‘कल्पना’ के कृष्णनाथ

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Krishna Nath

यायावर विचारक और बौद्ध दर्शन के अध्येता कृष्णनाथ के यात्रा-वृतांतों का तो मुरीद रहा ही हूँ। पिछले कुछ समय से उनका वैचारिक लेखन भी पढ़ने को मिला। मसलन यह पुस्तक ‘रूपं शून्यं शून्यं रूपं’। जिसमें हैदराबाद से छपने वाली पत्रिका ‘कल्पना’ में समय-समय पर प्रकाशित समीक्षा लेख और पचास-साठ के दशक के कुछ महत्त्वपूर्ण साहित्यिक आयोजनों की रिपोर्टें शामिल हैं। इन समीक्षाओं में कृष्णनाथ जी का भाषा-सौंदर्य और उनकी विद्वत्ता का दरस-परस मिलता है।

यह समीक्षा लेख आलोचनात्मक ग्रंथों, उपन्यासों, नाटकों के बारे में हैं, तो प्रसाद और धूमिल की कविताओं के बारे में भी। शिवप्रसाद सिंह के उपन्यास अलग-अलग वैतरणी, गली आगे मुड़ती है, नीला चांद पर बहुत मन से कृष्णनाथ ने लिखा है। ख़ुद रस लेते हुए और समीक्षा के माध्यम से पाठकों को भी रसास्वादन कराते हुए। शिवप्रसाद सिंह के इन उपन्यासों की समीक्षा करते हुए उनकी महत्ता, उपलब्धियों के साथ उनकी सीमाओं को भी वे बताते हैं। मसलन, बहुचर्चित और पुरस्कृत उपन्यास ‘नीला चांद’ की चर्चा करते हुए वे इस उपन्यास में बौद्ध तंत्र को लेकर जो पूर्वाग्रह दिखाई पड़ता है और उस सम्प्रदाय को जिस नकारात्मक छवि में ढालकर पेश किया गया, उसे भी उन्होंने इंगित किया है।

हजारी प्रसाद द्विवेदी के उपन्यास ‘चारु चंद्रलेख’ पर लिखते हुए वे समीक्षा की पारंपरिक रिवायत से हटकर सृजनात्मक समीक्षा की ओर जाते हैं। अघोर नाथ से अपने संवाद के ज़रिए वे चारु चंद्रलेख की संभावनाओं और उसकी सीमाओं के बारे में लिखते हैं। बेकेट के नाटक वेटिंग फ़ॉर गोदो के कृष्ण बलदेव वैद के हिंदी अनुवाद और बिपिन कुमार अग्रवाल के नाटकों पर भी उन्होंने बढ़िया लिखा है।

आलोचना ग्रंथों में रामविलास शर्मा की कृतियों ‘आस्था और सौंदर्य’ और ‘प्रेमचंद और उनका युग’ की समीक्षा करते हुए कृष्णनाथ रामविलास शर्मा की आलोचकीय दृष्टि की सीमाओं को उजागर करते हैं और विशेष रूप से प्रेमचंद को एक खास सांचे में ढाल कर देखने की प्रवृत्ति को वे आड़े हाथों लेते हैं। यही नहीं रामविलास शर्मा द्वारा बरते गए साहित्य या सौंदर्य के प्रतिमानों का भी वे बड़ी बारीकी से मूल्यांकन करते हैं।

रचना की समीक्षा करते हुए कृष्णनाथ कर्ता की कसौटियों यानी लेखक द्वारा बताई गई कसौटियों पर भी उसकी कृति को आजमाते हैं और यह देखते हैं कि खुद कर्ता की कसौटी पर उसकी वह किताब खरी उतरी या नहीं।

बनारस में फरवरी 1964 में ‘साहित्य रचना और आलोचना का अंतराल’ विषय पर हुई एक गोष्ठी की उनकी विस्तृत रिपोर्ट भी पठनीय है। जिसमें डॉक्टर देवराज, देवीशंकर अवस्थी नामवर सिंह, विजयशंकर मल्ल, बच्चन सिंह आदि के विचारों की विस्तृत चर्चा कृष्णनाथ ने की है। यह रिपोर्ट, रिपोर्ट न रहकर इस पूरी बहस में एक स्वतंत्र हस्तक्षेप बनकर उभरती है।

इसी तरह वर्ष 1959 में कोलकाता के शिक्षायतन कॉलेज में ‘आधुनिक साहित्यबोध’ विषय पर हुए संवाद पर आधारित पुस्तक की उनकी विस्तृत समीक्षा भी है। जिसमें हजारी प्रसाद द्विवेदी, धर्मवीर भारती, डॉक्टर देवराज, अज्ञेय और नामवर सिंह ने व्याख्यान दिए थे। जिनके हवाले से कृष्णनाथ जी ने बहुत विस्तार से साहित्य-बोध, संवेदना के विभिन्न आयामों को लेकर चर्चा की है।

कहीं-कहीं यह समीक्षाएं बहुत तीखी भी हो गई हैं। मसलन परशुराम चतुर्वेदी की पुस्तक ‘रहस्यवाद’ की समीक्षा। या फिर कार्ल मार्क्स और एंगल्स द्वारा 1857 से 1859 के बीच ‘न्यूयार्क डेली ट्रिब्यून’ में लिखे भारत विषयक लेखों के संकलन की समीक्षा। यहाँ मार्क्स की दृष्टि की सीमा बताते हुए कृष्णनाथ रमेश चंद्र मजूमदार और सुरेंद्रनाथ सेन जैसे इतिहासकारों को ‘गुलाम इतिहासकार’ कहने जैसी अविवेकी टिप्पणी भी कर डालते हैं। इन दोनों इतिहासकारों के लेखन से परिचित कोई भी अध्येता शायद ही उनकी इस टिप्पणी से सहमत हो। कहना न होगा कि दृष्टि की सीमा और पूर्वाग्रह से ख़ुद कृष्णनाथ भी मुक्त नहीं हो सके हैं।

कृष्णनाथ जी के लेखों का यह संकलन साक्षरा प्रकाशन से छपा है।


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