— अरुण कुमार त्रिपाठी —
यह गांधी की आत्मकथा यानी ‘सत्य के मेरे प्रयोग’ का शताब्दी वर्ष है। हालांकि गांधी की आत्मकथा का शताब्दी वर्ष का ठीक ठीक निर्धारण कठिन है। क्योंकि गांधी ने आत्मकथा मूलतः गुजराती में लिखनी शुरू की और वह उनके दो प्रमुख पत्रों यंग इंडिया और नवजीवन में धारावाहिक रूप से नवंबर 1925 से फरवरी 1929 तक हर हफ्ते प्रकाशित हुई। इसका गुजराती नाम सत्यना प्रयोगो या आत्मकथा है जिसका पहला खंड 1926 में प्रकाशित हुआ। इसमें गांधी के जन्म से लेकर उनके लंदन प्रवास तक की कथा है। दूसरे खंड में उनके भारत में संघर्ष के आरंभिक दिन से लेकर दक्षिण अफ्रीका के संघर्ष और 1920 में हुए नागपुर के कांग्रेस सम्मेलन तक की कहानी है। गुजराती संस्करण का दूसरा खंड 1928 में आया। अंग्रेजी में यानी एन आटोबायोग्राफी आर द स्टोरी आफ मॉय एक्सपेरिमेंट विथ ट्रुथ क्रमशः 1927 और 1929 में प्रकाशित हुई। इसलिए गांधी जनों के लिए यह छूट है कि वे 1925 से लेकर 1929 तक कभी भी गांधी की आत्मकथा का शताब्दी वर्ष मना सकते हैं। उनकी आत्मकथा का हिन्दी नाम सत्य के साथ मेरे प्रयोग है जिसका गुजराती से अनुवाद काशीनाथ त्रिवेदी ने किया है। जबकि गुजराती से अंग्रेजी का अनुवाद महादेव देसाई और प्यारेलाल ने किया है।
धार्मिक पुस्तकों, जिनकी पहुंच असाधारण होती है, को छोड़ दें तो किताबों की दुनिया में गांधी की आत्मकथा व्यावसायिक तौर पर अपनी वैश्विक व्याप्ति रखती है। अनुमानित तौर पर अब तक इस पुस्तक की एक करोड़ से अधिक प्रतियां बिक चुकी हैं। पुस्तक के मूल प्रकाशक नवजीवन ट्रस्ट ने देश में 58 लाख प्रतियां बेची हैं। हर साल इसकी दो लाख से अधिक प्रतियां बिकती हैं। इसका 16 भाषाओं में अनुवाद भी हो चुका है। पुस्तक का पहला अंग्रेजी संस्करण कर्नाटक प्रेस ने छापा और खाकी कपड़े में उसकी जिल्द थी। गांधी ने आत्मकथा की पूरी वसीयत नवजीवन ट्रस्ट को दे दी। उन्हें इस बात का अहसास था कि यह पुस्तक बिकेगी और इसकी आय से यह ट्रस्ट चलता रहेगा। हालांकि आज ट्रस्ट की जो स्थिति है उसे देखकर रोना ही आता है। उनकी वसीयत की भाषा कुछ इस प्रकार है, “ मेरे पास कोई संपत्ति नहीं है। फिर भी इस आश्रम को चलाने वाली नवजीवन ट्रस्ट नामक जो संस्था है, मैं अपनी उन पुस्तकों जो मैंने लिखी हैं या जो मैं लिखूंगा और अन्य वस्तुओं के सारे अधिकार देता हूं। इन चीजों से जो भी आय होगी उसका प्रयोग ट्रस्ट के निर्देशों के अनुसार सत्याग्रह आश्रम को चलाने में किया जाएगा।”
गांधी की आत्मकथा नवंबर 1925 में नवजीवन और यंग इंडिया में धारावाहिक छपने लगी। उसे वे अहमदाबाद के साबरमती आश्रम में रह कर लिख रहे थे। उससे ठीक पहले वे दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह का इतिहास लिख चुके थे। वह पुस्तक 1924 से 1925 के बीच नवजीवन और यंग इंडिया में धारावाहिक रूप से प्रकाशित हुई थी। आत्मकथा ठीक उसके बाद प्रकाशित होना शुरू हुई। जाहिर सी बात है कि दोनों पुस्तकों के विचार गांधी के दिमाग में एक साथ ही चल रहे थे। हो सकता है लेखन भी एक साथ ही चल रहा हो। दोनों पुस्तकों की कथा एक दूसरे में प्रवेश करती है और एक दूसरे से बाहर भी निकलती है। यानी वे ओवरलैप करती हैं। इसलिए यह सवाल उठ सकता है कि दोनों ही संस्मरण हैं तो उनमें अंतर क्या है। एक तो दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह का इतिहास व्यक्तिगत से अधिक समष्टिगत है। उसमें आत्मनियंत्रण, ब्रह्मचर्य जैसे प्रयोगों से अधिक राजनीतिक कार्रवाइय़ों और उनके प्रभावों का वर्णन है। उसमें दक्षिण अफ्रीका का राजनीतिक इतिहास भी बड़े खूबसूरत ढंग से वर्णित है। उसका भूगोल भी उसमें है। कुछ टीकाकारों का कहना है कि दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह का इतिहास यह बताती है कि कैसे उन्होंने सत्याग्रह के हथियार की खोज की। वह पुस्तक यह साबित करने के लिए थी कि एक जगह सत्याग्रह का हथियार सफल हो चुका है और अब मैं उसे भारत पर लागू करने जा रहा हूं। लेकिन सत्य क्या है और उसे गांधी एक व्यक्ति के रूप में अपने निजी जीवन में कैसे साधते हैं यह बात आत्मकथा में अधिक गहराई से उभरी है। रायचंद, रस्किन, टालस्टाय और थोरो उन्हें कैसे प्रभावित करते हैं इसका वर्णन आत्मकथा में मिलेगा।
एक टीकाकार का तो यह कहना है कि आत्मकथा का नायक गांधी नहीं सत्य है। गांधी तो उस सत्य नामक नायक के महज उपकरण हैं। गांधी यह बताते हैं कि सत्य जैसी दुधारी तलवार कैसे उसका प्रयोग करने वाले को भी घायल करती है। दक्षिण अफ्रीका वाली किताब में निजता कम है जबकि आत्मकथा स्वान्तः सुखाय अधिक है। वे आत्मकथा में लिखते हैं, “ मैं समाज की सेवा में पूरी तरह से डूब गया था तो उसका कारण यह था कि मैं आत्मसिद्धि प्राप्त करना चाहता था। मैंने सेवा का अपना धर्म विकसित किया था क्योंकि मुझे लगता था कि ईश्वर सेवा से ही मिल सकता है।”
आत्मकथा की भूमिका में गांधी लिखते हैं, “ राजनीतिक क्षेत्र में जो मेरे प्रयोग हैं वे अब भारत ही नहीं बल्कि एक हद तक पूरी दुनिया में विदित हैं। मेरे लिए उसका कोई मूल्य नहीं है। और उन कामों का और भी कम मूल्य है जिनके नाते मैंने महात्मा की उपाधि पाई है। क्योंकि इस उपाधि ने मुझे पीड़ा दी है और शायद ही ऐसा कोई समय हो जब वह मुझमें दिखाई पड़ती हो। मैं तो दरअसल आध्यात्मिक क्षेत्र के अपने अनुभव को बताना चाहता हूं जो मुझे ही मालूम है और जहां से मुझे राजनीतिक क्षेत्र में कार्य करने की शक्ति प्राप्त होती है।
गांधी की आत्मकथा ने मानवता पर असर डाला है लेकिन जो वास्तविक और प्रभावी असर होना है लगता है वह अभी बाकी है। उसकी वजह यह भी है कि पुस्तक की कथा अवधि गांधी के जीवन के 50 वर्षों तक ही सीमित है। पुस्तक की कथा वहीं पर ठहर जाती है। गांधी इसकी दो वजहें बताते हैं। एक तो उसके बाद का उनका प्रयोग अपना न होकर कांग्रेस के साथ किया गया प्रयोग है और दूसरे उसके बाद उनका जीवन इतना सार्वजनिक हो गया कि कुछ नया कहने लायक बचता नहीं। आत्मकथा का उपसंहार करते हुए गांधी लिखते भी हैं कि मैं बड़े दुःख के साथ पाठकों से विदा लेता हूं। मैंने सच्ची कहानी कहने में बड़ी पीड़ा उठाई है।
गांधी के जीवनी लेखक और उनके पोते राजमोहन गांधी ‘मोहनदासः अ ट्रू स्टोरी आफ अ मैन हिज पीपुल एंड एन इम्पायर’ में लिखते हैं कि पुस्तक के आरंभ में गांधी ने स्वीकार किया है कि उन्होंने कुछ छोड़ दिया। ‘कुछ चीजें मेरे और मेरे रचनाकार के बीच की हैं। वे अकथनीय हैं।’ वैसी चीजें क्या हो सकती हैं इसका महज अनुमान ही लगाया जा सकता है। वे परमेश्वर से की गई सख्त शिकायतें हो सकती हैं। अधूरी उम्मीदों की पीड़ा हो सकती है। या वे विशेष ईश्वरीय संदेश हो सकते हैं। क्या था कुछ कहा नहीं जा सकता। कुछ ऐसी चीजें थीं जो दूसरों को मालूम थीं और वे डरे हुए थे कि गांधी अपनी आत्मकथा के धारावाहिक लेखन में उसका जिक्र करेंगे पर उन्होंने उसे छोड़ दिया तो लोगों ने राहत की सांस ली। जैसे कि सरला देवी चौधुरानी का प्रसंग। वे तब जीवित थीं और संभवतः गांधी उन्हें कोई नया दुःख नहीं देना चाहते थे। शेख मेहताब की घटना का जिक्र हुआ पर उनका नाम नहीं लिया गया। मेहताब वे व्यक्ति थे जो गांधी को मांसाहार और वेश्यावृत्ति की ओर ठेलना चाहते थे। गांधी की आत्मकथा जब साप्ताहिक पत्रों में धारावाहिक छप रही थी तब उनके दक्षिण अफ्रीका के साथियों ने भी कठोर आपत्तियां उठाई थीं। उनके एक थे उनके साथी हेनरी पोलक। पोलक ने कहा कि गांधी कैसे दक्षिण अफ्रीका के उस यहूदी सर्राफ गैबरिल आइजक को भूल सकते हैं जिन्होंने भारतीयों की दिल खोलकर मदद की। जबकि गांधी की निजी सचिव रही सोनजा श्लेसिन को श्रीमती बोग्ट का जिक्र न करने की शिकायत थी। उनकी शिकायत यह भी थी कि गांधी को उनके निजी पत्रों को गोपनीय रखना चाहिए था और अगर उनको सार्वजनिक करना ही था तो उनसे अनुमति लेकर करना था। उन्होंने इस विश्वास भंग की संज्ञा दी और आठ पेज का कड़ा पत्र लिखकर कहा कि जो बात यंग इंडिया में लिख दिया उसे पुस्तक में न डालें। उन्होंने कुछ और आपत्तियां उठाते हुए कहा कि महात्मा को झूठ नहीं बोलना चाहिए। गांधी के दूसरे नंबर के बेटे मणिलाल को भी कुछ चीजें छूट जाने की शिकायत थी।
लेकिन दक्षिण अफ्रीका को कुछ संवाददाताओं को इस बात की खुशी थी कि गांधी ने बहुत बेबाकी से लिखा है। एक ने तो कहा कि कस्तूरबा के साथ क्रूरता की बात को लिखना बड़े साहस का काम है। उसका उत्तर देते हुए गांधी ने कहा, “ जाहिर सी बात है कि आप ने यह नहीं सोचा होगा कि मैंने इस क्रूरता का स्मरण गर्व के साथ किया है या मैं किसी प्रकार की क्रूरता करने लायक हूं। लेकिन जो मुझे एक सज्जन और पत्नी को प्यार करने वाले व्यक्ति के रूप में देखते हैं उन्हें मालूम होना चाहिए कि मैं एक जानवर भी हूं। तभी एक मित्र ने मुझे एक पवित्र गाय और हिंस्र व्याघ्र भी कहा है।”
अंग्रेजों के अखबार टाइम्स आफ इंडिया ने लिखा, “ पुस्तक पढ़कर लगता है कि यह व्यक्ति महाअहंकारी है। यह एक ऐसे व्यक्ति की आत्मकथा है जो दंभी है और मानव व्यवहार के बारे में अपने प्रयोगों पर आत्मसंतुष्ट है। कामेच्छा और संपत्ति की इच्छा मनुष्य की सामान्य इच्छाएं हैं। जबकि गांधी ब्रह्मचर्य और संपत्ति त्याग की बात करते हैं। बोल्शेविकों ने रूस में निजी संपत्ति समाप्त करने की कोशिश की लेकिन वे सफल नहीं हुए। गांधी वह करना चाहते हैं जिसकी आशा सोवियतों ने छोड़ दी।” लेकन शंघाई के एक अंग्रेजी अखबार ने गांधी की आत्मकथा की सूक्ष्म और गंभीर समीक्षा की। उसने लिखा कि दुनिया में बहुत कम संत ऐसे हुए हैं जिन्होंने अपनी आत्मा को बेझिझक तौर पर प्रचार की अग्निपरीक्षा के समक्ष अरक्षित छोड़ दिया है। हालांकि गांधी एक गंभीर और धैर्यवान चिंतक नहीं हैं पर वे एक धुनी व्यक्ति जरूर हैं जिन्होंने अपने पाठकों पर भोजन, दवा और हाथ की कताई को लेकर पन्ने दर पन्ने उतार दिए हैं।” द चाइना प्रेस नामक यह अखबार 16 फरवरी 1930 को ‘ए सेंट आन हिज केस’ अपनी टिप्पणी में लिखता है, “ किताब आसानी से पढ़ी जा सकती है। इसलिए हमारी सहानुभूति उसके साथ है। पुस्तक में स्पष्टवादिता है और ईसाइयत की सच्ची भावना भी है जो कि हर चीज को ताजा और मधुर बनाए रखती है। एक तरह से विस्मयकारी खिचड़ी बनाती है।”
इस तरह तमाम प्रतिकूल और मिली जुली टिप्पणियों के साथ गांधी की आत्मकथा के प्रति रुचियां बढ़ने लगीं। बढ़ने लगी हिन्दी, उर्दू, पंजाबी, तमिल, बंगाली, फ्रांसीसी, जर्मन, डैनिश, जापानी और नार्वे के संस्करणों की मांग। गांधी का कहना था कि हमारी आत्मकथा भारतीय भाषाओं में छपे पर उसमें से कुछ हटाया न जाए। अंग्रेजी संस्करण छपने पर वे बहुत प्रसन्न थे। लेकिन विदेशी भाषाओं को अधिकार देने से पहले वे प्रतीक्षा करना चाहते थे। 1926 में ही उनके एक प्रशंसक और न्यूयार्क के पादरी जान हेयन्स होम्स ने कहा कि उन्हें मैकमिलन से बातचीत करने के लिए इजाजत चाहिए। ताकि इसका अंग्रेजी संस्करण पूरी दुनिया में बेचा जा सके। गांधी ने इजाजत दे दी। लेकिन खुद कुछ लिखकर नहीं दिया।
अप्रैल 1928 में लंदन के अखबार ‘आब्जर्वर’ ने पुस्तक के कुछ अंश छापे और गांधी आन हिमसेल्फ शीर्षक के टिप्पणी लिखी। अखबार का कहना था कि उन्होंने हाड़ मांस की चेतना के ऊपर आत्मा की चेतना को स्थापित कर दिया। जबकि बाल्टीमोर में सन अखबार के संपादक एच. एल मेंचेन ने लिखा—“-इस पुस्तक से पता चलता है कि पूरब और पश्चिम में कितना अंतर है। हम पश्चिम के लोग गांधी की प्रशंसा करते हैं लेकिन उनके बताए रास्तों पर चल नहीं सकते। और मैं मानता हूं यह सही भी है।’’ यह सारी टिप्पणियां खासकर आब्जर्वर की टिप्पणी पूरे ब्रिटेन में पढ़ी गई। इस बीच कर्टिस ब्राउन नामक कंपनी के लिटरेरी एजेंट डेविड हिगमैन ने कहा कि उनका प्रकाशन आत्मकथा को छापना चाहता है। ऐसे तमाम प्रयास दुनिया भर के प्रकाशकों की ओर से चलने लगे थे। गांधी जानते थे कि उनके पास कोई संपत्ति नहीं है। इसलिए नवजीवन ट्रस्ट का व्यय चलाने के लिए उसे वे विचार की संपत्ति देना चाहते थे। इसी नजरिए से गांधी ने 1929 में अपनी आत्मकथा के अमेरिकी अधिकार मैकमिलन कंपनी आफ न्यूयार्क को तकरीबन एक लाख रुपए यानी 7500 पौंड स्टर्लिंग में बेंच दिए। यह सारा पैसा खादी को चला गया। जबकि सीएफ एंड्रूज ने ब्रिटिश संस्करण के लिए जार्ज एलेन एंड अनविन से बात की। लेकिन एंड्रूज का मत था कि इस किताब को संक्षिप्त करके प्रकाशित किया जाए। संक्षेपीकरण का काम उन्होंने स्वयं किया। कहने की आवश्यकता नहीं कि वे गांधी के अनन्य मित्र थे और वे गांधी को महात्मा और जी कहने के बजाय मोहन कहते थे।
गांधी के मित्र और नोबेल साहित्यकार रोम्यां रोलां ने गांधी की आत्मकथा उसी समय पढ़ ली जब वह दो साप्ताहिकों में धारावाहिक रूप से प्रकाशित हो रही थी। क्योंकि वे आत्मकथा के प्रकाशन आरंभ होने से पहले ही ‘महात्मा गांधी’ नाम से उनकी प्रसिद्ध जीवनी लिख चुके, जिसमें उन्होंने गांधी की तुलना ईसा मसीह से की थी। उनकी पुस्तक के स्रोत के तौर पर यंग इंडिया के अंक और रवींद्र नाथ टैगोर से हुई बातचीत काम आई थी। आत्मकथा के प्रकाशन के दौरान गांधी की शिष्या और अंग्रेज महिला मैडलीन स्लेड यानी मीरा बहन उन्हें उसके बारे में जानकारी भेज दिया करती थीं। रोलां ने आत्मकथा में दर्शायी गई गांधी की संवेदनशील और निष्कलुष ईमानदारी की तारीफ की और कहा कि वह ऐसा संत है जो बिना नकाब के रहता है। जबकि पारंपरिक संत अपने को काफी तोप ढक कर रहते हैं। लेकिन उन्होने विज्ञान और तार्किकता को न स्वीकार करने के लिए गांधी की आलोचना की और यह भी कहा कि गांधी में हिंदू और जैन परंपरा का गहरा कट्टरपन है।
रोमां रोलां ने गांधी की आत्मकथा के फ्रांसीसी संस्करण की भूमिका लिखी। वह लंबी है और उसमें इस पुस्तक की विशिष्टता उभरती है। वे लिखते हैं, “ आप जिस महान पुस्तक को पढ़ रहे हैं वह सामान्य अर्थों में लिखी गई आत्मकथा नहीं है। क्योंकि जैसा कि पश्चिम के महान लेखकों की आत्मकथाएं होती हैं उनमें या तो आत्मरति होती है या फिर नैतिक प्रदर्शन होता है। न ही उसमें तालस्ताय या ज्यां जैक्स की आत्मकथा जैसा सौंदर्यबोध है। गांधी 26 नवंबर 1925 को लिखी गई अपनी प्रदीप्त करने वाली भूमिका में बड़ी कठिनाई से इस बात से इंकार करते हैं। मुझे अफसोस है कि सी. एफ एंड्रूज ने अपने संक्षिप्त संस्करण में उसे हटा दिया है। यह पुस्तक कर्म के बारे में है और कर्म को हासिल करने के लिए ही लिखी गई है। हमारे समय का जो भी व्यक्ति कर्मयोगी है पुस्तक उसके लिए मंगलप्रभात की तरह से होनी चाहिए। इसका मतलब यह नहीं है कि वे पुस्तक के निर्देशों का पालन करें। गांधी वैसा चाहते भी नहीं। उन्होंने कभी अपने प्राधिकार का दावा भी नहीं किया। बल्कि वे चाहते हैं कि हर व्यक्ति इसकी मुक्त होकर व्याख्या करे और अपने विवेक की रोशनी में उसे समझे। लेकिन इस काम में हर व्यक्ति को तथ्यात्मक निर्देशों की अगणनीय संपदा मिलेगी। यह संपदा यह बताती है कि कैसे अपने पर काम किया जाए, कैसे दूसरों पर काम किया जाए और कैसे एक राष्ट्र के नागरिकों और आज के राष्ट्र पर काम किया जाए।
वे जिस सटीक तरीक से हर काम को करते हैं उसी अर्थ में वे पुस्तक का नाम सत्य के मेरे प्रयोग यानी माइ एक्सपेरीमेंट्स विथ ट्रुथ रखते हैं। यहां प्रयोग शब्द को रेखांकित किया जाना चाहिए। साथ अच्छा होगा कहा जाए कि सत्य पर प्रयोग न कि सत्य के साथ प्रयोग। यहां पर सत्य को उस ब्रहमांडीय तत्त्व के रूप में देख गया है जिसके ऊपर प्रयोग किया जा सकता है। यह प्रयोग वैसे ही है जैसे अल्बर्ट आइंस्टीन कैलीफोर्निया की प्रयोगशाला में प्रकाश पर कर रहे हैं।
पूरी किताब यानी गांधी का पूरा जीवन तथ्यों पर आधारित प्रयोगों की एक शृंखला है। यह शृंखला उनके बचपन से शुरू होती है और इसका विकास कभी रुका नहीं। यह धैर्यपूर्वक बिना रुके हुए एक कड़ी से दूसरी कड़ी की ओर बढ़ रही है। इसके धागे ऐसे बढ़ रहे हैं जो तीस करोड़ भारतीयों को अपने घेरे में लेते जा रहे हैं। यह शृंखला जल्द ही पूरे संसार को अपने घेरे में ले लेगी फिर भी संपूर्ण नहीं मानी जाएगी। इस बारे में वे स्पष्ट रूप से कहते भी हैं—-मौजूदा प्रयोगों के आधार पर निकाले गए मेरे निष्कर्ष फैसलाकुन नहीं कहे जा सकते। फिर भी मैं इन प्रयोगों को काफी महत्त्व देता हूं। मेरे निष्कर्ष पूरी तरह से सही लगते हैं। पर मैं उन्हें अपनी तरफ से संपूर्णता से काफी दूर पाता हूं। मेरा मानना है वे वैसे ही हैं जैसे एक वैज्ञानिक के प्रयोग होते हैं। वैज्ञानिक अपने प्रयोग एकदम शुद्धता के साथ करता है, उसके साथ आगे की सोचता है और सूक्ष्मता का ध्यान रखता है लेकिन अपने निष्कर्षों को कभी भी अंतिम नहीं मानता। बल्कि उनके बारे में खुला दिमाग रखता है।”
गांधी की आत्मकथा की प्रशंसा आयरलैंड के नाटककार और आलोचक जार्ज बर्नार्ड शा ने भी की और कहा कि वे आत्मकथा इसलिए नहीं लिखेंगे क्योंकि वे गांधी जितने ईमानदार नहीं हो सकते। उनका मानना था कि ज्यादातर आत्मकथाएं झूठ का पुलिंदा होती हैं। लेकिन गांधी की आत्मकथा उस परंपरा की अपवाद है। अमेरिका के काले लोगों के नागरिक अधिकारों के पुरोधा मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने 1950 के दशक में गांधी की आत्मकथा 21 साल की उम्र में तब पढ़ी जब वे पेनसिल्वेनिया के किंग क्रोजर थियोलाजिकल सेमिनरी में एक छात्र थे। उसके एक दशक बाद उन्होंने उसे अपने आंदोलन की प्रेरणा शक्ति के रूप में स्वीकार किया।
दक्षिण अफ्रीका के अश्वेत नेता ने अपने 27 साल के जेल जीवन में गांधी से बहुत कुछ सीखा। उन्हें 1964 से 1982 तक राबिन आइलैंड पर अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस के साथियों के साथ कैद रखा गया था। तब उन लोगों ने उस जेल को एक विश्वविद्यालय का रूप दे दिया था। वैसे कहा जाता है कि मंडेला की रुचि ‘दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह का इतिहास’ में अधिक थी क्योंकि उसमें दक्षिण अफ्रीका में गांधी के संघर्ष की कहानी और सत्याग्रह जैसे आयुध के आविष्कार का रहस्य छुपा था। गांधी की दोनों महत्त्वपूर्ण पुस्तकें ‘दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह का इतिहास’ और ‘सत्य के मेरे प्रयोग’ एक के बाद एक होने वाले रचनात्मक उत्पाद हैं। दक्षिण अफ्रीका 1924 से 1925 तक धारावाहिक छपी तो आत्मकथा नवंबर 1925 से 1929 तक। एक पुस्तक राजनीतिक है तो दूसरी पूरी तरह से निजी और आध्यात्मिक। लेकिन गांधी के पुस्तक लिखने का यह समय राजनीतिक सक्रियता से विश्राम का समय है। इस समय वे एक ओर देश और दुनिया के समक्ष अपने को सत्य के सिपाही साबित करना चाहते थे तो दूसरी ओर एक सच्चा हिंदू। वे कितने सफल हुए यह तो आने वाला समय ही बताएगा। जाहिर है समय कभी रुकता नहीं इसलिए गांधी की आत्मकथा यानी उनके सत्य के प्रयोग रुके नहीं हैं। वे किसी न किसी रूप में उनके जैसे किसी और के द्वारा किए ही जा रहे हैं।
संदर्भः—
1-महात्मा गांधी, एन आटोबायग्राफी आर माय एक्सपेरीमेंट विथ ट्रुथ, नवजीवन पब्लिशिंग हाउस, अहमदाबाद.
2-गांधी, दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह का इतिहास, नवजीवन.
3-राजमोहन गांधी, मोहनदास-ए ट्रू स्टोरी आफ ए मैन, हिज पीपुल एंड एन एम्पायर,पेन्गुइन रैंडम हाउस इंडिया.
4-रामचंद्र गुहा, गांधी, द ईयर्स दैट चेंज्ड द वर्ल्ड, 1914-1948, पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया.
5-रोमां रोलां एंड गांधी करेस्पांडेंस, पब्लिकेशन्स डिवीजन.
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