— परिचय दास —
।। चार।।
नंदकिशोर आचार्य की आलोचना का विशिष्ट पक्ष उनकी अज्ञेय-दृष्टि में दिखाई देता है। अज्ञेय पर लिखते हुए आचार्य केवल एक कवि के काव्य-संसार का मूल्यांकन नहीं करते, बल्कि आधुनिक हिन्दी कविता की उस जटिल चेतना को पकड़ने का प्रयत्न करते हैं जिसमें व्यक्ति, स्वतंत्रता, आत्मान्वेषण, भाषा और अस्तित्व के प्रश्न एक-दूसरे में गुंथे हुए हैं। ‘अज्ञेय की काव्य-तितीर्षा’ इसलिए केवल अज्ञेय पर लिखी हुई आलोचना-पुस्तक नहीं रह जाती; वह स्वयं आचार्य की आलोचना-दृष्टि को समझने की एक महत्त्वपूर्ण कुंजी बन जाती है।
अज्ञेय का काव्य अपने भीतर एक निरंतर पार जाने की बेचैनी रखता है। ‘तितीर्षा’ में नदी को पार करने की आकांक्षा का बिंब है, लेकिन आचार्य इसे केवल बाहरी यात्रा की तरह नहीं देखते। यह उस चेतना का संकेत है जो अपनी प्राप्त सीमाओं से संतुष्ट नहीं है। वह अनुभव की एक सतह से दूसरी सतह की ओर जाना चाहती है। अपने भीतर उतरना भी एक तरह का पार जाना है और अपने भीतर से बाहर निकलकर दूसरे के अनुभव तक पहुँचना भी। अज्ञेय के काव्य को इसी बेचैनी से पढ़ना आचार्य की आलोचनात्मक सूझ का परिचायक है।
यहाँ आचार्य की अपनी साहित्य-दृष्टि भी स्पष्ट होती है। वे रचना को स्थिर वस्तु की तरह नहीं देखते। उनके लिए रचना एक गति है। उसमें अनुभव लगातार अपना रूप बदलता है। कवि जो जानता है, कविता केवल उतना ही नहीं कहती; वह उस अज्ञात की ओर भी बढ़ती है जिसे कवि स्वयं लिखते हुए खोजता है। रचना इसलिए केवल अभिव्यक्ति नहीं, खोज भी है। लेखक पहले से पूरा सत्य लेकर नहीं बैठा रहता कि उसे कविता में जमा दे। कई बार कविता लिखते हुए ही उसे अपने अनुभव का असली अर्थ मिलता है। आलोचना की दृष्टि से यह बहुत महत्त्वपूर्ण बात है, क्योंकि इससे रचना को केवल ‘कहना क्या है’ के प्रश्न से मुक्त करके ‘वह अपने अर्थ तक कैसे पहुँचती है’ के प्रश्न से जोड़ा जा सकता है।
आचार्य की अज्ञेय-दृष्टि में व्यक्ति का प्रश्न भी केंद्रीय है। अज्ञेय की कविता में व्यक्ति समाज से भागता हुआ अकेला प्राणी नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व की पहचान खोजता हुआ मनुष्य है। उसकी स्वतंत्रता केवल सामाजिक बंधनों से मुक्ति नहीं है। वह अपने भीतर की जड़ताओं, पूर्वनिर्धारित पहचानों और आरोपित अर्थों से भी मुक्त होना चाहता है। आचार्य इस आकांक्षा को रचनात्मकता से जोड़ते हैं। रचनाकार तभी अपनी आवाज पा सकता है जब वह अपने अनुभव को किसी तैयार भाषा या विचार में पूरी तरह समर्पित न कर दे।
यहाँ से उनकी आलोचना का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण सिद्धांत उभरता है: साहित्य में स्वतंत्रता और अनुशासन विरोधी नहीं हैं। सच्ची रचनात्मक स्वतंत्रता भाषा और रूप के प्रति अधिक सजग बनाती है। कवि जितना अपने अनुभव के प्रति ईमानदार होता है, उतना ही उसे भाषा के प्रति सावधान होना पड़ता है। अज्ञेय के काव्य में शब्दों का चयन, विराम, बिंब और मौन इसलिए महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं। भाषा का संयम अनुभव की तीव्रता को कम नहीं करता, बल्कि उसे अधिक सघन बनाता है।
आचार्य की आलोचना इस सघनता को पहचानती है। वे कविता को केवल उसके विषय के आधार पर नहीं पढ़ते। अज्ञेय ने प्रकृति पर लिखा, प्रेम पर लिखा, मृत्यु और अकेलेपन पर लिखा, आत्मान्वेषण और स्वतंत्रता पर लिखा, लेकिन आलोचक के लिए प्रश्न यह नहीं कि विषयों की सूची क्या है। प्रश्न यह है कि इन विषयों के भीतर कवि की चेतना किस प्रकार काम करती है। पेड़, नदी, आकाश, धूप, अँधेरा, रास्ता जैसी वस्तुएँ अज्ञेय की कविता में केवल दृश्य नहीं रहतीं; वे अनुभव की आंतरिक संरचना का हिस्सा बन जाती हैं।
यही वह जगह है जहाँ नंदकिशोर आचार्य की आलोचना काव्य-भाषा की सूक्ष्मता को पकड़ती है। वे कविता को केवल उसके घोषित अर्थ से नहीं, उसकी संवेदनात्मक बनावट से समझते हैं। किसी शब्द का अर्थ केवल शब्दकोश में नहीं होता। कविता में वह अपनी ध्वनि, संदर्भ, स्मृति और दूसरे शब्दों से संबंध के कारण नया अर्थ ग्रहण करता है। आलोचक का काम इस अर्थ-निर्माण को देखना है। इसीलिए आचार्य की आलोचना में भाषा का प्रश्न बार-बार जीवन और अनुभव के प्रश्न से जुड़ जाता है।
अज्ञेय पर विचार करते हुए यह भी समझ में आता है कि आचार्य के लिए आधुनिकता केवल नया विषय या नई शैली नहीं है। आधुनिकता मूलतः चेतना की स्थिति है। आधुनिक मनुष्य अपने सामने उपलब्ध उत्तरों पर सहज विश्वास नहीं कर सकता। उसे अपने प्रश्न स्वयं पूछने पड़ते हैं। इसलिए आधुनिक कविता में आत्मसंदेह, अकेलापन, खोज, असुरक्षा और स्वतंत्रता की आकांक्षा आती है। अज्ञेय का काव्य इसी प्रश्नशील आधुनिक चेतना का एक महत्त्वपूर्ण रूप है।
लेकिन आचार्य अज्ञेय की आधुनिकता को केवल व्यक्तिवादी आत्मसंघर्ष में सीमित नहीं करते। उनके यहाँ व्यक्ति और संसार का संबंध लगातार बना रहता है। आत्मान्वेषण यदि केवल आत्ममुग्धता बन जाए तो उसकी साहित्यिक शक्ति घट जाती है। अज्ञेय के यहाँ ‘मैं’ संसार से संवाद करता हुआ ‘मैं’ है। प्रकृति से उसका संबंध है, दूसरे मनुष्य से उसका संबंध है, इतिहास और समय से उसका संबंध है। इसीलिए उसकी निजता अंततः व्यापक मानवीय अनुभव की ओर खुल सकती है।
नंदकिशोर आचार्य की आलोचना का एक सुंदर पक्ष यह है कि वे कवि की निजता का सम्मान करते हुए भी उसे आलोचनात्मक प्रश्नों से मुक्त नहीं करते। अज्ञेय के प्रति उनका आकर्षण उन्हें अंध-प्रशंसक नहीं बनाता। वे उनकी रचनात्मक उपलब्धियों को उनकी सीमाओं के साथ समझने की कोशिश करते हैं। यही आलोचक की ईमानदारी है। आलोचना का प्रेम यदि विवेक खो दे तो वह आलोचना नहीं, प्रशस्ति बन जाती है।
आचार्य के लिए अज्ञेय का महत्त्व इस बात में भी है कि उन्होंने हिन्दी कविता में अनुभव की निजता को रचनात्मक गरिमा दी। लेकिन यह निजता किसी बंद कमरे की निजता नहीं। वह ऐसी निजता है जो स्वयं को पहचानते हुए दूसरे तक पहुँचने की कोशिश करती है। कविता का ‘मैं’ जब अपनी गहराई में उतरता है, तब वह कई बार एक व्यापक मानवीय अनुभव से जुड़ जाता है। यही साहित्य की अद्भुत प्रक्रिया है: जितना गहरा निजी अनुभव, उतनी ही अधिक उसकी संभावित सार्वभौमिकता।
इस दृष्टि से अज्ञेय पर आचार्य का विचार उनकी अपनी आलोचना-दृष्टि का आत्मप्रकाश भी है। जिस तरह वे अज्ञेय की कविता में खोज, स्वतंत्रता और पार जाने की आकांक्षा देखते हैं, उसी तरह उनकी अपनी आलोचना भी निश्चित निष्कर्षों से आगे जाने की कोशिश करती है। वह रचना को बंद नहीं करती। वह उसके भीतर नए प्रश्नों के लिए जगह छोड़ती है। आलोचना में यह खुलापन उनकी बड़ी शक्ति है।
उनकी दृष्टि में आलोचक को भी एक तरह की तितीर्षा चाहिए। उसे ज्ञात से अज्ञात की ओर जाना होता है। यदि आलोचक पहले से तय निष्कर्ष लेकर रचना के पास पहुँचता है तो वह रचना को अपने निष्कर्ष का प्रमाण बना देगा। लेकिन यदि वह प्रश्न लेकर जाता है तो रचना उसे बदल भी सकती है। आचार्य की आलोचना में यह आत्मसंशोधन की संभावना दिखाई देती है। आलोचक रचना को पढ़ते हुए केवल रचना की परीक्षा नहीं करता, अपने पूर्वग्रहों की भी परीक्षा करता है।
यहीं उनकी आलोचना अपनी सबसे सुंदर मानवीय भूमि पर पहुँचती है। साहित्य को समझना अंततः स्वयं को समझने की प्रक्रिया भी है। अज्ञेय के ‘मैं’ की खोज में आचार्य जिस मनुष्य को देखते हैं, वह केवल अज्ञेय का मनुष्य नहीं रह जाता। वह आधुनिक मनुष्य है, जो अपने समय में रहते हुए अपने भीतर किसी ऐसी जगह की तलाश करता है जहाँ वह स्वयं से झूठ न बोल सके। साहित्य उस जगह तक पहुँचने की एक संभावना है।
इसलिए ‘अज्ञेय की काव्य-तितीर्षा’ को नंदकिशोर आचार्य की आलोचना-यात्रा में एक विशेष पड़ाव की तरह देखना चाहिए। यहाँ आलोचक कवि की व्याख्या करते हुए अपने आलोचनात्मक विश्वासों को भी उजागर करता है। रचना अनुभव की खोज है, भाषा उस खोज का माध्यम है, स्वतंत्रता उसकी शर्त है और सत्य उसकी उपलब्धि। साहित्य की सार्थकता तब है जब वह मनुष्य को अपने भीतर और अपने बाहर की दुनिया को अधिक गहराई से देखने की क्षमता दे।
नंदकिशोर आचार्य की अज्ञेय-दृष्टि इसलिए अंततः अज्ञेय तक सीमित नहीं रहती। वह हिन्दी आलोचना के उस बड़े प्रश्न तक पहुँचती है कि कविता मनुष्य को कितना अधिक मनुष्य बनाती है। उत्तर किसी घोषणापत्र में नहीं, कविता के अनुभव में छिपा है। आलोचक का काम उस छिपे हुए अनुभव को उजागर करना है, लेकिन इस सावधानी के साथ कि प्रकाश इतना तेज न हो जाए कि कविता की अपनी रोशनी ही दिखाई देना बंद हो जाए। आचार्य की आलोचना की परिपक्वता इसी संतुलन में है।
।। पांच ।।
नंदकिशोर आचार्य की आलोचना में एक और उल्लेखनीय विशेषता उनकी परंपरा, संस्कृति और आधुनिक चेतना को साथ रखकर देखने की क्षमता है। उनके लिए परंपरा कोई बंद संदूक नहीं है, जिसे केवल श्रद्धा से खोला जाए और फिर वापस बंद कर दिया जाए। वह जीवित अनुभव है। उसमें अतीत की स्मृतियाँ हैं, मनुष्य की अर्जित संवेदनाएँ हैं, विचारों की लंबी यात्राएँ हैं और ऐसे मूल्य हैं जो बदलते समय में नए अर्थ ग्रहण कर सकते हैं। आचार्य की आलोचना इसी जीवित परंपरा की तलाश करती है।
उनके चिंतन में परंपरा का अर्थ केवल पुरानी साहित्यिक कृतियों का उत्तराधिकार नहीं है। परंपरा मनुष्य की उस सामूहिक स्मृति का नाम भी है जिसके सहारे कोई समाज अपने वर्तमान को समझता है। लेकिन स्मृति यदि केवल पुनरावृत्ति बन जाए तो वह जीवन को बाँधने लगती है। इसलिए परंपरा को जीवित रखने के लिए उसमें प्रश्न करना आवश्यक है। नंदकिशोर आचार्य की आलोचना परंपरा के प्रति सम्मान और प्रश्न, दोनों को एक साथ संभव बनाती है।
यहीं उनकी आधुनिकता की समझ विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हो जाती है। आधुनिक होना उनके लिए केवल पुराने से अलग दिखाई देना नहीं है। नया वस्त्र पहन लेने, नई शब्दावली अपना लेने या पुराने मूल्यों को अस्वीकार कर देने से चेतना आधुनिक नहीं होती। आधुनिकता का मूल प्रश्न मनुष्य की स्वतंत्र चेतना का प्रश्न है। वह अपने समय को स्वयं समझे, अपने अनुभव को स्वयं परखे और प्राप्त मान्यताओं को बिना जाँच स्वीकार न करे, यही आधुनिक होने की अधिक गहरी प्रक्रिया है।
इस दृष्टि से साहित्य परंपरा और वर्तमान के बीच एक सर्जनात्मक संवाद बन जाता है। कवि अतीत से सामग्री ले सकता है, मिथकों को पुनः अर्थ दे सकता है, लोक-स्मृतियों को आधुनिक अनुभव में ला सकता है, लेकिन उसकी रचना तभी जीवित होगी जब वह उस सामग्री को अपने समय की बेचैनी से जोड़ सके। केवल उद्धरणों से परंपरा जीवित नहीं होती। वह तब जीवित होती है जब वर्तमान मनुष्य उसमें अपना कोई प्रश्न पहचान ले।
नंदकिशोर आचार्य की आलोचना इसी पहचान की तलाश करती है। वे साहित्य को इतिहास की निर्जीव वस्तु की तरह नहीं पढ़ते। किसी रचना का महत्त्व केवल इसलिए नहीं कि वह अतीत में प्रतिष्ठित रही है। उसका वास्तविक महत्त्व यह भी है कि आज वह हमारे भीतर क्या जगाती है। एक पुरानी कविता यदि आज भी हमें अपने जीवन के बारे में सोचने के लिए बाध्य करती है तो उसकी परंपरा जीवित है। यदि वह केवल परीक्षा के प्रश्नपत्र में एक नाम बनकर रह गई है तो मनुष्य ने उसे बचाया जरूर है, पर उसकी आत्मा को शायद कहीं रास्ते में छोड़ दिया है।
आचार्य के आलोचनात्मक विवेक में संस्कृति भी इसी जीवंत अर्थ में आती है। संस्कृति उनके लिए सजावटी पहचान नहीं है। वह मनुष्य के जीने, सोचने, संबंध बनाने और संसार को अर्थ देने की प्रक्रिया है। साहित्य संस्कृति के भीतर पैदा होता है, लेकिन संस्कृति को केवल दोहराता नहीं। वह उसकी परीक्षा भी करता है। रचना अपने समय की सांस्कृतिक मान्यताओं को स्वीकार कर सकती है, उनसे संघर्ष कर सकती है या उनके भीतर छिपी किसी अनदेखी संभावना को सामने ला सकती है।
इसलिए साहित्य का सांस्कृतिक मूल्य केवल इस बात में नहीं कि उसमें कितने सांस्कृतिक प्रतीक हैं। असली प्रश्न यह है कि वह मनुष्य और समाज के बीच संबंध को किस गहराई से समझता है। किसी रचना में लोकगीत, मिथक, धार्मिक प्रतीक या ऐतिहासिक प्रसंग बहुत अधिक हों, फिर भी वह सांस्कृतिक रूप से सतही हो सकती है। दूसरी ओर, कोई रचना बिल्कुल सामान्य जीवन की छोटी-सी घटना के माध्यम से किसी समाज की गहरी मानसिक संरचना को उजागर कर सकती है। आचार्य की आलोचना इसी गहराई को पहचानने का प्रयत्न करती है।
यहाँ उनकी आलोचना का मानवीय केंद्र फिर सामने आता है। संस्कृति मनुष्य के लिए है, मनुष्य संस्कृति के लिए नहीं। जब कोई सांस्कृतिक व्यवस्था मनुष्य की स्वतंत्रता और गरिमा को नष्ट करने लगे, तब साहित्य उसके भीतर प्रश्न पैदा कर सकता है। साहित्य का यह प्रश्न करना किसी राजनीतिक घोषणा से अलग है। कविता सीधे आदेश नहीं देती, लेकिन वह पाठक की संवेदना में ऐसी जगह बना सकती है जहाँ स्थापित सत्य असुविधाजनक लगने लगे। यही साहित्य की शांत लेकिन गहरी शक्ति है।
नंदकिशोर आचार्य की आलोचना इस शक्ति को पहचानती है। उनके लिए साहित्य की सार्थकता केवल उसमें व्यक्त विचारों में नहीं, बल्कि उन विचारों के पीछे सक्रिय मानवीय संवेदना में है। विचार यदि मनुष्य से कट जाए तो वह कठोर सिद्धांत बन सकता है और संवेदना यदि विचार से पूरी तरह कट जाए तो वह क्षणिक भावुकता। श्रेष्ठ साहित्य दोनों को एक ऐसी रचनात्मक एकता में रखता है जहाँ संवेदना विचार को गहराई देती है और विचार संवेदना को दिशा।
उनकी आलोचना में यही संतुलन भाषा में भी दिखाई देता है। वे गूढ़ बात को अनावश्यक कठिन भाषा में कहने के पक्षधर नहीं लगते। उनकी आलोचना में विचार की गंभीरता है, लेकिन भाषा उस गंभीरता का प्रदर्शन नहीं करती। वह धीरे-धीरे अर्थ खोलती है। कभी कोई वाक्य दार्शनिक प्रश्न की तरह सामने आता है और अगले ही क्षण वही प्रश्न जीवन के किसी बहुत सामान्य अनुभव से जुड़ जाता है। इसीलिए उनकी आलोचना में एक प्रकार की आत्मीयता बनी रहती है।
यह आत्मीयता उनकी आलोचना को भावुक नहीं बनाती। वे साहित्य से प्रेम करते हैं, लेकिन प्रेम के कारण आलोचनात्मक विवेक छोड़ नहीं देते। किसी लेखक की उपलब्धि को स्वीकार करना और उसकी सीमा को देखना साथ-साथ संभव है। आलोचक के लिए यही सबसे कठिन साधना है। प्रशंसा करना आसान है, निंदा करना उससे भी आसान। कठिन है किसी रचना को उसके पूरे जटिल अस्तित्व में स्वीकार करना और फिर उसके भीतर से अपनी असहमति को प्रमाणित करना।
आचार्य की आलोचना इस कठिन रास्ते पर चलती है। इसलिए उसमें निर्णय से अधिक विवेक दिखाई देता है। वह पाठक को किसी लेखक के पक्ष या विपक्ष में खड़ा करने से पहले उसे लेखक को समझने की दृष्टि देती है। साहित्य में पक्षधरता आवश्यक हो सकती है, लेकिन आलोचना की पहली जिम्मेदारी समझना है। बिना समझे किया गया विरोध भी उतना ही सतही है जितनी बिना पढ़े की गई प्रशंसा।
उनकी दृष्टि में आलोचक को अपनी भाषा और अपने निष्कर्ष दोनों के प्रति सावधान रहना चाहिए। रचना को किसी एक सूत्र में बाँध देना आलोचना की सुविधा तो हो सकती है, साहित्य की सच्चाई नहीं। साहित्य में जो अस्पष्ट है, उसे जबरन स्पष्ट करना भी एक प्रकार की हिंसा है। कुछ अर्थों को खुला रहना चाहिए। कुछ प्रश्नों का उत्तर रचना स्वयं पाठक के भीतर छोड़ती है। आलोचक को उस खुलेपन का सम्मान करना चाहिए।
यही कारण है कि नंदकिशोर आचार्य की आलोचना में मौन और अनिश्चितता का भी मूल्य है। साहित्य हर प्रश्न का उत्तर देने के लिए बाध्य नहीं। कई बार प्रश्न को जीवित रखना ही उसकी बड़ी उपलब्धि है। मनुष्य जिन प्रश्नों का उत्तर तुरंत पा लेता है, वे जल्दी समाप्त हो जाते हैं; जो प्रश्न उसके भीतर लंबे समय तक चलते हैं, वे उसकी चेतना को बदलते हैं। साहित्य ऐसे ही प्रश्नों की भूमि तैयार करता है।
इस प्रकार नंदकिशोर आचार्य की आलोचना परंपरा को वर्तमान से, संस्कृति को मनुष्य से, विचार को संवेदना से और साहित्य को जीवन से जोड़ती है। उनके यहाँ आलोचना न तो केवल पुस्तक का मूल्यांकन है और न केवल विचारों का विवेचन। वह रचना के भीतर छिपे हुए मनुष्य तक पहुँचने की प्रक्रिया है। इसी कारण उनकी आलोचना पढ़ते हुए हम केवल कवियों और कृतियों को नहीं समझते, अपने समय और अपनी चेतना को भी नए ढंग से देखने लगते हैं। यही वह बिंदु है जहाँ आलोचना अपने सीमित अर्थ से बाहर निकलकर साहित्यिक जीवन का गंभीर आत्मसंवाद बन जाती है।
।। छः।।
नंदकिशोर आचार्य की आलोचना में साहित्य और स्वतंत्रता का संबंध अत्यंत गहरे स्तर पर उपस्थित है। उनके लिए स्वतंत्रता कोई बाहरी सुविधा नहीं, मनुष्य के अस्तित्व की बुनियादी आवश्यकता है। इसी कारण रचनात्मकता भी उनके यहाँ स्वतंत्र मनुष्य की स्वाभाविक अभिव्यक्ति बनती है। जो मनुष्य अपने अनुभव को बिना भय, बिना आरोपित साँचे और बिना किसी पूर्वनिर्धारित निष्कर्ष के देख सकता है, वही अपने अनुभव को सच्ची रचना में बदल सकता है। इसीलिए आचार्य की आलोचना में साहित्य का प्रश्न धीरे-धीरे मनुष्य की मुक्ति का प्रश्न बन जाता है।
साहित्य की स्वतंत्रता को वे केवल लेखक की स्वतंत्रता के रूप में नहीं देखते। रचना की अपनी भी एक स्वतंत्र सत्ता होती है। लेखक लिखने के बाद रचना पर पूर्ण अधिकार नहीं रखता। शब्द पाठक के पास जाते हैं और वहाँ नए अर्थ ग्रहण करते हैं। लेखक की मंशा रचना का एक आधार हो सकती है, उसका अंतिम अर्थ नहीं। इसीलिए आलोचक का काम लेखक की घोषित इच्छा को दोहराना नहीं, रचना में उपस्थित अर्थ-सम्भावनाओं को पहचानना है।
यह दृष्टि आलोचना को भी स्वतंत्र बनाती है। आलोचक यदि किसी पूर्वनिर्धारित विचारधारा का केवल प्रवक्ता बन जाए तो उसकी दृष्टि सीमित हो जाती है। वह रचना को देखता कम और उसमें अपने निष्कर्ष खोजता अधिक है। आचार्य की आलोचना इस प्रकार की बौद्धिक जड़ता से बचने की कोशिश करती है। उनके लिए आलोचना का पहला धर्म है कि वह रचना को उसके अपने स्वभाव में समझे। आलोचक अपने विचार लेकर रचना तक अवश्य जाए, लेकिन रचना को अपने विचार का बंदी न बनाए।
इसी कारण उनकी आलोचना में प्रश्न करने की संस्कृति दिखाई देती है। वे साहित्य को ऐसे क्षेत्र के रूप में देखते हैं जहाँ मनुष्य अपने समय से प्रश्न कर सकता है और स्वयं से भी। प्रश्न करना असहमति मात्र नहीं है। प्रश्न करना अपनी निश्चितताओं की परीक्षा करना भी है। जो आलोचक हर बात का उत्तर पहले से जानता है, उसके सामने साहित्य बहुत जल्दी समाप्त हो जाता है। लेकिन जो रचना के साथ अपने प्रश्नों को बदलने के लिए तैयार है, उसके सामने साहित्य की दुनिया लगातार विस्तृत होती जाती है।
नंदकिशोर आचार्य की आलोचना में यह खुलापन उनकी मानवीय दृष्टि से जुड़ा हुआ है। वे मनुष्य को किसी एक पहचान या किसी एक सामाजिक भूमिका में सीमित करके नहीं देखते। मनुष्य विरोधाभासी है, अधूरा है, खोजता हुआ है। उसमें करुणा भी है और हिंसा की संभावना भी, प्रेम भी है और अकेलापन भी, स्वतंत्रता की इच्छा भी है और सुरक्षा के लिए बंधन स्वीकार कर लेने की प्रवृत्ति भी। साहित्य इस जटिल मनुष्य को पकड़ता है। इसलिए साहित्यिक आलोचना भी मनुष्य की जटिलता के प्रति धैर्यवान होनी चाहिए।
यही धैर्य उनकी आलोचना को विशेष बनाता है। वे साहित्य को तुरंत किसी निष्कर्ष तक पहुँचाने की जल्दी में नहीं दिखाई देते। रचना के भीतर कुछ ऐसा भी होता है जो पहली दृष्टि में दिखाई नहीं देता। उसका अर्थ पाठ के साथ समय बिताने पर खुलता है। आलोचक का धैर्य यहाँ बहुत महत्त्वपूर्ण है। कविता को केवल सूचना की तरह पढ़ना उसके अनुभव को नष्ट कर देना है। कविता अपने अर्थ को धीरे-धीरे खोलती है, जैसे सुबह का प्रकाश किसी कमरे में एकदम नहीं, क्रमशः भरता है।
आचार्य के लिए साहित्य की भाषा इसी धीमे खुलने की प्रक्रिया का प्रमुख माध्यम है। शब्द केवल सूचना नहीं देते, वे अनुभव का वातावरण बनाते हैं। एक शब्द अपने साथ इतिहास, स्मृति, संस्कृति और भावनात्मक ध्वनियाँ लेकर आता है। कवि जब उसे एक विशेष संदर्भ में रखता है तो उसका अर्थ बदल सकता है। इसलिए साहित्यिक भाषा को केवल शब्दार्थ से समझना संभव नहीं। उसके पीछे की संवेदना और उसके भीतर का मौन भी पढ़ना पड़ता है।
इस संदर्भ में उनकी आलोचना का ललित पक्ष विशेष रूप से उभरता है। वे भाषा के सौंदर्य की चर्चा करते हुए केवल अलंकारों की सूची नहीं बनाते। उनके लिए भाषा का सौंदर्य उसके अनुभव को सच्चाई से वहन करने में है। यदि शब्द चमकदार हैं लेकिन अनुभव निष्प्राण है तो भाषा का वैभव केवल सजावट रह जाएगा। दूसरी ओर, साधारण शब्द भी असाधारण साहित्यिक शक्ति प्राप्त कर सकते हैं, यदि उनके पीछे जीवन का गहरा अनुभव हो।
आचार्य की आलोचना में साहित्य और नैतिकता का संबंध भी इसी स्तर पर समझा जाना चाहिए। साहित्य नैतिक उपदेश देने के लिए नहीं है, लेकिन वह मनुष्य को अपनी नैतिक चेतना से सामना करा सकता है। कोई कहानी हमें यह नहीं बताती कि हमें कैसा मनुष्य होना चाहिए, फिर भी वह किसी दूसरे मनुष्य के दुःख को इस तरह हमारे सामने रख सकती है कि हम उसके प्रति उदासीन न रह सकें। संवेदना का यह जागरण साहित्य की गहरी नैतिक शक्ति है।
इसीलिए आचार्य के लिए साहित्य में करुणा का महत्त्व है, लेकिन करुणा भावुक दया नहीं। करुणा दूसरे के अस्तित्व को उसकी पूरी गरिमा के साथ स्वीकार करने की क्षमता है। साहित्य जब किसी अपरिचित मनुष्य के अनुभव को हमारे अनुभव का हिस्सा बना देता है, तब वह हमारे भीतर की सीमाएँ विस्तृत करता है। आलोचना को इस विस्तार की पहचान करनी चाहिए।
नंदकिशोर आचार्य के साहित्यिक चिंतन में अध्यात्म भी इसी मानवीय धरातल पर आता है। साहित्य का अध्यात्म किसी धार्मिक उपदेश का पर्याय नहीं है। यह मनुष्य के भीतर उस गहरी जगह की खोज है जहाँ वह अपने अस्तित्व से सामना करता है। साहित्य हमें बाहर की दुनिया से परिचित कराता है, लेकिन महान साहित्य कई बार हमें अपने भीतर के ऐसे प्रदेश में भी ले जाता है जहाँ हम स्वयं अपने लिए अपरिचित होते हैं।
यह आत्मान्वेषण आत्ममुग्धता नहीं है। अपने भीतर उतरना तभी सार्थक है जब वहाँ से दूसरे तक जाने का रास्ता खुले। यदि आत्म की खोज केवल आत्म में बंद हो जाए तो वह साहित्य को संकुचित कर सकती है। लेकिन जब व्यक्ति अपने निजी अनुभव में किसी व्यापक मानवीय सत्य को पहचानता है, तब निजी अनुभव साहित्य बन जाता है। आचार्य की आलोचना इसी रूपांतरण में साहित्य की बड़ी शक्ति देखती है।
उनकी आलोचना में पाठक की भूमिका भी इसलिए महत्त्वपूर्ण हो जाती है। पाठक निष्क्रिय ग्रहणकर्ता नहीं है। वह रचना के अर्थ को अपने अनुभव के साथ पुनः निर्मित करता है। एक ही कविता अलग-अलग पाठकों के भीतर अलग-अलग कंपन पैदा कर सकती है और फिर भी उसकी मूल साहित्यिक शक्ति नष्ट नहीं होती। बल्कि यही उसकी जीवंतता है। रचना जितनी अधिक अर्थ-सम्भावनाएँ अपने भीतर रखती है, उतनी ही अधिक वह समय के पार जा सकती है।
आलोचक इस प्रक्रिया में पाठक और रचना के बीच एक संवेदनशील मध्यस्थ की तरह काम करता है। वह अर्थ को तय नहीं करता, उसकी ओर संकेत करता है। वह पाठक को देखने की ऐसी दृष्टि देता है जिससे पाठक स्वयं रचना के भीतर कुछ खोज सके। नंदकिशोर आचार्य की आलोचना की यही पद्धति उसे पाठक-विरोधी विद्वत्ता से बचाती है। ज्ञान यहाँ प्रदर्शन नहीं, समझ का माध्यम है।
इस दृष्टि से उनकी आलोचना में साहित्य का लोकतांत्रिक स्वभाव भी दिखाई देता है। साहित्य किसी एक अंतिम अर्थ का राजाज्ञापत्र नहीं। वह संवाद है। उसमें लेखक बोलता है, पाठक सुनता है, फिर पाठक के भीतर से कोई नया प्रश्न निकलता है और वह प्रश्न फिर रचना की ओर लौटता है। आलोचना इस संवाद को गहरा करती है। वह रचना और पाठक के बीच ऐसी दूरी नहीं बनाती जिसमें केवल विशेषज्ञ प्रवेश कर सकें।
नंदकिशोर आचार्य की आलोचना का आकर्षण इसी मानवीय संवाद में है। वह कठिन प्रश्नों को सरल नहीं करती, लेकिन उन्हें मनुष्य से दूर भी नहीं जाने देती। वह साहित्य को ऊँचे आसन पर रखकर उसकी पूजा नहीं करती; उसे जीवन के बीच लाकर उसकी उपयोगिता भी नहीं घटाती। साहित्य उसके लिए जीवन का वह क्षेत्र है जहाँ मनुष्य स्वयं को, दूसरे को और संसार को नए ढंग से देखने की स्वतंत्रता अर्जित करता है।
इसलिए आचार्य की आलोचना को पढ़ते हुए अंततः साहित्य से अधिक मनुष्य की स्वतंत्र चेतना का प्रश्न सामने आता है। रचना तभी जीवित है जब उसमें प्रश्न करने की क्षमता है, भाषा तभी सार्थक है जब वह अनुभव को मुक्त करती है, आलोचना तभी उपयोगी है जब वह सोचने की स्वतंत्रता बचाए रखती है और पाठक तभी सचमुच पाठक बनता है जब वह रचना से अपने लिए कोई नया प्रश्न लेकर लौटता है। नंदकिशोर आचार्य की आलोचना इसी प्रश्नशील, स्वतंत्र और संवेदनशील मनुष्य की खोज है।
।। सात ।।
नंदकिशोर आचार्य की आलोचना को समग्रता में देखें तो वह हिन्दी आलोचना की उस संवेदनशील धारा का प्रतिनिधित्व करती है जिसमें साहित्य को केवल साहित्यिक विधा, विचारधारा या सामाजिक दस्तावेज मानकर संतुष्ट नहीं हुआ जाता। उनके लिए साहित्य मनुष्य के अनुभव, उसकी स्वतंत्रता, उसकी संवेदना और उसके आत्मबोध की एक गहरी रचनात्मक प्रक्रिया है। इसलिए उनकी आलोचना रचना के बाहर खड़े होकर उस पर निर्णय सुनाने के बजाय उसके भीतर उतरकर उसके अर्थ-स्रोतों को पहचानने का प्रयत्न करती है।
आचार्य के आलोचनात्मक संसार में अनुभव सबसे महत्त्वपूर्ण आधारों में है। रचना किसी विचार का यांत्रिक विस्तार नहीं, अनुभव का कलात्मक रूपांतरण है। अनुभव जब भाषा में प्रवेश करता है तो बदलता है, गहराता है और कभी-कभी अपने उस अर्थ तक पहुँचता है जिसे स्वयं रचनाकार ने पहले पूरी तरह नहीं जाना होता। इसीलिए उनकी आलोचना रचना के कथ्य के साथ-साथ उस आंतरिक प्रक्रिया को समझना चाहती है जिसमें अनुभव साहित्य बनता है। ‘रचना का सच’, ‘सर्जक का मन’, ‘अनुभव का भव’ जैसी कृतियों में यह दृष्टि अलग-अलग कोणों से दिखाई देती है।
उनकी आलोचना का दूसरा बड़ा आधार सत्य की खोज है। साहित्यिक सत्य उनके लिए तथ्य की पुनरावृत्ति नहीं, अनुभव की प्रामाणिकता है। रचना का सच उसके भीतर से पैदा होता है। वह किसी बाहरी सिद्धांत से प्रमाणित नहीं होता। इसीलिए वे साहित्यिक रचना को तैयार विचारों की कसौटी पर कसने से अधिक उसके अपने अनुभव-संसार में प्रवेश करने पर बल देते हैं।
अज्ञेय पर उनका चिंतन इस दृष्टि का विशिष्ट उदाहरण है। ‘अज्ञेय की काव्य-तितीर्षा’ में वे अज्ञेय की कविता के भीतर सक्रिय आत्मान्वेषण, स्वतंत्रता और सीमाओं के पार जाने की आकांक्षा को पहचानते हैं। यहाँ अज्ञेय का विश्लेषण करते हुए स्वयं आचार्य की आलोचना-दृष्टि भी सामने आती है। रचना उनके लिए एक खोज है और आलोचना उस खोज की सहयात्री। वह अंतिम अर्थ पर ताला नहीं लगाती, बल्कि अर्थ की नई खिड़कियाँ खोलती है।
नंदकिशोर आचार्य की आलोचना में साहित्य का अध्यात्म भी महत्त्वपूर्ण है। यह अध्यात्म किसी कर्मकांड या संकीर्ण धार्मिक अर्थ में नहीं, बल्कि मनुष्य के अस्तित्व के मूल प्रश्नों से जुड़ा है। साहित्य मनुष्य को उसके भीतर की बेचैनी, अकेलेपन, प्रेम, मृत्यु, स्वतंत्रता और सत्य से सामना करा सकता है। इस अर्थ में साहित्य आत्मान्वेषण का माध्यम है। उनकी आलोचना इसी अंतःयात्रा को पहचानती है।
उनके साहित्यिक चिंतन में स्वतंत्रता कोई अतिरिक्त मूल्य नहीं, रचनात्मकता की आधारभूमि है। लेखक की स्वतंत्रता, रचना की स्वायत्तता और आलोचना की प्रश्नशीलता एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। वे आलोचना को किसी पूर्वनिर्धारित वैचारिक आदेश का अनुचर नहीं बनाते। आलोचक को रचना से संवाद करते हुए अपने निष्कर्षों की भी परीक्षा करनी चाहिए। इसीलिए उनकी आलोचना में प्रश्न का महत्त्व उत्तर से कम नहीं है।
उनकी दृष्टि में परंपरा और आधुनिकता भी परस्पर विरोधी खेमे नहीं हैं। परंपरा तभी जीवित है जब वर्तमान उससे संवाद करे और उसे नए अर्थ दे। आधुनिकता तभी सार्थक है जब वह अपनी स्मृति से संबंध बनाए रखते हुए अपने समय के प्रश्नों को स्वतंत्र चेतना से देखे। साहित्य इस संवाद का सबसे संवेदनशील क्षेत्र है। आचार्य की आलोचना इसी जीवित सांस्कृतिक निरंतरता की खोज करती है।
उनकी भाषा आलोचना को विशेष ललितता प्रदान करती है। विचार की गंभीरता के बावजूद वह केवल विद्वत्ता का प्रदर्शन नहीं बनती। उसमें एक ऐसी आत्मीयता है जिसमें दर्शन जीवन से जुड़ता है और साहित्य विचार से। उनकी आलोचना पढ़ते हुए पाठक को लगता है कि वह किसी बंद सिद्धांत-भवन में नहीं, एक खुले विचार-प्रदेश में चल रहा है। यही कारण है कि उनकी आलोचना में विचार और संवेदना का संतुलन उसकी विशिष्ट पहचान बन जाता है।
नंदकिशोर आचार्य की आलोचना की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद यही है कि वह साहित्य को फिर से मनुष्य के पास ले आती है। कविता हो या आलोचना, भाषा हो या संस्कृति, परंपरा हो या आधुनिकता, अंतिम प्रश्न मनुष्य का ही है। साहित्य मनुष्य को कितना अधिक देखने, समझने और महसूस करने योग्य बनाता है, यही उसकी गहरी कसौटी है। इस कसौटी पर आचार्य की आलोचना साहित्य को जीवन से जोड़ती है, लेकिन उसे किसी उपयोगितावादी सूत्र में बाँधती नहीं।
इस अर्थ में नंदकिशोर आचार्य केवल कृतियों के व्याख्याकार नहीं, साहित्य के स्वभाव के अन्वेषक हैं। उनकी आलोचना निर्णय से अधिक संवाद, निष्कर्ष से अधिक खोज और सिद्धांत से अधिक अनुभव को महत्त्व देती है। वह पाठक को किसी निश्चित विचार की चौखट में बंद नहीं करती, बल्कि उसे रचना के साथ सोचने की स्वतंत्रता देती है। उनकी आलोचना का यही मानवीय विवेक और ललित वैचारिकता उसे हिन्दी आलोचना में विशिष्ट स्थान प्रदान करती है। साहित्य को पढ़ते-पढ़ते मनुष्य को पढ़ना और मनुष्य को पढ़ते-पढ़ते साहित्य के अर्थ तक पहुँचना उनकी आलोचना की सबसे बड़ी पहचान है।
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