क्या नेहरू ने सुभाष का साथ छोड़ा था?

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राज गोपाल सिंह बर्मा

— राज गोपाल सिंह बर्मा —

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद और विशेष रूप से बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध से भारतीय सार्वजनिक विमर्श में एक प्रश्न बार-बार उठाया जाता रहा है कि क्या जवाहरलाल नेहरू ने सुभाषचंद्र बोस का साथ छोड़ दिया था?

लोकप्रिय साहित्य, राजनीतिक वक्तव्यों और सामाजिक माध्यमों में इस प्रश्न का उत्तर प्रायः अत्यंत सरल रूप में दिया जाता है, मानो 1939 का संकट दो व्यक्तियों के बीच सत्ता-संघर्ष मात्र था। किंतु इतिहासकार का दायित्व लोकप्रिय धारणाओं की पुनरावृत्ति करना नहीं, बल्कि उपलब्ध साक्ष्यों, समकालीन दस्तावेजों और पत्राचार के आधार पर घटनाओं का पुनर्मूल्यांकन करना है। जब इन स्रोतों का अध्ययन किया जाता है, तो स्पष्ट होता है कि नेहरू और सुभाष के संबंध न तो सामान्य राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के थे और न ही वैयक्तिक शत्रुता के। उनके बीच मतभेद अवश्य थे, परंतु वे मुख्यतः कांग्रेस की रणनीति, संगठनात्मक संरचना और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के मूल्यांकन से संबंधित थे।

समकालीन पत्राचार से स्पष्ट है कि नेहरू सुभाषचंद्र बोस की बौद्धिक क्षमता, त्याग और राष्ट्रभक्ति के प्रति गहरा सम्मान रखते थे। उन्होंने अनेक अवसरों पर सार्वजनिक रूप से सुभाष की प्रशंसा की और उन्हें कांग्रेस के सबसे प्रतिभाशाली युवा नेताओं में स्थान दिया। दूसरी ओर सुभाष ने भी नेहरू को आधुनिक भारत के निर्माण की दृष्टि रखने वाला नेता माना। दोनों के बीच नियमित पत्राचार होता था और अनेक राष्ट्रीय प्रश्नों पर वे परस्पर विचार-विमर्श करते थे। यदि व्यक्तिगत संबंधों के स्तर पर देखा जाए, तो उनके बीच विश्वास का आधार लंबे समय तक बना रहा। यही कारण है कि 1939 का संकट उत्पन्न होने पर नेहरू ने प्रारंभ में किसी भी पक्ष का खुला समर्थन करने के स्थान पर समझौते का मार्ग खोजने का प्रयास किया।

समस्या वहाँ उत्पन्न हुई जहाँ कांग्रेस के संगठनात्मक ढाँचे और नेतृत्व की परंपरा का प्रश्न सामने आया। सुभाष का मत था कि कांग्रेस अध्यक्ष को अपनी कार्यसमिति गठित करने तथा अपनी राजनीतिक रणनीति के अनुसार संगठन को दिशा देने की पर्याप्त स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। इसके विपरीत गांधी और उनके निकट सहयोगियों का विश्वास था कि कांग्रेस का व्यापक राष्ट्रीय चरित्र तभी सुरक्षित रह सकता है जब संगठनात्मक निर्णय व्यापक सहमति से लिए जाएँ और गांधी के नैतिक नेतृत्व से उनका सामंजस्य बना रहे। नेहरू इन दोनों पक्षों की वैधता को समझते थे। वे अध्यक्ष के अधिकारों के विरोधी नहीं थे, किंतु वे यह भी मानते थे कि गांधी से टकराव की स्थिति में कांग्रेस का जनाधार कमजोर हो सकता है। इसलिए उनका निर्णय वैचारिक सहमति से अधिक संगठनात्मक यथार्थ पर आधारित था।

बाद के दशकों में कुछ लेखकों ने यह आरोप लगाया कि यदि नेहरू सुभाष का समर्थन कर देते, तो कांग्रेस का नेतृत्व पूरी तरह बदल जाता और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की दिशा भी भिन्न होती। यह निष्कर्ष ऐतिहासिक साक्ष्यों की अपेक्षा कल्पनाओं पर अधिक आधारित प्रतीत होता है। कांग्रेस 1939 तक केवल एक राजनीतिक दल नहीं थी; वह अनेक विचारधाराओं, प्रांतीय नेतृत्वों और सामाजिक समूहों का व्यापक राष्ट्रीय मंच थी। गांधी का प्रभाव केवल संगठनात्मक नहीं, बल्कि नैतिक और जनमानस पर आधारित था। ऐसी परिस्थिति में नेहरू यदि सुभाष के साथ अलग खड़े भी हो जाते, तो यह निश्चित नहीं कहा जा सकता कि कांग्रेस की दिशा बदल जाती। इसके विपरीत, संगठन का विभाजन और अधिक तीव्र होने की संभावना भी थी। इसलिए इतिहासकार संभावित परिकल्पनाओं के आधार पर नहीं, बल्कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही निष्कर्ष निकालते हैं।

उल्लेखनीय है कि सुभाषचंद्र बोस के कांग्रेस से अलग होने के बाद भी नेहरू ने उनके प्रति शत्रुतापूर्ण व्यवहार नहीं अपनाया। जब सुभाष विदेश गए और बाद में आज़ाद हिंद फ़ौज के माध्यम से स्वतंत्रता-संग्राम का नया अध्याय प्रारंभ हुआ, तब भी नेहरू ने सार्वजनिक रूप से उनके देशप्रेम पर कभी प्रश्न नहीं उठाया। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान उनकी रणनीति से नेहरू असहमत अवश्य थे, विशेषकर धुरी राष्ट्रों से सहयोग के प्रश्न पर, किंतु उन्होंने सुभाष के उद्देश्य और राष्ट्रभक्ति को संदेह की दृष्टि से नहीं देखा। इसी प्रकार 1945 में आज़ाद हिंद फ़ौज के अधिकारियों पर मुकदमा चलने के समय नेहरू ने स्वयं अधिवक्ता का चोगा पहनकर बचाव पक्ष में भाग लिया। यह तथ्य दोनों नेताओं के संबंधों को समझने के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। यदि उनके बीच स्थायी व्यक्तिगत वैमनस्य होता, तो ऐसा व्यवहार संभव नहीं था।

आधुनिक इतिहासलेखन भी इसी संतुलित निष्कर्ष की ओर संकेत करता है। लियोनार्ड गॉर्डन और सुगत बोस जैसे शोधकर्ताओं ने अपने विस्तृत अध्ययनों में दिखाया है कि नेहरू और सुभाष के संबंधों को बाद की राजनीतिक प्रतिस्पर्धाओं ने अत्यधिक ध्रुवीकृत कर दिया। सर्वपल्ली गोपाल ने भी इस बात पर बल दिया है कि नेहरू की सबसे बड़ी चिंता कांग्रेस की एकता थी, न कि सुभाष को राजनीतिक रूप से पराजित करना। दूसरी ओर कुछ इतिहासकार यह स्वीकार करते हैं कि नेहरू यदि मध्यस्थता में अधिक सक्रिय भूमिका निभाते, तो संभवतः टकराव की तीव्रता कुछ कम हो सकती थी। किंतु यह भी केवल एक ऐतिहासिक संभावना है, सिद्ध तथ्य नहीं। उपलब्ध स्रोतों से इतना अवश्य स्पष्ट होता है कि नेहरू का निर्णय व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की अपेक्षा संगठनात्मक स्थिरता और राष्ट्रीय आंदोलन की निरंतरता से अधिक प्रेरित था।

नेहरू के राजनीतिक विकास की दृष्टि से इस पूरे प्रसंग का सबसे महत्त्वपूर्ण परिणाम यह था कि उन्होंने लोकतांत्रिक नेतृत्व की जटिलताओं को प्रत्यक्ष रूप से अनुभव किया। स्वतंत्रता-संग्राम केवल आदर्शों का संघर्ष नहीं था; वह व्यक्तित्वों, संस्थाओं, संगठनात्मक अनुशासन और राजनीतिक यथार्थ के बीच संतुलन स्थापित करने की भी प्रक्रिया था। त्रिपुरी संकट ने नेहरू को यह सिखाया कि किसी राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व केवल लोकप्रियता से नहीं चलता। उसके लिए सहमति, संस्थागत विश्वास और दीर्घकालिक राजनीतिक दृष्टि की भी आवश्यकता होती है। यही अनुभव आगे चलकर स्वतंत्र भारत में उनके लोकतांत्रिक आचरण, संसदीय परंपराओं के प्रति सम्मान और संस्थागत निर्माण की नीति में स्पष्ट दिखाई देता है।

इतिहास के निष्पक्ष अध्ययन से यही निष्कर्ष निकलता है कि नेहरू और सुभाषचंद्र बोस के संबंधों को ‘विश्वासघात’ या ‘पूर्ण सहमति’ जैसे सरल शब्दों में नहीं बाँधा जा सकता। वे समान लक्ष्य वाले, परंतु अलग-अलग रणनीतियों वाले दो राष्ट्रवादी नेता थे। दोनों आधुनिक भारत का निर्माण चाहते थे, दोनों साम्राज्यवाद के विरोधी थे, दोनों समाजवादी प्रवृत्तियों से प्रभावित थे और दोनों भारतीय युवाओं के आदर्श थे। उनका मतभेद इस प्रश्न पर था कि स्वतंत्रता तक पहुँचने का सबसे उपयुक्त मार्ग कौन-सा है और कांग्रेस का संगठन किस प्रकार संचालित होना चाहिए। यही संतुलित दृष्टिकोण इतिहाससम्मत भी है और उपलब्ध स्रोतों से सर्वाधिक पुष्ट भी।


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