
पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखरजी की आज पुण्यतिथि है। दिल्ली के अपोलो अस्पताल में आज ही के दिन उनका निधन 2007 में हुआ था। मेरा उनसे पहली बार परिचय 1983-84 में हुआ था। तबसे लगातार संवाद होता रहा, संबंध बना रहा।
उनसे एक भावनात्मक लगाव इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढाई के दौरान हुआ था। क्योंकि उनके करीबी रिश्तेदार डीके सिंह हमारे सहपाठी थे। पर उनके बारे में वास्तव में जानने-समझने का अवसर मित्र कृपाशंकर चौबे के कारण मिला। फिर संसद में उनको बहुत करीब से देखा समझा।
चंद्रशेखरजी प्रेस की आजादी के प्रबल पक्षधर थे। वे कहते भी थे कि उनका पहला वक्तव्य 1954 में लखनऊ में प्रकाशित हुआ था। तबसे अब तक कोई बता दे कि हमने अपने किसी भी विषय में प्रकाशित खबर का खंडन किया हो। मैं सही मायनों में पत्रकारों की आजादी में विश्वास करता हूं। उनके खिलाफ लिखने वाले बहुत थे, मैने भी काफी कुछ लिखा, पर कभी शिकायत नहीं नहीं की। जब मिले तो तेवर कभी बदला नहीं दिखा।
तमाम मौकों पर चंद्रशेखरजी के साथ मैं देश के बहुत से हिस्सों में गया। संसद को देखने वालों को यह हैरत होती थी कि जिस व्यक्ति के पास न कोई सलीके का संगठन था न सांसदों का संख्याबल, फिर भी उसे इतना अधिक सम्मान कैसे मिल रहा है। सभी दलों के लोग उनको सम्मान देते थे, उनकी कही बातों को बहुत से लोग पत्थर पर लिखी लकीर जैसा समझते थे। सभी दलों में उनके अनुयायी और पक्के भक्त मिल जाते थे।
ऐसा नहीं है कि चंद्रशेखरजी का राजनीतिक जीवन आरोपों से मुक्त था। उनके करीब रहने वाले तमाम लोगों पर भी सवाल उठते थे। लेकिन चंद्रशेखर ने कभी परदे की पीछे की राजनीति नहीं की। अच्छे हों या बुरे जो उनके साथ थे वे साथ थे। बागी बलिया का उनका तेवर जीवन भर कायम रहा। आर्थिक नीतियों पर उनके विचार कभी बदले नहीं।
चंद्रशेखरजी चिट्ठियां खूब लिखते थे और उसमें खरी-खरी बातें लिखने में संकोच नहीं करते थे। मेरे पास भी उनकी कई चिट्ठियां हैं. किसी खास मौके पर उसका उपयोग करूंगा।
चंद्रशेखरजी 1962 में प्रजा सोशलिस्ट पाटी से राज्यसभा सदस्य बने तो अपने पहले ही भाषण में पंडित जवाहर लाल नेहरू का मन जीत लिया। पंडितजी ने अपने पास में बैठे राजा दिनेश सिंह से पूछा कि ये दाढी वाला नौजवान कौन है ? नेहरूजी किसी के बारे में अनायास नहीं पूछते थे। उन्होंने तभी जान लिया था कि आने वाले समय में उनकी एक विशिष्ट भूमिका होगी।
संसद के दोनों सदनों में उन्होंने आम आदमी की आवाज मुखरित की। वे उनके प्रवक्ता और मजबूत आवाज बने रहे। उनकी राजनीतिक शक्ति सीमित थी, पर बुनियादी सवालों पर उऩकी आवाज दूर तक जाती थी। शालीनता के साथ वे हर शब्द नाप-तौल कर बोलते थे। गांव गरीब औऱ कमजोर तबके उनके एजेंडे में रहते थे।
चंद्रशेखरजी संसद में बोलने लगते थे तो पूरे सदन में सन्नाटा पसर जाता था। हर सांसद उनकी बातों को गौर से सुनता था।
उनकी संसदीय पारी लंबी और चार दशकों से अधिक समय की रही। दोनों सदनों में अपने भाषणों और कार्यकलापों से चंद्रशेखरजी ने संसदीय गरिमा को विस्तार दिया।
उत्कृष्ट सांसद पुरस्कार की स्थापना के बाद जब आरंभिक बैठक हुई तो सबकी राय थी कि पुरस्कार का आरंभ चंद्रशेखरजी को सम्मानित करने के साथ होना चाहिए।
समय के साथ बहुत बड़े-बड़े राजनेताओं के विचार बदलते रहे हैं लेकिन चंद्रशेखरजी अपनी कही बातों पर कायम रहते थे।
धारा के खिलाफ खड़े होने के बाद भी वे लगातार मुख्यधारा में बने रहे। वे वह सब कहने का साहस रखते थे जिससे उनका नुकसान हो तो होता रहे। इन बातों की वे परवाह नहीं करते थे। समाजवादी धारा के अपने साथियों के मदद के प्रति वे हमेशा तत्पर रहे।
वे मानते थे कि संसदीय लोकतंत्र को हम तभी सुचारू रुप से चला सकते हैं जब आपसी विचार विमर्श हो। और एक-दूसरे के विचारों को यथासंभव समाहित कर हम उसे आगे बढाएं।
चंद्रशेखरजी ने ही संसद में पहली बार औद्योगिक घरानों के एकाधिकार के खिलाफ 1966 में आवाज उठायी, जबकि वे सत्ता दल के साथ थे। इस मसले पर काफी हंगामा हुआ और हजारिका आयोग बैठा। राजाओं-महाराजाओं के प्रिवी पर्स की समाप्ति और बैंकों के राष्ट्रीयकरण में भी उनकी भूमिका रही। चंद्रशेखरजी के राजनीतिक आदर्श महान नायक आचार्य नरेंद्र देव थे। जब तक चंद्रशेखरजी जीवित रहे आचार्य जी को याद करते रहे।
आचार्य जी की शताब्दी के मौके पर एक बड़ा आयोजन चंद्रशेखरजी ने किया था जिसमें राजीव गांधी और समाजवादी दिग्गजों का जमावड़ा भोड़सी में हुआ था। मैं भी उस मौके पर गया था।
चंद्रशेखऱजी ने देश के करीब सभी हिस्सों को बहुत करीब से देखा था। उनकी भारत यात्रा ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा। 1983 में उन्होंने पैदल 4260 किमी की भारत यात्रा की थी तो तमाम हिस्सों की जमीनी हकीकत को करीब से देखा। 1945 से 2007 तक का चंद्रशेखरजी का राजनीतिक जीवन बहुत कुछ बताता है।
पूर्व केंद्रीय मंत्री कल्पनाथ राय को जेल हुई तो उनके पक्ष में खड़े होने वाले वे पहले नेता थे। चंद्रशेखर जी संवाद के पक्षधर थे। उन्होंने इसी सूत्र से तमाम अनसुलझी पहेलियों को सुलझाने की कोशिश की।
मै कई बार बाहर उनके साथ दौरों पर गया। कई बार बलिया और और भुवनेश्वरी आश्रम में भी गया। कई समारोहों को भी देखा।
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