बुद्धिजीवी : पक्षधरता, निष्पक्षता और विवेक का संकट

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Parichay Das

— परिचय दास —

‘बुद्धिजीवी’ शब्द अपने भीतर जितनी गरिमा रखता है, व्यवहार में उतना ही विवादास्पद हो चुका है। वह व्यक्ति जो अपने विवेक, अध्ययन, संवेदना और तर्क के आधार पर समाज, संस्कृति, राजनीति और सत्ता का विश्लेषण करता है, उसे बुद्धिजीवी कहा जाता है। किंतु आज सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि बुद्धिजीवी आखिर किसका होता है? सत्य का, समाज का, सत्ता का, किसी विचारधारा का, या अपने निजी स्वार्थ का?

सैद्धांतिक रूप से बुद्धिजीवी का एकमात्र पक्ष सत्य होना चाहिए। उसे न सत्ता का प्रचारक होना चाहिए और न विपक्ष का स्थायी प्रवक्ता। उसका धर्म है कि वह जहाँ अच्छाई हो, उसकी प्रशंसा करे और जहाँ अन्याय या विकृति हो, उसकी आलोचना करे परंतु व्यवहार में ऐसा कम दिखाई देता है। अधिकांश बुद्धिजीवी किसी न किसी वैचारिक, राजनीतिक या सांस्कृतिक शिविर से इस प्रकार जुड़ जाते हैं कि उनका विवेक भी उसी दिशा में चलने लगता है। तब उनकी दृष्टि स्वतंत्र नहीं रहती, बल्कि पूर्वनिर्धारित निष्कर्षों का समर्थन करने लगती है।

यहीं से निष्पक्षता का संकट प्रारंभ होता है। निष्पक्ष होना केवल इतना नहीं कि किसी दल या संगठन का सदस्य न रहा जाए। निष्पक्षता का अर्थ है अपने प्रिय पक्ष की भूलों को भी स्वीकार करना और विरोधी पक्ष के गुणों को भी पहचानना। यह अत्यंत कठिन साधना है। मनुष्य स्वभावतः अपने विश्वासों से प्रेम करता है और जो उसके विश्वासों से भिन्न हो, उसके प्रति सहज संदेह रखता है। इसलिए बुद्धिजीवी भी इस मानवीय दुर्बलता से पूरी तरह मुक्त नहीं रह पाता।

आज का एक बड़ा संकट यह है कि बुद्धिजीवी की पहचान उसके विचारों से कम और उसके राजनीतिक स्थान से अधिक की जाती है। यदि वह सत्ता की आलोचना करता है तो उसे एक विशेष खेमे का माना जाता है। यदि वह सत्ता के किसी अच्छे कार्य की प्रशंसा कर दे तो दूसरे खेमे में उसका विश्वास संदिग्ध हो जाता है। इसी प्रकार यदि वह विपक्ष की आलोचना करे, तो उसे सत्ता समर्थक घोषित कर दिया जाता है। परिणाम यह होता है कि अनेक बुद्धिजीवी सत्य की अपेक्षा अपनी वैचारिक पहचान बचाने में अधिक व्यस्त दिखाई देते हैं।

सत्ता के साथ बुद्धिजीवी का संबंध भी इसी द्वंद्व से भरा हुआ है। कुछ बुद्धिजीवी सत्ता में केवल अंधकार देखते हैं। उन्हें कोई नीति, कोई योजना, कोई उपलब्धि दिखाई नहीं देती। उनकी दृष्टि में सत्ता का प्रत्येक कार्य संदेहास्पद है। दूसरी ओर कुछ ऐसे भी हैं जिन्हें सत्ता में केवल प्रकाश दिखाई देता है। वे उसकी प्रत्येक भूल का औचित्य सिद्ध करने लगते हैं। दोनों स्थितियाँ बौद्धिक ईमानदारी के विपरीत हैं। कोई भी सत्ता पूर्णतः शुभ या पूर्णतः अशुभ नहीं होती। उसमें उपलब्धियाँ भी होती हैं और विफलताएँ भी। बुद्धिजीवी का दायित्व इसी मिश्रित यथार्थ को पहचानना है।

समाज के साथ भी उसका व्यवहार इसी प्रकार का हो गया है। वह अपने अनुकूल समाज की प्रशंसा करता है और प्रतिकूल समाज को पिछड़ा, अज्ञानी या प्रतिक्रियावादी कहकर छोड़ देता है। जबकि समाज स्वयं अनेक स्तरों, अनेक विरोधाभासों और अनेक संभावनाओं का जीवित संसार है। उसका मूल्यांकन एकरेखीय नहीं हो सकता।

यह स्थिति केवल व्यक्तियों की समस्या नहीं है। इसके पीछे संस्थागत और सांस्कृतिक कारण भी हैं। विश्वविद्यालय, मीडिया, साहित्यिक संस्थाएँ, पुरस्कार, प्रतिष्ठा, आर्थिक संसाधन और सामाजिक स्वीकृति, सभी किसी न किसी प्रकार के वैचारिक दबाव उत्पन्न करते हैं। ऐसे वातावरण में स्वतंत्र रहना कठिन होता जाता है। धीरे-धीरे व्यक्ति अपने विवेक से अधिक अपने समूह की स्वीकृति को महत्त्व देने लगता है। तब सत्य की जगह निष्ठा और तर्क की जगह पहचान प्रमुख हो जाती है।

सोशल मीडिया ने इस संकट को और गहरा किया है। वहाँ संतुलित विचारों की अपेक्षा तीखे वक्तव्य अधिक लोकप्रिय होते हैं। अतिवाद तुरंत ध्यान आकर्षित करता है, जबकि संतुलित विश्लेषण को अक्सर कमजोरी या अवसरवाद समझ लिया जाता है। फलस्वरूप अनेक बुद्धिजीवी जटिल यथार्थ की व्याख्या करने के बजाय एक पक्षीय घोषणाएँ करने लगते हैं।

वास्तव में बुद्धिजीवी की सबसे बड़ी पूँजी उसका विवेक है। यदि वही किसी विचारधारा, दल, सत्ता, संस्था या निजी हित के अधीन हो जाए, तो उसका बौद्धिक अस्तित्व क्षीण होने लगता है। बुद्धिजीवी का अर्थ केवल विद्वान होना नहीं है; उसका अर्थ है सत्य के प्रति उत्तरदायी होना। सत्य कभी किसी एक दल, एक सत्ता, एक विचारधारा या एक समुदाय की निजी संपत्ति नहीं होता। वह अनेक स्तरों पर प्रकट होता है और निरंतर परीक्षा की माँग करता है।

इसलिए आदर्श बुद्धिजीवी वह नहीं है जो हर समय सत्ता का विरोध करे या हर समय उसका समर्थन करे। आदर्श बुद्धिजीवी वह है जो प्रशंसा और आलोचना, दोनों का नैतिक साहस रखता हो। वह अच्छे कार्य का स्वागत करे, चाहे वह विरोधी पक्ष ने किया हो; और बुराई का प्रतिरोध करे, चाहे वह उसके प्रिय पक्ष में ही क्यों न हो। यही बौद्धिक ईमानदारी है और यही विवेक की वास्तविक परीक्षा भी।

आज आवश्यकता निष्पक्ष होने का दावा करने वाले बुद्धिजीवियों की नहीं, बल्कि आत्मालोचन करने वाले बुद्धिजीवियों की है। जो अपने पूर्वाग्रहों को पहचान सकें, अपने निष्कर्षों की पुनः जाँच कर सकें और सत्य को किसी वैचारिक सीमा में कैद न करें। क्योंकि जिस दिन बुद्धिजीवी का पहला दायित्व सत्य के स्थान पर किसी दल, सत्ता या विचारधारा के प्रति हो जाता है, उसी दिन वह बुद्धिजीवी कम और प्रचारक अधिक बन जाता है।


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