमें व्यक्ति अपने विवेक और अनुभव के आधार पर जीवन का अर्थ खोजता है।
यदि एक वाक्य में कहा जाए तो साही के अनुसार कबीर न समाज-सुधारक हैं, न संत, न रहस्यवादी, न क्रांतिकारी, न केवल भक्त।
वे इन सब रूपों से होकर गुजरने वाली एक विराट मानवीय चेतना हैं।
और यदि एक ही सूत्र में उनका अंतिम निचोड़ बाँधना पड़े, तो साही शायद यही कहेंगे:
कबीर का मूल स्वर सत्य की खोज नहीं, बल्कि सत्य के अतिरिक्त हर झूठी निश्चितता का निरंतर विध्वंस है; और इसी विध्वंस के बीच मनुष्य की स्वतंत्र चेतना का जन्म होता है।
यही साही का कबीर है।
एक ऐसा कबीर जो किसी पंथ का नहीं, किसी विचारधारा का नहीं, किसी वर्ग का नहीं, किसी जाति का नहीं।
एक ऐसा कबीर जो हर बार पकड़ में आते-आते छूट जाता है।
जो हर व्याख्या को अस्थिर कर देता है।
जो अपने समय से बड़ा है और अपनी सभी व्याख्याओं से भी।
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