क्या गांधी का रास्ता बेअसर हो गया है? सोनम वांगचुक का अनशन और लोकतंत्र का संकट

0
Sonam Wangchuk

— राम दत्त त्रिपाठी —

क्या भारत में महात्मा गांधी के शांतिपूर्ण सत्याग्रह और अहिंसक विरोध का रास्ता अब बेअसर हो गया है? यह सवाल आज देश के राजनीतिक और अकादमिक हलकों में गूंज रहा है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के वरिष्ठ समाजशास्त्री प्रोफेसर आनंद कुमार के साथ हाल ही में हुई एक विस्तृत चर्चा में यह उभरकर सामने आया कि हम एक ऐसे युग में हैं जहाँ सरकारें संवाद के बजाय मौन और हठधर्मिता को प्राथमिकता दे रही हैं।

सत्याग्रह बनाम सरकारी हठधर्मिता

पिछले कुछ वर्षों में हमने देखा है कि किसानों के आंदोलन से लेकर सोनम वांगचुक के वर्तमान अनशन तक, सरकार का रवैया अक्सर उपेक्षापूर्ण रहा है। सोनम वांगचुक, जो पिछले कई दिनों से शांतिपूर्ण अनशन पर हैं, अपनी मांगों के समर्थन में सरकार से संवाद की अपील कर रहे हैं। प्रोफेसर आनंद कुमार कहते हैं, “सोनम वांगचुक गांधी की शैली में मित्र और शत्रु की भाषा नहीं बोल रहे हैं। वे केवल प्रश्न का समाधान चाहते हैं। सरकार का उन पर ध्यान न देना एक प्रकार की ‘पॉलिसी पैरालिसिस’ (नीतिगत पक्षाघात) का संकेत है।”

क्या संसद और अदालतें निष्प्रभावी हो गई हैं?

डेमोक्रेसी में विरोध के तीन मुख्य रास्ते माने जाते हैं—संसद, सड़क और अदालत। दुर्भाग्यवश, आज ये तीनों ही माध्यम चुनौतियों से घिरे हैं।
* संसद: विधानसभाओं और संसद में विपक्ष को बोलने का पर्याप्त अवसर नहीं मिल रहा है।
* सड़क (सत्याग्रह): शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों को सत्ताधारी दल द्वारा अक्सर ‘राष्ट्र-विरोध’ या ‘अराजकता’ का नाम देकर खारिज कर दिया जाता है।
* अदालत: न्यायपालिका से जो उम्मीदें थीं, वे भी जनमानस में कहीं न कहीं कमजोर होती दिख रही हैं, जिससे नागरिकों का मोहभंग हो रहा है।

सत्ता का अहंकार और नैतिक उत्तरदायित्व

प्रोफेसर आनंद कुमार का मानना है कि आज की राजनीति में अकाउंटेबिलिटी (जवाबदेही) का भारी अभाव है। शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में पेपर लीक और प्रशासनिक विफलता के बावजूद जिम्मेदार मंत्रियों द्वारा नैतिक जिम्मेदारी न लेना यह दर्शाता है कि सत्ता का अहंकार लोकतांत्रिक मूल्यों पर भारी पड़ रहा है।

उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा, “अगर शांतिपूर्ण सत्याग्रह के रास्तों को कुचला गया, तो देश में अराजकता की ताकतों को बल मिलेगा। सरकार को जीडी अग्रवाल जैसे वैज्ञानिकों की दुखद मृत्यु से सीख लेनी चाहिए और सोनम वांगचुक के साथ संवाद का मार्ग प्रशस्त करना चाहिए।”

मीडिया की भूमिका और ‘कायरता का दौर’

चर्चा के दौरान यह बात प्रमुखता से उठी कि आज का मुख्यधारा का मीडिया सरकार का आईना बनने के बजाय ‘सेवक’ की भूमिका में आ गया है। प्रोफेसर आनंद कुमार ने कहा, “पहले के संपादक अपनी स्वायत्तता और आत्म-गौरव के लिए जाने जाते थे। वे सरकार को आईना दिखाते थे, लेकिन आज का मीडिया सरकार की चाटुकारिता में लगा है। जनता का पक्ष रखने वाली जगह खाली है।”

रास्ता अभी बंद नहीं हुआ है

निष्कर्ष के तौर पर, प्रोफेसर आनंद कुमार ने देश के युवाओं और बुद्धिजीवियों से आग्रह किया है कि वे निराश न हों। गांधी का सत्याग्रह केवल एक आंदोलन नहीं, बल्कि समाज के विवेक को जगाने का माध्यम है। उन्होंने 20 जुलाई को प्रस्तावित संसद मार्च के आह्वान का समर्थन करते हुए कहा कि हमें गांधी, जेपी, और लोहिया की विरासत को बचाए रखना है।

यह समय है जब नागरिकों को एक साथ आकर सत्य के प्रति अपना आग्रह व्यक्त करना चाहिए। सोनम वांगचुक का आंदोलन केवल एक व्यक्ति की मांग नहीं है, बल्कि यह भारत के लोकतंत्र, शिक्षा व्यवस्था और पर्यावरण की रक्षा के लिए एक सामूहिक नैतिक संघर्ष है।

सरकार को यह समझना होगा कि लोकतंत्र संवाद से चलता है, अहंकार से नहीं। जैसा कि इतिहास गवाह है, जो सत्ता जनता की आवाज को अनसुना करती है, वह अंततः अपना आधार खो देती है।


Discover more from समता मार्ग

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Leave a Comment