मैं वापस आऊँगा: घर की ओर लौटती स्मृतियाँ और विभाजन का मौन

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मैं वापस आऊँगा

Parichay Das

— परिचय दास —

भारतीय सिनेमा में विभाजन पर अनेक फिल्में बनी हैं। अधिकांश फिल्मों ने उसे इतिहास की एक विराट राजनीतिक घटना के रूप में देखा है। वहाँ रक्तपात है, हिंसा है, सीमाएँ हैं, धर्म है और सत्ता की निर्ममता है लेकिन इम्तियाज़ अली की नवीनतम फिल्म~ “मैं वापस आऊँगा” विभाजन को इतिहास के शोर से निकालकर मनुष्य की स्मृति के भीतर रख देती है। यह फिल्म बताती है कि विभाजन केवल भूगोल का विभाजन नहीं था, वह मनुष्य के भीतर बसे घरों का भी विभाजन था।

इम्तियाज़ अली की रचनात्मक दुनिया में “लौटना” हमेशा एक महत्त्वपूर्ण क्रिया रही है। उनके पात्र बाहर जितनी यात्राएँ करते हैं, भीतर उससे कहीं अधिक भटकते हैं। इस फिल्म में भी लौटना केवल किसी गाँव, कस्बे या मकान तक पहुँचना नहीं है। यह अपने अतीत तक लौटने का प्रयास है, उस समय तक लौटने का प्रयास है जहाँ जीवन अभी टूटा नहीं था। लेकिन समय का सबसे बड़ा सत्य यही है कि वह किसी को वापस नहीं लौटने देता। मनुष्य लौटता है, पर वह दुनिया नहीं लौटती जिसमें वह कभी रहा था।

फिल्म का सबसे बड़ा सौन्दर्य उसका संयम है। वह विभाजन को आँसुओं की प्रदर्शनी नहीं बनाती। यहाँ इतिहास चिल्लाता नहीं, धीरे-धीरे रिसता है। एक बूढ़े चेहरे की झुर्रियों में, एक पुराने मकान की दीवारों में, किसी भूले हुए गीत की धुन में और उन रास्तों में जिन पर अब कोई पहचान शेष नहीं है। इम्तियाज़ अली यहाँ इतिहासकार नहीं हैं, स्मृतिकार हैं। वे घटनाओं का नहीं, उनके पश्चात बची हुई अनुभूतियों का वृत्तांत लिखते हैं।

फिल्म देखते हुए बार-बार लगता है कि वास्तविक नायक कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि स्मृति है। स्मृति जो कभी पूरी तरह सच नहीं होती, फिर भी जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई बन जाती है। मनुष्य अपने वर्तमान से कम और अपनी स्मृतियों से अधिक निर्मित होता है। यही कारण है कि फिल्म का वृद्ध पात्र अपने वर्तमान से अधिक अपने अतीत में जीवित दिखाई देता है। उसके लिए घर वह नहीं जहाँ वह रहता है, बल्कि वह है जहाँ वह कभी था।

नसीरुद्दीन शाह का अभिनय इस फिल्म की आत्मा है। उन्होंने अभिनय नहीं किया है, मानो समय को अपने चेहरे पर उतर आने दिया है। उनके मौन में संवादों से अधिक अर्थ हैं। कई दृश्य ऐसे हैं जहाँ वे कुछ नहीं कहते, फिर भी दर्शक बहुत कुछ सुन लेता है। यह अभिनय की नहीं, जीवन की भाषा है। समकालीन हिंदी सिनेमा में ऐसे अभिनेता कम होते जा रहे हैं जो चरित्र को निभाने के बजाय उसके भीतर बस जाते हैं।

फिल्म का दृश्य-विधान भी उल्लेखनीय है। पुराने घर, धूल से भरे आँगन, टूटती हुई दीवारें, सुनसान रास्ते और धुँधली रोशनियाँ मिलकर एक ऐसी दृश्य-कविता रचते हैं जिसमें समय स्वयं एक पात्र बन जाता है। इम्तियाज़ अली के कैमरे को हमेशा रास्तों से प्रेम रहा है। यहाँ भी रास्ते केवल भौतिक नहीं हैं; वे स्मृति और विस्मृति के बीच फैले हुए मार्ग हैं।

फिर भी फिल्म अपनी सीमाओं से मुक्त नहीं है। कई स्थानों पर निर्देशक अपनी ही संवेदनशीलता के मोह में फँस जाते हैं। कथा का प्रवाह कुछ प्रसंगों में शिथिल पड़ता है। कुछ दृश्य इतने लंबे हो जाते हैं कि उनकी भावनात्मक शक्ति कम होने लगती है। कला का एक नियम है कि वह जितना कहती है, उतना ही छिपाती भी है। कहीं-कहीं फिल्म अपने रहस्यों को अनावश्यक रूप से खोल देती है।

फिल्म की दूसरी सीमा यह है कि वह विभाजन की सामाजिक और राजनीतिक जटिलताओं से जानबूझकर दूरी बनाए रखती है। यह उसका सौन्दर्य भी है और उसकी कमजोरी भी। इससे फिल्म अधिक मानवीय बनती है, लेकिन इतिहास की कुछ कठोर परतें पृष्ठभूमि में चली जाती हैं। दर्शक कभी-कभी यह महसूस करता है कि त्रासदी का भाव तो उपस्थित है पर उसकी ऐतिहासिक तीक्ष्णता कुछ मंद हो गई है।

इसके बावजूद मैं वापस आऊँगा आज के समय में एक महत्त्वपूर्ण फिल्म है। ऐसे समय में जब सिनेमा लगातार शोर, प्रदर्शन और तात्कालिक उत्तेजना की ओर बढ़ रहा है, यह फिल्म स्मृति, मौन और आत्मीयता की ओर लौटती है। यह हमें याद दिलाती है कि मनुष्य का सबसे बड़ा भूगोल उसके भीतर होता है। देश बदल सकते हैं, सीमाएँ बदल सकती हैं, सरकारें बदल सकती हैं, लेकिन स्मृति का मानचित्र नहीं बदलता।

फिल्म का शीर्षक अंततः एक गहरी विडंबना में बदल जाता है। कोई भी वास्तव में वापस नहीं आता। जो लौटता है, वह वही व्यक्ति नहीं होता; और जहाँ वह लौटता है, वह भी वही स्थान नहीं रह जाता। लौटना इसलिए एक भौगोलिक नहीं, आध्यात्मिक क्रिया है। मनुष्य अपने अतीत तक पहुँचने की कोशिश करता है, लेकिन उसे केवल उसकी प्रतिध्वनियाँ मिलती हैं।

इम्तियाज़ अली की यह फिल्म इसी प्रतिध्वनि की कथा है। यह विभाजन की नहीं, विभाजन के बाद बची हुई मनुष्यता की फिल्म है। यह घर की खोज की फिल्म है और अंततः यह स्वीकार करने की भी कि कुछ घर केवल स्मृति में बसते हैं। वहाँ पहुँचा नहीं जा सकता, केवल उन्हें याद किया जा सकता है। यही इस फिल्म का सौन्दर्य है और यही उसकी सबसे बड़ी करुणा।


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