वांगचुक को कोसिए, सत्याग्रह को नहीं – अरुण कुमार त्रिपाठी

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Sonam Wangchuk

Arun Kumar Tripathi
कृतघ्नता दिल्ली के स्वभाव में है। चूंकि दिल्ली भारत की राजधानी है इसलिए वह स्वभाव एक चरित्र बनकर पूरे देश में व्याप्त हो गया है। इसीलिए ‘जनसत्ता’ अखबार के संस्थापक संपादक प्रभाष जोशी का यह कथन बहुत मौजूं है कि दिल्ली उसकी जो इसे जीत ले। वह अपने पिछले शासकों और पुरखों को भुलाने में ज्यादा समय नहीं लगाती। शायद यही वजह है कि भले लद्दाख के इंजीनियर और शिक्षाविद सोनम वांगचुक के 26 दिन तक अनशन करने के बाद काकरोच जनता पार्टी के परीक्षा और शिक्षा में सुधार संबंधी आंदोलन को गति और एक भिन्न पहचान मिली आज उन्हें भुलाने और सरकारी एजेंट बनाने में दिल्ली तेजी से लग गई है। वांगचुक को केंद्रीय मंत्रियों के हाथ से जूस पीकर अनशन नहीं तोड़ना था और उनकी पत्नी को हिंदुत्व के अनुकूल बयान नहीं देने थे, यह बात सही है। ऐसा करके वांगचुक दंपत्ति दिल्ली और देश भर में पैदा हुई अपने समर्थन की पूंजी को खो रहा है। लेकिन उसी के साथ सवाल यह भी है कि वांगचुक की आलोचना करने वाले सत्याग्रह जैसे मनुष्यता के महान अस्त्र को क्या भोथरा नहीं साबित कर रहे हैं?

शिक्षा में सुधार संबंधी युवाओं के आंदोलन और उसमें अभिजित दीपके और सोनम वांगचुक की भूमिका पर चर्चा से कम आवश्यक नहीं है सत्याग्रह के हथियार और उसकी ऐतिहासिकता पर चर्चा करना। क्योंकि भविष्य में भारत में संघ परिवार की तानाशाही से मुक्ति के लिए सघन लड़ाई होनी है और उस लड़ाई में यही हथियार काम आएगा। बात अक्तूबर सन् 1957 की है। समाजवादी नेता डॉ राम मनोहर लोहिया के साथ लखनऊ की जेल में बंद थे कृष्णनाथ जी। कृष्णनाथ जी अर्थशास्त्री, यायावर साहित्यकार और बौद्ध दर्शन के मर्मज्ञ थे और समाजवादी थे। उन्होंने डॉक्टर साहेब से कहा, “ लगता है आपने गांधी जी के बाद सत्याग्रह को जिला दिया।” इस टिप्पणी पर डॉक्टर लोहिया थोड़ी देर चुप रहे और फिर बोले, “ अभी कुछ कहना मुश्किल है। जब तक कम्युनिस्ट भी इसे न अपना लें तब तक कुछ कहा नहीं जा सकता।” फिर वे कृष्णनाथ जी की जिज्ञाशा को और शांत करने के लिए बोले, “हां कम्युनिस्ट अपना लें तो अलबत्ता कुछ कहा जा सकता है। उनकी तादाद है न?” संयोग देखिए आज आजादी के सत्तर साल बाद डॉ लोहिया की बात सच होती हुई दिख रही है लेकिन तब जबकि कम्युनिस्टों की तादाद घट चुकी है।

कृष्णनाथ जी एक जगह यह भी कहते हैं कि बीसवीं सदी की बड़ी उपलब्धि भारत की आजादी नहीं बल्कि गांधी का सत्याग्रह है। इसी बात को डॉ लोहिया अधिक प्रभावशाली ढंग से कहते थे कि बीसवीं सदी में मानवता की दो बड़ी उपलब्धियां हैं। एक एटम बम और दूसरा सत्याग्रह। देखना है कि अगली सदी में कौन बचेगा। सत्याग्रह के हथियार की सफलता इसी में है कि उसे न सिर्फ भारत के दूरदराज क्षेत्र के सोनम वांगचुक आजमा रहे हैं बल्कि भूमिगत आंदोलन से मुख्यधारा में आई सीपीआई (एमएल) लिबरेशन की छात्र शाखा आइसा की युवा अध्यक्ष नेहा वोरा के साथ दूसरे छात्र भी आजमा रहे हैं। उन युवाओं के सुर में सुर मिलाकर वांगचुक ने जंतर मंतर के प्रतिरोध को एक ऊंचाई प्रदान की और प्रदान किया क्षैतिज विस्तार। जिसकी झलक 20 जुलाई को पूरे देश ने देखी। लेकिन इस आंदोलन को प्रायोजित आंदोलन बताने वाले बौद्धिकों ने उन सभी के सत्याग्रह पर पानी फेरने में कोई कसर नहीं छोड़ी। बल्कि वे लोग इसे राहुल गांधी के नेतृत्व और आंदोलन को खत्म करने वाला ही बता रहे थे। भला हो कांग्रेस पार्टी के शीर्षस्थ नेताओं का कि उन्होंने ऐसी कोई टिप्पणी नहीं। बल्कि उन्होंने तो आंदोलन के जज्बे को सड़क से संसद तक फैलाने में पूरा जोर लगा दिया। राहुल गांधी, प्रियंका गांधी या मल्लिकार्जुन खड़गे या फिर समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव, डिम्पल यादव जिस तरह से सड़क से संसद तक युवाओं के साथ जुड़े उसे देखकर अगर उन्हें डॉ लोहिया की श्रेणी का सत्याग्रही कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। डॉ लोहिया की श्रेणी का सत्याग्रही इसलिए कि आज कांग्रेस का जो शीर्षस्थ नेतृत्व मौजूदा सरकार के विरुद्ध संघर्ष कर रहा है उसे हम न तो सरकारी गांधीवादी कह सकते हैं और न ही विनोबा भावे की तरह मठी गांधीवादी कह सकते हैं। वास्तव में वह कुजात गांधीवादी है जो जनता के तमाम मुद्दों के साथ अपने को जोड़ता जा रहा है। लेकिन इससे उन कुजात गांधीवादियों से ईर्ष्या करने और उन्हें कमतर बताने का कोई औचित्य नहीं बनता जो अलग संगठन और मंचों से तात्कालिक अन्याय से लड़ रहे हैं।

जंतर मंतर आंदोलन की खासियत यह थी कि उसमें न सिर्फ कम्युनिस्टों ने सत्याग्रह किया बल्कि आंबेडकरवादियों ने भी सत्याग्रह का मार्ग अपनाया। इससे अच्छी बात क्या हो सकती है कि सशस्त्र क्रांति और सर्वहारा की तानाशाही में यकीन करने वाले कम्युनिस्ट और संविधान बनने के साथ किसी सत्याग्रह की आवश्यकता को खारिज करने वाले डॉ भीमराव आंबेडकर के अनुयायी महात्मा गांधी के सत्याग्रह के मार्ग पर चल पड़े हैं। सवाल यह नहीं है कि वांगचुक नेता बनेंगे या राहुल गांधी। राहुल गांधी और वांगचुक की स्थिति में देश के सीमांत क्षेत्र और मध्यक्षेत्र का भी अंतर है। सोचिए लद्दाख जैसे बर्फीले क्षेत्र में अनशन करते समय महज एक बयान पर वांगचुक को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत जोधपुर जैसे गर्म इलाके की जेल में रखा जा सकता है तो दिल्ली में कुछ आड़ा तिरछा बोलने या अधिक अड़ जाने पर यह सरकार क्या कर सकती है। वांगचुक ने लद्दाख में यही कहा था कि पहले चीन ने जब भारत पर हमला किया तो हमारे लोगों ने अपनी जान देकर उसका मुकाबला किया। लेकिन अगर सरकार हमारी बात नहीं सुनेगी तो हमारे लोगों को वैसी स्थिति में जान देने की क्या जरूरत है।

दरअसल सत्याग्रह के विविध रूप हैं और हर देशकाल के अनुरूप वह बदलता है। लेकिन सत्याग्रह की असली भावना तात्कालिक अन्याय का हर हाल में प्रतिरोध करना है। मार्टिन लूथर किंग जूनियर को लोग सलाह दे रहे थे रंगभेद एक दिन चला जाएगा, इसलिए लड़ाई की जरूरत नहीं है। लेकिन उन्हें लगता था कि रोज रोज होने वाले अपमान को कैसे सहा जाए। इसीलिए जो लोग यह सलाह दे रहे हैं कि अगर सरकार बुरी है तो अगले चुनाव में उसे बदल दीजिए वे सत्याग्रही नहीं हो सकते। सत्याग्रही वे हैं जो डॉ लोहिया की तरह से कहते हैं कि जिंदा कौमें पांच साल इंतजार नहीं करतीं। विनोबा भावे ने सकारात्मक सत्याग्रह का सिद्धांत दिया था। उन्होंने कहा था कि जब तक बातचीत के दरवाजे खुले हैं तब तक सत्याग्रह पर नहीं उतरना चाहिए। फिर गांधी ने तो विदेशी सत्ता के विरुद्ध सत्याग्रह किया था आज अपने लोगों की सत्ता है उससे क्या सत्याग्रह करना। उन्होंने कहा था कि सत्याग्रह करते समय न तो सत्याग्रही के मन में प्रतिपक्ष के प्रति क्रोध आना चाहिए और न ही प्रतिपक्ष के मन में सत्याग्रही के प्रति। तभी सत्याग्रह सफल माना जाएगा। विनोबा की दिक्कत यही थी कि वे नेहरू शासन के अन्याय के प्रति भी सत्याग्रह के लिए तैयार नहीं हुए और न ही इंदिरा गांधी शासन के अन्याय के प्रति सत्याग्रह के लिए। वे दोनों सरकारों से मदद लेते रहे और दोनों सरकारों को आशीष देते रहे। एक तरह से उन्होंने सत्याग्रह के सिद्धांत को निर्वीर्य कर दिया। बल्कि विनोबा ने तो आपातकाल को ‘अनुशासन पर्व’’ कह कर उसे मौन सहमति भी दे डाली। इसीलिए जयप्रकाश नारायण ने तात्कालिक अन्याय का विरोध करने और नक्सली हिंसा को काबू में लाने के लिए विनोबा का साथ छोड़कर सत्याग्रह का रास्ता चुना। डॉ लोहिया तो मानते थे कि जब तक सामने वाले में क्रोध न उपजे तब तक सत्याग्रह नहीं है। सत्याग्रह की यह तो अतियां हैं। इनके बीच में हम सोनम वांगचुक को कहीं फिट कर सकते हैं। अगर इंदिरा गांधी को विनोबा भावे जैसे किसी गांधीवादी संत की आवश्यकता थी तो नरेंद्र मोदी और मोहन भागवत को भी जनता को झांसा देने के लिए और बचे खुले लोभी गांधीवादियों और सत्तालोलुप समाजवादियों को फुसलाने के लिए किसी सोनम वांगचुक की आवश्यकता है। सोनम वांगचुक अपनी क्षेत्रीय मजबूरियों के कारण क्या उस काम के लिए तैयार हैं यह तो समय ही बताएगा। हालांकि वे अभी तक तो तात्कालिक अन्याय(कुछ अपवादों को छोड़कर) से लड़ते रहे हैं।

लेकिन साजिश की थ्योरी और राहुल गांधी बनाम सोनम वांगचुक या भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस बनाम काकरोच जनता पार्टी के बीच जंतर मंतर आंदोलन का श्रेय लेने वाली चर्चा से अलग जो बात जरूरी है वो यह कि सत्याग्रह जैसे हथियार की पवित्रता और उसकी धार को बचाकर रखना। इरोम शर्मिला से लेकर दूसरे तमाम सत्याग्रह आंदोलनों की विफलता के सैकड़ों उदाहरण अगर हमारे पास हैं तो हजारों उदाहरण इसकी सफलता के भी हैं। कोई जरूरी नहीं कि अतीत में किसी विफल प्रयोग को भविष्य में सफलता न मिले। इसलिए वांगचुक और दीपके को कोसने वालों से यही अनुरोध किया जा सकता है कि सत्याग्रह को न कोसें।


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