आज चन्द्रशेखर जी का जन्मदिन है. सुबह से मन उदास है. उसके अपने कारण हैं. परसों ही चन्द्रशेखर जी के सचिव रहे यादव जी का फोन आया था. हमेशा की तरह इस बार भी पूछा- दो लाइन लिखेंगे. सवाल है- क्या लिखा जाए?
29 जुलाई, 1997 की शाम पहली बार दो वरिष्ठ पत्रकारों- विजय सांघवी और संघ पर बेहतरीन पुस्तकों के लेखक डीआर गोयल के भाई नरेंद्र गोयल के साथ चन्द्रशेखर जी से मिला और उसी दिन उन्होंने अपनी पत्रिका साप्ताहिक ‘यंग इंडियन’ का दायित्व मुझे सौंप दिया. तब से एक दशक तक बाद तक की बहुत-सी बातें/यादें /घटनाएँ/सवाल हैं, जिन्हें साझा करने का मन है. इस साल वह सब टुकड़े-टुकड़े करके साझा करने की कोशिश होगी. आज इससे ज्यादा कुछ नहीं लिख सकूँगा.
एक दशक की इन यादों में कई घटनायें हैं, सवाल हैं.
पहला तो यही, कि चंद्रशेखर जी का वह कौन-सा निर्णय था जिसने साप्ताहिक पत्रिका ‘यंग इंडियन’ के भविष्य को सर्वाधिक प्रभावित किया? वह कौन शख्स था, जिसके कारण ठीक-ठाक चल रही और भविष्य में आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ रही यंग इंडियन का स्तर एकाएक गिरने लगा और आख़िरकार उसे बंद करना पड़ा? कौन था जिसने अपने निजी स्वार्थ के लिए यंग इंडियन की टीम को एक-एक करके तोड़ दिया जिसमें देश के जाने माने पत्रकार शामिल थे? उनके परिवार का ऐसा कौन-सा शख्स था, जिसने साल 2002 में जब उनका स्वर्णजयंती समारोह मनाया जा रहा था, उन्हेंं कई लोगों के बीच डांट दिया था और वह कुछ नहीं कह सके थे? कौन था, जो यंग इंडियन के कंप्युटर और अलमारी तक उठा कर ले जाना चाहता था? कौन था, जो नहीं चाहता था कि यंग इंडियन हिन्दी में कभी प्रकाशित ही न हो, सिर्फ़ अंग्रेजी में हो? कौन उद्योगपति था जो यंग इंडियन के बहाने नरेंद्र निकेतन की ज़मीन पर कब्ज़ा करना चाहता था और इसके लिए मुझे लालच देने का काम किया? कौन लोग थे जिन्होंने निजी स्वार्थ के लिए नरेंद्र निकेतन पर बुलडोजर चलवा दिया? चन्द्रशेखर जी का वह कौन-सा रिश्तेदार था जो राजगीर में समाजवादी जनता पार्टी के राष्ट्रीय अधिवेशन के दौरान यंग इंडियन की बिक्री के पैसे डकार गया? वह कौन-सा जन्मदिन था जिस दिन चन्द्रशेखर जी उदास थे? उस उदासी का क्या कारण था? यंग इंडियन को युवा भारत ट्रस्ट में लाने की वज़ह क्या थी? युवा भारत ट्रस्ट में ट्रस्टियों को क्यूँ बदला गया?
और, सबसे बड़ा सवाल – वह कौन शख्स था जिसने चंद्रशेखर जैसी शख्सियत से उनकी किताबों के प्रकाशन के लिए उनकी जेब से लाखों रुपये निकलवा लिए? इसके अलावा भी ऐसी कई घटनाएँ हैं जिनका जिक्र आगे किया जाएगा.
बहरहाल, आज से चन्द्रशेखर जी का जन्मशती वर्ष शुरू हो रहा है. देश भर में आयोजनों की शुरुआत हो चुकी है, जो देश के अलग-अलग हिस्सों में साल भर चलेंगे. कुछ लोग इसे उनकी जन्मशती के तौर पर देख रहे हैं. लेकिन ऐसा नहीं है. तकनीकी तौर पर यह उसकी शुरुआत है. आज यदि वे जिवित होते तो 99 वर्ष के होते.
चन्द्रशेखर पर इतना कुछ लिखा जा चुका है. नया शायद लोगों की निजी स्मृतियों और अनुभवों में ही बचा रह गया है. घुमा फिरा कर वही बातें /राजनीतिक घटनाएँ दोहराने का कोई अर्थ नहीं. वह ऐसे थे, वैसे थे, उन्होंने ऐसा किया, वैसा किया. यह सभी लिखते आ रहे हैं और आगे भी लिखा जाता रहेगा. मैं ऐसा कुछ नहीं लिखूँगा. मैं कुछ घटनाओं / संस्मरणों को साझा करने की कोशिश करूँगा जो मेरे सामने घटित हुए या जिनसे किसी न किसी रूप में जुड़ा रहा. साथ ही कुछ ज़रूरी सवाल भी.
सच तो यह है कि चंद्रशेखर अपने परिवार या करीबियों के कारण ही लोगों की स्मृतियों में नहीं हैं. बल्कि, ऐसे अनेक लोगों के कारण हैं जो बहुत नजदीक न रहने के बावज़ूद उनकी वैचारिक मशाल बने हुए हैं. ऐसे कई लोगों से संवाद होता रहता है.
आज सुबह जब सोच रहा था कि कुछ लिखूँ कि नहीं, चन्द्रशेखर से जुड़े रहे लोगों के राजघाट पर उनके समाधि स्थल पर चल रहे कार्यक्रम के दौरान फोन आए. कुछ से तो सालों बाद बात हुई. अच्छा लगा कि लोगों ने मुझे वहाँ याद किया और एकदूसरे से फोन नंबर लेकर बात की. कुछ मित्रों को शिकायत रही कि मैं क्यूँ बैंगलोर में बैठा हूँ, मुझे आज दिल्ली होना चाहिए था. मेरे पास जवाब है. लेकिन कुछ सवालों का जवाब होते हुए भी देते नहीं बनता.
चन्द्रशेखर जी के छोटे बेटे नीरज, जो अब भाजपा में हैं और राज्यसभा सांसद हैं, भी एक कार्यक्रम करवा रहे हैं. पता चला कि भाजपा के दो होनहार नेता निशिकांत दुबे और गिरिराज सिंह भी आज वहाँ थे. सुनने में आया है कि वह एक अन्य कार्यक्रम में गृहमंत्री अमित शाह को बुलाने के लिए लालायित हैं. कुछ और लोग भी कुछ-कुछ तरह के आयोजन कर चन्द्रशेखर जी को याद कर रहे हैं. आज ही दिल्ली में 3 कार्यक्रम हो रहे हैं. बलिया में भी आज कार्यक्रम की सूचना है. एक अगले महीने होना है. उसके बाद के महीनों में भी कार्यक्रम होने हैं. बलिया से निमंत्रण मुझे भी है, लेकिन जा पाना फ़िलहाल सम्भव नहीं दिख रहा है. हालाँकि बलिया जाने का मन है.
कुछ महीने पहले की बात है. नीरज शेखर से फोन पर तीखी बहस हो गई. नीरज का कहना था कि आप सभी ने चंद्रशेखर को भुला दिया. एक-एक करके उसने तमाम छोटे-बड़े नाम गिना दिए. मुझे यह सुनकर बहुत बुरा लगा. मैंने साफ़ कहा – चंद्रशेखर को याद करने या भुला देने के लिए किसी को न तो आपकी तरह भाजपा का झंडा उठाना ज़रूरी है और न ही किसी ज़मीन या ट्रस्ट को लेकर मारामारी करना या कोर्ट कचहरी के झगड़ों में उलझना.
नीरज शेखर ऐसा कभी नहीं था. मैं उसको 1997 से देखता आ रहा हूँ. मैं स्वयं उसको पसंद करता रहा हूँ. यह वही नीरज है, जिसके भविष्य को लेकर चन्द्रशेखर जी को मैंने लोगों से बात करते और परेशान होते देखा था. लेकिन सोहबत और राजनीति व्यक्ति को बदल देती है. वह चाहे जिस दल में रहे लेकिन इस तरह के आरोप लगाना सही नहीं. हमने तो दिया ही, लिया कभी कुछ नहीं. जिन्होंने लिया उनपर आरोप लगाएं तो बात समझ आती है.
आचार्य नरेंद्र देव निकेतन गिरा या गिरवा दिया गया. उसे बचाने के लिए कौन आगे आया? चन्द्रशेखर भवन को लेकर जो कुछ हुआ या हो रहा सबके सामने है. सुनने में तो यह भी आया है कि चन्द्रशेखर के कुछ क़रीबी लोग चन्द्रशेखर भवन को पीछे के रास्ते संघ के किसी संगठन के हवाले करना चाहते हैं.
जन्मदिन पर समाधि पर जाकर फूल चढ़ा देने या किसी वातानुकूलित भवन में बड़े लोगों को आमंत्रित कर किसी मंत्री/प्रधानमंत्री के साथ फोटो खिंचवा लेना और उससे अपने स्वार्थ सिद्ध करने की कोशिश अलग बात है और किसी के राजनीतिक विचारों को आगे बढ़ाना अलग.
जब नरेंद्र निकेतन पर बुलडोजर चला. तमाम ज़रूरी दस्तावेज़ और पुस्तकें सड़क पर बिखेर दी गई. उनसे जुड़ी कितनी चीजें थीं. कौन आगे आया उन्हेंं ले जाने के लिए? कुछ सामान ज़रूर कमल मुरारका जी की कोठी पर पहुँचा. लेकिन अधिकांश चीज़ें वहीं बिखरी पड़ी रही. चूँकि इन चीजों की ज़मीन /ट्रस्ट /राजनीतिक लाभ जैसी कोई अहमियत नहीं थी.
जिस दिन बुलडोजर चला (शायद साल 2020 की 14 फरवरी का दिन था) चन्द्रशेखर जी की पार्टी में कई दशकों से पार्टी सुपरिटेंडेंट रहे रावत जी ने लगभग रोते हुए मुझे फोन पर कहा- अत्रि जी, बताइए हम लोग अब कहाँ जाएं? सोहन सिंह रावत प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के ज़माने (1968) से जुड़े हुए थे. नरेंद्र निकेतन, यंग इंडियन या बाद के सालों में उनकी पार्टी का कार्यालय भर नहीं था. उसका शिलान्यास अरुणा आसफ अली के कर कमलों द्वारा हुआ था. वह चंद्रशेखर और समाजवादी वैचारिकी का एक ऐसा स्थल था, जहाँ से कई तरह के राजनीतिक और सामाजिक विचारों ने जन्म लिया. समकालीन समाजवादी आन्दोलन का एक इतिहास उससे जुड़ा था. वह इतिहास उस दिन आपसी झगड़ों और स्वार्थों की भेंट चढ़ गया.
विडंबना देखिए कि उनमें से कई लोग आज उनके जन्मशती कार्यक्रम का हिस्सा हैं. और, भुला हम जैसे लोगों ने दिया! ये वही लोग हैं जिन्होंने चन्द्रशेखर जी का वही और उतना ही सम्भाला जितना उनके लिए ज़रूरी था. बाक़ी सब लुटने-पिटने के लिए छोड़ दिया गया. कितने लोगों ने उनकी या उनपर लिखी सामग्री को सहेज कर रखा? कितने लोगों ने यंग इंडियन की सड़क पर बिखरी प्रतियों को सम्भाल कर रखा?
आज आपको बता दूँ, रोड पर बिखेर दिए गए उस सामान में वह कुर्सी-टेबल भी शामिल थी, जिस पर कभी चंद्रशेखर जी बैठा करते थे? ऐसे लोगों के साथ कैसे किसी मंच पर जाकर खड़ा हो जाऊँ?
ऐसी बातों से तब भी पीड़ा होती थी, आज भी होती है. पीड़ा होनी भी चाहिए.
उधर, कई लोग आज भी हैं, जो अपने तरीके से चंद्रशेखर जी की स्मृतियों को जिंदा रखे हुए हैं. इसी कड़ी में एक नाम प्रमुखता के साथ मेरे दिमाग में आता है वह चन्द्रशेखर जी के निजी सचिव रहे आरबी यादव का. बेहद विनम्र और सुलझे हुए इंसान. गौतम के बाद चन्द्रशेखर जी को जैसे सचिव की ज़रूरत थी, यादव जी वैसे ही हैं. 2008 से लेकर आज तक एक बार छोड़ दें, तो कोई साल नहीं गया होगा कि उनकी जयंती या पुण्यतिथि पर यादव जी ने मुझे फोन न किया हो. हर साल हम इन दिवसों या उनकी पूर्व संध्या पर उन्हें याद करते हुए उनकी अनेक यादों और बातों को साझा करते आ रहे हैं. ऐसा करते समय वह आज भी भावुक हो जाते हैं. पिछले एक अर्से से उनकी तबीयत थोड़ी खराब रहती है.
दूसरा नाम ठाकुर सूर्य कुमार सिंह का है. उत्तर प्रदेश के बहराइच भारत यात्रा केंद्र के संचालक हैं. अक्सर फोन पर बात होती है. तमाम दबाव के बावज़ूद वह अभी तक डिगे नहीं. चन्द्रशेखर की राजनीतिक वैचारिकी को आगे बढ़ाने में उनका अपना योगदान है. भले राजनीति में उस तरह आगे न बढ़े हों. ओम प्रकाश श्रीवास्तव जी अलावा चन्द्रशेखर के अलावा जिन 2 लोगों में मुझे पुस्तकें पढ़ने की भूख दिखाई दी उनमें सूर्य कुमार जी के अलावा राम गोविन्द चौधरी जी (आजकल समाजवादी पार्टी में) हैं. अक्सर यंग इंडियन के कार्यालय आते तो पढ़ने के लिए पुस्तकें मांग कर ले जाते थे. आज के दौर में कहाँ ऐसे नेता हैं. ऐसे ही एक फक्कड़ गोरखपुर से आने वाले श्याम जी त्रिपाठी हैं. वह चन्द्रशेखर जी की पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. एक दौर था जब पार्टी में यदि कोई युवा नेता किसी के साथ बैठना पसंद करता था तो वह त्रिपाठी जी ही थे. ऐसे और भी बहुत नाम हैं. हालाँकि अपने स्वभाव के कारण, मेरा जुड़ाव उनसे जुड़े राजनीतिक लोगों से कम ही रहा.
एक और नौजवान सतेन्द्र सिंह मुझे याद आ रहा है, जिसने युवा संवाद के जरिए देशभर के विश्वविद्यालयों में कार्यक्रम का आयोजन करवा कर नौजवानों को चन्द्रशेखर से जोड़ने का बीड़ा उठाया था. आजकल वह अखिल भारतीय पंचायत परिषद के राष्ट्रीय महासचिव हैं. इस संगठन की नीव जय प्रकाश नारायण और बलवंत राय मेहता सहित कुछ अन्य लोगों ने रखी थी. सतेन्द्र सिंह के दिमाग में आज भी चंद्रशेखर को लेकर किसी न किसी कार्यक्रम की रूपरेखा चलती रहती है. मैं भी उस संवाद कार्यक्रम का हिस्सा रहा. उस पर फिर कभी बात होगी. बलिया के एक वरिष्ठ पत्रकार हैं अखिलेश का नाम याद आ रहा है जो वहाँ रहकर चन्द्रशेखर जी पर हमेशा ही कुछ न कुछ नया करने का सोचते रहते हैं. इन सब लोगों से निरंतर संवाद होता है.
अनेक और लोग हैं, जिनका जिक्र अगले हिस्से में किया जाएगा. कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनके नाम और चेहरे से कोई वाकिफ़ नहीं होगा. राजनीति में रिश्ते सिर्फ़ ख़ून के ही नहीं होते.
सच तो यह है, चन्द्रशेखर जी ने अपने जीवनकाल में घर-कुनबे से लेकर मित्रों और चेलों के आँगन में कई ‘समाजवादी पौधे’ रोपे. बलिया में उनके घर से लेकर दिल्ली में राज्यसभा के सिंहासन तक, वे सभी आज ‘संघी फलों’ से लदे झूम-झूम कर, फासीवादी ताक़तों के हरावल दस्ते में शामिल हो, नव-समाजवादी आन्दोलन को नई दिशा दे रहे हैं.
ऐसे कुछ लोगों के लिए चन्द्रशेखर अलादीन का चिराग हैं, जिसे वह लोग जब मन करता है घिसकर अपना राजनीतिक या अन्य किस्म का स्वार्थ पूरा करने की कोशिश करते रहते हैं. अपने राम ने ऐसी कोई कोशिश उनके जीवित रहते नहीं की. अब क्या ही करेंगे.
(जारी….)
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