जाने-माने पर्यावरणविद, शिक्षक और वैज्ञानिक सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल का आज नवां दिन हैँ। दिल्ली की इस झुलसाने वाली भीषण गर्मी में, लद्दाख के बर्फीले पहाड़ों को छोड़कर आया यह शख्स तड़प रहा हैँ और उसकी हालत दिनों-दिन गिरती जा रही हैँ।
अब तक उनका वजन लगभग 7 किलो घट चुका हैँ, लेकिन इस व्यवस्था की चमड़ी इतनी मोटी है कि उसे इस ढलती सांस की कोई परवाह नहीं हैँ। उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर सैकड़ों युवा दिन-रात जंतर-मंतर की तपती सड़कों पर बैठे हैं, मगर असंवेदनशील, भ्रष्ट और देश के होनहार विद्यार्थियों के भविष्य की हत्यारी सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही हैँ।
भ्रष्ट शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और पेपर लीक के इस महाघोटाले पर यह निक्कमी, लुटेरी सत्ता व्यवस्था शुतुरमुर्ग की तरह आंखें मूंदे बैठी हैँ। अगर हालात ऐसे ही रहे, तो स्थितियां इस कदर बिगड़ेंगी कि संभालना मुश्किल हो जाएगा। अब यह पूरी तरह साफ हो चुका है कि इस निर्लज्ज निजाम को इस बात से रत्ती भर फर्क नहीं पड़ता कि कितने बच्चे इस व्यवस्था की बलि चढ़ रहे हैं और कितनों का भविष्य काल के गाल में समा रहा हैँ।
इन्हें न तो जनता की संवेदनाओं से कोई सरोकार है और न ही युवाओं के बर्बाद होते कल से। करोड़ों युवाओं का भविष्य अंधकार में धकेल दिया गया, एक के बाद एक पेपर लीक हो रहे हैं, लेकिन सत्ता के गलियारों में बैठे हुक्मरान अपनी कुर्सियों से टस से मस होने को तैयार नहीं हैँ।
यह इस देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है कि एक सच्चा देशभक्त वैज्ञानिक, जो दुनिया भर में भारत का नाम रोशन कर सकता था, आज अपने ही देश के नौजवानों और छात्रों के हक के लिए अपनी जान दांव पर लगाए बैठा हैँ और हुकूमत के चेहरे पर एक शिकन तक नहीं हैँ। सत्ता पूरी तरह अंधी और बहरी हो चुकी है, और सबसे दुखद यह है कि समाज का एक बड़ा हिस्सा अब भी गहरी नींद में सोकर बेपरवाह बना हुआ हैँ।
आखिर सोनम वांगचुक को क्या जरूरत थी इस दिल्ली के दोजख जैसे मौसम में आकर भूखे-प्यासे तपने की? वह किसके लिए अपने प्राणों की आहुति देने पर उतारू हैँ? सिर्फ और सिर्फ इस देश के युवाओं के उज्ज्वल भविष्य के लिए। यह वह इंसान है जो चाहता तो सरकार का पिछलग्गू बनकर, उनके सुर में सुर मिलाकर ऐश-ओ-आराम की आलीशान जिंदगी बसर कर सकता था, बड़े-बड़े सरकारी पुरस्कार और पद अपनी झोली में डाल सकता था। लेकिन उन्होंने चाटुकारिता का मखमली रास्ता छोड़कर संघर्ष और कांटों भरी उस राह को चुना जहां कदम-कदम पर दमन हैँ, विरोध हैँ, जेल की सलाखें हैँ और जान का सीधा खतरा हैँ।
सरकार का जनता के हर बुनियादी मुद्दे के प्रति यह अनदेखी और क्रूर असंवेदनशीलता का रुख दरअसल उनकी उस तानाशाही मानसिकता का नतीजा हैँ, जो अब खुद को चुनावी हार-जीत के डर से ऊपर मान चुकी हैँ। उन्हें लगता है कि वे अजेय हैँ, लेकिन इतिहास गवाह हैँ कि जब-जब युवाओं के भविष्य पर चोट हुई हैँ और वैज्ञानिकों-शिक्षकों को सड़कों पर तड़पाया गया हैँ, तब-तब बड़े से बड़े साम्राज्य ताश के पत्तों की तरह ढह गए हैँ।
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