— शिवानन्द —
आज़ाद भारत में भी अंग्रेज़ों के ज़माने की पुलिसिया बर्बरता और औपनिवेशिक प्रशासनिक व्यवस्था आज तक जारी है। इसमें सुधार की सख़्त ज़रूरत है, लेकिन इस पर कभी गंभीरता से चर्चा नहीं होती। आज देश भर में, विशेषकर दिल्ली में, पुलिस हिरासत के दौरान युवाओं और युवतियों के साथ मारपीट, बदसलूकी और अमानवीय व्यवहार की जो घटनाएँ सामने आ रही हैं, वे अत्यंत चिंताजनक हैं और हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न खड़ा करती हैं। स्वयं पीड़ितों के बयान इस बात के गवाह हैं कि प्रशासन किस कदर संवेदनहीन हो चुका है।
डिटेंशन वैन जैसी घुटन भरी गाड़ियों में लोग पानी के लिए छटपटाते रहे, लेकिन पुलिसकर्मियों के पास पानी होते हुए भी उन्हें पानी नहीं दिया गया। इनमें से दो लोग तो प्यास के कारण बेहोश हो गए, लेकिन पुलिस का रवैया निर्मम बना रहा। थानों में गिरफ्तार लोगों को पीटा गया। यहाँ तक कि महिलाओं को भी नहीं बख़्शा गया। आखिर हमारी पुलिस और प्रशासनिक व्यवस्था में यह जनविरोधी भावना क्यों भरी हुई है?
लेकिन ऐसा नहीं है कि पुलिस और प्रशासन का यह जनविरोधी चरित्र नया है। इसका एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण 1947 की घटना है।
देश अभी आज़ाद नहीं हुआ था, लेकिन आज़ादी की तारीख की घोषणा हो चुकी थी। बिहार में कांग्रेस की सरकार थी और श्री बाबू उस सरकार के प्रमुख थे। उन्हीं दिनों बिहार के कुछ हिस्सों में दुर्भिक्ष की स्थिति पैदा हो गई थी। लोगों को भरपेट खाना नहीं मिल रहा था। सरकार और प्रशासन का ध्यान इस समस्या की ओर आकर्षित करने के लिए सूरज नारायण सिंह के नेतृत्व में दरभंगा में गरीबों का एक बड़ा जुलूस निकाला गया।
सूरज बाबू बिहार के बड़े नेताओं में थे। 1942 में जयप्रकाश नारायण के साथ हजारीबाग जेल से भागने वालों में वे भी शामिल थे। उनके नेतृत्व में आज़ाद हिंद दस्ता ने नेपाल के हनुमान नगर स्थित पुलिस हाजत पर हमला कर वहाँ बंद जयप्रकाश नारायण और डॉ. राममनोहर लोहिया को मुक्त कराया था।
उन्हीं सूरज बाबू के नेतृत्व में निकले हजारों भूखे लोगों के जुलूस पर पुलिस और प्रशासन ने बेरहमी से लाठियाँ चलाईं। दर्जनों लोगों को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया। दरभंगा और मधुबनी में भूखे लोगों के प्रदर्शन और जुलूस आयोजित किए गए थे, ताकि प्रशासन का ध्यान खाद्यान्न संकट की ओर जाए।
हजारों किसान-मजदूरों ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया। इनमें हिंदू-मुसलमान, स्त्री-पुरुष सभी शामिल थे। उपलब्ध विवरणों के अनुसार, पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर लाठियाँ चलाईं, महिलाओं को भी पीटा और 97 लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया।
इस घटना से आहत होकर सूरज नारायण सिंह ने गांधी जी को पत्र लिखा और एक मार्मिक सवाल पूछा था—“क्या यही वह हुकूमत है, जिसके लिए आज सोलह वर्षों से कांग्रेस के एक ईमानदार सिपाही की हैसियत से लड़ता आया हूँ?”
यह एक लंबी चिट्ठी है, जिसे पढ़ा जाना चाहिए। इस पत्र में आज़ादी की दहलीज़ पर खड़े देश में सत्ता और जनता के बीच के रिश्ते को लेकर उठी पीड़ा और निराशा को समझा जा सकता है।
1965 का वह दिन, जब मैंने पुलिस की लाठी खाई
मुझे 1965 का वह दौर याद है। तब कांग्रेस की सरकार थी और के. बी. सहाय मुख्यमंत्री थे। 9 अगस्त को ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की याद में डॉ. राममनोहर लोहिया के आह्वान पर बिहार में आंदोलन हुआ था। यह एक जुझारू आंदोलन था। कई स्थानों पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया और कुछ जगहों पर आँसू गैस का भी इस्तेमाल हुआ।
डॉ. लोहिया उन दिनों पटना में ही थे। उन्हें सर्किट हाउस के सामने गिरफ्तार किया गया था। उनके साथ भोला प्रसाद सिंह भी थे। संभवतः पटना से प्रकाशित अंग्रेज़ी अख़बार सर्चलाइट के संपादक टी. एस. जॉर्ज को भी गिरफ्तार कर लिया गया था। डॉ. लोहिया को रात भर कोतवाली थाने में कुर्सी पर बैठाकर रखा गया और अगले दिन सुबह हजारीबाग जेल भेज दिया गया।
इन घटनाओं के विरोध में पटना के गांधी मैदान में एक सभा आयोजित की गई। इसे औपचारिक सभा इसलिए कहा जा सकता है कि पटना और आसपास के जिलों में धारा 144 लागू थी। शहर में भय का माहौल था। इसलिए सभा का सार्वजनिक ऐलान करना संभव नहीं था। लोगों को मुँहज़बानी सूचना देकर बुलाया गया था। गैर-कांग्रेसवाद का दौर था। विभिन्न विपक्षी दलों के नेता और कार्यकर्ता ही इस विरोध सभा में पहुँचे थे।
उस ऐतिहासिक सभा की अध्यक्षता संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के नेता रामानंद तिवारी जी कर रहे थे। मंच पर और कौन-कौन मौजूद थे, यह अब याद नहीं है। लेकिन कम्युनिस्ट पार्टी के नेता चंद्रशेखर सिंह जी भी मंच पर मौजूद थे, यह मुझे ज़रूर याद है।
मंच के नीचे कर्पूरी ठाकुर जी, पटना के सांसद कॉमरेड राम अवतार शास्त्री तथा अन्य लोग बैठे हुए थे। मैं भी उन्हीं लोगों के साथ बैठा था।
अचानक राइफलधारी पुलिस की एक टुकड़ी आकर मंच के पास खड़ी हो गई। हम लोग कुछ समझ पाते, इससे पहले ही लाठीधारी पुलिसकर्मियों का एक जत्था वहाँ पहुँच गया। उनमें से कुछ मंच पर चढ़ गए और कुछ हमारी तरफ़ आए। बिना कुछ कहे उन्होंने लाठियाँ बरसानी शुरू कर दीं।
उस समय मेरी उम्र लगभग बाईस वर्ष रही होगी। मैं तुरंत उठकर भागा। पंद्रह अगस्त के उत्सव की तैयारी के लिए गांधी मैदान में बाँस-बल्ले लगाए गए थे। वहाँ से पलटकर देखा तो बाबूजी पर नज़र पड़ी। वे मंच पर खड़े थे। पुलिसवाले मंच पर मौजूद नेताओं पर लाठियाँ बरसा रहे थे। मैंने देखा कि एक पुलिसकर्मी ने दोनों हाथों से बाबूजी की पीठ पर बेंत वाला डंडा मारा। उस चोट से उनके चेहरे का रंग उड़ गया।
यह देखकर मैं दौड़कर वापस लौटा और बाबूजी से लिपट गया। तब तक तीन-चार लाठियाँ मेरी पीठ पर भी पड़ चुकी थीं। एक पुलिसवाले ने डंडे के मुठ से मेरी पीठ पर प्रहार किया। चोट इतनी ज़ोरदार थी कि मेरी साँस अटक गई। मेरे मुँह से अचानक निकला—“जान गइल हो दादा!”
बाबूजी ने कहा, “भागो यहाँ से।”
मैं पुलिसवाले के हाथ से अपने आपको छुड़ाकर वहाँ से भागा। पुलिस की लाठी का वह मेरा पहला अनुभव था।
बाद में पता चला कि कर्पूरी जी के हाथ की हड्डी टूट गई थी। सीपीआई के नेता चंद्रशेखर सिंह जी के सिर के पीछे ऐसी लाठी लगी कि वे बेहोश होकर मंच के नीचे गिर पड़े। उनकी ओर किसी का ध्यान भी नहीं गया। वहाँ मौजूद लगभग सभी लोगों को कमोबेश लाठियों की चोटें आई थीं।
सरकार की ओर से बयान जारी किया गया कि पंद्रह अगस्त की तैयारियों के लिए गांधी मैदान में जो बाँस-बल्ले लगाए गए थे, ये लोग उन्हें आग लगाने की कोशिश कर रहे थे। इसलिए पुलिस को मजबूरन लाठीचार्ज करना पड़ा।
उन दिनों संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के बिहार प्रदेश अध्यक्ष प्रणव कुमार चटर्जी जी थे। उन्होंने सरकार के इस आरोप का खंडन करते हुए मेरी ओर से घटना का आँखों देखा बयान तैयार किया और उसे अख़बारों में प्रकाशन के लिए भेजा था।
दोषियों पर कार्रवाई न होना भी एक अपराध था
विडंबना यह है कि इस घटना के केवल दो वर्ष बाद बिहार में महामाया बाबू के नेतृत्व में गैर-कांग्रेसी सरकार बनी। उस सरकार में कर्पूरी ठाकुर जी उपमुख्यमंत्री बने और रामानंद तिवारी जी पुलिस मंत्री। चंद्रशेखर बाबू भी उस सरकार में शामिल थे।
लेकिन दो वर्ष पहले प्रशासन द्वारा की गई इस गंभीर कार्रवाई के विरुद्ध उस सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की।
आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो मानता हूँ कि 1965 की घटना के दोषी अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई न करना उस सरकार की गंभीर चूक थी। अगर कार्रवाई हुई होती, तो वह भविष्य के लिए एक नज़ीर बनती। पुलिस और प्रशासन को यह संदेश मिलता कि सत्ता बदल जाने से जवाबदेही का प्रश्न समाप्त नहीं हो जाता और सरकारी पद पर बैठे किसी व्यक्ति को कानून से ऊपर नहीं माना जा सकता।
औपनिवेशिक ढाँचे से मुक्ति कब?
इस पूरे रवैये के मूल में हमारी प्रशासनिक और पुलिस व्यवस्था का वह ढाँचा है, जिसे हमने अंग्रेज़ों से विरासत में हासिल किया था। अंग्रेज़ों ने यह व्यवस्था जनता की सेवा और सुरक्षा के लिए नहीं, बल्कि अपने शासन को बनाए रखने तथा सत्ता के विरुद्ध उठने वाले असंतोष को कुचलने के लिए बनाई थी। आज़ादी के बाद भी इस ढाँचे के मूल चरित्र में कोई बुनियादी बदलाव नहीं किया गया।
नतीजा यह है कि पुलिस और प्रशासन संविधान के दायरे में निष्पक्ष रूप से काम करने के बजाय कई बार सरकारों की इच्छा पूरी करने का माध्यम बन जाते हैं। अलग-अलग राज्यों में बुलडोज़र की कार्रवाई हो या आंदोलनों का दमन, पुलिस और प्रशासन की भूमिका को लेकर बार-बार सवाल उठते रहे हैं। जनता की आवाज़ को सुनने और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने के बजाय, सरकारी आदेशों के पालन को प्राथमिकता दिए जाने की प्रवृत्ति लोकतंत्र के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
आज इस बात पर बेहद गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है कि देश को इस औपनिवेशिक और दमनकारी पुलिस व्यवस्था से कैसे मुक्ति दिलाई जाए। इसके लिए पुलिस को राजनीतिक दबाव से मुक्त करना, हिरासत में होने वाली हिंसा की स्वतंत्र और निष्पक्ष जाँच सुनिश्चित करना तथा दोषी अधिकारियों की जवाबदेही तय करना आवश्यक है। पुलिस सुधार केवल प्रशासनिक विषय नहीं है; यह लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों से जुड़ा प्रश्न है।
जब तक पुलिस और प्रशासनिक व्यवस्था के मूल चरित्र में बदलाव नहीं होगा, तब तक उनके जनता के रक्षक बनने का सपना अधूरा रहेगा। आज़ाद भारत में पुलिस और प्रशासन का उद्देश्य सत्ता की रक्षा करना नहीं, बल्कि संविधान, कानून और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना होना चाहिए।
आज़ादी का अर्थ केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं है। उसका वास्तविक अर्थ यह भी है कि नागरिक अपने ही देश की पुलिस और प्रशासन से भयभीत होकर नहीं, बल्कि अपने अधिकारों के प्रति आश्वस्त होकर जी सकें
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