
1967 में हरियाणा विधानसभा के एक विधायक आया राम ने दो हफ्ते में तीन बार दल बदल किया था। वह रिवायत आज भी जारी है। दिल्ली के एक भूतपूर्व विधायक तथा बाद में पंजाब से राज्यसभा के सदस्य द्वारा आम आदमी पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल होने पर इसकी हिमायत तथा मुखालफत पर जोरों से सोशल मीडिया में बहस जारी है। अभी हाल में बंगाल में बने मुख्यमंत्री, भूतपूर्व मुख्यमंत्री के खासमखास थे। एक वक्त राहुल गांधी की कदमबोसी करने वाले राजनेता अब असम के मुख्यमंत्री बनकर राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी पर जमकर हमला बोल रहे हैं। और यह सिलसिला नया भी नहीं है। एक अनुमान के मुताबिक 1967 से 1971 तक 4000 विधायकों तथा संसद सदस्यों ने दल बदल किया था।
जिस इंसान का सियासत से दूर-दूर का भी रिश्ता नहीं रहा, तमाम जिंदगी ऐश-इशरत, भोग-विलास में डूबा रहा, जैसे-तैसे हजारों, लाखों, करोड़ों रुपए का साम्राज्य खड़ा कर लिया। नौटंकी उसकी सबसे बड़ी योग्यता रही। एक रात में मुख्यमंत्री के पद तथा केंद्र में मंत्री बन जाता है। बहुमत न भी हो, जुगाड़ से बहुमत पा लेता है। शुरुआत में रेवड़ी बांटने के सुंदर सपने, बेरोजगारी, भुखमरी, बदहाली को चुटकी में खत्म करने का जादुई चिराग जला देता है। जात, मजहब, क्षेत्रीयता के खंभों पर पैर जमा कर जननेता का तमगा भी पा लेता है। फिर कुछ दिन या सालों के बाद क्या होता है, वह बतलाने की जरूरत नहीं।
इसके उलट, जो कार्यकर्ता अपनी विचारधारा से बंधकर तमाम उम्र उसके प्रचार में लगे रहने के बावजूद किसी विधायी पद पर न पहुंचकर मुफलसी, बदहाली के हालात में जिंदगी जी रहे हैं, उनका कैसा-कैसा मजाक, खिल्ली उन लोगों के द्वारा उड़ाई जाती है, जिन्होंने विचारधारा नाम की चिड़िया को अपने पास फटकने ही नहीं दिया। स्वाभिमान किस बला का नाम है, पैर पकड़ने में क्या हर्ज है, दल बदल क्या फालतू बकवास है, जहां काम सिद्ध होता है वहां सजदा करने में क्या हर्ज है। पद और पैसा मिलने पर यह तबका सबसे ज्यादा हिकारत की नजर से वक्त-बेवक्त ज्ञान के कुल्ले करते हुए, उपहास उड़ाते हुए नजर आता है।
दूसरी तरफ, घर-परिवार, रिश्तेदार, दोस्तों को छोड़िए, आम लोग भी उन्हें बेचारे से ज्यादा कुछ नहीं समझते। एक आस्थावान राजनीतिक कार्यकर्ता के लिए धारणा बन गई है कि इस बेचारे का दांव नहीं लगा, इसलिए सड़क पर चप्पल घिस रहा है। आज सियासत शोहरत और दौलत कमाने का सबसे आसान जरिया है, बशर्ते सिद्धांत, नीति, कार्यक्रम, विचारधारा, मान-सम्मान, लोक-लाज को खूंटी पर टांग दें।
आज के राजनीतिक माहौल में विचारधारा से बंधे इंसान को किस वेदना से गुजरना पड़ता है, इसका अंदाजा गैर-राजनीतिक लोग नहीं लगा सकते।
सवाल उठता है कि क्या सारा राजनीतिक माहौल एक जैसा है? मेरी एक पुरानी पोस्ट, जो आज भी मेरे नजरिए से ताजा है, उसको नत्थी कर प्रेषित कर रहा हूं।
सियासत में सौदागर
बनाम
विचारधारा से बंधे कार्यकर्ता!
प्रोफेसर राजकुमार जैन
आज के वक्त में, जब सियासत में विचारधारा कपड़े बदलने की तरह बन गई है, बरसों-बरस केंद्र में मंत्री, राज्य में मुख्यमंत्री, पार्टी के अध्यक्ष, एमपी, एमएलए थोक में पार्टी बदलने का हर रिकॉर्ड तोड़ रहे हैं, तो आम लोगों में भी यह भावना गहरे से बन रही है कि सियासत में कोई दीन-ईमान नहीं, राजनीति दौलत और शोहरत कमाने का सबसे आसान जरिया बन गई है। आम लोग खद्दर का कुर्ता-पाजामा पहनने वाले कार्यकर्ताओं को अच्छी नजर से नहीं देखते। उनको धंधेबाज तथा जो किसी पद पर अभी तक नहीं पहुंच पाए, भाव यह है कि इस बेचारे का दांव नहीं लगा, कोशिश में लगा है।
परंतु क्या यह हकीकत है? सियासत में क्या सब बेपेंदी के लोटे हैं? इसकी पड़ताल करना जरूरी है। मेरे तजुर्बे और नजरिये में इससे उलट एक दूसरी तस्वीर भी है, हालांकि उसकी तादाद जरूर कम होती जा रही है।
मेरे 60 साल के सियासी सफर में अनेकों ऐसे उदाहरण हैं, जहां राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने अपनी तमाम जिंदगी एक विचारधारा से बंधकर गुजार दी। विचारधारा के कारण कितनी भी दुश्वारियां, कठिनाइयां, जुल्म सहने पड़े, परंतु किसी तरह का डर, सत्ता की आकांक्षा, अथवा किसी भी प्रकार की सुख-सुविधा का लालच उनकी जिंदगी में देखने को नहीं मिला। उसकी सबसे बड़ी खासियत इस बात में रही कि यह बात किसी एक विचारधारा, पार्टी तक ही महदूद नहीं रही। यूं तो सैकड़ों ऐसे लोगों की जानकारी मुझे है।
फिलहाल दिल्ली के ऐसे चंद लोग, जिनके साथ पिछले 40-50-60 सालों से मेरा ताल्लुक रहा है, जिन्होंने अपनी तमाम जिंदगी अपनी विचारधारा, पार्टी के साथ गुजार दी। यही नहीं, वे उच्च शिक्षित, अपने-अपने पेशे में नामवर तथा प्रतिष्ठित भी रहे हैं, उनका जिक्र कर रहा हूं।
भारतीय जनता पार्टी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रोफेसर राजकुमार भाटिया, जिन्हें मैं तकरीबन 55 साल से जानता हूं। दिल्ली यूनिवर्सिटी में भाजपा के यूथ संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की जड़ें जमाने से लेकर देशभर में विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री के रूप में संगठन को बनाने और सक्रिय करने में उन्होंने अपना जीवन लगा दिया। दिवंगत अरुण जेटली को राजनीति में दाखिल तथा स्थापित करने में इनकी मुख्य भूमिका रही है। नरेंद्र मोदी जब गुजरात में एक स्थानीय युवक नेता के रूप में थे, उस समय भाटिया राष्ट्रीय स्तर पर संगठन को तैयार करने में लगे रहते थे। आपातकाल में हम लोगों ने मीसाबंदी के रूप में जेल में जीवन बिताया। आज केंद्र में उनकी पार्टी की सरकार है, उनके जूनियर केंद्र से लेकर राज्यों में बड़े-बड़े पदों पर काबिज हैं, परंतु राजकुमार भाटिया आज भी संगठन के कार्य में जुटे रहते हैं। आज तक उन्होंने कोई सार्वजनिक चुनाव नहीं लड़ा।
विजय क्रांति 60 के दशक में किरोड़ी मल कॉलेज के छात्र थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विद्यार्थी परिषद में सक्रिय विजय क्रांति ने तिब्बत मुक्ति आंदोलन का फोटोग्राफी के माध्यम से प्रचार करने में अपनी जिंदगी लगा दी।
कांग्रेस के श्री हरचरण सिंह जोश तमाम उम्र कांग्रेस के झंडे को कंधे पर ढोते रहे। दिल्ली यूनिवर्सिटी में 58 साल पहले हमने एक-दूसरे के खिलाफ दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्रसंघ के अध्यक्ष का चुनाव लड़ा था। 1984 में दिल्ली में सिखों के नरसंहार के बाद सिख समुदाय में कांग्रेस पार्टी के लिए नफरत का माहौल था। खुद हरचरण सिंह जोश पर प्राणघातक हमला केवल इसलिए नाकाम हुआ क्योंकि गैर-सिख समाज के उनके पड़ोसी, जो उनके मुरीद थे, उन्होंने ढाल बनकर उनकी हिफाजत की, वरना इनका बचना मुश्किल था। ऐसे माहौल में रहकर भी वे कभी कांग्रेस पार्टी से एक पल के लिए भी अलग नहीं हुए।
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय कमेटी के प्रमुख सदस्य मेरे सहपाठी जोगेंद्र शर्मा दिल्ली यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर थे। पार्टी के कार्य के लिए उन्होंने वॉलंटरी रिटायरमेंट लेकर अपनी सारी जिंदगी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के संगठन में लगा दी। किसी भी तरह के वैधानिक पद की ओर उन्होंने झांका भी नहीं। पार्टी कार्यालय ही उनका मरकज बना रहा। यह जानने के बावजूद कि मार्क्सवादी पार्टी से किसी भी बाहरी पद की मिलने की कोई गुंजाइश दिल्ली में न कभी थी और न फिलहाल दिखाई देती है।
दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ के दो भूतपूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर मुरली मनोहर प्रसाद सिंह तथा डॉ. अमरदेव शर्मा जैसा वैचारिक आस्था में निष्ठा रखने वाले होना कोई साधारण बात नहीं।
…
यह तो मैंने चंद साथियों का ही जिक्र किया है। ऐसे अनेकों साथी हैं, जिन्होंने कभी भी अपनी समाजवादी निष्ठा से अलगाव नहीं किया।
विडंबना यह है कि जो कार्यकर्ता अपनी विचारधारा से बंधे रहे, उनकी चर्चा न होकर जो सियासत में तिजारत, एक तरह का व्यापार करते रहे कि कहां फायदा होगा, वे ही तिकड़मबाजी करके सत्ता प्राप्त कर लेते हैं। समाज में भी उनकी ही शख्सियत बनी रहती है।
परंतु लुब्बे-लुबाब यह है कि इस सब मूल्यहीनता के बावजूद, जो कार्यकर्ता अपने ईमान पर अडिग रहे, उन्हें आंतरिक संतुष्टि तथा आनंद की अनुभूति सदैव रही, बनिस्बत उनके जो बड़े से बड़े पद पर रहे, परंतु पद से हटने पर उनकी बेचैनी, बौखलाहट, उदासी तथा सामाजिक अलगाव से उनको कभी भी निजात नहीं मिल पाती है।
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