दशहरा : अपने भीतर के अंधकार से संवाद

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Dussehra: Dialogue with the darkness within you

Parichay Das

— परिचय दास —

दशहरा आते ही हमारे आसपास एक परिचित उजास फैलती है। कहीं रामलीला के मंच सजते हैं, कहीं रावण के ऊँचे पुतले खड़े होते हैं और कहीं मेले की चहल-पहल बच्चों की आँखों में उत्सव के छोटे-छोटे संसार रचती है। किंतु इस उल्लास के बीच एक प्रश्न हमारे भीतर उतरता है : क्या रावण का पुतला जला देने से बुराई समाप्त हो जाती है, अथवा उसका दहन हमें अपने भीतर झाँकने का अवसर देता है?

दशहरा भारतीय सांस्कृतिक स्मृति का ऐसा पर्व है, जिसमें कथा और जीवन, उत्सव और आत्मपरीक्षण एक-दूसरे से मिलते हैं। रावण के दस सिर मनुष्य की उन अनेक वृत्तियों के प्रतीक माने जा सकते हैं, जो ज्ञान और शक्ति प्राप्त कर लेने के बाद भी उसे विवेक से दूर ले जाती हैं। रावण विद्वान था, शक्तिशाली था, किंतु उसका ज्ञान उसे अहंकार से मुक्त नहीं कर सका। उसकी कथा बताती है कि ज्ञान के साथ विनम्रता, शक्ति के साथ मर्यादा और उपलब्धि के साथ उत्तरदायित्व न हो, तो उत्कर्ष भी पतन का कारण बन सकता है।

आज के समय में यह प्रश्न और प्रासंगिक हो उठा है। विज्ञान और तकनीक ने मनुष्य की क्षमताओं को अभूतपूर्व विस्तार दिया है। सूचना क्षण भर में दुनिया के एक छोर से दूसरे छोर तक पहुँच जाती है, लेकिन क्या विवेक भी उसी गति से विकसित हुआ है? संवाद के साधन बढ़े हैं, पर असहमति को सहने की क्षमता कई बार घटती दिखाई देती है। झूठ, सामाजिक विद्वेष, हिंसा और सत्ता का अहंकार सार्वजनिक जीवन को प्रभावित करते हैं। ऐसे समय में दशहरा याद दिलाता है कि बाहरी विजय से पहले आंतरिक विवेक की विजय आवश्यक है।

पश्चिमी चिंतन की आधुनिक धाराओं में व्यक्ति की स्वतंत्रता, सत्ता की आलोचना, विवेक और मानवीय गरिमा को महत्त्व दिया गया है। आधुनिक सभ्यता की विडंबनाओं पर भी प्रश्न उठे हैं, जहाँ साधनों की प्रचुरता के बावजूद नैतिक विवेक संकुचित हो सकता है। तकनीकी दक्षता अपने आप में नैतिकता नहीं है, आर्थिक समृद्धि संवेदना की गारंटी नहीं है और सत्ता प्राप्त कर लेना न्यायपूर्ण होने का प्रमाण नहीं है। इस दृष्टि से रावण उस मानसिकता का रूपक बन जाता है, जो अपनी क्षमता को ही अपनी श्रेष्ठता का अंतिम प्रमाण मान बैठती है।

भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में मर्यादा, आत्मसंयम और लोकमंगल के मूल्य महत्त्वपूर्ण रहे हैं। आधुनिक पश्चिमी विचार ने स्वतंत्रता, अधिकार और संस्थागत उत्तरदायित्व के प्रश्नों को प्रमुखता दी है। इन दोनों दृष्टियों के बीच संवाद की आवश्यकता है। समाज को अधिकार भी चाहिए और उत्तरदायित्व भी, स्वतंत्रता भी चाहिए और आत्मसंयम भी। परंपरा का सम्मान करते हुए उसकी विवेकपूर्ण समीक्षा करना सांस्कृतिक जीवन का आवश्यक अंग है। दशहरा इन मूल्यों को एक साथ समझने का अवसर दे सकता है।

आज हम अपने विचारों और पहचानों के आधार पर मनुष्यों को सहज ही दो खेमों में बाँट देते हैं। अपने पक्ष की गलतियाँ छोटी और दूसरे पक्ष की कमियाँ बड़ी दिखाई देती हैं। ऐसी मानसिकता में रावण-दहन आत्मालोचन के बजाय दूसरों को दोषी ठहराने का आयोजन बन सकता है। हम अपने बाहर के रावण को पहचानने में तत्पर रहते हैं, लेकिन अपने भीतर छिपे छल, अहंकार, असहिष्णुता और अन्याय को देखने से बचते हैं। उत्सव की सार्थकता तभी है, जब वह दूसरों पर निर्णय सुनाने से पहले अपने आचरण की जाँच करना सिखाए।

राम की विजय का अर्थ भी केवल युद्ध में सफलता नहीं है। रामकथा की सांस्कृतिक उपस्थिति मर्यादा, धैर्य, संकल्प और उत्तरदायित्व की आकांक्षा से जुड़ी है। आज जब असहमति को शत्रुता समझ लिया जाता है और सफलता के लिए किसी भी साधन को उचित ठहराने की प्रवृत्ति दिखाई देती है, तब मर्यादा का प्रश्न विशेष महत्त्व रखता है। अन्याय का प्रतिरोध आवश्यक है, लेकिन प्रतिरोध की भाषा स्वयं अन्यायपूर्ण नहीं होनी चाहिए। विजय का उत्सव किसी पराजित के प्रति अमानवीयता का उत्सव भी नहीं बनना चाहिए।

उत्सव हमें स्मृति से जोड़ते हैं, लेकिन स्मृति का अर्थ केवल अतीत को दोहराना नहीं है। उसका वास्तविक प्रयोजन वर्तमान को अधिक विवेकपूर्ण बनाना है। यदि रामकथा की नैतिक प्रेरणा हमारे पारिवारिक व्यवहार, सामाजिक संबंधों और सार्वजनिक जीवन में करुणा तथा न्याय का विस्तार नहीं करती, तो उत्सव का संदेश अधूरा रह जाता है। संस्कृति की जीवंतता इसी आत्मसमीक्षा में है।

दशहरा पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारी पर विचार करने का अवसर भी है। उत्सव का उल्लास यदि वायु को विषाक्त करे और ध्वनि से बच्चों, वृद्धों तथा बीमार लोगों को कष्ट पहुँचाए, तो उसके स्वरूप पर विचार करना चाहिए। परंपरा का सम्मान जड़ता नहीं है। वह तभी जीवित रहती है, जब समय के प्रश्नों से संवाद करती है और अपने मूल भाव को सुरक्षित रखते हुए अनावश्यक हानियों से मुक्त होने का रास्ता खोजती है। सुरक्षित सामग्री, प्रदूषण पर नियंत्रण और स्थानीय कारीगरों की भागीदारी उत्सव को अधिक उत्तरदायी बना सकती है।

हमारे समय में बाजार ने उत्सव की भावनाओं को वस्तुओं, विज्ञापनों और उपभोग की आकांक्षाओं से जोड़ दिया है। त्योहारों की रौनक अनेक बार खरीदारी, सजावट और सार्वजनिक प्रदर्शन से आँकी जाने लगी है। बाजार की अपनी भूमिका है, लेकिन जब उत्सव का सांस्कृतिक अर्थ उसके बाहरी वैभव में खोने लगता है, तब ठहरकर सोचने की जरूरत होती है। क्या त्योहार हमें अधिक उदार, संवेदनशील और आत्मीय बनाते हैं, या केवल कुछ समय के लिए हमारी इच्छाओं को चमकदार आवरण दे देते हैं?

यदि समाज में कमजोर व्यक्ति भय, अपमान और अन्याय से मुक्त नहीं है, सार्वजनिक जीवन में सत्य बोलना कठिन होता जा रहा है और व्यक्तिगत लाभ के सामने सामूहिक हित पीछे छूट जाता है, तो रावण-दहन अपने आप में पर्याप्त नहीं हो सकता। सांस्कृतिक प्रतीकों की सार्थकता उनके जीवनगत परिणामों में दिखाई देती है। राम की मर्यादा का स्मरण तभी उपयोगी है, जब वह हमारे व्यवहार, सामाजिक संबंधों और सार्वजनिक उत्तरदायित्व में परिवर्तन ला सके।

दशहरा अंततः अपने भीतर के अंधकार से संवाद करने की सांस्कृतिक प्रेरणा है। पुतले का दहन दृश्य है, लेकिन उसके पीछे छिपा आत्मपरीक्षण अधिक कठिन है। बाहर की आग कुछ क्षणों में बुझ जाती है, जबकि भीतर का अहंकार अपनी लपटें लंबे समय तक बचाए रख सकता है। इसलिए इस वर्ष रावण का पुतला जले, तो उसके साथ हमारे भीतर का थोड़ा-सा छल, द्वेष और अहंकार भी जल सके। हमारी विजय तभी सार्थक होगी, जब वह दूसरों की पराजय पर ठहरने के बजाय हमारे अपने आचरण को बेहतर बनाएगी। दशहरे की वास्तविक उजास इसी आत्मसंवाद से फैलती है।


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