
अघोषित आपातकाल के सवाल पर अनेकों किताबें, रिसाले, टिप्पणियां, वार्ताएं, पत्रिकाएं छप चुकी है और यह सिलसिला अभी भी जारी है। किसी भी लेखक की कलम की धार उसकी परवरिश किस माहौल में हुई इस पर भी बहुत कुछ मुनासिर होता है। किताब का लेखक हिंदुस्तान का मशहूर पत्रकार होने के बावजूद साफगोई के साथ लिखता है,
” मैंने खुद एक समाजवादी युवजन छात्र के रूप में आपातकाल को देखा और जिया है। समाजवादी पिता के साथ महीनो जेल में रहा फिर जेल से बाहर आने के बाद आपातकाल के विरुद्ध भूमिगत आंदोलन में सक्रिय रहा।”
इसके बावजूद उनकी किताब बिना किसी की तरफदारी या मुखालफत के सच्चाई बयां करती है। पत्रकार/ लेखक जयशंकर गुप्त द्वारा लिखित किताब ‘आपातकाल से अमृतकाल’ को पढ़कर लगा की आधुनिक भारत के राजनीतिक इतिहास के विद्यार्थियों, परीक्षार्थियों के लिए भी यह सहायक सिद्ध होगी, कहना गलत ना होगा। 525 पन्नों की इस किताब में अध्याय के रूप में काली मनहूश रात, कारण और पृष्ठभूमि, ऐतिहासिक विभाजन, लोकप्रियता का चरम, गुजरात का नव निर्माण आंदोलन, बिहार आंदोलन, संपूर्ण क्रांति आंदोलन, इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला, आपातकाल की अधिसूचना, मीडिया पर अंकुश और प्रतिरोध, दबाव में न्यायपालिका, संजय गांधी की संविधानेत्तर सत्ता, दमन और प्रतिरोध, जार्ज फर्नांडीज और डायनामाइट कांड, आपातकाल में आप बीती, आरएसएस का दोहरा चरित्र, चुनाव और आपातकाल का अन्त, आपातकाल के बाद, इंदिरा गांधी की वापसी, राजीव गांधी का राजनीतिक उदय और अंत, मंडल और मंदिर- मस्जिद विवाद, राव सरकार के 5 वर्ष, अस्थिर सरकारें, राजक की अटल सरकार, संप्रग की मनमोहन पारी, राष्ट्रीय राजनीति में मोदी, मोदी काल, विवादित मुद्दों पर अमल, कोरोना का कहर, अमृत काल, आम चुनाव 2024, कमजोर हुआ करिश्मा, पहलगाम पर आतंकी हमला, बेआबरू होकर धनखड़ निकले, पश्चिम बंगाल में खिला कमल, कॉकरोच के बहाने जेन जी का उभार, शताब्दी वर्ष में संघ की सत्ता, स्वतंत्रता संग्राम और संघ, आपातकाल की इंदिरा बनाम अमृतकाल के मोदी, संविधान की हत्या।
परिशिष्ट के रूप में, इंदिरा गांधी को लिखे सर संचालक बालासाहेब देवरस के पत्र ( याचना पत्र) महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री शंकर राव चव्हान को देवरस के पत्र, सरसंघचालक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, पत्र संख्या दो, पत्र संख्या 3, आचार्य विनोबा भावे को लिखा बाला साहब देवरस का पत्र, विनोबा भावे को श्री देवरस का दूसरा पत्र, शंकर राव चव्हान को श्री देव रस का दूसरा पत्र, लोकसभा की मियाद बढाए जाने के विरोध में मधु लिमए का त्यागपत्र।
यकीनन, आपातकाल आजाद भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में एक काला और कलंकित अध्याय था। भारतीय लोकतंत्र का एक बेहद स्याह और शर्मनाक अध्याय। एक मनहूस कालखंड जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपनी सत्ता की सलामती के लिए समूचे देश को कैदखाने में तब्दील कर दिया था। विपक्षी दलों के तमाम नेता और कार्यकर्ताओं के साथ ही सरकार ने असहमति रखने वाले लोग जेलो में ठूस दिए गए थे। जबरन नसबंदी, मानवधिकार, नागरिक स्वतंत्रताओं और प्रेस तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचला गया। सभी संवैधानिक संस्थाएं -संसद, न्यायपालिका और कार्यपालिका पंगु और निस्तेज कर दी गई थी। लेखक का मानना है कि आपातकाल की हकीकत को आज की पीढ़ी के लिए जानना बहुत जरूरी है, जो उस समय पैदा भी नहीं हुई थी या फिर आपातकाल के मायने समझने के लायक नहीं थी। जाहिर सी बात है कि इतने साल बीत जाने के बाद लोगों की चेतना पर आपातकाल के निशान धुंधले पड़ गए हैं इसलिए भी आज न सिर्फ आपातकाल को याद करना बल्कि उसके प्रति देशवासियों को चौकस करना भी जरूरी है ताकि दोबारा वैसे कल का सामना नहीं करना पड़े, भविष्य में कोई सत्तारूढ़ दल और उसका नेता वैसी हरकत और हिमाकत नहीं कर सके जैसा तत्काल तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 25- 26 जून 75 की दरमियानी रात में किया था।
नरेंद्र मोदी की सरकार और भाजपा पार्टी हर साल 25 जून को बड़ी तैयारी के साथ याद दिलवाने के लिए मुल्क भर में बड़े पैमाने पर आयोजन करती है। यही नहीं आपातकाल की याद को ताजा बनाए रखने के इरादे से एनसीईआरटी (राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद) ने नवी कक्षा के लिए सामाजिक विज्ञान की नई पाठ्य पुस्तक में आपातकाल पर एक अध्याय को शामिल किया है। इस अध्याय में आपातकाल को भारतीय लोकतंत्र के लिए गंभीर चुनौती बताया गया है।
किताब एक तरफ जहां आपातकाल की ज्यादतियों का कच्चा चिट्ठा बिना किसी लाग लपेट के खोलती है, वहीं नरेंद्र मोदी के अमृतकाल की दरी के नीचे दबे लोकतंत्र की हकीकत को बयां करती बताती है, आपातकाल मैं प्रत्यक्ष सेंसरशिप से जनता अंधेरे में थी तो मोदी काल में फेक न्यूज़, नफरत भरी कवरेज और सत्ता के प्रति समर्पित मुख्य धारा की मीडिया के जरिए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण (हिंदुओं के पक्ष में तथा मुस्लिम विरोधी नैरेटिव ) से समाज को बांटने की कोशिश की जा रही है। ——द वायर के कथन को आगे रखते हुए किताब कहती है “मोदी युग में मीडिया पर नियंत्रण इंदिरा गांधी के आपातकाल से भी बदतर है, क्योंकि यह ‘चुनावी तानाशाही’ का रूप ले चुका है, जहां मीडिया सांप्रदायिक विभाजन के लिए इस्तेमाल होता है!” पत्र -पत्रिकाओं और टीवी चैनलो, सोशल मीडिया पर भी सरकारी विज्ञापनों, सीबीआई, प्रवर्तन -निदेशालय और आयकर विभाग जैसी सरकारी एजेंसियों और यहां तक की अदालतों का भी इस्तेमाल कर असहमति के स्वरों को दबाने के जरिए अमृतकाल में भी अलग तरह के अघोषित आपातकाल के अक्स साफ दिख रहे हैं। आपातकाल में अगर मीडिया का एक बड़ा हिस्सा तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सत्ता के आगे समर्पित होकर उनकी तथा उनके पुत्र संजय गांधी की चाटुकारिता में जुट गया था, आज का या कहें मोदी काल में मीडिया के एक बड़ा हिस्सा या कहे मुख्य धारा का मीडिया इससे कहीं आगे निकलकर सत्ता पक्ष के लिए एजेंडा सेट करने से लेकर उसे राजनीतिक लाभ पहुंचाने की गरज से समाज में नफरत का जहर घोलनते हुए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के प्रयासों में भी लगा हुआ दिखता है। लेखक अफसोस के साथ लिखता है कि आपातकाल एक खास तरह की राजनीतिक संस्कृति और मानसिकता का परिचायक था, जिसे लागू तो इंदिरा गांधी ने किया था लेकिन बात के वर्षों में और आज भी वह एकाधिकारवादी मानसिकता कमोबेश सभी राजनीतिक दलों और उनके शीर्षस्थ नेताओं में देखने को मिलती रही है। जो इंदिरा गांधी जैसी नेता को अल्पकालिक तानाशाह बना देती है। और आज भी वही प्रवृत्तियां अच्छे दिन लाने के वायदे के साथ सत्तारूढ़ लोकप्रियता का चरम छू रहे लोगों के भीतर एकाधिकारवादी नेतृत्व का एहसास भर देती है। देश आज अंध राष्ट्रवाद और धार्मिक कट्टरपंथ के सहारे एक अराजक माहौल और अघोषित आपातकाल की ओर बढ़ रहा है। दबाव में न्यायपालिका, मंदिर मस्जिद विवाद, नागरिक कानूनो में बदलाव, किसान आंदोलन, अग्नि वीर, पुलवामा, पहलगाम, सर्जिकल स्ट्राइक, अंबानी अडानी की लूट, आज का मीडिया पहले से ज्यादा सतर्क, परंतु वह लोकतंत्र के लिए प्रतिबद्ध नहीं।आज की राजनीति के सबके नंगे सच को बेरहमी के साथ बेपर्दा करती हुई किताब लिखती है,
“लेकिन बात केवल नरेंद्र मोदी या उसकी सरकार की ही नहीं है, आजादी के बाद भारतीय राजनीति की यह बुनियादी समस्या रही है कि वह हमेशा से व्यक्ति केंद्रित रही है। यहां संस्थाओं, उनकी गरिमा और स्वायत्तता को उतना महत्व नहीं दिया जाता, जितना महत्व करिश्माई नेताओं को दिया जाता है। नेहरू से लेकर नरेंद्र मोदी तक की यही कहानी है। और यह प्रवृत्ति तकरीबन सभी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों में दिखती है। आज के राजनीतिक दलों में अंदरूनी लोकतंत्र नहीं के बराबर ही दिखता है। इसकी जगह व्यक्तिवाद, जातिवाद और परिवारवाद में ले ली है। केंद्र में हो या किसी राज्य में सरकार किसी भी दल की हो भ्रष्टाचार अब कोई मुद्दा नहीं रह गया है। यही नहीं अब तो अदालतों के फैसले भी सरकार की मंशा और ‘जन आस्था’ के आधार पर भी होने लगे हैं। सूचना का अधिकार लगभग बेअसर बना दिया गया है”। आपातकाल की अमृतकाल से तुलना करते हुए लेखक प्रेम शंकर झा की टिप्पणी के माध्यम से करते हुए लिखते हैं कि आपातकाल तवे पर पड़े पानी की बूंद की तरह क्षणिक था। इंदिरा गांधी का आपातकाल अल्पकालीन था लेकिन मोदी का अमृतकाल दीर्घकालीन है। शासन जाने के बाद भी उसके निशान बहुत दिनों तक बने रहेंगे। इंदिरा गांधी का शासन अधिनायक जरूर था परंतु वह धार्मिक सहिष्णु, बहुलतावाद, मैं यकीन रखता था।
किताब का एक रोचक अध्याय ‘आपातकाल में आप बीती’ है। लंबे समय के बंदी जीवन में कैदी थोड़ी सी आजादी की सांस लेने के लिए क्या-क्या जतन करता है उसकी बानगी भी किताब में पढ़ने को मिलेगी। किसी तरह अदालत में पेशी हो, शहर के अस्पताल में जाने का मौका मिले, छद्म नाम से पत्रव्यवहार, कैदियों द्वारा योजना बनाकर जेल से फरार होने का आंखों देखा मंजर, लेखक और उनके पिता द्वारा गांधी की सीख के मुताबिक शौचालय साफ करना, इस तरह की गाथा लिखते हुए एक मार्मिक प्रसंग भारत रत्न के खिताब से नवाजे गए, बिहार के भूतपूर्व मुख्यमंत्री रहे कर्पूरी ठाकुर का भी पढ़ने को मिलेगा। आपातकाल में कर्पूरी ठाकुर फरारी जीवन मैं कुछ समय के लिए दिल्ली में थे। जेब खाली थी एक पुराने भरोसे के जानकार वकील से मिलकर कहा की ₹50 की व्यवस्था कर दीजिए, वकील हैरान था, कर्पूरी जी आप कैसी बात कर रहे हैं₹50 से क्या होने वाला है आप कम से कम ₹500 रख लीजिए,कर्पूरी जी बोले फिलहाल आप केवल 50 रू ही दे दीजिए। एक राजनीतिक कार्यकर्ता के लिए इस तरह की नजीरें मुश्किल दौर में भी उसको चट्टान की तरह ईमानदारी बरतने तथा हर तरह के ज़ुल्म ज्यादती, बेइंसाफी के खिलाफ लड़ने का साहस प्रदान करती है।
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